सम्भवामि युगे युगे -5
तो बात चल रही थी, माया के खेल की । माया और पुरुष, दोनों के अलग-अलग क्षेत्र, कहीं कोई एक दूसरे से प्रभावित होने अथवा प्रभावित करने का कारण नहीं । माया प्रभावित नहीं करती बल्कि पुरुष ही उससे प्रभावित होता है । कोई कारण न होते हुए भी पुरुष कैसे प्रभावित हो जाता है ? माया में तीन गुण रहते हैं - सत्व, रजस और तमस । इन तीन गुणों के कारण ही माया में विभिन्न क्रियाएं सम्पन्न होती है । ये क्रियाएं माया में एक प्रकार का आकर्षण उत्पन्न करती हैं । क्रियाओं की चकाचौंध से प्रकृतिस्थ पुरुष प्रभावित हो जाता है ।
माया से प्रभावित होकर पुरुष उसे अपने अनुसार उपयोग में लाने का प्रयास करता है । परमात्मा की माया सरलता से पुरुष के वश में आती नहीं है । जिसका परिणाम होता है कि पुरुष माया पर अपना अधिकार जमाने के लिए माया के गुणों का ही सहारा लेता है । परन्तु गुण माया के अन्तर्गत होने के कारण वे माया की आज्ञानुसार चलते हुए पुरुष को नचाना प्रारम्भ कर देते हैं । पुरुष को यह भ्रम होता है कि वह माया को नचा रहा है, जबकि वास्तव में पुरुष ही माया के परवश हुआ नाचता है ।
जो व्यक्ति अपने जीवन में स्वयं कर्ता बनता है और परिणाम मिलने पर ईश्वर को दोष देता है तो वह सबसे बड़ा झूठा है । माया और मायापति कुछ नहीं करते परन्तु माया में गुणों के कारण हो रही क्रियाओं को देखकर आप उनमें उलझ जाते हैं । क्रियाओं में उलझ जाने से अर्थ है, क्रियाओं को अपने स्वार्थ अनुसार चलाने का प्रयास करना । सभी क्रियाएं पूर्वनिर्धारित होती हैं, वे उसी अनुसार ही होंगी । केवल आप ही भ्रम पाल लेते हैं कि ये क्रियाएं मैं अपनी इच्छानुसार कर रहा हूँ । यही कर्ताभाव है । कर्ता होने पर भोक्ता भी होना पड़ेगा । प्रश्न उठता है कि परमात्मा बिना उलझे इस खेल को माया से कैसे खेल लेते हैं, जबकि हम इसमें उलझ जाते हैं ?
क्रमशः
प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल
।। हरिः शरणम् ।।
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