Thursday, October 22, 2026

सम्भवामि युगे युगे -50

 सम्भवामि युगे युगे -50

            इधर गंगा पार आकर निषादराज देखते हैं कि जहां से सुमंत्रजी को विदा किया था, वे वहीं के वहीं खड़े विषाद में डूबे हुए हैं । समझाबुझाकर अपने चार व्यक्तियों को उनके साथ कर अयोध्या के लिए विदा करते हैं । सुमंत्र के अवध लौटने पर उनके साथ में राम को आया न देखकर दशरथ प्राण त्याग देते हैं । वसिष्ठ मुनि भरत शत्रुघ्न को ननिहाल से बुलवा लेते हैं और पिता का अंतिम संस्कार कराते हैं । परिवार की दशा देखकर बड़े दुःखी हैं, भरत । जब सभा जुड़ती है तब वशिष्ठजी भरत को विविध भांति समझाते हैं ।

        वसिष्ठजी भरत को समझाते हुए कह रहे हैं कि - ‘ संसार में हानि-लाभ, जीवन-मरण और यश-अपयश सब विधाता के हाथ में है । इसलिए तुम्हें इस संबद्ध में शोक करने की कोई आवश्यकता नहीं है । 

सुनहु भरत भावी प्रबल, बिलखि कहेउ मुनिनाथ ।

हानि लाभु जीवनु मरनु, जसु अपजसु बिधि हाथ ।। अयोध्याकाण्ड - 171 ।।

         राजा दशरथ ने अपना जीवन आदर्श स्थापित करते हुए जीया है और अपने वचनों को सत्य सिद्ध किया है, इसलिए उनके चले जाने पर तुम्हारा शोक करने का कोई कारण नहीं बनता । अब तुम अपने पिता द्वारा दिए गए वचन का मान रखते हुए अयोध्या का राज्य सम्भालो ।’

        भरत ने कहा - ‘गुरुवर ! आपने मुझे उचित सलाह दी है । परंतु कुछ भी करने से पूर्व मैं वन में जाकर भैया से मिलना चाहता हूँ । वे जैसा कहेंगे, फिर मैं वैसा ही करने को तैयार हूँ ।’ गुरु वसिष्ठजी ने मंत्रणा करते हुए दूसरे दिन राम से मिलने के लिए वन में चलने की आज्ञा दे दी । अयोध्या की ज़िम्मेवारी विश्वस्त अधीनस्थों को सौंपकर गुरु, माताओं और अयोध्यावासियों के साथ दोनों भाई वन की ओर चल पड़े ।

             निषादराज गुह को जब भरत के सेना सहित चित्रकूट की ओर जाने की सूचना मिली तो व्यथित हो गए । वे सोचने लगे कि कहीं भरत निष्कंटक राज्य की चाह में राम को राह से हटाने के लिए तो नहीं आ रहे हैं ? एक बुजुर्ग वनवासी ने सगुन देखकर निषादराज को भाइयों के होने वाले मिलन की वास्तविकता बताते हुए भरत का विरोध करने से रोक दिया । जब भरत से मिलना हुआ तब उनकी दशा देखकर गुह को बड़ा पश्चाताप हुआ । निषादराज साथ हो लेते हैं और चित्रकूट पहुंच जाते हैं । दूर से ही राम को देखकर भरत दण्डवत प्रणाम करते हैं । द्रवित हुए राम आगे बढ़ते हुए भरत को उठाकर हृदय से लगा लेते हैं ।

क्रमशः 

प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल

।। हरिः शरणम् ।।

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