सम्भवामि युगे युगे -4
धर्म को दबाकर अधर्म बढ़ेगा तभी तो परमात्मा अवतार लेंगे । ऐसे में प्रश्न उठता है कि जब चारों ओर धर्म का ही बोलबाला है तो फिर अधर्म बढ़ कैसे जाता है ? अधर्म का बढ़ना भी परमात्मा का माया के माध्यम से खेले जाने वाला एक खेल है । भगवान ने प्रकृति बनाई, उसके नियम बनाए और साथ ही नियम तोड़ने पर मिलने वाले परिणाम भी बना दिए । इनमें एक नियम यह भी है कि जब-जब धर्म की हानि होगी और धर्म निष्प्रभावी होगा, तब-तब परमात्मा धर्म की पुनर्स्थापना के लिए अवतरित होंगे, चाहे युग कोई सा भी हो ।
हम सोचते हैं कि सतयुग बहुत महान युग रहा होगा, जबकि सत्यता यह है कि भगवान को सबसे अधिक अवतार भी सतयुग में ही लेने पड़े । अभी कलियुग चल रहा है और एक बार परमात्मा को फिर अवतार (कल्कि) लेना है । चारों ओर अधर्म बढ़ता दिख रहा है, धर्म का नाम केवल शास्त्रों में रह गया है । न जाने उनके अवतरित होने की कब तक प्रतीक्षा करनी पड़ेगी ? सतयुग में धर्म और अधर्म के मध्य संघर्ष प्रायः कम देखने को मिलता था, जबकि कलियुग में संघर्ष तुलनात्मक रूप से अधिक हो रहा है । जहां संघर्ष न के बराबर होता है अथवा बिलकुल नहीं होता, वहां परमात्मा को दौड़ कर शीघ्र आना पड़ता है । ऋषि-मुनि अपनी साधना में लीन रहते थे, बेचारे लड़ नहीं पाते थे तो भगवान को अवतार लेना पड़ता था ।
हिरण्याक्ष पृथ्वी को जल से बाहर निकालने में बाधा बन कर खड़ा था, किस मनुष्य ने उसके साथ संघर्ष किया ? एक ने भी नहीं, आना पड़ा परमात्मा को, शूकर का शरीर लेकर । हिरण्यकशिपु से संघर्ष केवल एक बालक ने किया वह भी केवल वाणी के स्तर पर । कितने प्रयास किए गए थे प्रह्लाद को मारने के । अंततः नरसिंह रूप लेकर स्वयं परमात्मा को आना पड़ा । प्रह्लाद भी असुर कुल में पैदा हुआ था, परंतु था बड़ा ईश्वर-भक्त । इनके ही कुल में (पौत्र) पैदा हुए थे राजा बलि । जिसके अहंकार ( दानवीर होने का) को तोड़ने के लिए परमात्मा को वामन अवतार लेकर तीन कदम धरती माँगनी पड़ी । ये सब सतयुग की ही तो कथाएं हैं ।
क्रमशः
प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल
।। हरिः शरणम् ।।
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