सम्भवामि युगे युगे -49
केवट, जिसे जन्मजन्मातरों तक प्रभु के चरणों की आस रही हो, उस आस से ही वह त्रेता में नाविक बना । जब आस पूरी हो चुकी है तो नाविक का व्यवसाय भी अब उसके लिए अर्थहीन हो चुका है । जिस नाव में साक्षात् परमात्मा-प्रकृति दोनों के एक साथ पांव पड़ चुके हैं, फिर किसी और के पांव पड़ने की आवश्यकता ही कहां रह जाती है ? केवट को अब किसी को पार नहीं ले जाना है । जो स्वयं पार हो चुका है वह तो पार कराने वाले की स्मृतियों के सहारे शेष रहे शारीरिक जीवन को भी बिता देगा । उसको विश्वास है राम के दिए गए उस आश्वासन पर कि वापसी में वे केवट से मिलने अवश्य आएंगे । जिसने एक बार उनके दर्शन का स्वाद चख लिया है, वह चाहकर भी उनको अपने से दूर नहीं कर सकता । अब राम आए अथवा नहीं, जीवन में कोई फ़र्क़ पड़ने वाला नहीं है ।
केवट को विदा कर भगवान गुह को भी लौट जाने का कहते हैं परन्तु वह कुछ और दूरी तक साथ चलना चाहता है । यात्रा आगे बढ़ती है, संगम (प्रयागराज) के पास भारद्वाजजी से भेंट होती है । भारद्वाजजी, श्रीरामचरित मानस के एक श्रोता, जिनको याज्ञवल्क्यजी ने राम-कथा सुनाई । राम से बार-बार भेंट होती है फिर भी उस भेंट से अधिक रस भारद्वाजजी को राम-कथा सुनने में मिलता है । इसी का नाम भक्ति है । आगे चलते हुए यमुनाजी को पार कर वाल्मीकीजी के आश्रम में प्रवेश करते हैं । रहने के लिए उचित स्थान बताने की प्रार्थना करते हैं । वाल्मीकीजी को हंसी आ जाती है । वे कहाँ नहीं है अर्थात् सब स्थानों पर है, फिर भी मानव स्वभाववश अपने रहने के लिए स्थान पूछ रहे हैं, इससे अधिक आश्चर्य की बात क्या होगी ? फिर भी उत्तर दिया जाएगा क्योंकि प्रत्येक प्रश्न का उत्तर देना आवश्यक होता है । चित्रकूट नामक स्थान पर कुटिया बना कर निवास करने की सलाह दी जाती है ।
चित्रकूट पहुँचकर निषादराज गुह ने पर्णकुटीर बना दिया है, यहाँ अब रामजी बारह वर्षों तक अपने भाई और भार्या के साथ निवास करेंगे । भगवान निषादराज को यहां से विदा कर देते हैं । रामजी के आने से पूर्व चित्रकूट के आसपास जब भी तपस्वी यज्ञादि करते थे उनके यज्ञ में बाधा डालने असुर आ जाते थे । भगवान ने उन्हें उनसे मुक्ति दिला दी है । अब सभी ऋषि-मुनि निर्भय होकर तपस्या, यज्ञादि कर्म करने लगे हैं ।
क्रमशः
प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल
।। हरिः शरणम् ।।
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