सम्भवामि युगे युगे -20
संध्या का समय, सूरज पश्चिम दिशा में डूब रहा है, न दिन है न रात, घर के मुख्य द्वार के दोनों ओर स्थित खंभों के बारे में हिरण्यकश्यप पूछ रहा था कि क्या इनमें भी भगवान है ? अब केवल ऐसे जीव के आगमन की प्रतीक्षा थी, जो न मनुष्य हो और न पशु । जिसके हाथ में न तो कोई अस्त्र हो और न ही शस्त्र । ऐसा जीव कौन बना सकता है ? प्रकृति (माया) के तो वश में नहीं है क्योंकि प्रकृति तो वही रच सकती है जैसा परमात्मा ने उसे निर्देश दे रखा है । ऐसा जीव प्रकृति की रचना में है ही नहीं और न आज तक हुआ है जो न तो मनुष्य हो और न पशु । तो क्या अब स्वयं परमात्मा को ही इन दोनों से परे कोई रूप धरकर आना पड़ेगा ? हाँ, आना ही होगा क्योंकि अधर्म को हटाकर धर्म की स्थापना जो करनी है, साथ ही भक्त को प्रत्येक त्रास से मुक्त भी तो करना है ।
स्वयंभू भगवान बने पिता का पूछना कि क्या इस खम्भे में भी तुम्हारा भगवान है और भक्त पुत्र प्रह्लाद का उत्तर देना कि हां, इस खम्भे में भी भगवान है , हिरण्यकश्यप को क्रोधित करने के लिए पर्याप्त था । क्रुद्ध व्यक्ति विवेक खो देता है । क्रोधित होकर उसने खम्भे पर ज़ोरदार घूंसे का प्रहार किया और बोला - ‘कहां है, तेरे भगवान, भगवान होते तो अब तक दिख जाते ‘। हिरण्यकश्यप का इतना सा कहना था कि तत्काल खम्भा फाड़ कर नरसिंह भगवान प्रकट हो गए । मनुष्य और सिंह का संयुक्त रूप ।
आज तक प्रकृति ने ऐसी किसी संयुक्त रचना को नहीं रचा है जो आधा मनुष्य और आधा पशु हो । ऐसी रचना करना तो केवल भगवान के वश में है । हां, भगवान की बराबरी करने का दुस्साहस करने निकले विज्ञान ने ऐसा प्रयास किया है परन्तु उन्हें वांछित सफलता अभी तक मिली नहीं है ।
क्रमशः
प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल
।। हरिः शरणम् ।।
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