Sunday, October 4, 2026

सम्भवामि युगे युगे -32

 सम्भवामि युगे युगे -32

             गौतम पत्नी अहिल्या ने भगवान की स्तुति की - ‘प्रभु ! मैं तो आपके दर्शन कर कृतार्थ हो गई । भला हुआ, ऋषि गौतम ने मुझे श्राप दिया । उन्होंने क्रोध में रहते हुए भी मेरा भला ही चाहा, तभी आज आपके दर्शन हुए । मुझे इस बात का कोई दुःख नहीं है कि मेरे पति ने मेरी निर्दोषता पर विश्वास नहीं किया । मेरा तो उनके दिए शाप से भला ही हुआ है ।’ इस प्रकार एक निर्दोष नारी को शापमुक्त कर भगवान ने अपनी प्रेमाभक्ति का वरदान देते हुए अहिल्या को गौतम ऋषि के पास भेज दिया ।

        भगवान की दृष्टि अब जनकपुरी पर है । भारत की उत्तर भूमि असुरों से लगभग रिक्त हो चुकी है । अब मुख्य प्रश्न था, रावण तक पहुंचने का । रावण का राज्य तो यहां से सुदूर दक्षिण में है । रावण को जीतना है, इसलिए माया का साथ चाहिए । माया सीता के रूप में मिथिला में है और मायापति से मिलने वाले आदेश की प्रतीक्षा भी कर रही है । भगवान का ज़नकपुरी जाने का मुख्य उद्देश्य यही है । 

          ऋषि विश्वामित्र के साथ राम और लखन जानकपुरी की ओर चल पड़े जहां सीता प्रतीक्षारत है । पुरुष और प्रकृति का मिलन ही पूर्णत्व को पुष्ट करता है । मिथिला के प्रवेशद्वार पर ही सतानन्दजी प्रतीक्षा कर रहे हैं । सतानन्दजी, मिथिला के राजपुरोहित और गौतम-अहिल्या के पुत्र । भगवान की अगवानी करते हुए प्रणाम करते हैं और बिना किसी औपचारिकता के पूछ लेते हैं कि क्या आपने मेरी मां का उद्धार कर दिया है ? भगवान इस प्रश्न के उत्तर में केवल मुस्कुरा देते हैं । भगवान भक्त को कृतार्थ करके ही मुस्कुरा सकते हैं । सतानन्दजी सब कुछ समझ जाते हैं । ऋषि सहित दोनों भाइयों को साथ लेकर सतानन्दजी राजा जनक के महल की ओर चल पड़े । 

क्रमशः 

प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल

 ।। हरिः शरणम् ।।

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