सम्भवामि युगे युगे -12
हिरण्याक्ष का जन्म भी तो भगवान की माया से ही प्रेरित था । प्रजापति दक्ष की पुत्रियों में एक पुत्री थी दिति । उनका विवाह ऋषि कश्यप के साथ हुआ था । कश्यप ऋषि, शरीर से स्वरूप की यात्रा पर थे । आदर्श दंपति बनकर दोनों सामान्य गृहस्थ जीवन बीता रहे थे - कश्यप और दिति । परन्तु परमात्मा को तो कुछ और ही मंज़ूर था । परमात्मा का संकेत समझ माया ने करवट ली । माया ने कामदेव को संदेश भेजा । सायंकाल में जब कश्यपजी यज्ञ कर रहे थे, कामदेव ने चुपके से उनकी कुटिया में प्रवेश किया । कामदेव के प्रभाव से दिति कामातुर हो उठी । कश्यपजी ने बहुत प्रकार से समझाया परंतु नहीं मानी । कामान्ध को काम-वासना के अतिरिक्त कुछ भी नहीं सुझता ।
दिति को ईर्ष्या थी कि उसकी दूसरी सौतों के तो संतानें है और वह अभी भी संतान सुख से वंचित है । कामातुर व्यक्ति लज्जा, स्थान और समय नहीं देखता । दिति भी ज़िद्द कर बैठी, या तो अभी, नहीं तो फिर कभी नहीं । बेचारे कश्यपजी त्रिया हठ के सामने बेबस थे । परिणाम - दो पुत्रों का जन्म, हिरण्याक्ष और हिरण्यकश्यप ।
जब अनुकूल वातावरण में समागम होता है तो दैव स्वरूप संतान उत्पन्न होती है । इधर थीं प्रजापति दक्ष की कन्या दिति जिसे प्रतिकूल वातावरण में किए गए समागम से संतान के रूप में मिले दो असुर पुत्र । बाद में बहुत पछताई परंतु अब पछताने से क्या होगा, कुछ नहीं हो सकता । उधर देखिए ! संतान चाहिए देवहूति को भी । देवहूति थी मनु-शतरूपा की पुत्री । अनुकूल वातावरण में साथ मिला पति कर्दम ऋषि का और पुत्र रूप में मिले स्वयं भगवान, कपिल के रूप में । भगवान कपिल ने माता देवहूति को ज्ञान दिया जिसका विस्तार से वर्णन भागवतजी में मिलता है ।
क्रमशः
प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल
।। हरिः शरणम् ।।
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