सम्भवामि युगे युगे -1
परमात्मा के अन्तर्गत दो - पुरुष और प्रकृति । पुरुष : अपरिवर्तनीय, प्रकृति : परिवर्तनशील । इस प्रकार अक्रिय परमात्मा के दो विभाग हुए - एक अक्रिय पुरुष और दूसरा सक्रिय प्रकृति । परमात्मा अक्रिय, न तो कर्ता न भोक्ता । यही स्वरूप पुरुष का भी है । प्रकृति सक्रिय है, फिर भी प्रकृति न तो कर्ता है और न ही भोक्ता, बिलकुल परमात्मा तथा पुरुष की तरह । क्रिया के कारण प्रकृति में होने वाली परिवर्तनशीलता के अतिरिक्त दोनों में कोई अन्तर नहीं है, इसीलिए कहा जाता है कि परमात्मा के साक्षात् दर्शन करने है तो प्रकृति को निहारो ।
प्रकृति (जगत्) में क्रिया भी होती है और प्रत्येक क्रिया का परिणाम भी मिलता है । यह अटल सिद्धान्त है कि प्रत्येक क्रिया का परिणाम होता है, तभी तो प्रकृति में परिवर्तन होते हैं ; आज जो जैसा दिख रहा है, पल भर बाद वो वैसा नहीं रहेगा । सक्रियता से क्रिया, उस क्रिया की प्रतिक्रिया और परिणाम, फिर भी प्रकृति न कर्ता न भोक्ता । है न आश्चर्य ! प्रश्न उठता है कि फिर कर्ता और भोक्ता कौन है ? कर्ता है, प्रकृति में स्थित पुरुष । जिस कारण से पुरुष प्रकृति में स्थित होकर कर्ता और भोक्ता बनता है, उसी को माया कहते हैं । यह माया प्रकृति का ही स्वरूप है ।
दो विभाग - प्रकृति और पुरुष । जब पुरुष प्रकृति में स्थित हो जाता है तब प्रत्येक क्रिया का अपने आपको कर्ता मानने लग जाता है । जो कर्ता बनता है उसको भोक्ता बनना ही पड़ता है अर्थात् पुरुष प्रकृति में हो रही प्रत्येक क्रिया का परिणाम स्वयं में अनुभव करता है । इस प्रकार क्रिया होती तो प्रकृति में है, उस क्रिया से वह तो अछूती बनी रहती है परन्तु पुरुष उस क्रिया के साथ होली खेलने लग जाता है । पुरुष को अपने स्वरूप में स्थित रहना चाहिए था साक्षी बनकर, परन्तु प्रकृति की सक्रियता से उपजी चकाचौंध से प्रभावित होकर वह अपनी स्वस्थता छोड़ देता है और जाकर प्रकृति में स्थित हो जाता है । इस प्रकार प्रकृतिस्थ पुरुष ही माया के जाल में उलझ कर कर्ता-भोक्ता बन जाता है ।
क्रमशः
प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल
।। हरिः शरणम् ।।
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