भाग - 1 से आगे
हिरण्याक्ष और हिरण्यकश्यप सतयुग में असुर थे, अब त्रेता में वे ब्राह्मण वर्ण में पैदा होंगे । अवश्य ही उन्होंने अपने आसुरी जीवन में ऐसे कर्म किए हैं, जो उनको ब्राह्मण शरीर तक ले जा रहे हैं । ब्राह्मण वर्ण में पैदा होकर भी रावण-कुम्भकरण में आसुरी सम्पदा की प्रबलता रहेगी क्योंकि उन पर सनकादिक ऋषियों का श्राप प्रभावी रहेगा । प्रश्न उठता है कि सतयुग से त्रेता तक की अवधि में उनकी जीवात्मा कहां रही ?
जैसा कि लेख के प्रारम्भ में ही मैंने स्पष्ट कर दिया है कि सब कुछ माया के खेल हैं । प्रकृति में परमात्मा द्वारा डाले गए विधान के अनुसार जीव अपने कर्मों के अनुसार ऊंची-नीची योनियों में जन्म लेकर भटकता रहता है । पुनः मानव देह मिलने से पूर्व भी वह कई जीव जैसे पशु, पक्षी यहाँ तक कि मनुष्य के रूप में भी कई शरीर भोग चुका होता है । हिरण्याक्ष और हिरण्यकश्यप ने भी ऐसे ही कई शरीरों से चौरासी की यात्रा तय की होगी । मानस में गोस्वामीजी ने प्रतापभानु की कथा के माध्यम से इस ओर संकेत भी किया है ।
एक देश- कैकय, वहाँ के राजा हैं, सत्यकेतु । इनके दो पुत्र - प्रतापभानु और अरिमर्दन । राज्य का उत्तराधिकारी बना, प्रतापभानु । प्रतापभानु राजा के सचिव थे, धरमरुचि । प्रतापभानु के राज्य में प्रजा बड़ी सुखी थी । सचिव धरमरुचि राजा के हितकारी और धार्मिक प्रवृति के थे । प्रतापभानु उनकी सलाह लेकर राज्य का संचालन करते थे । बस, एक जगह प्रतापभानु से चूक हो गई, वे अपने सचिव की सलाह न ले सके । जब संग अच्छा होता है तो शान्ति बनी रहती है, भीतर भी और बाहर भी । जहां कुसंग हुआ कि सब मटियामेट । एक चूक ने ही प्रतापभानु के साथ-साथ अरिमर्दन और धरमरुचि के भी प्राण ले लिए । इस चूक के साथ ही विधि ने तीनों को असुर योनि में डाल दिया । प्रतापभानु - रावण, अरिमर्दन-कुम्भकरण और धरमरुचि-विभीषण । चलिए ! पूरे वृतान्त पर दृष्टि डाल लेते हैं ।
राजा प्रतापभानु ने इस पृथ्वी पर एकछत्र राज किया था । चाहे संसार के सभी भोग-पदार्थ मिल जाए परन्तु व्यक्ति सन्तुष्ट नहीं हो सकता । प्रथम तो जो मिला है वह उसे सदैव अपर्याप्त लगता है और यदि सबकुछ मिल भी जाता है तो सदैव उसे खोने का भय सताता रहता है । प्रतापभानु दूसरी श्रेणी के राजा है । पूरी पृथ्वी को जीत लिया, अब अपना राज्य पूर्ण रुप से सुरक्षित रहे, केवल यही चिन्ता है ।
पराजित राजा सदैव विजयी राजा से अपना क्षेत्र येन केन प्रकारेण पुनः छीन लेने के अवसर की प्रतीक्षा करता है । शीघ्र ही वह दिन भी आ गया । पराजित राजा एकतनु नाम से साधु का वेश बनाकर जंगल में प्रतापभानु की प्रतीक्षा कर रहा था । माया का खेल देखिए, मृगया के लिए निकला प्रताप जंगल में राह भटक गया । पहुंच गया एकतनु की कुटिया पर । उसी रात छल लिया पराजित ने विजयी को । किसी के सभी दिन सदैव एक समान नहीं रहते । प्रतापभानु उसके जाल में फँस गया ।
विजयी को अक्षुण्ण राज्य चाहिए और पराजित को विजयी का सारा राज्य । इस संसार में सभी को कुछ न कुछ चाहिए, यहां कोई संतुष्ट नहीं है । लोभ में आकर राजा ने साधु बने एकतनु से उपाय पूछा । इसी अवसर की ताक में ही तो था वह पराजित राजा । एकतनु ने कुछ ऐसी ही सिद्धियों का प्रदर्शन किया कि प्रतापभानु उस पर विश्वास कर बैठा । राज्य को अक्षुण्ण बनाए रखने का कोई उपाय ? एकतनु बोला - ‘कल सभी विप्रों को भोज के लिए आमंत्रित करें और आप स्वयं उनको भोजन परोसें । आपके रसोइए के भेष में मैं स्वयं वहाँ आकर उनके लिए भोजन बनाउंगा । भोजन कर विप्रजन प्रसन्न हो गए तो जीवनभर आपका राज अक्षुण्ण रहेगा ।’
राजा प्रताप को माया-बल से रात को ही घोड़े सहित राजमहल पहुंचा दिया गया । एकतनु ने संपूर्ण राजमहल में अपना मायाजाल फैला दिया और स्वयं रसोइया बनकर वहां जा पहुंचा । प्रतिशोध की धधकती ज्वाला को शान्त करने के लिए हिरणों के मांस के साथ ब्राह्मण का मांस मिला दिया । प्रतापभानु ने ब्राह्मणों को भोजन परोसा । आकाशवाणी हुई और ब्राह्मणों को पता चल गया कि भोजन अभक्ष्य है । ब्राह्मणों के पास देने के लिए दो ही चीजें हैं - आशीर्वाद और श्राप । प्रसन्न हो गए तो आशीर्वाद मिलेगा और रुष्ट हो गए तो श्राप । क्रोधित ब्राह्मणों ने प्रतापभानु को सपरिवार राक्षस होने का श्राप दे डाला । वही प्रतापभानु त्रेतायुग में परिवार सहित राक्षस बना जिसका नाम था - रावण । छोटा भाई अरिमर्दन का जन्म कुम्भकरण के रूप में हुआ । बड़े धार्मिक विचारों वाले और राजा को न्यायसंगत व हितकारी सलाह देने वाले सचिव धरमरुचि विभीषण बने ।
इस प्रकार हमने कथा के अन्तर्गत देखा कि प्रतापभानु स्वयं रावण हुआ, उसके भाई ने कुम्भकर्ण के रूप में जन्म लिया और जो सात्विक गुणों से युक्त प्रतापभानु का एक मन्त्री था, वह बना उसका छोटा भाई विभीषण । विभीषण ने राक्षस राज में रहते हुए भी अपने पूर्व जीवन की शुचिता को बनाए रखा । सदैव उस परमात्मा का स्मरण करता रहता था, जिसका नाम लेना भी रावण-राज में अपराध माना जाता था, यहां तक कि स्वयं रावण भी उन्हें वनवासी कहता था । विभीषण को भक्ति के कारण भगवान भी मिले और लंका का राज भी ।
पुनः स्मरण करा दूँ कि परमात्मा ने ही प्रकृति और उसके विधान बनाए हैं । इसके बाद जो कुछ भी करती है अथवा जो कुछ भी होता है, सब प्रकृति के माध्यम से ही होता है , परमात्मा की भूमिका केवल एक साक्षी होने तक ही सीमित रहती है । परमात्मा तभी अवतरित होते हैं, जब धर्म की हानि और अधर्म की अनियंत्रित रूप से वृद्धि होने लगती है । परमात्मा भी अपने प्रकटीकरण में प्रकृति को अधीन करते हुए उसकी सहायता लेते हैं । प्रकृति ने ही मनुष्य को कर्म स्वतंत्रता दी है । मनुष्य के द्वारा किए जाने वाले कर्मों के परिणाम देने के लिए प्रकृति ही उसे विभिन्न शरीरों में घुमाती रहती है ।
चलें, आगे बढ़ते हैं और प्रवेश करते हैं, जय-विजय के दूसरे राक्षस जीवन की कथा में । ऋषि विश्रवा (ऋषि पुलस्त्य के पुत्र) का दैव योग से राक्षसी कैकसी के साथ विवाह हो जाता है । संतान के रूप में दसग्रीव पैदा होते हैं । दसग्रीव के दो सगे भाई भी हैं - कुम्भकर्ण और विभीषण । एक बहिन भी है - सूपनखा । एक सौतेला भाई कुबेर भी हैं जो विश्रवा की पहली पत्नी इलविला के पुत्र हैं । इस प्रकार पुलस्त्य कुल में राज्य का उत्तराधिकारी कुबेर को होना चाहिए था परन्तु हो गया, रावण ।
कैकसी ने भी दिति की तरह ही विश्रवा से सायं के समय संयोग की कामना की क्योंकि उसके मन में राक्षस पुत्र प्राप्ति की कामना थी । असमय किए गए कार्य के परिणाम कभी अच्छे नहीं होते । असमय के इस संयोग से रावण और कुम्भकर्ण पैदा हुए ।
पुत्र को पिता के गुणसूत्र विरासत में मिलते हैं । विश्रवा का कैकसी से उत्पन्न हुआ ज्येष्ठ पुत्र रावण बड़ा ज्ञानी था । रावण ने अपने भाइयों के साथ ब्रह्माजी को प्रसन्न करने के लिए तपस्या की । परिणामस्वरूप वरदान तो मिलने ही थे । रावण ने देवताओं, दानवों और यक्षों से अजेय होने का वर मांगा । पूर्वजीवन में प्रतापभानु ने जैसी एक चूक की थी वैसी ही एक चूक इस जीवन में रावण भी कर बैठा । मनुष्यों और वानरों को उसने तुच्छ समझ लिया । अंततः वे ही उसकी मृत्यु का कारण बने । कुंभकर्ण मांगना तो चाहता था इंद्रासन परन्तु बुद्धि के फेर से मांग बैठा निद्रासन, छः माह तक सोना और एक दिन के लिए जागना । इस वरदान के पीछे भी माया का हाथ रहा । माया के आग्रह पर ही सरस्वतीजी ने उसकी बुद्धि फेर दी थी । विभीषण ने भक्ति का वरदान मांगा ।
सब कुछ माया का खेल है । विभीषण परमात्मा की भक्ति नहीं मांगता तो क्या होता ? प्रश्न कितने ही कर लो, परमात्मा की रची माया को कोई नहीं जान सकता । अहंकारी असुर को भक्ति से नफ़रत होती है । ऐसे में रावण कब तक विभीषण को लंका में बर्दाश्त करता । उसने अपने सौतेले भाई कुबेर तक को तो लंका में नहीं रहने दिया । उसका सब कुछ छीन लिया, यहाँ तक कि उसका पुष्पक विमान भी । भागकर कुबेर को शंकर की शरण में जाना पड़ा । अंततः उसको शिव ने अपने चरणों में स्थान दिया । शंकर के निवास स्थान पर्वत कैलाश की तलहटी में बनी मानसरोवर झील के मध्य, अथाह जल की गहराई में कुबेर का महल है, ऐसी मान्यता है ।
कुबेर का पैतृक स्थान उसके हाथ से निकल गया जबकि लंका का वास्तविक उत्तराधिकारी वही था । उसका पुष्पक विमान छीन लिया गया, उसकी सारी सम्पति हड़प ली गई । भागकर कुबेर अपने आराध्य के चरणों में जा बैठा । कैलाश की तलहटी में स्थित मानसरोवर झील में अपना महल बना लिया । विभीषण तो रावण का सगा भाई है । उसका लंका में रहना पारिवारिक दृष्टि से उचित ही था, इसलिए उसकी उपस्थिति को सहन भी करना पड़ा । असुर और भक्त के मध्य सदैव ही छत्तीस का आँकड़ा रहता है । एक न एक दिन दोनों में दुराव होना निश्चित ही था । एक दिन रावण ने विभीषण को लंका से लात मारकर निष्कासित कर दिया । भक्त का एक ही आश्रय होता है - भगवान का । लंका से निकलकर पहुंच गया उनकी शरण में । यही विभीषण दैवयोग से रावण का काल बना ।
रावण का अहंकार उसके सर चढ़कर बोल रहा था । उसके आतंक से पृथ्वी व्यथित हो गई । पृथ्वी और सभी देवताओं को साथ लेकर ब्रह्माजी पहुँच गए, श्रीहरि के यहां । आश्वासन मिल गया - आ रहा हूँ, भूमि का भार उतारने । मैंने पूर्व में भी कहा है कि परमात्मा को धर्म की पुनः स्थापना करने के लिए पंच भौतिक देह लेकर ही आना पड़ता है । वे भी बैकुण्ठ में बैठे-बैठे ही करने को सब कुछ कर सकते हैं, पर नहीं करते । वहीं बैठे-बैठे करने में उनका बनाया विधान ही बाधक बन जाता है । विधान बनाने वाला विधान को तोड़ भी सकता है परन्तु वे नहीं तोड़ते । वे हम जैसे मनुष्यों के सामने अनुकरणीय उदाहरण प्रस्तुत करना चाहते हैं ।
उनके विधान को लागू करने का कार्य माया (प्रकृति) करती है । प्रकृति ही सृष्टि रचती है, उसका संचालन करती है और समय आने पर वह सृष्टि को समेट भी लेती है । जब भी अवतरित होने के लिए परमात्मा को देह चाहिए होती है, वे प्रकृति को अपने अधीन कर देह प्राप्त कर लेते हैं ।
उधर जय-विजय को सनकादिक ऋषियों का शाप और इधर मनु-शतरूपा को दिया वरदान, मानव देह प्राप्त करने के लिए इससे अनुकूल स्थिति क्या हो सकती है ? निर्णय हो गया कि पृथ्वी पर चलते हैं, राम बनकर । मायापति ने माया को कह दिया, जनकपुर जाओ । वहां जाकर शरीर लिया और पृथ्वी से प्रकट होकर बन गई जनकसुता जानकी । भला, प्रकृति के बिना परमात्मा लीला कैसे कर सकते हैं ? लीला तो प्रकृति के माध्यम से ही हो सकती है । लंका विजय के पश्चात् सीता कहती भी है कि सब जगह नाम तो राम का हो रहा है परन्तु उनके जन्म से लेकर सब कार्य (लीलाएँ) मेरे द्वारा ही की जा रही है । सत्य है, राम तो करने और पाने से भी परे हैं । गीता में परमात्मा स्वयं कहते हैं - शरीरस्थोपि कौन्तेय न करोति न लिप्यते ।
मनु-शतरूपा को दिया वरदान केवल प्रसन्न होकर दिया गया वरदान नहीं था । परमात्मा जानते थे कि जय-विजय का त्रेता में भी असुरोद्धार करना है । मनु हुए अवध के राजा दशरथ और शतरूपा वहां की पटरानी कौशल्या । राजा को चाहिए पुत्र । पुत्रेष्टि यज्ञ सम्पन्न कराया, वशिष्ठजी के आग्रह पर शृंगी ऋषि ने । यज्ञ भगवान की कृपा से तीन रानियों के चार पुत्र हुए - कौशल्या से राम, कैकेयी से भरत तथा सुमित्रा से लखन और रिपुदमन । सभी का बड़े लाड़-प्यार से लालन-पालन होने लगा । बड़े हो रहे हैं परंतु राम को राजमहल कुछ रूच नहीं रहा है ।
परमात्मा के अवतरण का उद्देश्य तो भूमि को असुरों के भार से मुक्त करना है, राजमहल का सुख भोगना नहीं है । धर्मशील जन बाहर संसार में बैठे भगवान को सहायता के लिए पुकार रहे हैं, ऋषि लोग यज्ञ नहीं कर पा रहे हैं । असुरों ने तांडव मचा रखा है । अधर्म बढ़ते हुए ऐसी स्थिति में आ गया है कि वह धर्म को दबाने लगा है । ऐसे में भला राम कब तक राजमहल में रुक सकते हैं ? भक्त पुकारे और भगवान हाथ पर हाथ धरे बैठे रहें, क्या ऐसा भी कभी हो सकता है ? निकलना होगा राजमहल से बाहर परंतु कैसे ? इसमें भी माया ही कुछ सहायता करेगी ।
माया ने भूमिका तैयार की । असुरों के भय ने विश्वामित्र ऋषि को विवश कर दिया कि राजा के सामने भगवान को मांगने की याचना करे । पुत्रासक्ति ने मना कर दिया । गुरु वशिष्ठ ने धर्म को, पिता और कर्तव्य के मध्य लाकर खड़ा कर दिया । गुरु की यही भूमिका होती है कि वह राजा से उसके धर्म का पालन करवाता रहे । राजा का धर्म है - प्रजा की रक्षा करना । राम-लखन चले गए विश्वामित्र के साथ । असुरों को मारते हुए आगे बढ़ते हुए वन में सूनी पड़ी कुटिया में पाषाण बनी अहिल्या का उद्धार किया ।
अहिल्या ब्रह्माजी की मानस पुत्री थी, बहुत सुंदर थी वह । पिता को पुत्री के विवाह की चिन्ता होती ही है परन्तु किसी ऐरे-ग़ैरे को तो नहीं सौंपी जा सकती । वर के लिए एक आवश्यक योग्यता तय कर दी गई - ‘समस्त त्रिलोकी की परिक्रमा कर सबसे पहले पहुंचने वाले के साथ ही अहिल्या का विवाह होगा ।’ इधर स्वर्ग का राजा इन्द्र अहिल्या की सुन्दरता पर मुग्ध था । देवराज हुआ तो क्या हुआ, भोगों के बीच रहने वाले की भोगों के प्रति आसक्ति क्या कभी समाप्त हो सकती है ? दौड़ पड़े इन्द्र त्रिलोकी का चक्कर लगाने और पहुंच भी गए सबसे पहले, फिर भी अहिल्या के साथ विवाह नहीं हो सका । अहिल्या का विवाह हुआ गौतम ऋषि के साथ ।
अहिल्या और इन्द्र के बीच नारद आ गए । इन्द्राणी में क्या कमी है जो अहिल्या के पीछे पड़े हो । नारदजी भी ब्रह्माजी के मानस पुत्र हैं । अपनी बहन अहिल्या को एक भोगी को जानबूझकर क्यों दे ? पिता को स्पष्ट कह दिया - ‘गौतम ऋषि ने त्रिलोकी की परिक्रमा सबसे पहले पूरी की है, इसलिए अहिल्या का विवाह गौतम से होना चाहिए ‘। प्रश्न उठा कि गौतम ऋषि ने त्रिलोकी की परिक्रमा सबसे पहले कैसे पूरी की ? नारद ने कहा - ‘अपने आश्रम में ऋषि गौतम ने प्रसव करती एक गाय की परिक्रमा की है और प्रसव करती गाय की परिक्रमा करना त्रिलोकी की परिक्रमा करने के समान है । आज भी वे उस गाय की बछड़े सहित प्रतिदिन परिक्रमा करते हैं । इसलिए अहिल्या के लिए योग्य वर ऋषि गौतम है न कि इन्द्र ।’
इस प्रकार अहिल्या का विवाह तो हो गया परन्तु इससे इन्द्र की उसे भोगने की इच्छा कम होने के स्थान पर बढ़ती ही गई । ऋषि अपनी पत्नी के साथ एक कुटिया में अपना वैवाहिक जीवन बिता रहे हैं और इधर इन्द्र उनकी कुटिया में प्रवेश करने का प्रयास कर रहा है । चन्द्रमा से साथ मांगा । दोनों ऋषि के आश्रम तक पहुंच भी गए । मध्य रात्रि का समय, पति-पत्नी कुटिया में गहरी नींद में । कैसे भी हो ऋषि को कुटिया से बाहर निकाल कर कहीं दूर भेजा जाए । माया का सहारा लिया गया । चन्द्रमा बन गए मुर्ग़ा और मध्य रात्रि को ही बांग दे डाली । ऋषि ने ब्रह्ममुहूर्त हुआ जान शैया त्याग दी और चल पड़े गंगा-स्नान को ।
इन्द्र ने गौत्तम ऋषि का रूप धरकर कुटिया में प्रवेश किया और चन्द्रमा बाहर पहरा देने लगे । इस प्रकार फिर एक नारी कामवासना से छली गई । इधर ऋषि स्नान करने गंगा में उतरने वाले ही थे कि मां प्रकट हो गई । गंगा मां ने ऋषि को इन्द्र की सारी मायावी चाल समझा दी । ऋषि आश्रम की ओर दौड़ पड़े । विवाहोपरांत नारी की सुरक्षा की ज़िम्मेवारी उसके पति पर होती है । ऋषि को आया देखकर चन्द्रमा भागने लगा । ऋषि ने उस पर अपना कमण्डल दे मारा । धक्का देकर कुटिया का द्वार खोला तो गौतम का रूप धरे इन्द्र को देखा । ऋषि को देखकर इन्द्र बाहर की ओर दौड़ पड़ा । क्रोधित ऋषि ने उसे नपुंसक हो जाने का श्राप दे डाला ।
ऋषि का क्रोध अभी भी कम नहीं हुआ था । क्रोध जब सीमा पार कर जाता है तो उसका शिकार बनती है बेचारी अबला । लाख क्षमा मांग ले नारी, आज तक पुरुष ने कभी उसको क्षमा नहीं किया है । पाषाण होने का श्राप दे दिया अहिल्या को । क्रोधित ऋषि भी अपने स्तर से गिर चुके थे । उनका तप नष्ट हो चुका था । शान्त होकर हिमालय की ओर चल पड़े और जाते-जाते पाषाण बनी अहिल्या को कहते गए कि त्रेता में भगवान राम की चरण रज के स्पर्श से ही तुम इस श्राप से मुक्त हो सकोगी ।
एक नारी जिसे अबला कहा जाता है किसी पुरुष के सामने कैसे विवश हो जाती है, अहिल्या के साथ हुआ अत्याचार इसका प्रमाण है । पाप इन्द्र ने किया परन्तु परिणाम अहिल्या को भी भोगना पड़ा । सूने आश्रम में केवल पाषाण बनी अहिल्या रह गई, पशु-पक्षियों तक ने वह स्थान छोड़ दिया । पाषाण बनी अहिल्या भगवान के आगमन की प्रतीक्षा करते हुए केवल राम-राम रटने लगी ।
भगवान अंतर्यामी भी है और सर्वत्र भी । उधर मिथिला में श्रीराम के आगमन की प्रतीक्षा कर रही है सीता । प्रकृति के बिना पुरुष अधूरा है । जब प्रकृति साथ होती है पुरुष के, तब कहीं जाकर वह पूर्णता को प्राप्त होता है । जाना तो है जनकपुरी परन्तु इधर उठ रही भक्त की पुकार को भगवान अनसुना भी तो नहीं कर सकते । विस्वामित्रजी की आज्ञा से राह बदल ली और पहुंच गये निर्जीव निःशब्द पड़े गौतम ऋषि के आश्रम में । पत्थर हो गई नारी को देखकर पूछ बैठे राम । विस्वामित्रजी ने सारी कथा सुना दी और बोले - ‘हे राम ! आपकी चरण-रज चाहती है, यह शापित नारी ।’
जिनका जन्म ही समाज में मर्यादा स्थापित करने के लिए हुआ हो, वह अपने पैरों से भला किसी नारी-मूर्ति को भी छूने की कल्पना कैसे कर सकता है ? ‘नहीं, मैं ऐसा नहीं कर सकता । हे माते ! इस कठिन समय में मेरी सहायता करो ।’ भला मायापति के आग्रह को माया कैसे ठुकरा सकती है ? कहा जाता है कि उसी समय वायु तीव्र गति से भगवान राम से शापित अहिल्या की तरफ़ बहने लगी । भूमि की विरल रज उड़ी और पाषाण हुई नारी को छू गई । तत्काल ही पाषाण हुई नारी में हलचल हुई और सुन्दर अहिल्या प्रकट हो गई । मर्यादा पुरुषोत्तम राम अपने अनुज सहित आगे बढ़े और दोनों ने नारी शक्ति को प्रणाम किया । बिना अपराध के मिली सजा से आज जाकर नारी मुक्त हुई है परन्तु इस मुक्ति के लिए भगवान को स्वयं आना पड़ा ।
गौतम पत्नी अहिल्या ने भगवान की स्तुति की - ‘प्रभु ! मैं तो आपके दर्शन कर कृतार्थ हो गई । भला हुआ, ऋषि गौतम ने मुझे श्राप दिया । उन्होंने क्रोध में रहते हुए भी मेरा भला ही चाहा, तभी आज आपके दर्शन हुए । मुझे इस बात का कोई दुःख नहीं है कि मेरे पति ने मेरी निर्दोषता पर विश्वास नहीं किया । मेरा तो उनके दिए शाप से भला ही हुआ है ।’ इस प्रकार एक निर्दोष नारी को शापमुक्त कर भगवान ने अपनी प्रेमाभक्ति का वरदान देते हुए अहिल्या को गौतम ऋषि के पास भेज दिया ।
भगवान की दृष्टि अब जनकपुरी पर है । भारत की उत्तर भूमि असुरों से लगभग रिक्त हो चुकी है । अब मुख्य प्रश्न था, रावण तक पहुंचने का । रावण का राज्य तो यहां से सुदूर दक्षिण में है । रावण को जीतना है, इसलिए माया का साथ चाहिए । माया सीता के रूप में मिथिला में है और मायापति से मिलने वाले आदेश की प्रतीक्षा भी कर रही है । भगवान का ज़नकपुरी जाने का मुख्य उद्देश्य यही है ।
ऋषि विश्वामित्र के साथ राम और लखन जानकपुरी की ओर चल पड़े जहां सीता प्रतीक्षारत है । पुरुष और प्रकृति का मिलन ही पूर्णत्व को पुष्ट करता है । मिथिला के प्रवेशद्वार पर ही सतानन्दजी प्रतीक्षा कर रहे हैं । सतानन्दजी, मिथिला के राजपुरोहित और गौतम-अहिल्या के पुत्र । भगवान की अगवानी करते हुए प्रणाम करते हैं और बिना किसी औपचारिकता के पूछ लेते हैं कि क्या आपने मेरी मां का उद्धार कर दिया है ? भगवान इस प्रश्न के उत्तर में केवल मुस्कुरा देते हैं । भगवान भक्त को कृतार्थ करके ही मुस्कुरा सकते हैं । सतानन्दजी सब कुछ समझ जाते हैं । ऋषि सहित दोनों भाइयों को साथ लेकर सतानन्दजी राजा जनक के महल की ओर चल पड़े ।
भगवान लीला करते हैं, अपनी माया की सहायता लेकर । माया ने राजा जनक द्वारा जनकपुर में अपनी पुत्री सीता का स्वयंवर रचवा दिया । राम को ही सीता चाहिए इसलिए माया ने जनकजी से शिव-धनुष तोड़ने की कठिन शर्त रखवा दी । यह इतनी कठिन शर्त थी कि उस धनुष को तोड़ना किसी साधारण मनुष्य के वश की बात नहीं थी । धनुष का भारी अथवा हल्का होना, कठोर अथवा लचीला होना, प्रकृति के बल पर निर्भर करता है । किसी के लिए एक तिनका भी भारी हो सकता है और किसी के लिए गिरिराज भी हल्के । सब कुछ परमात्मा की इच्छानुसार माया रचती रही । जगदीश का धनुष भला जगतपिता के अतिरिक्त दूसरा कौन तोड़ सकता है ? अंततः धनुष-भंग हुआ और सीता ने राम को वर लिया ।
स्वयंवर का पूर्ण हो जाने का अर्थ यह नहीं है कि सबकुछ शान्ति से सम्पन्न हो गया है । अभी भी भगवान को माया के माध्यम से कुछ लीला और करनी है । त्रेता के दूसरे अवतार प्रतीक्षा कर रहे हैं, त्रेता के प्रथम अवतार की । तभी परशुरामजी का आगमन हो जाता है । परशुरामजी, परमात्मा के अंशावतार । क्रोध तो जैसे सदा उनकी नाक पर ही बैठा रहता है । इक्कीस बार भूमि को क्षत्रिय विहीन कर चुके हैं, ब्राह्मणों के परम हितैषी । माया ने क्यों बुलाया ऐसे क्रोधी को, रंग में भंग डालने के लिए । भगवान की लीला इतनी शीघ्रता से समझ में आ जाए तो फिर माया ही क्या हुई ?
समस्या थी कि परशुरामजी के पास भी शिव का एक धनुष था । संभावना बनती है कि यह धनुष कभी भी रावण को आशीर्वाद स्वरूप मिल सकता हैं । भविष्य में ऐसा न हो इसके लिए कैसे रोका जाए उनको ? यह कार्य माया के माध्यम से ही हो सकता था । माया ही परशुरामजी को धनुष-यज्ञ स्थल पर खींच लाई ।
अंशावतार होते हुए भी परशुरामजी परमात्मा को नहीं पहचान सके । लक्ष्मण के साथ बड़ा वाद-विवाद हुआ । अन्ततः राम को बीच में आना पड़ा । बड़े प्रभावित हुए परशुरामजी । ‘ अरे ! ये तो साक्षात् परम ब्रह्म हैं, कैसे पुष्टि करूँ?’ उनके द्वारा भगवान होने की केवल एक ही परीक्षा ली गई और परशुरामजी के हाथ का शिव-धनुष अपने आप राम के पास चला गया । शान्त भाव से परशुरामजी ने भगवान श्रीराम का अभिवादन किया और तपस्या करने वन में चले गए ।
धनुष-भंग के साथ ही राम-सीता विवाह हो गया, फिर भी सामाजिक मान्यता के लिए पाणिग्रहण संस्कार भी होना आवश्यक है । इसके लिए दशरथजी को सपरिवार बुलावा भेजा गया । दशरथजी बारात लेकर आये और चारों भाइयों का विवाह सम्पन्न हो गया । सीता-राम, माण्डवी-भरत, उर्मिला-लक्ष्मण और श्रुतिकीर्ति-शत्रुघ्न । सब को साथ लेकर लौट आए राजा दशरथ अयोध्या को । अयोध्या लौटते ही राजा दशरथ ने राम को अयोध्या की सेना का सेनापति बना दिया । एक तरफ़ राज्य की सुरक्षा का भार और दूसरी ओर गृहस्थ जीवन । लेकिन राम-सीता ने कोई गृहस्थ जीवन जीने के लिए तो शरीर धारण नहीं किए थे । आगे की योजना, प्रकृति स्वयं बनाएगी । प्रकृति परिवर्तन का ही दूसरा नाम है । बालक युवक में परिवर्तित होता है, युवा प्रोढता को प्राप्त होता है और प्रोढ वृद्ध में परिवर्तित होता है । जीव को स्वयं के शरीर में हो रहे इन परिवर्तनों का भान तो होता है परन्तु वह सदैव ही इन संकेतों की उपेक्षा करता आया है ।
दशरथजी को भी एक दिन अपनी दस्तक दे रही वृद्धावस्था का भान हुआ, जब वे दर्पण के सामने खड़े होकर अपने आप को निहार रहे थे । कानों के ऊपर के बाल सफ़ेद होते जा रहे हैं । समझ गए कि समय आ गया है, उत्तराधिकारी को राज-पाट सौंपने का । गुरु वशिष्ठजी को बुलाया गया । मंत्रणा हुई कि चारों भाई एक साथ जन्मे, एक साथ पले-बढ़े, न कोई बड़ा न कोई छोटा । किसको राज्य सौंपा जाय ?
जिस माया को बार-बार बीच में ला रहा हूँ, जरा उस विधि का विधान तो देखिए । भरत-शत्रुघ्न कैकय देश में, अवध से बहुत दूर, सुदूर पश्चिम में । तत्काल बुलावा भेजना और उनका आ पाना, सम्भव ही नहीं क्योंकि राज्याभिषेक का शुभ मुहूर्त भी दो दिन बाद का निकाला है । चारों भाइयों में बड़ा प्रेम है । भरत और शत्रुघ्न यहां होते तो अच्छा था । उन दोनों को भला क्या आपत्ति होगी । मंत्रणा की गई । मंत्रणा में निश्चित हुआ कि सर्वोत्तम मुहूर्त को देखते हुए राम का राज्याभिषेक इसी दिन होगा । सभी प्रसन्न हुए क्योंकि प्रियता किसको पसन्द नहीं होती । राम सबके प्रिय हैं और राम को सब प्रिय हैं ।
कौशल्या की तो बात ही क्या, भरत की माता कैकेयी और शत्रुघ्न की माँ सुमित्रा तक राम को राज्य मिलता देखकर प्रमुदित है । लखन लाल के तो पैर ही ज़मीन पर टिक नहीं रहे हैं । दशरथजी के इस निर्णय से सब प्रसन्न परन्तु रनिवास में बैठे सीता-राम गहरे चिंतन की मुद्रा में । भूमि को असुरों से मुक्त करना ही एक मात्र उद्देश्य है न कि राज्य-भोग । सीता (प्रकृति) ने माया को सक्रिय किया । वैसे सब कुछ पूर्व नियोजित होता है परंतु कार्यरूप में परिणति समय आने पर ही होती है ।
अपने उद्देश्य की पूर्ति के लिए किसे विश्वास में ले ? ऐसे समय भला मां के अतिरिक्त दूसरा कौन विश्वसनीय हो सकता है ? राम रनिवास को छोड़ मां के पास पहुंच गए । चरणों में शीश झुकाया, कैकेयी ने जैसे आशीर्वादों की झड़ी लगा दी । बोली - ‘पुत्र, कैसे आना हुआ ?’ राम बोले -‘माते, पुत्र जब उलझन में होता है तो मार्गदर्शन के लिए मां के पास ही आता है । मां, मुझे भूमि का भार हल्का करना है, इसमें आपकी सहायता चाहिए ।’ कैकेयी बोली -‘ बोल बेटा, मुझसे क्या सहायता चाहिए ?’ ‘मां, चाहिए तो बहुत कुछ परन्तु ………।’ ‘परन्तु क्या पुत्र ? आवश्यकता पड़ने पर एक पुत्र के लिए मां अपने प्राण तक दे सकती है ।’
कैकेयी के पास बैठते हुए राम बोले -‘ माँ, मुझे बताने में कुछ संकोच हो रहा है ।’ ‘माँ से संकोच कैसा बेटे । मां तो अपने पुत्र के लिए अपने प्राणों तक का त्याग कर देती है ।’ कैकेयी बोली । राम कह रहे हैं -‘मां, मुझे आपसे ऐसे ही उत्तर की आशा थी । मैं जानता हूँ कि मेरी मां मुझे कभी भी निराश नहीं करेगी । परन्तु माँ ……..।’ कैकेयी बोली -‘परन्तु क्या पुत्र ? मां-पुत्र के मध्य फिर से यह परन्तु कहाँ से आ गया ? माँ-पुत्र के मध्य संबंध ऐसा है कि दोनों के बीच परन्तु जैसी कोई दीवार आ ही नहीं सकती ।’
राम गंभीर होकर बोले - ‘माते ! असुरों से भूमि को ख़ाली करवाने में आपकी भूमिका बड़ी महत्वपूर्ण होने जा रही है । मैं चाहता हूँ कि भरत अवध का राज्य सम्भाले और मैं स्वयं लंका जाकर असुरों को मारूँ । मैं जानता हूँ कि पिताजी के पास ऋण के रूप में आपके दो वरदान सुरक्षित पड़े है, आपको उनसे दोनों वरदान आज ही लेने हैं । मैं यह भी समझता हूँ कि भरत और आप, दोनों ही राज्य नहीं चाहते लेकिन मेरे लिए आपको ऐसा करना होगा । साथ ही मुझे लंका तक पहुँचाने के लिए आपको अपने पति से मेरे लिये चौदह वर्ष का वनवास भी मांगना होगा । मैं यह भी भलीभाँति जानता हूँ कि ऐसे वरदान मांगने पर आपको अपयश मिलेगा और वैधव्य भरा जीवन भी । परंतु मां, शरीर मिलता है, संसार की सेवा के लिए । संसार की सेवा ही परमात्मा की सेवा है ।’ इतना कहकर राम चुप हो गए ।
राम से यह सुनकर कैकेयी स्तब्ध रह गई । अपने आप को सम्भालते हुए बोली - ‘ पुत्र, पहला वरदान तो मैं हिम्मत जुटाकर जैसे-तैसे माँग भी लूँगी, भले ही मुझे अपयश ही क्यों न मिले परन्तु दूसरे वरदान की मैं कल्पना तक नहीं कर सकती, माँगना तो बड़ी दूर की बात है । दशरथजी का भला क्या अपराध ? उनके मरने से हम सबको हानि ही होगी न पुत्र । नहीं पुत्र, मुझसे ऐसा नहीं होगा ।’
‘ मां, जिसने इस धरा पर जन्म लिया है, उसका मरना भी निश्चित है । मैं जानता हूँ कि पिताजी का मेरे ऊपर स्नेह है और इसी स्नेह के कारण वे मुझसे दूरी सहन नहीं कर सकेंगे । यह स्नेह-पाश ही उनकी मृत्यु का कारण बनेगा । राजा दशरथ को मृत्यु-द्वार तक तो उनके कर्म ही ले जा रहे हैं माते, आपका वरदान राजा की मृत्यु का एकमात्र कारण नहीं बनेगा । आप वरदान नहीं मांगोगी, तो भी उनका मरना निश्चित है ।’ राम ने कैकेयी को स्पष्ट किया ।
‘ऐसा कौन सा कारण है राम, जो उन्हें मृत्यु-द्वार तक ले जाएगा’ - कैकेयी ने उत्सुकता जताई । राम ने कहा - ‘‘मां, एक बार पिताजी शिकार करने के लिए वन में गए थे । अचानक उन्हें एक दिशा से कुछ आवाज़ सुनाई दी, जिससे उन्हें लगा कि कोई हिंसक पशु तालाब से पानी पी रहा है । शिकार करने के लिए उन्होंने उस दिशा में शब्द-भेदी बाण चला दिया । पास जाकर देखा तो कोई युवा दर्द के मारे तड़प रहा था । पिताजी को बड़ा पश्चाताप हो रहा था । उन्होंने उस युवक को सहारा देकर बिठाया ।
युवक ने बताया कि वह अपने अन्धे माता-पिता को तीर्थ-यात्रा पर लेकर जा रहा है । दोनों ही प्यासे हैं । उन्होंने मुझसे जल पिलाने की मांग की तो जल भरने यहां चला आया । मैं तो मर रहा हूँ, कृपा करके मेरे अन्धे वृद्ध माता-पिता के पास जाकर उन्हें जल पिला दें । इतना कहकर युवक ने प्राण त्याग दिए । दुःखी राजा जल लेकर ढूंढ़ते हुए वृद्ध दंपति के पास पहुंचे । युवक के पिता ने पद-चाप सुनकर कहा - ‘बेटा श्रवण, आ गए ! बड़ी देर कर दी ।’ पिताजी ने उनको जल पिलाने का प्रयास किया परंतु उनके मौन ने सब कुछ स्पष्ट कर दिया था । पिताजी ने अनजाने में हुई घटना पर दुःख प्रकट किया और क्षमा मांगते हुए जल पीने का आग्रह किया परंतु दोनों ने रोते हुए इनकार कर दिया ।
प्राण त्यागते प्यासे वृद्ध दंपति ने पिताजी को श्राप दिया कि जैसे हम पुत्र वियोग में शरीर त्याग रहे हैं, ऐसे ही एक दिन आप भी पुत्र वियोग में मृत्यु शैया का वरण करेंगे । आज वही श्राप, पिताजी को मरने की स्थिति तक ले आया है ।” राम आगे कहते हैं कि अपने कर्मों का परिणाम ही व्यक्ति भुगतता है । इसके लिए किसी दूसरे को दोष नहीं दिया जा सकता । इसलिए माता आप दुःखी न हो, जो होना है वह तो होकर रहेगा । इसमें आप और मैं अथवा कोई दूसरा कर भी क्या सकता है ? समझदार वही है, जो सबकुछ जानकर बिना विचलित हुए प्रत्येक परिस्थिति का सदुपयोग करे ।
सम्भवामि युगे युगे -38
कैकेयी इतना सबकुछ जानकार विस्मित रह गई । एक तरफ़ उसका सुहाग है और दूसरी ओर परमात्मा का कार्य । माता को असमंजस में घिरा देखकर राम बोले - ‘ माता, आप यह सुना हुआ सब विस्मृत कर दें । आप परिस्थिति बनाने बिगाड़ने वाली कौन होती है ? परिस्थितियों को नियंत्रित करना प्रकृति का कार्य है । माया को अपना कार्य करने दे । आप निश्चिंत होकर रात्रि की प्रतीक्षा कीजिए ।’ इतना कहकर राम ने कैकेयी को प्रणाम किया और वहाँ से निकल गए ।
इसे परमात्मा की माया का प्रभाव कहें अथवा पुत्र के वचन सुनकर माता के हृदय को लगा आघात, कैकेयी घटनाक्रम को विस्मृत कर बैठी । सुन्न होकर बैठी कैकेयी को याद नहीं रहा कि पुत्र ने क्या कहा परन्तु ऐसा आभास अवश्य हो रहा था कि निकट भविष्य में अवश्य कुछ अशुभ घटित होने जा रहा है । सिर को एक हल्का सा झटका देकर कैकेयी उठी और पूर्व की भांति दैनिक कार्यों में व्यस्त हो गई ।
राम ने मां के पास जाकर बहुत कुछ कहते हुए भी कुछ नहीं कहा क्योंकि कैकेयी सब कुछ भूल चुकी है । अब माया का खेल शुरू अर्थात् फिर से संसार की उठापटक । मंथरा जोकि कैकेयी की सेविका थी, राजमहल जाने के लिए घर से निकली । अयोध्या को सजती देखकर विस्मय करने लगी । किसी से पूछा तो पता चला कि राम का कल राज्याभिषेक होने जा रहा है । दुःखी हुई क्योंकि अब तो राजमाता का पद कौशल्या का होगा । कैकेयी की भी जब पूछ नहीं रहेगी तो उसके सामने बेचारी मंथरा की क्या बिसात ? राजमहल पहुंचकर वही सब कुछ किया जो ईर्ष्या की मारी एक स्त्री करती है । परंतु कैकेयी कोई साधारण स्त्री तो थी नहीं, बड़ी विदुषी और बहादुर थी वह । माया को मंथरा के माध्यम से बड़ा संघर्ष करना पड़ा तब कहीं जाकर कैकेयी कोप-भवन में जाने को राज़ी हुई । कोप-भवन राजमहल का वह भाग, जहां जाकर कोई भी पटरानी राजा से अपनी नाराज़गी व्यक्त कर सकती थी । देखा गया है कि काम पिपासु व्यक्ति इसी जगह आकर स्त्री के समक्ष समर्पण कर बैठता है ।
रात होने पर दशरथजी कैकेयी के रनिवास पहुंचे । परंतु यह क्या, यह तो सूना पड़ा है । परिचारिका से पूछा तो उसने कोपभवन की ओर संकेत कर दिया । सदा सजी-धजी रहने वाली प्राणप्रिया आज बाल बिखेरे किसी रणचण्डी से कम नहीं लग रही थी । बड़ी मान-मनोव्वल करनी पड़ी राजा को, तब जाकर कैकेयी थोड़ी बहुत बात करने लगी । राम की शपथ दिलाकर राजा के पास अमानत के रूप में पड़े दो वरदान मांग लिए - भरत के लिए राज्य और तपस्वी भेष में राम के लिए चौदह वर्ष का वनवास ।
राज्य चाहे राम को मिले अथवा भरत को, राजा को इससे कोई फ़र्क़ पड़ने वाला नहीं है परंतु राम से दूरी वे सहन नहीं कर सकते । कैकेयी को बहुत प्रकार से समझाया, यहां तक कि उसके पैरों तक में गिर पड़े परंतु आज तो मायातीत की माया ने सुकोमल कैकेयी को भी पाषाण हृदयी बना दिया था । ‘नहीं, राम को वन में जाना ही होगा, आपने राम की शपथ ली है । आप अपने वचन से भले ही टल जाएं परंतु टलने से पहले रघुवंश की कीर्ति का ध्यान कर लें ।’ कैकेयी किसी काली नागिन की तरह फ़न फैलाए फुँफकार रही थी ।
नारी के मोहपाश में जकड़ा पुरुष अपना भला-बुरा नहीं समझता । इसी बंधन में बंधा वह उचित-अनुचित का विचार किए बिना पत्नी ही नहीं, किसी भी स्त्री को वचन दे सकता है । आज ये वचन तीर की भांति राजा दशरथ के हृदय को विदीर्ण कर रहे थे । उन्हें वर्षों पूर्व हुई उस घटना का स्मरण हो आया जब पुत्र वियोग में अंधे माता-पिता प्राण त्याग रहे थे । राजा समझ गए कि उनके कर्म का परिणाम आज उनके समक्ष आकर खड़ा हो गया है । राम से होने वाला वियोग ही उनकी मृत्यु का कारण बनने जा रहा है । उन्होंने कैकेयी को समझाने का अंतिम प्रयास किया परन्तु उसको मानना नहीं था तो मानी ही नहीं । तीन हठ प्रसिद्ध हैं - त्रिया-हठ, बाल- हठ और राज-हठ, परन्तु त्रिया-हठ के सामने शेष दोनों हठ बहुत बौने हैं ।
इधर कैकेयी रणचण्डी बनी बैठी है और उधर दशरथ राम-राम की रट लगाते बार-बार मूर्छित हो रहे हैं । इस धरती पर चाहे कितनी ही बड़ी घटना हो जाय, भास्कर का रथ कभी नहीं रुकता । भोर को होना ही था । कैकेयी का रनिवास सूना पड़ा था और इधर कोप- भवन में राज-परिवार का टूटता ताना-बाना एक कोने में पड़ा सिसक रहा था । ब्रह्ममुहूर्त में जाग जाने वाले राजा आज कहीं दिखाई नहीं दे रहे थे । सुमन्त्र के सारथी जीवन में आज पहली बार ऐसा हुआ था कि रथ तैयार है और रथी का कोई अता-पता नहीं है । ढूंढ़ते-ढूंढ़ते कोप-भवन तक पहुंच गए । राजा की दशा का कारण कैकेयी के अलावा दूसरा कोई नहीं बता सकता है । कारण बताने के स्थान पर आदेश दिया कि राम को राजा से मिलने भेजा जाय ।
सेवक की कभी हिम्मत नहीं होती कि वह प्रतिप्रश्न कर सके । सुमन्त्र ने तत्काल ही राम को संदेश पहुंचा दिया । राम तो साक्षात् परमात्मा हैं, भला उनसे कोई बात छिपी कैसे रह सकती है ? फिर भी लोकाचार के नाते कोप-भवन में प्रवेश कर माता-पिता को प्रणाम किया और कैकेयी से राजा की इस दशा का कारण जानना चाहा । कैकेयी ने रात की सारी घटना बता दी । रघुकुल की रीति, राम की शपथ, दो वरदान और पिता का पुत्र-मोह । राम कोई साधारण मनुष्य नहीं है कि विपरीत बात सुनकर संतुलन खो दे । समता में रहते हुए बोल पड़े - ‘बस, इतनी सी बात ! चौदह वर्ष ही क्यों, राजा के वचनों की साख के लिए उनका राम जीवन भर वन में रहने को तैयार है ।’
अश्रु भरे नयनों ने राम की बातों की सराहना की परंतु दशरथ तो राम नहीं है न ! भीतर के भाव आंसू बन प्रवाहित हो चले और भावुक पिता ने पुत्र को हृदय से लगा लिया । जो एक पल के लिए पुत्र को अपनी दृष्टि से दूर नहीं रखना चाहते, वे कैसे अपने पुत्र को चौदह वर्ष के लिए वनगमन का आदेश दे सकते हैं । कैकेयी के द्वारा कहे गए शब्दों पर राजा दशरथ का मौन रह जाना, चौदह वर्ष के वनवास के आदेश पर मोहर लगा रहा था । इस समय निर्णय राम को ही करना है । नहीं, ऐसा हमारी सोच कह सकती है, मैं तो कहता हूँ कि यह राम का ही निर्णय है ।
व्यक्ति विधि के लिखे विधान को पलटने का भरसक प्रयास करता है । यह विधि ही मायापति की माया है । कर्म हम करते हैं और उन कर्मों के अनुसार परमात्मा विधि से हमारा विधान लिखाते हैं । यह बात हमारी समझ से बाहर रहती है, तभी तो हम प्रत्येक परिस्थिति के लिए किसी दूसरे को ज़िम्मेवार ठहराने का प्रयास करते हैं जबकि वास्तविकता है कि प्रत्येक परिस्थिति के लिए हम स्वयं ही ज़िम्मेदार होते हैं । मैं तो कहूँगा कि हम इतना सब जानते हुए भी अनजान बने रहते हैं क्योंकि हमारा विश्वास अपने शास्त्रों पर तनिक सा भी नहीं है । यही कारण है कि हम विधान को स्वीकार करने के स्थान पर उसे अपनी शक्ति से बदलने का प्रयास करते हैं । इस प्रयास के पीछे हमारा सांसारिक मोह है । दशरथजी भी तो यही कर रहे हैं ।
कैकेयी को दिए हुए वचनों को निर्मूल करने का एक ही रास्ता बचा है, दशरथजी के पास । वे राम को कहते हैं कि तुम अयोध्या के सेनापति हो, राज्य की सुरक्षा के नाम पर मुझे गिरफ़्तार कर लो और अवधपति बन जाओ । इससे तुम्हारे सामने वचन पालन की बाध्यता नहीं रहेगी । परंतु राम कोई औरंगज़ेब तो थे नहीं कि अपने पिता (शाहजहां) को गिरफ़्तार कर जेल में डाल देते और शासन अपने हाथ में ले लेते । आज के युग में एक सेनापति राजा को इतना कहने का भी समय नहीं देता, उससे पूर्व ही उसे गिरफ़्तार कर जेल में डाल देता अथवा फांसी पर लटका देता । परंतु राम कोई साधारण मनुष्य नहीं है, वे तो मर्यादा पुरुषोत्तम है ।
जिनका जन्म भी मर्यादित हो और कर्म भी, वे भला ऐसी गलती कैसे कर सकते हैं ? राम ने अपने पिता को समझाया कि आपका ऐसा कहना उचित नहीं है । आपकी आन-बान और शान को अक्षुण बनाए रखना मेरा प्रथम कर्तव्य है । मैं ऐसा कुछ भी नहीं कर सकता जो नियम विरुद्ध और निन्दनीय हो । पिताजी, आप मुझे वन-गमन की आज्ञा दें । समय आपकी और मेरी परीक्षा ले रहा है और उस परीक्षा के परिणाम से ही भविष्य में इतिहास लिखा जाएगा ।
समय केवल माता-पिता और पुत्र की परीक्षा ही नहीं लेता बल्कि यह परीक्षा पूरे परिवार की होती है । हमारा सामाजिक और पारिवारिक ताना-बाना ऐसी सांस्कृतिक डोर से बुना गया है कि इसको कहीं से भी थोड़ा सा छेड़ा जाए तो उसकी तरंगे डोर के अंतिम सिरे तक पहुंच जाती है । यही कारण है कि सनातन संस्कृति को समझने वाले अपने परिवार की प्रत्येक कड़ी पर ध्यान केंद्रित रखते हैं । प्रत्येक कड़ी का ध्यान न रखने के कारण ही इस कलियुग में पारिवारिक ढाँचा चरमरा रहा है, फिर यह तो त्रेता की बात है । कैकेयी के दो वरदानों ने पूरे परिवार को झकझोर कर रख दिया । धीरे-धीरे एक-एक कर सभी कड़ियाँ इससे प्रभावित होने जा रही है । यही तो माया का खेल है ।
प्रत्येक परिवार में धीरे-धीरे इसी प्रकार परिस्थितियां बनती बिगड़ती रहती है । राम को तो वन में जाना आवश्यक है क्योंकि लंका तक पहुंचने के रास्ते में कई जन उनकी प्रतीक्षा कर रहे हैं । राम तो निश्चित ही वन को जाएंगे परन्तु माया का संचालन करने के लिए सीता का भी साथ होना आवश्यक है । सीता और लक्ष्मण साथ हो जाते हैं क्योंकि जय-विजय के उद्धार में इन दो की भूमिकाएं भी महत्वपूर्ण होने जा रही है । परीक्षा कौशल्या की भी है, साथ ही उर्मिला और भरत की भी । कैकेयी जानती है कि उसको अपयश का भागी बनकर उपेक्षित रहते हुए वैधव्य जीवन भोगना होगा । परिवार में केवल एक कैकेयी ही ऐसी है, जो चाहकर भी अपना दुःख प्रकट नहीं कर सकती । रामकाज के लिए कई दुःख हृदयांगम करने होते हैं । कैकेयी का ऐसा उपेक्षित जीवन होगा कि उससे जन्म लेने वाला पुत्र ही उससे दूर हो जाएगा । स्त्री सब कुछ सह सकती है परंतु पुत्र द्वारा किया गया अपमान उसे भीतर ही भीतर तोड़ देता है । फिर भी कैकेयी उसी परिवार में रहते हुए अपने भीतर दुःखों का सागर समेटे एकाकी जीवन बिताएगी ।
राम, सीता और लखन की वन यात्रा प्रारम्भ होने जा रही है । सबसे आशीर्वाद और आज्ञा लेकर वल्कल वस्त्र धारी तीनों जने सुमन्त्रजी के साथ दशरथजी के पास पहुंचते हैं । बड़े भारी मन से वनगमन की आज्ञा देते हुए नरेश व्यथित हो जाते हैं । सुमन्त्र को पास बुलाकर कहते हैं कि दो-चार दिन वन में घुमाकर लौटा लाना । बड़ी भारी विडम्बना है कि मोह पाश में बंधा दुःखी हृदय मृत्यु-शैय्या पर आ जाता है फिर भी आशा नहीं छोड़ पाता । आशा की किरण प्राणों की लौ से भी तेज होती, प्राण लौ तो बुझ जाती है परन्तु आशा की किरण जन्म-जन्मांतर तक नहीं बुझ पाती ।
विधि का विधान देखिए, सुबह से राजद्वार पर खड़ा सजा-धजा रथ राजा को प्रातःक़ालीन भ्रमण पर ले जाने के लिए तैयार खड़ा है और अब तपस्वी भेष में राम, जानकी और लखन लाल को इसी रथ से सारथी सुमंत्र वन में छोड़ने जा रहे हैं । विधि का विधान ही कुछ ऐसा है कि हम सोचते कुछ हैं और हो जाता कुछ और ही है । कहां तो राम का आज राज्याभिषेक होना निश्चित था और कहां अब वे ही राम वनगमन को तैयार हैं । माया का खेल समझना असम्भव है । जिसने इसको समझ लिया वह फिर माया में उलझता नहीं है बल्कि संसार चक्र से बाहर हो जाता है ।
सुमंत्र ने तीनों को रथ पर चढ़ाया और बढ़ चले शहर से बाहर निकलने वाली राह पर । अयोध्या के जन राम के वनगमन का समाचार पाते ही राजभवन की ओर दौड़ पड़े । कुछ समय रहते पहुंच पाए वे तो रथ के पीछे हो लिए, जो देर से पहुंचे वे राम-राम करते रथ के पहियों की लकीरों को ढूंढ़ते इधर-उधर बदहवास से घूमने लगे ।
जब जीवन का संध्याकाल आ जाता है, तब जाकर होश आता है कि परमात्मा को ढूंढ़े । कहां छिपा है, वह ? वह तो स्वयं के भीतर ही है और हम जगत् में ढूंढ़ने निकल पड़ते हैं । पहले अपने भीतर प्रवेश कर उसे ढूंढ़ो, उसी को अनुभव करो फिर जगत् में भी उसी की अनुभूति होगी । पहले उसे जगत् में ढूंढ़ने निकलोगे तो वह वहां होते हुए भी नहीं दिखेगा । जिस दिन अपने भीतर उसे देख लोगे उसके बाद सर्वत्र एक वही दिखेगा । उसे ढूंढ़ने की यात्रा बाहर की न होकर भीतर की यात्रा है । जब यह यात्रा पूरी होगी तब जाकर बाहर-भीतर का सारा भेद मिटेगा उससे पूर्व नहीं ।
अनजान राहों पर जब कोई यात्रा प्रारम्भ होती है, तब सांसारिक व्यक्ति बड़ा व्यथित होता है जबकि एक आध्यात्मिक पुरुष उसे अच्छा अवसर मानता है । चौदह वर्ष कोई कम नहीं होते वन में बिताने के लिए । यहां तो सुबह पास के किसी खेत में भी चले जायें तो थोड़ी देर बाद ही घर लौटने के लिए शाम होने की प्रतीक्षा करने लगते हैं । जहां देखने-बोलने के लिए कोई दूसरा न हो वहां एक पल भी एक घड़ी जितना लम्बा प्रतीत होता है । निर्जन वन उन्हीं को काट खाने को दौड़ता है जो निरुद्देश्य वहां जाकर बैठते हैं । राम का वनगमन निरुद्देश्य नहीं है ।
इस संसार में हम सभी एक दूसरे से इतने गहरे से सम्बन्धित हैं कि आपका प्रत्येक कार्य, व्यवहार, यहाँ तक कि आपके हृदय की धड़कन तक दूरस्थ बैठे किसी दूसरे जीव तक को प्रभावित करते हैं । ऊपरी दृष्टि से देखकर भले ही कैकेयी के द्वारा दशरथ से मांगे वर को दोष दे दें परंतु गहराई से चिंतन करेंगे तो पायेंगे कि कहीं दूर से आई पुकार ने राम के अन्तर्मन को प्रभावित किया है । पुकार को सुनने के लिए भी तो राम जैसा हृदय चाहिए । राम जैसा हृदय हो तो फिर प्रकृति भी पुकार को सम्बन्धित हृदय तक पहुंचाने के लिए विशेष भूमिका तैयार कर लेती है ।
रथ शृंगवेरपुर पहुंच चुका है । थोड़ी दूर ही दक्षिण दिशा में कलकल बहती मां गंगा का तट दिखाई पड़ रहा है । भगवान राम, अपनी भार्या सीता और अनुज लखन के साथ रथ से उतरते हैं और दूर बहती गंगा मां को प्रणाम करते हैं । निषादराज गुह अपने राज्य की सीमा में आए दोनों राजकुमारों और जनकदुलारी का अभिवादन करते हैं और आग्रह करते हैं कि वे रात्रि विश्राम उनके निवास स्थान पर करे । पिता की आज्ञा का वास्ता देकर राम मना कर देते हैं । निषादराज अपने अधीनस्थों को साथ लेकर वहीं वन में एक छोटी सी अस्थाई कुटिया का निर्माण कर देते हैं ।
रात्रि गहराती जा रही है । भीतर सियारामजी शयन कर रहे हैं । बाहर वीरासन लगाए लक्ष्मण पहरा दे रहे हैं । पास ही बैठे गुह कुछ खोए-खोए से बैठे हैं । प्रतीत होता है, भीतर कुछ सोच-विचार चल रहा है । राज्य के भावी उत्तराधिकारी को घने वन में घास-पूस की झोंपड़ी में शयन करते देखकर गुह विषादग्रस्त हो जाते हैं । जल भरे नयनों से कैकेई को भला-बुरा कहने लगते हैं । लक्ष्मण विविध प्रकार से उन्हें समझाते हैं और कहते हैं कि जीव अपने दुःख का कारण स्वयं ही होता है । दुःख के लिए किसी दूसरे को दोष देना उचित नहीं है । सभी अपने-अपने कर्मों का फल पाते हैं ।
भगवान होकर भी कर्मों का फल भोगना पड़ता है, कैसे ? वे तो कर्ता-भोक्ता है ही नहीं । सत्य तो यह है कि जिसने भी भौतिक शरीर लिया है, उसके शरीर से कुछ न कुछ कर्म तो होंगे ही और उन कर्मों से एक सम्बन्ध बना लेना ही जीव के दुःख-सुख का कारण बनता है । प्रत्येक कर्म का परिणाम भी शरीर को भोगना होगा, उस एक शरीर को नहीं तो भावी दूसरे शरीर को, परंतु कर्मों का परिणाम अवश्य मिल कर रहता है । राम अर्थात् भगवान ने अपने पूर्व के मानव शरीर से ऐसे कौन से कर्म किए थे कि आज वन-वन में भटकना पड़ रहा है । विधि का विधान कभी ग़लत नहीं हो सकता । अतः जो हो रहा है, वह उचित ही हो रहा है, इस बात को स्वीकारना चाहिए । इस ज्ञान को अशिक्षित गुह ने कितना समझा, कह नहीं सकते परंतु इतना अवश्य कह सकते हैं कि हम पढ़े-लिखे कथित शिक्षित लोग भी सबकुछ समझते हुए भी कुछ नहीं समझ पाते ।
राम का उद्देश्य है, पीड़ित साधुओं को पीड़ा से मुक्त करना, अधर्मियों का विनाश करना तथा इनके साथ-साथ वंचितों से मिलकर उन्हें समाज की मुख्य धारा में लाने के लिए एक सेतु का निर्माण करना । तभी तो अवध का राजकुमार निषादराज के गले मिलता है, केवट से गंगा पार कराने का अनुरोध करता है और दलित नारी शबरी के हाथों से बेर खाता है ।
वे स्वयं गंगा को पार कर सकते थे परंतु नहीं किया क्योंकि उन्हें वंचितों, दलितों और पिछड़ों को भी उनके होने का, उनके अस्तित्व का अनुभव जो कराना था । उनका होना इस समाज के लिए कितना महत्वपूर्ण है, यह संसार को बताना आवश्यक था । यदि हम इस आधुनिक युग में भी इस बात को नहीं समझते तो कमी हमारे में हैं । इसका अर्थ है कि हम अपने भीतर बैठे राम की उपेक्षा कर रहे हैं ।
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