Thursday, September 17, 2026

सम्भवामि युगे युगे -15

 सम्भवामि युगे युगे -15

            हिरण्याक्ष तो बल के मद में चूर था । ललकार कर भिड़ पड़ा भगवान से । भगवान से शत्रुता करने का परिणाम हम सब जानते ही हैं । कोई भी कितना ही बड़ा वरदान पाकर मद में चूर होकर दहाड़ता फिरे, भगवान के समक्ष कोई भी वरदान मायने नहीं रखता, वरदान का भी कोई न कोई तोड़ निकाल ही लेते हैं वे । हाँ, फिर भी भगवान वरदाई का मान अवश्य रखते हैं । अन्ततः वही हुआ जो होना था, असुर हिरण्याक्ष मारा गया और वराह भगवान पृथ्वी को जल से बाहर निकाल लाए ।

           हिरण्यकश्यप ने भी ब्रह्माजी से वरदान ले लिया । चाहा था अमरता का वरदान परंतु ऐसा वरदान देना किसी के भी बलबूते से बाहर है । ऐसे में असुर को अमरता के लिए कोई न कोई तो राह निकालनी ही थी । असुर बुद्धि में देवताओं की तुलना में बड़े तेज होते हैं । उनमें तो बस एक ही कमी है कि वरदान में शक्तियां पाकर अहंकारी हो जाते हैं । अहंकार भी ऐसा कि परमात्मा तक को ललकारने लगते हैं । असुरों की तुलना में देवता कम से कम अहंकार को तो नहीं पालते । देवताओं की बुद्धि को तो भोगों में रत रहने के कारण जंग लग जाता है । यही हाल सांसारिक भोगों में रत मनुष्यों का है । देवताओं को विपत्ति के समय कोई दूसरी राह नहीं दिखती, बस केवल एक ही राह दिखती है कि सहायता के लिए ब्रह्माजी को साथ लेकर भगवान के पास चले जाओ । 

           हाँ, तो बात चल रही थी कि हिरण्यकश्यप को अमरत्व तो नहीं मिला परन्तु उसने अपनी बुद्धि के अनुसार मृत्यु के सभी दरवाज़े बंद करने के लिए कई वरदान एक साथ मांग लिए । वह भूल गया था कि मृत्यु को आने के लिए किसी दरवाजे की आवश्यकता नहीं होती । न दिन में मरूँ न रात को, न घर में मरूँ न बाहर, न आसमान में मरूँ न धरती पर, न मनुष्य मुझे मार सके न ही कोई पशु आदि । प्रसन्न होकर ब्रह्माजी ने भी दे दिए सभी वरदान । ‘प्रभु ! मैंने तो वरदान दे दिए, अब इस समस्या को आप ही सम्भालो ।’ ब्रह्माजी और कर भी क्या सकते हैं ? 

 क्रमशः 

प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल

।। हरिः शरणम् ।।

No comments:

Post a Comment