सम्भवामि युगे युगे -18
स्थूल शरीर का आकार-प्रकार तो माता-पिता के गुणसूत्रों से बनता है जबकि स्वभाव तो पूर्व मानव जन्म से मिले संस्कारों के अनुरूप होता है । गर्भकाल से ही शिशु के संस्कारों को उपयुक्त वातावरण देकर स्वभाव को सुधारा/बिगाड़ा जा सकता है । हिरण्यकश्यप का अन्त करना है तो कयादू की सन्तान को भक्त बनना ही होगा। । इसलिए नारदजी ने भक्ति के अनुकूल वातावरण प्रदान करते हुए गर्भस्थ शिशु को संस्कारित किया । यही बालक बाद में भक्त प्रह्लाद नाम से प्रसिद्ध हुआ ।
प्रश्न था कि हिरण्यकश्यप का उद्धार कैसे होगा ? अपनी मृत्यु को रोकने के जितने उपाय करने थे, वे उसने वरदान प्राप्त कर पहले ही कर लिये थे । बस, वैसी ही परिस्थितियां बनने की प्रतीक्षा हो रही थी । जिस दिन ब्रह्माजी के दिए वरदान के अनुसार परिस्थितियां बन जाएगी उस दिन हिरण्यकश्यप चाहकर भी मृत्यु से भाग नहीं पाएगा ।
परिस्थितियों का निर्माण भी प्रकृति करती है । माया का ही खेल है, अनुकूल-प्रतिकूल परिस्थितियों का बनना । मन का अनुकूल और प्रतिकूल को अनुभव करने से आप स्वयं प्रभावित नहीं होते । यदि आप पर उसका प्रभाव पड़ रहा है तो इसका अर्थ एक ही है कि आप प्रकृति में स्थित हैं, स्व में नहीं । जिस दिन स्व में स्थित हो जाएंगे, मन के माध्यम से अनुभव में आने वाली प्रत्येक परिस्थिति से अतीत हो जाएंगे ।
क्रमशः
प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल
।। हरिः शरणम् ।।
म् ।।
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