Saturday, September 5, 2026

सम्भवामि युगे युगे -3

 सम्भवामि युगे युगे -3

          केवल मनुष्य ही आनन्दित हो सकता है, अन्य जीव नहीं । मनुष्य और अन्य जीवों में इतना बड़ा भारी अन्तर, फिर भी मनुष्य आनन्द प्राप्ति का मूलभूत उद्देश्य भूलकर सुख-दुःख में उलझ गया । कारण - प्रकृति ने सृष्टि का निर्माण किया और मनुष्य ने स्वयं को सृष्टि का अंग मान लिया । केवल उसका शरीर ही सृष्टि का अंग है न कि वह स्वयं । मनुष्य नहीं जानता कि उसके शरीर में उपस्थित पुरुष जोकि वह स्वयं है, वास्तव में आनन्द को अनुभव करने के लिए ही है । परमात्मा भी मनुष्य रूप में अवतरित होते हैं परन्तु वे अपना मूल स्वरूप नहीं भूलते क्योंकि वे प्रकृति(माया) को अपने अधीन करके अपनी योगमाया से प्रकट होते हैं - ‘प्रकृतिं स्वामधिष्ठाय सम्भवाम्यात्ममायया’ (गीता-4/6) । हां, आनन्द के लिए माया का सहारा लेकर लीला अवश्य करते हैं । कैसी-कैसी लीला की है उन्होंने, माया को अपने अधीन करके ? उनकी लीला का हम माया की दृष्टि से देखते हुए और माया में लिप्त हुए बिना आनन्द लेंगे ।

          परमात्मा ने प्रकृति से इस जगत् की रचना की और इसमें अपनी माया डाल दी । माया, जिसमें एक साथ दो सदैव उपस्थित रहते हैं, बस उनकी मात्रा में अंतर चलता रहता है, जैसे भला-बुरा, जन्म-मरण, हानि-लाभ, खट्टा-मीठा आदि । इन्हीं दो के अंर्तगत धर्म-अधर्म भी आ जाते हैं ।

        धर्म और अधर्म एक ही सिक्के के दो पहलू की तरह है । सिक्का उछालोगे तो वह एक पहलू ऊपर रखते हुए गिरेगा । इसी प्रकार इस जगत् में धर्म और अधर्म, दोनों बराबर एक साथ चलते रहते हैं । कभी धर्म का पक्ष ऊपर (प्रभावी) रहता है और कभी अधर्म का । जब अधर्म का प्रभाव अत्यधिक होने लगता है और धर्म को सदैव के लिए निष्प्रभावी करने का प्रयास करता है, तब भगवान को मनुष्य रूप धारण करना पड़ता है ।

क्रमशः 

प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल

।। हरिः शरणम् ।।

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