Wednesday, September 16, 2026

सम्भवामि युगे युगे -14

 सम्भवामि युगे युगे -14

         कथित ज्ञानी कह रहे हैं कि जब पृथ्वी नहीं थी तो मनु-शतरूपा कहां रहते थे ? अरे भाई ! सूक्ष्म शरीर को रहने के लिए किसी आधार की आवश्यकता नहीं होती । हाँ, भविष्य में होने जा रहे सृष्टि के विस्तार के लिए स्थूल शरीर और उसके टिके रहने के लिए आधार की आवश्यकता होगी । विज्ञान भी कहता है कि पृथ्वी पहले जल में डूबी थी फिर उसका स्थल भाग उभरा और जल भाग समुद्र बन गया । शास्त्र और विज्ञान दोनों ही कहते हैं कि आकाश से वायु का प्रादुर्भाव हुआ, वायु से अग्नि, अग्नि से जल और सबसे अन्त में पृथ्वी अस्तित्व में आई । कहीं कोई मत भिन्नता नहीं है, अल्प ज्ञान से भिन्नता दिखाई पड़ती है । 

           आज के विज्ञान और शास्त्रों में वर्णित ज्ञान, दोनों की तुलना करना बेमानी है क्योंकि आधुनिक विज्ञान को शास्त्रों के ज्ञान तक पहुँचने के लिये अभी लंबा समय लगेगा । एरण, ज़िला सागर मध्य प्रदेश में पांचवीं छठी शताब्दी (490 से 510 के मध्य) की तेरह फीट लंबी एक मूर्ति मिली है, जिसमें वराह भगवान अपने दांतों पर भूदेवी को उठाए हुए है । इस मूर्ति में पृथ्वी का आकार गोल दिखाया गया है । वैज्ञानिकों ने पृथ्वी के गोल होने को स्वीकार सोलहवीं शताब्दी में जाकर किया है । है न आश्चर्य की जो बात, वैज्ञानिकों ने पांच सौ साल पहले पृथ्वी को गोल बताया है, वह हमें पंद्रह सौ वर्षों से पूर्व भी पता थी ।

              विज्ञान केवल विस्मृत हुए ज्ञान की पुनः स्मृति कराता है, जिसको खोज करना कहते हैं । विज्ञान कोई नया निर्माण नहीं कर सकता, कोई नई वस्तु नहीं बना सकता । वह तो केवल पहले से बने को खोज कर ला सकता है । विज्ञान केवल परमात्मा द्वारा प्रकृति को प्रदत्त की गई शक्तियों को खोजने में लगा है और उस खोज को अपनी सुख-सुविधा के लिए उपयोगी बनाता है । विषयांतर न हो जाए, इसलिए विज्ञान को यहीं छोड़ हिरण्याक्ष और वराह भगवान के मध्य हो रहे युद्ध की तरफ़ चलते हैं ।

क्रमशः 

प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल

 ।। हरिः शरणम् ।।

 ।।

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