सम्भवामि युगे युगे -21
वैज्ञानिकों ने प्रकृति के साथ छेड़छाड़ करते हुए चीते (Tiger) और शेरनी (Lioness) के मध्य अप्राकृतिक संयोग करा टाइगोन (Tigon) का जन्म कराया है । परन्तु इस संयुक्त जीव ने जन्म लेकर वैज्ञानिकों को निराश ही किया है । टाइगोन न तो शिकार कर सकती थी और न ही उसने लम्बी उम्र ही पाई । गधे और घोड़ी के संयोग से खच्चर पैदा अवश्य करवा लिया परन्तु वह भी भार ढोने के अलावा किसी काम का नहीं है । विज्ञान अपनी पीठ थपथपा सकता है परन्तु उसने ऐसा अपने स्तर पर न कर प्रकृतिजन्य साधनों से ही सम्भव किया है । ऐसा करना प्रकृति के साथ खिलवाड़ करना और सृष्टि के विध्वंस को आमंत्रित करना नहीं है तो और क्या है ? नरसिंह भगवान के रूप में तो परमात्मा स्वयं अवतरित हुए हैं ।
नरसिंह भगवान प्रकट हुए और हिरण्यकश्यप को अपनी गोद में लिटाते हुए महल की देहरी पर जा बैठे और देखते ही देखते अपने नाखूनों से उसका पेट फाड़ डाला । पेट की आँतों की माला गले में डाल ली और प्रह्लाद को गोद में बैठाकर उसका मुख चाटने लगे । प्रह्लाद भयभीत नहीं हुए । एक भक्त की पहचान यही होती है कि वह सदैव भय रहित रहता है ।
इस प्रकार हिरण्याक्ष और हिरण्यकश्यप के मारे जाने के साथ ही शापित जय-विजय की एक असुर योनि तो कट गई परन्तु अभी दो बार उन्हें असुर योनि और भोगनी है । दूसरी बार वे रावण और कुम्भकर्ण के रूप में असुर बने और पृथ्वी पर धर्म को नष्ट करने लगे । कई बार प्रश्न आते हैं कि सतयुग के जय-विजय उसी युग में हिरण्याक्ष और हिरण्यकश्यप नाम से असुर बन गए । इन दोनों के मारे जाने के पश्चात् एक युग बीत गया और फिर त्रेता में वे रावण-कुम्भकरण के रूप में पैदा हुए । बीच की अवधि में उनकी जीवात्मा कहां रही ? इस प्रश्न का उत्तर जानने से पहले हमें सृष्टि निर्माण होने के पश्चात् हुए उसके विस्तार को जानना होगा ।
क्रमशः
प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल
।। हरिः शरणम् ।।
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