Wednesday, September 2, 2026

अनुभव की बात

 अनुभव की बात 

         गत सौ दिनों में दो विषयों पर लेखन हुआ, ‘आसक्ति से अनुरक्ति की ओर’ तथा ‘मौन’ । पता नहीं, विषय कौन सुझाता है ? मैं जो सोचता हूँ, वह विषय तो कहीं बहुत पीछे छूट जाता है और अचानक मस्तिष्क में एक बिजली सी कौंधती है और बिलकुल नया विषय सामने आ जाता है । फिर उस विषय पर चिंतन कहाँ से शुरू होता है, कैसे आगे बढ़ता है और लेखनी कैसे चल पड़ती है, कुछ भी अनुभव में नहीं आता । जब संपादन करने के लिए अवलोकन करता हूँ तो आश्चर्य होता है कि क्या ये शब्द मेरे हैं ? नहीं, शब्द मेरे नहीं है बल्कि किसी ने मेरे माध्यम से इनको कैनवास पर उतारा है । बहुत कुछ बदलाव करने की सोचता हूँ परंतु बदलाव भी मेरे चाहे अनुसार नहीं होता । जब संपादित करने के पश्चात् पढ़ता हूँ तो आत्मिक संतुष्टि और सुख का अनुभव अवश्य होता है । गोस्वामीजी ने मानस में जिसे ‘स्वान्तः सुखाय’ कहा है, क्या यह लगभग वैसा ही है ?

            मेरे चाहने से कुछ नहीं होता, चाहता वही है, मुझे तो उसकी चाह के अनुसार भूमिका निभानी है । अब देखिए, ‘मौन’ पर लिखने के पश्चात् सोचा था कि मैं अब लेखनी को विश्राम देकर ‘न किंचिदपि चिन्तयेत्’ की अवस्था की तरफ़ बढ़ चलूं क्योंकि अंततः उसी लक्ष्य को प्राप्त करना है । मस्तिष्क तंद्रा की अवस्था में था कि यकायक बिजली सी कौंधी और एक प्रश्न उठा  - ‘‘अनुरक्ति” का क्या हुआ ? 

         आचार्य जी श्री गोविन्द राम शर्मा कहते हैं - ‘प्रकाश ! तू ज्ञान मार्गी है । ज्ञान से भक्ति विलक्षण है । जब भीतर भक्ति जगेगी और परमात्मा से प्रेम होगा तब समस्त ज्ञान स्वयं में ही पा लेगा ।’  आज ज्ञान और भक्ति के दोराहे पर खड़ा मैं सोच रहा हूँ कि ‘अनुरक्ति’ की ओर बढ़ने का संकेत क्या आदरणीय भाईजी (आचार्यजी) की परमात्मा से की गई अनुशंसा का परिणाम है ? क्योंकि लेखन हेतु मुझे जो भी संकेत मिलता है, उसे मैं उन्हीं का आशीर्वाद और परमात्मा की कृपा समझता हूँ ।

         खपती मस्तिष्क की खपत तब तक नहीं मिटती जब तक आप भीतर से ख़ाली नहीं हो जाते । अब इसी खपत को परमात्मा की ‘अनुरक्ति’ में परिवर्तित कर दिया है । अब जिस दिन गुरु और परमात्म-कृपा होगी भीतर से रिक्त होता चला जाऊँगा, फिर एक दिन ‘मौन’…… , पास में कुछ न होते हुए भी सब कुछ पा लेना  । तब तक लेखनी भगवान भरोसे, वह जैसा और जब तक लिखवाना चाहता है, तब तक वैसा लिखता रहूँगा । ‘अनुरक्ति‘ की प्रथम सीढ़ी और संभवतः अंतिम भी अर्थात् एकमात्र सीढ़ी है - उसकी लीला का गुणगान करना और उसकी लीला में डूब जाना । परन्तु प्रत्येक लीला तो माया के अन्तर्गत है, मायापति की माया के । कोई बात नहीं, उसकी माया का गुणगान करना भी तो परोक्ष रूप से उसी का गुणगान करना है । बिना माया की सहायता के सीधे वह भी अवतरित नहीं हो सकता । प्रकृति को अपने अधीन करके अपनी माया से ही तो वह प्रकट होता है - ‘धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे’ ।

गोस्वामीजी मानस में कहते हैं - रामहि सुमिरिअ गाइअ रामहि। संतत सुनिअ राम गुन ग्रामहि॥ अर्थात् भगवान श्री राम का स्मरण करना, उनके नामों का गुणगान करना और निरंतर उनके यश व गुणों के समूहों को सुनना ही सबसे बड़ा और सुलभ साधन है।

कल से माया और मायापति का गुणगान करेंगे - “ सम्भवामि युगे युगे” में ।

।। हरिः शरणम् ।।

डॉ. प्रकाश काछवाल

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