सम्भवामि युगे युगे - 2
पुरुष और सक्रिय प्रकृति के गठजोड़ की एक विशेषता है - ‘अभी नहीं मिला तो आगे मिलेगा’, इस आश्वासन के साथ माया पुरुष को अपने में उलझाए रखती है । आश्वासन - कि सुख आज नहीं मिला, कोई बात नहीं कल मिल जाएगा । और पुरुष उस सुख की प्रतीक्षा करने लगता है जिसे भविष्य में कभी मिलना भी नहीं है । माया का असत्य आश्वासन, तभी माया को असत् कहा जाता है । सत् सदैव साथ रहता है, असत् का साथ केवल मृगमारीचिका है । भगवान कहते हैं - नासतो विद्यते भावो नाभावो विद्यते सत: (गीता-2/16) । असत् परिवर्तनशील है, वह प्राप्त होता दिखते हुए भी सदैव अप्राप्त ही रहेगा । सत् प्राप्त ही है परन्तु माया के कारण अप्राप्त दिखता है । इस प्रकार असत् का संग कर एक भला पुरुष, जो स्वरूप से अजन्मा है और जिसे सक्रियता से कोई मतलब नहीं होता, वह भी प्रकृति की मायारूपी बैलगाड़ी में सवार होकर अनन्त यात्रा पर निकल पड़ता है ।
परमात्मा ने स्वयं के आनंद के लिए प्रकृति बनाई । आनन्द की अनुभूति के लिए एक से दो होना आवश्यक था । आनन्द को अनुभव करने के लिए वह स्वयं पुरुष बना और प्रकृति को अपने आनन्द का स्रोत बनाया । परमात्मा ने प्रकृति को सृष्टि रचने का आदेश दिया - ‘मयाध्यक्षेण प्रकृतिं सूयते सचराचरम्’ (गीता-9/10) । सृष्टि में प्रकृति स्वयं जगत् बनी और उस जगत् के माध्यम से आनन्द अनुभव करने के लिए परमात्मा ने पुरुष (आत्मा) रूप से उसमें प्रवेश किया । पुरुष को अनुभव करना था आनन्द को परन्तु अनुभव करने लगा सुख-दुःख को । इस प्रकार सुख-दुःख को अनुभव करने के कारण वह अपना मूल स्वरूप भूल बैठा । इसी भूल ने उसको जीव बना दिया और उसे मुक्त न रखकर विभिन्न शरीरों की यात्रा पर धकेल दिया । जिसके वशीभूत होकर वह अनन्त यात्रा पर निकल पड़ा है, यही परमात्मा की माया है ।
प्रकृति (माया) ने पुरुष को नहीं उलझाया है बल्कि माया के साथ गठजोड़ कर वह स्वयं जीव बन उसमें उलझा है । इसी माया को संसार कहा जाता है । सब जीवों के शरीर समान है, पांच भौतिक तत्वों से बने हैं । इसी प्रकार आत्मा सबकी एक ही है और वह सर्वत्र है, केवल माया के कारण वह (जीव बना पुरुष) मेरा-तेरा में उलझ गया है । एक कोशिकीय जीव से लेकर बहुकोशिकीय जीव तक सब के शरीरों को देख लीजिए । सबमें वही पांच भौतिक तत्त्व, मन, बुद्धि अहम्, (अष्टधा प्रकृति) कहीं पर कोई भिन्नता नहीं । फिर भी मनुष्य और अन्य जीवों में एक बहुत बड़ा मूलभूत अन्तर है । सभी जीव सुख-दुःख की अनुभूति तो कर सकते हैं परन्तु आनन्द की अनुभूति केवल मानव ही कर सकता है ।
क्रमशः
प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल
।। हरिः शरणम् ।।
‘धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे’ - इस धरा पर अधर्म का नाश और धर्म की स्थापना करने के लिए मानव रूप में अवतरित होने वाले लीलाधर, मायापति, श्यामवर्णी, सबके प्यारे, नटखट नटवरलाल, श्यामसुन्दर, कन्हैया का आज प्रकटोत्सव मनाया जा रहा है । आप सभी को श्रीकृष्ण जन्माष्टमी की शुभकामनाएं ।
।। हरिः शरणम् ।।
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