Wednesday, March 1, 2023

ज्ञान और भक्ति

 ज्ञान और भक्ति 

   स्वकर्म करते हुए व्यक्ति कर्मयोग के माध्यम से परमात्मा तक पहुंच सकता है।इस माध्यम में व्यक्ति के स्वभाव की भूमिका रहती है। दूसरा माध्यम है, ज्ञान का। ज्ञान प्राप्त करने में मनुष्य को स्वयं प्रयास करना पड़ता है और यह प्रयास है, परमात्मा को जानने का। ज्ञान योग में विवेक की महत्वपूर्ण भूमिका रहती है। कर्म और ज्ञान, दोनों ही मार्ग में प्रयास करना पड़ता है। कर्मयोग में स्थूल शरीर के माध्यम से प्रयास होता है जबकि ज्ञानयोग में सूक्ष्म शरीर से।

       उपरोक्त दोनों ही योग अपरा प्रकृति से सम्बंधित है। तीसरा योग है, भक्तियोग। इसमें संसार से अर्थात अपरा प्रकृति से संबंध विच्छेद करने के लिए परमात्मा के सम्मुख होना पड़ता है। इस योग में किसी भी प्रकार के प्रयास की आवश्यकता नहीं है।

      कर्म तो सभी जीव करते हैं परन्तु ज्ञान प्राप्त करने के लिए केवल मनुष्य ही अधिकारी है। इसी प्रकार भक्ति भी केवल मनुष्य नाम का प्राणी ही कर सकता है। भक्ति से ज्ञान प्राप्त हो जाता है और ज्ञान से भक्ति। दोनों का परिणाम भी एक ही है -आत्मबोध। तभी गोस्वामीजी मानस में लिखते हैं -"भगतिहि ग्यानहि नहिं कछु भेदा"। इसी विषय पर कल से एक नई श्रृंखला प्रारम्भ होने जा रही है।साथ बने रहें।

प्रस्तुति -डॉ. प्रकाश काछवाल

।। हरि:शरणम्।।

Tuesday, February 28, 2023

वर्ण और जीवनमुक्ति

 वर्ण और जीवनमुक्ति

        मनुष्य जीवन का एक मात्र उद्देश्य जीवन मुक्त होना है अर्थात इसी जीवन के रहते सभी सांसारिक बंधनों से मुक्ति। इसके लिए वर्ण व्यवस्था की भूमिका बड़ी महत्वपूर्ण है। स्वभाव के अनुसार स्वकर्म करते हुए भी मुक्ति की सिद्धि को मनुष्य प्राप्त कर सकता है।

       भगवान कहते हैं -

स्वे स्वे कर्मण्यभिरतः संसिद्धिं लभते नरः।(गीता-18/45) अर्थात अपने अपने कर्म में लगा हुआ मनुष्य सम्यक सिद्धि को प्राप्त कर लेता है ।

     किसी एक वर्ण को पहले और सुगमता से सिद्धि प्राप्त होती है, ऐसा भी नहीं है। प्रत्येक वर्ण के मनुष्य को परमात्मा प्राप्ति का पूरा पूरा अधिकार है।

मां हि पार्थ व्यपाश्रित्य येऽपि स्यु पापयोनय: |

स्त्रियो वैश्यस्तथा शूद्रास्तेऽपि यान्ति परां गतिम् || गीता -9/32।।

हे पृथा पुत्र, जो लोग मेरी शरण लेते हैं,वे चाहे पाप योनि के प्राणी हों, वैश्य हो, शूद्र हों अथवा स्त्री-निःसंदेह सभी परम पद को प्राप्त को प्राप्त कर लेते हैं।

उपरोक्त श्लोक को शूद्रों के लिए सबसे अधिक हानिकारक माना जाता है, परंतु वह है नहीं। यह शूद्र, वैश्य, स्त्री और पाप योनि के में जन्म लिए व्यक्तियों का समान रूप से सम्मान करता है । भगवान कहते हैं कि ये भी सर्वोच्च स्थान प्राप्त कर सकते हैं।

       इसीलिए सनातन धर्म शास्त्र वर्ण धर्म पालन पर जोर देते हैं। जहां वर्ण व्यवस्था टूटी नहीं कि मनुष्य का पतन निश्चित है। स्वाभाविक कर्म करते हुए ज्ञान और भक्ति मार्ग पर चलें, तो आत्मबोध को शीघ्र ही उपलब्ध हुआ जा सकता है, इसमें तनिक भी संदेह नहीं है।

प्रस्तुति -डॉ. प्रकाश काछवाल

।। हरि:शरणम्।।

 

Monday, February 27, 2023

वर्ण और स्वाभाविक कर्म-कल से आगे

 वर्ण और स्वाभाविक कर्म -कल से आगे 

        एक क्षत्रिय के स्वाभविक कर्म क्या हैं, अर्जुन को स्पष्ट करते हुए भगवान कह रहे हैं-

शौर्यं तेजो धृतिर्दाक्ष्यं युद्धे चाप्यपलायनम्।

दानमीश्वरभावश्च क्षात्रं कर्म स्वभावजम्।।गीता -18/43।।

शूरवीरता,तेज,धैर्य,प्रजा का संचालन,युद्ध में पीठ न दिखाना,दान करना और शासन करना, ये एक क्षत्रिय के स्वाभाविक कर्म हैं।

      अर्जुन एक क्षत्रिय वर्ण का था।जब वह युद्धभूमि से पलायन करने जा रहा था,तो भगवान ने कहा था कि आज तू मेरी बात न सुनकर युद्ध से भाग रहा है परंतु एक दिन तेरा स्वभाव तुम्हें युद्धभूमि में खींच लाएगा।  युद्ध से बढ़कर एक क्षत्रिय के लिए कोई अन्य कार्य है ही नहीं।युद्ध उसके लिए स्वर्गदायी और कीर्ति को देने वाला है।

   वैश्य और शूद्र वर्ण के मनुष्यों के कर्तव्य कर्म क्या हैं ? भगवान कह रहे हैं -

कृषिगौरक्ष्यवाणिज्यं वैश्यकर्म स्वभावजम् |

परिचर्यात्मकं कर्म शूद्रस्यपि स्वभावजम् ||गीता-18/ 44||

वैश्यों के गुण वाले लोगों के लिए कृषि, दूध डेयरी और वाणिज्य स्वाभाविक कार्य हैं। शूद्रों के गुणों वाले लोगों के लिए अपने शरीर से काम करते हुए सेवा करना स्वाभाविक कर्तव्य है।यही कारण है कि वैश्य वर्ण का व्यक्ति व्यापार में सफलता प्राप्त करता है और शूद्र वर्ण के व्यक्ति सेवा के माध्यम से समाज में प्रतिष्ठा पाते हैं।जिस दिन शूद्र अपने सेवा भाव से विमुख हो जाएंगे, कर्मचारी मिलने मुश्किल हो जाएंगे। आज अमेरिका में सेवा के लिए कर्मचारी मिलने असम्भव होते जा रहे हैं।

प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल

।।हरि:शरणम्।।

Sunday, February 26, 2023

वर्ण और स्वाभाविक कर्म

 वर्ण और स्वाभाविक कर्म

       वर्ण व्यवस्था का एकमात्र आधार पूर्व मानव जीवन में किए गए कर्म हैं, जिनसे हमारा इस जीवन का स्वभाव बना है।किस वर्ण का उसके जीवन में कैसा स्वभाव होगा, उनके कर्म कैसे होंगे, इसका श्री कृष्ण ने गीता में वर्णन किया है।वे कहते हैं -

ब्राह्मणक्षत्रियविशां शूद्राणां च परन्तप |

कर्माणि प्रविभक्तानि स्वभावप्रभवैर्गुणै: || गीता -18/41||

ब्राह्मणों, क्षत्रियों, वैश्यों और शूद्रों के कर्तव्यों को उनके गुणों के अनुसार, उनके गुणों के अनुसार बांटा गया है।

          स्वाभाविक कर्म मनुष्य के द्वारा किए ही जायेंगे । उन कर्मों को देखकर आप उस मनुष्य का वर्ण पता कर सकते हैं।ब्राह्मण वर्ण में जन्मे मनुष्य के स्वाभाविक कर्म कौन कौन से हैं, भगवान बतला रहे हैं -

शमो दमस्तपः शौचं क्षान्तिरार्जवमेव च।

ज्ञानँ विज्ञानमास्तिक्यं ब्रह्मकर्म स्वभावजम्।।गीता -18/42।।

मन का निग्रह करना,इंद्रियों को वश में करना,धर्म पालन के लिए कष्ट सहना, बाहर भीतर की शुद्धि,क्षमा करना, सरलता, वेदाध्ययन, यज्ञ करना और परमात्मा में श्रद्धा रखना, ये नौ ब्राह्मण के स्वाभाविक कर्म हैं।

        अगर कोई व्यक्ति इन कर्मों को नहीं कर रहा है, तो समझ लीजिए उसके ब्राह्मण वर्ण का होने में संदेह है।कम से कम बाहर भीतर की शुद्धि, क्षमाशील होना और परमात्मा में विश्वास रखना तो बाहर से भी देखकर अनुभव में आ जाएगा।

शेष कल 

प्रस्तुति -डॉ. प्रकाश काछवाल

।। हरि:शरणम्।।

Saturday, February 25, 2023

वर्ण - अभेद

 वर्ण-अभेद

         वर्ण भले ही चार हों उनमें जो भी भिन्नता दिखलाई देती है,वह सब असत है।असत इसलिए क्योंकि वर्ण व्यवस्था संसार की व्यवस्था है । अभेद केवल एक ही स्तर पर है -भीतरी स्तर पर। सभी वर्ण के मनुष्यों के भीतर परमात्मा निवास करते हैं। इसीलिए भगवान ने गीता में कहा है -

विद्याविनयसंपन्ने ब्राह्मणे गवि हस्तिनि।

शुनि चैव श्वपाके च पण्डिताः समदर्शिनः।।5/18।।

      जिनके आत्माका अज्ञान ज्ञान द्वारा नष्ट हो चुका है वे पण्डितजन परमार्थतत्त्वको कैसे देखते हैं ? भगवान कहते हैं कि विद्या और विनययुक्त ब्राह्मण में अर्थात् विद्या आत्मबोध और विनय उपरामता इन दोनों गुणोंसे सम्पन्न जो विद्वान् और विनीत ब्राह्मण है उस ब्राह्मण में, गौ में हाथी में, कुत्ते और चाण्डाल में भी पण्डितजन समभाव से देखते हैं । 

       सभी में परमात्मा को समभाव से देखना तो उचित है परंतु सब के साथ व्यवहार समान रूप से नहीं किया जा सकता।व्यवहार में भिन्नता रखने को ही वर्ण के कारण भेदभाव रखना बताया जाता है, जोकि उचित नहीं है। कार्यालय में विभागाध्यक्ष और कर्मचारियों आदि को समभाव से तो देखा जा सकता है परंतु इन सब के साथ व्यवहार अलग अलग प्रकार से किया जाता है।

        इस प्रकार स्पष्ट है कि वर्ण व्यवस्था में भिन्नता व्यवहार के स्तर पर होना उचित है परंतु सबको समभाव से देखना वर्ण-अभेद है। भिन्न व्यवहार करने को भेदभाव नहीं कहा जा सकता।

प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल

।।हरि:शरणम्।।

Friday, February 24, 2023

वर्ण-भेद

 वर्ण-भेद

      गुण और कर्मों के आधार पर शरीर का वर्ण निश्चित होता है और प्राणी का स्वभाव भी इन गुण और कर्मों से निश्चित होता है। इसका अर्थ हुआ कि प्रत्येक प्राणी के भावी जन्म सदैव एक ही वर्ण में होना आवश्यक नहीं है।साथ ही यह भी निश्चित है कि वर्ण प्रकृति के अंतर्गत ही है क्योंकि गुण और कर्मों के आधार पर मिला यह शरीर भी प्रकृति का ही भाग है।

        प्रकृति में कोई भी दो वस्तुएं, व्यक्ति अथवा प्राणी एक समान नहीं हो सकते।इसका कारण है कि प्रकृति असत है।असत इसलिए कि यह स्थिर नहीं है और जो अस्थिर है, वह कभी सत्य नहीं हो सकता। "पल में तोला पल में माशा" की बात पर विश्वास नहीं किया जा सकता क्योंकि यह असत है, जो प्रतिपल बदल रहा है।

     शरीर, गुण, कर्म, स्वभाव आदि सभी प्रकृति के अंतर्गत है।इसीलिए ये असत हैं और असत्य होने के कारण इनमें भेद होना अवश्यम्भावी है। वर्ण का आधार भी गुण,कर्म, स्वभाव आदि हैं इसलिए ही भगवान ने मनुष्यों  के चार वर्ण बनाये हैं। इस भेद को किसी भी प्रकार मिटाया नहीं जा सकता क्योंकि ये भिन्नता स्वभाव पर आधारित है और स्वभाव को लाख प्रयास करके भी परिवर्तित नहीं किया जा सकता।

     वर्ण में परिवर्तन लाना है तो व्यक्ति को अपने स्वभावानुसार आचरण करते हुए कर्मों को सुधारना होगा। कर्म गुणों की अवस्था को परिवर्तित करते हैं और ये गुण ही संस्कार बनाते हैं। संस्कार से नए जीवन में वर्ण और स्वभाव बनता है।

     वर्ण भिन्न भिन्न भले ही हों परंतु इन वर्णों में क्या कोई समानता भी है ? इसी बात पर कल चर्चा करेंगे -'वर्ण-अभेद' में।

प्रस्तुति -डॉ. प्रकाश काछवाल

।। हरि:शरणम्।।

Thursday, February 23, 2023

वर्ण-व्यवस्था-कल से आगे

 वर्ण-व्यवस्था -कल से आगे

      स्वभाव के कारण ही मनुष्य ही क्या संसार में कोई भी दो प्राणी अथवा वस्तुएं एक समान नहीं मिलते हैं, यहां तक कि युग्मज में भी दोनों में कुछ न कुछ भिन्नता अवश्य रहती है। समानता बाहर से भी नहीं है और भीतर स्वभाव से भी नहीं है। आधुनिकता के प्रभाव से वर्ण व्यवस्था को जाति व्यवस्था बतलाते हुए इसका चाहे जितना मान मर्दन करें, यह आदिकाल से चली आ रही व्यवस्था है और इसे कभी भी समाप्त नहीं किया जा सकता।साथ ही साथ यह व्यवस्था पूर्ण रूप से वैज्ञानिक व्यवस्था भी है।

        वर्ण व्यवस्था के लिए केवल एक वर्ण (ब्राह्मणों) पर दोषारोपण किया जाता है परंतु यह अर्द्ध सत्य है। वास्तव में देखा जाए तो किसी मनुष्य ने इन वर्णों को नही बनाया है। वर्ण भगवान द्वारा निश्चित किए गए हैं। गीता में भगवान स्पष्ट करते हुए कहते हैं-'चातुर्वर्ण्यं मया सृष्टं गुणकर्मविभागशः'(गीता-4/13)- अर्थात मेरे द्वारा गुणों और कर्मों के विभागपूर्वक चारों वर्णों की रचना की गई है । पूर्वजन्मों में किये गये कर्मों के अनुसार सत्त्व, रजस और तमस - इन तीनों गुणों में न्यूनाधिकता रहती है।सृष्टि-रचनाके समय उन गुणों और कर्मोंके अनुसार भगवान् ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र -इन चारों वर्णोंकी रचना करते हैं। 

 प्रस्तुति -डॉ. प्रकाश काछवाल

।। हरि:शरणम्।।