सम्भवामि युगे युगे -8
तीन युगों में परमात्मा के तीन अवतार, जय-विजय को आसुरी रूप से मुक्त करने के लिए हुए । यह आसुरी और दैवी रूप क्या हैं ? चलिए ! इन्हें समझने के लिए श्रीमदभगवद्गीता का सहारा लेते हैं ।
गीता में भगवान कहते हैं कि प्रत्येक मनुष्य में दो प्रकार की संपदा रहती है - दैव और आसुरी । किसी के भीतर दैव संपदा अधिक प्रभावी होती है और किसी में असुर संपदा । स्थूल शरीर को देखकर हम अनुभव नहीं कर सकते कि कौन दैव संपदा से ओतप्रोत है और कौन नहीं । असुरों के सींग-पूंछ नहीं होते और देवताओं में से कोई सुगंध नहीं निकलती । इसलिए आवरण में कुछ नहीं रखा, मनुष्य का आचरण ही उसकी पहचान बताता है । ब्राह्मण कुल में पैदा हुआ रावण भी राक्षस हो सकता है और असुर कुल में जन्म लेने वाला प्रह्लाद भी भगवद् भक्त हो सकता है । केवल आचरण ही उनकी पहचान कराता है । जब तक मुख से वाणी प्रस्फुटित नहीं होती तब तक कौवे और कोयल में कोई अंतर नहीं दिखता ।
हिरण्याक्ष और हिरण्यकश्यप भी कम ज्ञानी नहीं थे । हिरण्याक्ष बहुत बलशाली भी था । अपने बल के प्रदर्शन के लिए उसे कोई समकक्ष बलशाली नहीं मिल रहा था । हिरण्यकश्यप की तो बात ही छोड़िए, वरदान पाकर वह स्वयं को ही भगवान मान बैठा था । आज भी तो ऐसे कई ज्ञानी महात्मा हैं जो स्वयं को परमात्मा का अवतार बता रहे हैं । हिरण्यकश्यप को तो उनके पुत्र ने बहुत बार पारमात्मिक-ज्ञान देने का प्रयास किया था परन्तु परिणाम में क्या मिला ? मृत्युदण्ड । वह तो परमात्मा की कृपा थी कि प्रत्येक बार प्रह्लादजी मृत्यु के मुख में जाने से बच गए । फिर भी ज्ञानी हिरण्यकश्यप का विवेक कहां जाग्रत हुआ ? यदि विवेक जाग्रत हो जाता तो सम्भव है कि वह उस समय का महान संत होता ।
क्रमशः
प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल
।। हरिः शरणम् ।।
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