Saturday, October 24, 2026

सम्भवामि युगे युगे -52

 सम्भवामि युगे युगे -52

         राम बोले - ‘वह कैसे मां ? आप अपने आपको इतने वर्षों तक अपमान का दुःख क्यों सहन करती रही ? आपका पुत्र राम आपके मन की  शांति के लिए कुछ भी कर सकता है, आप आदेश तो करें ।’ 

             कैकेई -  ‘जब राजतिलक का मुहूर्त निश्चित हो गया तब मैं और महाराज बड़े प्रसन्न थे । इधर राजतिलक होना है और उधर रघुवंश का मूल राजमुकुट तो बाली के पास है । बिना उस मुकुट के राजतिलक होना कैसे सम्भव है ?’ मैंने उसी समय निश्चित कर लिया था कि राजमुकुट को वापस लाने का उपयुक्त समय आ गया है । मंथरा की ईर्ष्या ने मेरे मन की इस उलझन को सुलझाने सहायता की । महाराज के पास मेरे पूर्व के दो वरदान सुरक्षित रखे थे । मेरे मन में भरत को राजा बनाना कभी था ही नहीं । इसलिए मैंने प्रथम वर के रूप में भरत के लिए राज्य माँगा क्योंकि मैं जानती थी कि वह तुम्हारे होते इसे कभी स्वीकार नहीं करेगा । दूसरे वरदान के रूप में मैंने राम के लिए वनवास इस कारण से माँगा कि एक तो तुम स्वयं यही चाहते थे और दूसरा, मैं जानती थी कि उस मुकुट को लाना केवल राम के ही वश की बात है ।’

             कैकेई ने आगे कहा - ‘अब वन में आगे वानर राज बाली से तुम्हारा सामना होगा । तेरे पिताजी का मुकुट उनके पास है । तुम्हें वह मुकुट उसे पराजित करके लाना है ।’ ‘परंतु माते ! पिताजी का मुकुट उसके पास पहुँचा कैसे ?’ राम ने उत्सुक होकर पूछा । तब कैकेई ने बाली तक मुकुट पहुँचने की कथा विस्तार से बताई - 

         ‘तुम्हारे जन्म से भी बहुत पहले की बात है । एक बार अयोध्या के राजा दशरथ का मृगया के लिए वन में गए थे । रास्ते में उनका बाली से सामना हो गया । उस समय मैं (महारानी कैकेई) उनके साथ थी । मेरी सुंदरता पर बाली पहले से ही मुग्ध था । मुझे महाराज के साथ देखकर वह मुझे प्राप्त करने की जुगत लगाने लगा । इसके लिए उसे महाराज को परास्त करना आवश्यक था । बाली ने राजा दशरथ को युद्ध के लिए ललकारा क्योंकि वह जानता था कि उसे यह वरदान प्राप्त है कि उसकी दृष्टि जिस किसी पर भी पड़ेगी उसका आधा बल उसमें आ जाएगा ।  इस कारण से युद्ध में दशरथजी के सामने बाली भारी पड़ने लगा । युद्ध का परिणाम आने से पहले ही निश्चित हो गया था कि पराजय राजा दशरथ की ही होगी । पराजित राजा दशरथ के सामने बाली ने शर्त रखी कि या तो वे मुझे (कैकेई को) उसको सौंप दे अथवा अपना मुकुट यहाँ छोड़कर मुझे लेकर अयोध्या लौट जाए । मजबूर राजा को मुकुट बाली के पास छोड़ना पड़ा ।’

क्रमशः 

प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल

 ।। हरिः शरणम् ।।

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