Monday, October 26, 2026

सम्भवामि युगे युगे -54

 सम्भवामि युगे युगे -54

                 राम के वनवास के पीछे हम मुख्यतः कैकेई के स्वार्थ को ही दोष दे देते हैं । इसी प्रकार कुछ इसका कारण मंथरा की ईर्ष्या भी बताते हैं । राम भी कैकेई से राजतिलक होने के मुहूर्त से एक दिन पूर्व मिले थे, यह भी वनवास का एक कारण है । इसी कड़ी में रघुवंश के राजमुकुट की वापसी का कैकेई द्वारा किया गया प्रयास भी तो एक कारण हो सकता है । कारण कुछ भी रहा हो परंतु यह सत्य है कि राम को वनवास हुआ था और वनवास देने की मांग निःसंदेह कैकेई की ही थी । 

    नारद को विश्वमोहिनी से विवाह करने से रोकने के लिए किया गया उपक्रम और प्रतिशोध स्वरूप नारदजी से मिला शाप भी तो एक कारण था । नारदजी को अपनी गलती का जब तक भान हुआ तब तक देरी हो चुकी थी । तीर जब कमान से निकल जाता है, फिर उसे लौटा लाने का कोई उपाय नहीं होता । होश आते ही नारदजी ने अपने दिए शाप के लिए क्षमा भी मांगी परंतु भगवान ने क्या कहा ? ‘मेरी इच्छा । मम इच्छा कह दीनदयाला ।’ सत्य है, उनकी इच्छा के बिना जगत् में पत्ता भी नहीं हिल सकता ।

         आज हम राम को दिए वनवास के पीछे के कारणों की विवेचना कर रहे हैं । देखा जाए तो वनवास का एकमात्र कारण हरि-इच्छा ही थी । विडम्बना है कि हम इस सत्य को स्वीकार कर नहीं पाते कि सबकुछ प्रभु की इच्छा से ही होता है । हम घटना घटित होने के बाद उसके कारणों की समीक्षा कर सकते हैं । हाँ, यह समीक्षा एक सीमा तक सीख लेने के लिए तो उपयोगी हो सकती है परंतु घटित घटना को आप तनिक भी परिवर्तित नहीं कर सकते । इसलिए आपके लिए घटित शुभ हो अथवा अशुभ, परिणाम को हरि इच्छा मानकर प्रसन्न रहना चाहिए । सब उस मायापति की माया की उठापटक है । न तो मंथरा दोषी है, न कैकेई और न ही देवर्षि नारद । कुछ नाम और भी जोड़े जा सकते । प्रत्येक घटना के पीछे एक मात्र परमात्मा की इच्छा ही कारण है । ऐसा स्वीकार कर लेने से मनुष्य सुख-दुःख के घेरे से परे निकल जाता है ।

क्रमशः 

प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल

 ।। हरिः शरणम् ।।

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