सम्भवामि युगे युगे -11
चलिए ! माया के इस खेल पर चल रही चर्चा को थोड़ा और विस्तार देते हैं ।
जय-विजय शापित हैं । तीन मनुष्य जन्मों तक आसुरी संपदा धारण करनी ही होगी । ब्रह्माजी की आज्ञा हुई, मनु-शतरूपा को संतान पैदा कर सृष्टि का विस्तार करना है । संतानें तो पैदा कर लेंगे परंतु वे रहेगी कहाँ ? पृथ्वी तो जल में डूबी पड़ी है । पृथ्वी को निकालना ही होगा जल से बाहर । जल में गहराई तक उतरकर पृथ्वी को बाहर निकालना बड़ा दुष्कर कार्य है, भगवान के सिवाय कोई इस कार्य के योग्य है ही नहीं ।
ब्रह्माजी की नासिका से वराह अवतार हुआ । ब्रह्माजी की नासिका से ही क्यों, उनकी पत्नी के गर्भ से क्यों नहीं ? पश्चिम का अंधानुकरण करने वाले हमारे शास्त्रों का मज़ाक़ उड़ाते हैं और हम चुप रहकर अपने ही शास्त्रों पर प्रश्नचिन्ह लगा देते हैं । थोड़ा गंभीरता से शास्त्रों को पढ़ेंगे तो ऐसे प्रश्न उठेंगे ही नहीं और यदि प्रश्न उठे भी तो उत्तर दिया जा सकता है ।
केवल पृथ्वी में ही पांचों भूत तत्व की उपस्थिति रहती है और प्रत्येक शरीर की रचना में ये पांच भौतिक तत्त्व ही आवश्यक होते है । पांच ज्ञानेंद्रियों में केवल नाक (घ्राण इंद्रिय) ही पृथ्वी का प्रतिनिधित्व करती है । ज्यों ही मिलेंगे पांचों तत्व एक साथ, एक स्थूल शरीर बनकर तैयार हो जाएगा । ब्रह्माजी ने नासिका से वराह बनाकर यही तो किया था ।
सूअर की सूंघने की क्षमता बड़ी तीव्र होती है, गन्दगी में से अन्न का एक-एक दाना तक खोज निकाल लेता है । वराह बने परमात्मा अपनी नासिका के बल से रसातल में जाकर जल में डूबी पृथ्वी को खोजकर अपने दोनों दांतों के मध्य उठाकर बाहर निकाल लाए । रास्ते में हिरण्याक्ष ने गदा से उनपर आक्रमण किया । परन्तु वराह भगवान के सामने उसकी एक न चली । अंततः हिरण्याक्ष का वध हुआ ।
क्रमशः
प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल
।। हरिः शरणम् ।।
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