Wednesday, July 31, 2013

पुनर्जन्म का वैज्ञानिक आधार-एक परिकल्पना|क्रमश:१८|चित्त |

क्रमश:
     गीता में भगवान ने किसी जीव को उत्पन्न करने के लिए पांच तत्वों,पांच ज्ञानेन्द्रियों के विषय,दस इन्द्रियों के अलावा मन,बुद्धि और अहंकार आवश्यक बताये है,जो कि प्रकृति से पैदा होते हैं|जबकि श्रीमद्भागवत महापुराण में इनके अतिरिक्त चित्त को भी शामिल किया है|चित्त को भी प्रकृति से उत्पन्न माना गया है|हालाँकि मन और चित्त में स्थिति के अनुसार कोई फर्क नहीं है,दोनों शरीर और आत्मा को जोड़ते है|अंतर केवल गुणात्मक है|अन्य शब्दों में कहा जाये तो इन को प्रयायवाची कह सकते है|मन और चित्त एक ही सिक्के के दो पहलू है|मन को पट्ट और चित्त को चित्त कह सकते है|मन का जो किनारा शरीर व संसार को छूता है वह मन है और दूसरा किनारा जो आत्मा को छूता है वह चित्त कहलाता है|दोनों शब्द केवल शब्दों का फेर है|मन कभी भी चित्त बन सकता है और चित्त कभी भी मन|
                                  मन का हिस्सा जो बुद्धि से प्रभावित होता है और आत्मा भी उसे प्रभावित करता है ,उसे अंतःकरण भी कहते हैं|इसलिए अन्तःकरण की आवाज ज्यादा मायने रखती है,बजाय मन की आवाज के|व्यक्ति जब सांसारिक मोहजाल में फंसा रहता है और उसके मस्तिष्क पर काम और वासनाएं हावी होने लगती है तब वह चित्त यानि अन्तःकरण अथवा अंतर्मन की आवाज की उपेक्षा करनी शुरू कर देता है|यहीं से चित्त का परिवर्तन मन में होने लगता है|इस आवाज की लगातार उपेक्षा करते जाने से उस व्यक्ति को इसका सुनाई देना भी बंद हो जाता है|ऐसी स्थिति में चित्त के स्थान को मन पूर्ण रूप से घेरकर समस्त स्थान पर अपना प्रभुत्व कायम कर लेता है|यह मानव जीवन की सबसे बड़ी त्रासदी है|इस त्रासदी से निकलना मनुष्य के लिए लगभग असंभव हो जाता है|इस संसार में डाकू से महर्षि बनने के उदाहरण एक दो से ज्यादा नहीं है|जब चित्त की आवाज सुनकर मनुष्य अच्छी राह पर चल देता है तो फिर परमात्मा से उसकी दूरी तुरंत समाप्त हो जाती है,कोई इंतज़ार नहीं करना होता|फिर वह स्वयं ही परमात्मा स्वरुप होते होते परमात्मा ही हो जाता है|
                                           यह सब पढना और लिखना जितना आसान है|जीवन में उतारना उतना ही मुश्किल|क्योंकि कर्ता भाव हमें इसे जीवन में उतारने से रोक देता है|हम ही इस संसार में सभी कार्य करने वाले बन जाते हैं|यह सब हमारे चित्त को प्रभावित करती है और मन प्रभावशील हो जाता है|सब "मैं" ही हूँ , यह मन का स्वभाव है,सब परमात्मा है यह चित्त का स्वभाव है|जब आप मन के अधीन होते हैं, तब आप कुछ ना करते हुये,केवल सोचते हुये भी सब कुछ करते है(कर्म-बंधन) ,और जब आप चित्त के अधीन होकर कुछ करते है ,तो आप सब कुछ करते हुये भी कुछ नहीं करते हैं|(कर्म-संन्यास)|कर्म बंधन आप को जन्म-मरण के चक्र से बाहर नहीं आने देता ,जबकि कर्म संन्यास मुक्ति का मार्ग खोलता है|गीता में भगवान कहते है-
                                     यततो ह्यपि कौन्तेय पुरुषस्य विपश्चितः|
                                     इन्द्रियाणि प्रमाथीनि हरन्ति प्रसभं मनः||गीता २/६०||
अर्थात्,हे अर्जुन!आसक्ति का नाश न होने के कारण ये प्रमथन स्वभाव वाली अर्थात् अपना प्रभुत्व कायम करने के स्वभाव वाली इन्द्रियां यत्न करते हुये बुद्धिमान पुरुष के मन को भी बलात् हर लेती है|
      इस श्लोक से स्पष्ट है कि जब मनुष्य को भोग प्रधान कर्म करने में आनंद आने लगता है तो इन्द्रियां मन पर अपना प्रभाव कायम कर लेती है| जिस कारण मनुष्य अधिक आनंद उठाने के लिए कर्म करने को विवश हो जाता है|वह कर्म के साथ अपने आप को बांध लेता है-यही कर्म-बंधन है|
                                          कर्म-बंधन में व्यक्ति को  अतुलनीय आनंद की अनुभूति होती है|कर्म-संन्यास को वह एक काल्पनिकता मानता है|आज जो सामने है उसको नकारना असंभव है|जो अभी सामने नहीं है,वह है भी या नहीं,इसी सोच में पूरा जीवन समाप्त हो जाता है|फिर कोई  कहाँ से कर्म-बंधन छोड़ कर कर्म-संन्यास को उपलब्ध होगा?इस देश के नागरिकों की यही विडम्बना है|हम योग नहीं कर सकते,जिम जा सकते हैं|हम घर पर निम्बू पानी नहीं पियेंगे,बाहर की बोतलबंद पेय  पी लेंगे;घर पर शाम को बनी रोटी अगले दिन सुबह नहीं खायेंगे,महीने पहले के बने बिस्किट खा लेंगे;छः महीने के बच्चे को डिब्बाबंद खाद्य  देना पसंद करेंगे;घर पर सूजी की खीर नहीं खिलाएंगे,ऐसे सैंकडों उदहारण मिल जायेंगे|काश!इस चित्त और मन को पश्चिम का कोई वैज्ञानिक सिद्ध कर दे तब फिर हम  भी इन सब पर विश्वास कर सकेंगे| हमारे सभी शास्त्र वैज्ञानिक पुष्टि कर के लिखे हुये हैं,विश्वास तो हमें ही करना होगा|अन्यथा हमारे पास चित्त न होकर मात्र मन होगा और कर्म-संन्यास के स्थान पर सिर्फ कर्म-बंधन|हमारा भविष्य हम ही तय कर सकते है,कोई अन्य नहीं|
क्रमश:
              || हरि शरणम् || 

Tuesday, July 30, 2013

पुनर्जन्म का वैज्ञानिक आधार-एक परिकल्पना|क्रमश:१७|मन-६

क्रमश:
                        गीता के अनुसार कर्म तीन प्रकार के होते हैं, कर्म,अकर्म और विकर्म|इनकी प्रकृति के अनुसार उन्हें अलग तरीके से तीन श्रेणियों में विभाजित किया गया है-सात्विक, राजसिक और तामसिक कर्म| मनुष्य के कर्म ,जो भी वह अपने जीवन में करता है ,वे सब प्रकृति के गुणों(Characteristics of nature)के कारण ही संभव है|गुण भी तीन प्रकार के होते है-सात्विक,राजसिक और तामसिक|
                                                   मन के बारे में पूर्ण जानकारी हो जाने पर पता चलता है कि मन आत्मा को शरीर से जोड़े रखने की एक कड़ी है|जिसका स्वयं का कोई उर्जा स्रोत नहीं होता ,बल्कि वह दो उर्जा स्रोतों के बीच एक सामंजस्य पैदा करता है जिससे संसार की सभी क्रियाएँ सामान्य रूप से संचालित होती रहे|मन शुरुआत में एक ठहरे हुये जल की झील के समान होता है,जिसमे छोटा सा एक कंकड डालने से ही हलचल मच जाती है|इस हलचल से उत्पन्न तरंगे दोनों ही तटों को प्रभावित करती है-आत्मा को भी और शरीर को भी|इस हलचल से प्रभावित ना होना लगभग असंभव होता है|
                                    मन और शरीर का उद्भव ईश्वर की प्रकृति से होता है|और प्रकृति से उत्पन्न होने के कारण तीनो गुण इनमे उपस्थित होते है|कोई भी मन और शरीर इन तीनो गुणों से अछूता नहीं हो सकता|किसी में एक गुण की प्रधानता होती है तो किसी में अन्य की|प्रधान गुण के कारण उस व्यक्ति का वैसा ही आचरण होता है और वह उसी के अनुरूप कर्म करता है|
     
                                   गीता में भगवान कहते हैं-
                               सत्वं रजस्तम इति गुणा: प्रकृतिसम्भवा:|
                               निबध्नन्ति  महाबाहो देहे देहिनमव्ययम्||गीत१४/५||
                               अर्थात्, हे अर्जुन!सत्वगुण,रजोगुण और तमोगुण-ये  प्रकृति से उत्पन्न तीनो गुण अविनाशी जीवात्मा को शरीर में बांधते हैं|
     यहाँ जो तीन गुणों के बारे में भगवान बता रहे हैं ,वे सब शरीर और जीवात्मा को बांधे रखने की एक कड़ी है|इसी प्रकार मन भी जीवात्मा को शरीर से जोड़ने की एक कड़ी है|गुणों के अनुरूप ही कर्म होते है,जो फिर से मन में संचित होकर पुनर्जन्म को निर्धारित करते हैं|
                    विज्ञानं के अनुसार अगर देखा जाये तो यह स्पष्ट हो जाता है कि शरीर और उसके समस्त अंगों में विद्युत उर्जा निरंतर बनी रहती है ,जिसके कारण जैव विद्युत-चुमबकीय क्षेत्र(Bio Electromagnetic field) सक्रिय रहता है|किसी एक अंग के इस क्षेत्र में होने वाले परिवर्तन का असर दूसरे अंग के क्षेत्र को प्रभावित करता है|इस परिवर्तन होने को ही कर्म होना कहते हैं|उदाहरण के तौर पर अगर पेट यानि आमाशय (Stomach)में इस क्षेत्र में परिवर्तन होता है , तब हमें भूख लगने या पेट भर जाने आदि का अनुभव होता है|यह परिवर्तन हाथों में उपस्थित क्षेत्र को प्रभावित करता है जिससे खाना शुरू करने या खाना बंद करने की प्रकिया होती है|यहाँ गुण अमाशय में उपस्थित जैव विद्युत चुम्बकीय क्षेत्र है और कर्म वह प्रकिया है जो इस क्षेत्र में परिवर्तन आने से घटित होती है| यह उदाहरण जैविक कर्म का है|एक अन्य उदहारण भौतिक कर्म का लेते है-आप हमेशा प्रातः भ्रमण को जाते है|प्रतिदिन सुबह आपके मष्तिष्क के जैव विद्युत चुम्बकीय क्षेत्र में परिवर्तन आता है,वह आपके शरीर की अन्य मांसपेशियों के क्षेत्र को प्रभावित करता है जिससे आपके भ्रमण की प्रकिया शुरू हो जाती है|इसी प्रकार भ्रमण के दौरान आपके कान अगर पीछे से दौड़कर आते हुये  पशुओं की आवाज सुनते है,तो यह सब  कान के  भीतरी यंत्र में इस क्षेत्र में होने वाले परिवर्तन के कारण होता है |यह परिवर्तन अनायास ही आपके पैरों में उपस्थित इसी क्षेत्र को प्रभावित करता है,जिससे आप अचानक एक झटके के साथ उछलकर उन पशुओं के रास्ते से हट जाते हैं|यह प्रतिक्रियात्मक कर्म का एक उदाहरण है|इन कर्मों से  जो विद्युत चुम्बकीय  क्षेत्र उत्पन्न होता है वह मन में अंकित यानि रेकॉर्ड होता है|यह फिर से शरीर को और आत्मा को प्रभावित करता है|जिस कर्म को करने से मनुष्य को आनंद आता है,मन की इसी रिकार्डिंग से पुनः शरीर को वही कर्म दोहराने का आदेश मिलता है |यह प्रक्रिया सतत जीवन भर चलती रहती है,और व्यक्ति भौतिक कर्म करते करते विकर्म की तरफ अग्रसर होता जाता है|उसे यह भान भी नहीं होता कि इन सब का लेख मन के एक हिस्से में अंकित हो रहा है,और जिनका परिणाम उसे अगले जन्म में मिलेगा|
                                     इस प्रकार हम देखते है कि  समस्त कर्म  इन जैव विद्यत चुम्बकीय क्षेत्रों में होने वाले परिवर्तन मात्र ही है,और ये क्षेत्र प्रकृति के गुण ही है|इसको ही गीता में सभी गुण, गुणों में ही वरत रहे है,ऐसा कहा गया है|जिस व्यक्ति को इसका भान हो जाता है वह फिर भौतिक कर्म से विकर्म की और जाने की बजाय अकर्म की तरफ जाने का प्रयास करता है|जब वह इसमे सफल हो जाता है तब उसके सभी कर्म नष्ट हो जाते है,फिर वह कर्म करते हुये भी कर्म में बंधता नहीं है|कर्म में बंधने का अर्थ यह है की इन कर्मों के लेख मन के किसी भी  हिस्से में अंकित नहीं होते है| वास्तविकता में इसी स्थिति को मुक्त होना या मोक्ष प्राप्त होना कहते है|
      क्रमश:
                || हरि शरणम् ||
                                    

Monday, July 29, 2013

पुनर्जन्म का वैज्ञानिक आधार-एक परिकल्पना|१६|मन-५

क्रमश:
        इस प्रकार हम देखते हैं कि कर्म मुख्यतः तीन प्रकार के होते हैं-(१)जैविक कर्म (२)प्रतिक्रियात्मक कर्म और (३)सक्रिय कर्म |फिर सक्रिय कर्म भी तीन प्रकार के होते है-(अ )भौतिक कर्म (ब)अकर्म और (स )विकर्म|
जैविक कर्म शरीर में होने वाले निश्चित कर्म है,जिनका मन से कोई सम्बन्ध नहीं है|प्रतिक्रियात्मक वे कर्म है जो मन के साथ पूर्वजन्म से संचित कर्म के रूप में आते है और इस जन्म में परिणाम देने के लिए प्रतिक्रियात्मक रूप से होते है|तीसरे कर्म जो इस जन्म में सक्रिय कर्म किये जाते है ,वे मन में अंकित होते रहते है और पुनर्जन्म में उनका परिणाम मिलता है जो अच्छा भी हो सकता है और बुरा भी|सक्रिय कर्म में केवल अकर्म ही  यहाँ इस जन्म में परिणाम दे सकते है परन्तु इस कर्म को करनेवाले को न तो कर्म से लगाव होता है और न ही परिणाम से|इसलिए अकर्म मन में संचित नहीं होते और न ही अगले जन्म में उनका कोई परिणाम मिलता है|
            केवल भौतिक कर्म और विकर्म ही मन में संचित होकर आत्मा के साथ नए शरीर में जाते हैं|उनका परिणाम जो भी तय होता है,नए शरीर में ही मिलता है|जिस जन्म में ये कर्म किये जाते है उस जन्म में इन कर्मो का कोई परिणाम नहीं मिलता|वर्त्तमान जन्म में केवल पूर्व जन्म में किये भौतिक कर्म और विकर्म के परिणाम ही प्रतिक्रियात्मक कर्म करते हुये ही प्राप्त होते हैं|
                  इस संसार में मनुष्य योनि को छोड़कर ८४ लाख तरह के जीव-जंतु और भी है|संचित कर्म(भौतिक और विकर्म) ,के अनुसार ही मनुष्य इन योनियों में जन्म लेता है और प्रतिक्रियात्मक कर्म करते हुये उनका परिणाम भुगतता है|ये सभी भोग योनियाँ होती है|यहाँ इन योनियों में किये कर्म केवल प्रतिक्रियात्मक ही होते है|कोई भी सक्रिय कर्म नहीं होते,अतः ये कर्म संचित भी नहीं होते|जब प्राणी अपनी इन योनियों में सभी का परिणाम को भोग लेता है तभी उसे मानव योनि फिर से सुलभ होती है|अगर यहाँ फिर से मानव जीवन में वह भौतिक कर्म औरविकर्म के चक्कर में आ जाता है तो उसे फिर से इन ८४ लाख योनियों में ही भटकते रहना होगा |
                                             इसीलिए मानव योनि को भोग योनि के साथ साथ योग योनि भी कहा गया है|अतः महापुरुषों ने मानव जन्म में हमेशा अच्छे कर्म करने को ही महत्व देने का कहा हैं|जिससे कम से कम इन ८४ लाख भोग योनियों में तो ना भटकना पड़े|गीता में भगवान कहते है कि जो जैसा इस जन्म में करता है ,अगले जन्म में उसको सब वैसा ही मिल जाता है|व्यक्ति स्वयं ही अपना मित्र है और स्वयं ही अपना शत्रु|
                                              उद्धारेदात्मनात्मानं   नात्मानमवसादयेत् |
                                              आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मन ||गीता ६/५||
अर्थात्,अपने द्वारा इस संसार सागर से अपना उद्धार करे और अपने आप को अधो गति में न डाले,क्योंकि यह मनुष्य आप ही तो अपना मित्र है और आप ही अपना शत्रु है|
                                             बन्धुरात्मात्मंनस्तस्य येनात्मैवात्मना जितः |
                                             अनात्मनस्तु शत्रुत्वे वर्तेतात्मैव शत्रुवत् ||गीता ६/६||
अर्थात्, जिस जीवात्मा द्वारा मन और इन्द्रियों द्वारा शरीर जीता हुआ है,उस जीवात्मा का वह आप ही तो मित्र है;और जिसके द्वारा मन तथा इन्द्रियों सहित शरीर नहीं जीता गया है,वह आप ही शत्रु की तरह शत्रुता बरतता है|
        उपरोक्त दोनों श्लोकों में भगवान ने स्पष्ट कर दिया है कि मनुष्य कैसे अपने मन के द्वारा इन्द्रियों को जीतकर अकर्म के द्वारा अपना उद्धार कर सकता है;और ऐसा न कर पाने पर वह भौतिक कर्म और विकर्म करते हुये ८४ लाख योनियों में भटकते हुये जन्म-मरण के चक्कर में ही घूमता रहेगा|
               
  क्रमश:
                           || हरि शरणम् || 

Sunday, July 28, 2013

पुनर्जन्म का वैज्ञानिक आधार-एक परिकल्पना|क्रमश:१५|मन-४

क्रमश:
                           इस प्रकार हमने देखा कि  मानव शरीर से तीन प्रकार के कर्म संभव है|जैविक कर्म में और प्रतिक्रियात्मक कर्म में मनुष्य का कोई सक्रिय योगदान नहीं होता है,परन्तु सक्रिय कर्म ,मनुष्य के योगदान के बिना संभव नहीं है|गीता में जो कर्मयोग भगवान श्रीकृष्ण द्वारा कह गया है,वह इन सक्रिय कर्म से ही सम्बन्धित है|भगवान कहते हैं-
                       किं कर्म किमकर्मेति  कवयोSप्यत्र मोहिताः|
                    तत्ते क्रम प्रवक्ष्यामि यज्ज्ञात्वा मोक्ष्यसेSशुभात्||गीता-४/१६||
अर्थात्, कर्म क्या है, अकर्म क्या है ,इस पर विद्वान भी स्पष्टत: नहीं बता पाते हैं|वह कर्म तत्व मैं तुझे भलीभांति कहूँगा,जिसको जानकर तू इस संसार सागर से मुक्त हो जायेगा|
          यह स्पष्ट है कि अभी भी कर्मों का विवेचन कोई भी विद्वान स्पष्ट नहीं कर पाया है|इस श्लोक में भगवान जिस कर्म की चर्चा कर रहे है,वह सक्रिय कर्म की ही है|सक्रिय कर्म तीन तरह के होते है-
(१)भौतिक कर्म (Materialistic act)-यह कर्म किसी कामना के वशीभूत होकर किये जाते हैं|गीता में इन्हें केवल कर्म शब्द से ही संबोधित किया गया है|
(२)अकर्म-(Act without ambition)-वे कर्म जो बिना कामना के किये जाते हैं अर्थात् कर्ता,कर्म के साथ लिप्त नहीं होता,उसे अकर्म कहते हैं|
(३)विकर्म(Act for lust)-जब कामनाएं एक सीमा से ज्यादा बढ़ जाती है और कर्म में लिप्तता अधिक हो जाती है,उस स्थिति में किये जाने वाले कर्म विकर्म कहलाते हैं|ये कर्म निकृष्टतम श्रेणी के माने जाते हैं|इस स्थिति में व्यक्ति अपनी लिप्सा पूरी करने के लिए किसी भी हद तक जा सकता है|
                           पहले और तीसरे कर्म संचित कर्म भी कहलाते हैं|इनका संचय ही पुनर्जन्म का कारण बनते हैं,और उनका परिणाम वहीं पर भुगतना होता है|दूसरे तरीके के कर्म अर्थात् अकर्म संचित नहीं होते और ना  ही उनका कोई परिणाम भुगतना होता है,वे यहीं पर नष्ट हो जाते हैं|
            गीता में फिर भगवान आगे कहते हैं-
                        कर्मण्यकर्म यः पश्येदकर्मणि च क्रम यः |
                        स बुद्धिमान्मनुष्येषु स युक्तः कृत्स्नकर्मकृत् ||गीता-४/१८||
अर्थात्, जो मनुष्य अकर्म में कर्म देखता है और जो कर्म में अकर्म देखता है वह मनुष्यों में बुद्धिमान है,वह योगी है और सम्पूर्ण कर्मों को करनेवाला है|
           भगवान यहाँ कहते कि वह सब कर्मो को करने वाला है,क्योंकि वह कर्मों में बिलकुल भी लिप्त नहीं है|अतः कर्म  करते हुये भी वह कर्मों से विलग है अर्थात् कर्मबंधन से मुक्त है|इसलिए वह बुद्धिमान और योगी कहलाने का अधिकारी है|ऐसा व्यक्ति कर्म करते हुये भी कुछ नहीं करता है|इसके यह कर्म संचित कर्म भी नहीं होते हैं|
                        मन की परिचर्चा में कर्म की चर्चा आवश्यक होती है|कर्म के बिना मन की कोई उपयोगिता भी नहीं है और मन के बिना कर्म की|प्रत्येक सक्रिय कर्म मन के कारण ही किये जाते हैं,इसी प्रकार किये हुये सभी कर्म मन में ही संचित हो जाते हैं|यही मन में संचित कर्म पुनर्जन्म का कारण बनते है|और मनुष्य इस जन्म-मरण के चक्र से मुक्त नहीं हो पाता है|
  क्रमश:
             || हरि शरणम् ||


Saturday, July 27, 2013

पुनर्जन्म का वैज्ञानिक आधार-एक परिकल्पना-१४|मन-३

क्रमश:        
                  शरीर का अपना आकर्षण और प्रतिकर्षण बल (गुरुत्वाकर्षण बल,Gravitational force) होता है और आत्मा का अपना|जब दोनों के गुरुत्वाकर्षण बल आपस में एक दूसरे पर प्रभाव डालते है,तब एक स्थान पर दोनों का बल बराबर बराबर(Balanced) हो जाता है|वही स्थान मन का है|यह स्थिति फिर कैसे परिवर्तित होती है,यह आगे की चर्चा में आएगा|
                          एक दूसरी शक्ति या उर्जा की चर्चा यहाँ आवश्यक हो जाती है|वह है विद्युतीय उर्जा(Electrical energy)| भौतिक  शरीर का आधार भी तत्व ही है,तत्व में परमाणु यानि उर्जा|एक परमाणु का अपना एक केन्द्र(Nucleus) होता है,जिसमे प्रोटोन(Protons) के रूप में धन (Positive)आवेश रहता है|इस केंद्र के चारों और ऋण(Negative) आवेशित इलेक्ट्रोन(Electrons) परिक्रमा करते है|परमाणु विद्युत उत्पादन करते है,जिससे एक विद्युतीय क्षेत्र का निर्माण होता है|इसी तरह से ही  आत्मा का भी अपना एक विद्युतीय क्षेत्र(Electrical field) होता है|दोनों ही क्षेत्र एक दूसरे को प्रभावित करते हैं|इससे एक स्थान पर दोनों का प्रभाव बराबर होता है|इस नए बने केन्द्र का नाम ही मन है|शरीर और आत्मा का प्रभाव जब मन पर बराबर होता है,ऐसी स्थिति में मन किसी के भी पक्ष में नहीं होता है|आप इसे सृष्टि की प्रारंभिक अवस्था में मन की स्थिति कह सकते है.|इस विद्युतीय क्षेत्र की विशेषता यह होती है कि यह विद्युत प्रवाह बंद होने के बाद भी बना रहता है|
               विद्युत प्रवाह के दौरान ही एक दूसरे क्षेत्र का निर्माण और होता है-चुम्बकीय क्षेत्र(Magnetic field)|विद्युत प्रवाह के बंद होने के साथ ही चुम्बकीय क्षेत्र भी समाप्त हो जाता है|जब विद्युत प्रवाह होता रहता है,तब विद्युतीय चुम्बकीय क्षेत्र(Electromagnetic field) दोनों साथ साथ होते है|इन दोनों के साथ साथ रहने और अकेले विद्युतीय क्षेत्र के रहने का इस  शरीर पर अलग अलग प्रभाव होता है|प्रत्येक जीव में उपस्थित इस विद्युत चुम्बकीय क्षेत्र को जैविक विद्युत चुम्बकीय क्षेत्र () कहा जाता है|जीव में होने वाली सभी क्रियाएँ इसी क्षेत्र के प्रभाव से संपन्न होती है|इन क्रियाओं को ही कर्म() कहा जाता है|
               प्रत्येक जीवित शरीर में होने वाली ये क्रियाएँ मुख्यतः तीन प्रकार से होती है|
(१)जैविक कर्म(Biological act)-पहली क्रियाएँ उस प्रकार की होती है जिसमे हो रही क्रियाओं का ज्ञान जीव को नहीं होता,यानि कि उसे महसूस नहीं होता कि शरीर में कुछ घटित हो रहा है||जैसे-भोजन के पचने की क्रिया(Digestion),उपापचय(Metabolism),यकृत (Liver)और गुर्दे(Kidneys) तथा शरीर के अन्य अंगों की क्रियाएँ,अन्तःस्रावी(Endocrine glands) व बाह्य स्रावी (Exocrine glands) ग्रंथियों की क्रियाएँ,साँस लेना और ह्रदय का धडकना आदि|इन क्रियाओं को जैविक कर्म(Biological action) कहा जा सकता है|
(२)प्रतिक्रियात्मक कर्म(Reflex act)- दूसरी क्रियाएँ इस प्रकार की होती है जो किसी प्रतिक्रिया के फलस्वरूप होती है|इन क्रियाओं का ज्ञान आपको रहता है परन्तु आपका नियंत्रण नहीं|ज्ञान के अनुसार आप इन क्रियाओं को कैसे भी करना चाहे,वै होती आपके नियंत्रण में नहीं होती-क्रियाओं का परिणाम आपके पक्ष का भी हो सकता है और विपक्ष का भी |इन क्रियाओं को प्रतिक्रियात्मक कर्म(Reflex act) कहा जा सकता है|
(३)सक्रिय कर्म  (Active act)-तीसरी तरह की क्रियाएँ वे होती है जो आप अपने ज्ञान और विवेक से करते हैं,उन पर आपका नियंत्रण होता है और जो आप किसी निश्चित फल प्राप्त करने के उद्देश्य से करते है|फिर भी इसके परिणाम पर आपका कोई नियंत्रण नहीं होता है|इन क्रियाओं को सक्रिय कर्म( Active Act) कहा जा सकता है|
   क्रमश:
           || हरि शरणम् ||

Friday, July 26, 2013

पुनर्जन्म का वैज्ञानिक आधार-एक परिकल्पना|क्रमश:१३|मन-२

       क्रमश:
                                  इस प्रकार हमने देखा कि  दोनों उर्जा क्षेत्रो के प्रभाव से उत्पन्न यह तीसरा क्षेत्र ही मन  है|जिसके पास अपनी कोई उर्जा नहीं है|संसार का शाश्वत नियम है कि जिसका स्वयं का कोई उर्जा श्रोत नहीं होता या जिसमे स्वयं की उर्जा नहीं होती उसका स्थायित्व भी नहीं होता है|और ऐसा इस मन के साथ भी है|परन्तु यथार्थ रूप से  इसे स्वीकार करना बड़ा ही मुश्किल है|
                             इस संसार में जितनी भी भौतिक वस्तुए है उनसे संबधित न्यूटन द्वारा प्रतिपादित एक सिद्धांत है| "संसार में प्रत्येक वस्तु एक दूसरे को आकर्षित भी करती है,और प्रतिकर्षित भी करती है|आकर्षण और प्रतिकर्षण बल समान होने पर उन वस्तुओं की स्थिति में कोई परिवर्तन नहीं होता है|"जब इन दोनों बलों में विषमता पैदा होती है, तब स्थायित्व खतरे में पड जाता है|यह सिद्धांत छोटे से छोटे अणु परमाणु से लेकर विराट तक,सब पर समान रूप से लागु होता है|इस ब्रह्माण्ड में सभी कार्य एक निश्चित सिद्धांत के अनुसार ही होते हैं|जिसमे यह सिद्धात महत्वपूर्ण है कि "यहाँ जो भी है चाहे अणु में चाहे विराट में,सब एक समान है|" यहाँ पर सब इस उर्जा का खेल ही चलता रहता है|यह सब खेल ही तो ईश्वर की माया है|इसकी इस माया को पूर्णतया समझ लेना ही ईश्वर को पा लेना है|
                              इन आकर्षण और प्रतिकर्षण बलों से सम्बन्धित  एकछोटा सा उदाहरण देना चाहूँगा, जिससे इस सिद्धांत को समझने में आसानी होगी|पृथ्वी और सूर्य के बीच उपरोक्त दोनों बल भी कार्य करते हैं| लाखों वर्ष पूर्व दोनों के इन बलों में असमानता पैदा होने के परिणाम स्वरुप चंद्रमा अस्तित्व में आया|आकर्षण और प्रतिकर्षण बालों में विषमता पैदा हो जाने के फलस्वरूप पृथ्वी का एक टुकड़ा टूट कर उससे अलग होकर दूर जाने लगा|जहाँ पर दोनों के बलों में संतुलन हुआ,वही यह पिण्ड स्थित  हो गया|दोनों के बलों में संतुलन बनाये रखने के लिए वह पृथ्वी के चक्कर लगाने लगा|आज चंद्रमा पृथ्वी और सूर्य के बीच उसी स्थान से पृथ्वी के चारों और परिक्रमा कर रहा है,जहाँ पर सूर्य और पृथ्वी के बल  उसे समान रूप से  प्रभावित करते है|यही स्थिति आत्मा और शरीर के मध्य में मन की है|मन और चंद्रमा की तुलना हो सकती है,क्योंकि जो क्षुद्र में है वह विराट में भी है|इसी कारण से चंद्रमा को मन का देवता भी कहा जाता है|शास्त्रों में  चंद्रमा को मन के  देवता की उपाधि ऋषियों ने ऐसे ही नहीं दी है,इस के पीछे यही एक वैज्ञानिक कारण है|
                                                     कोई भी पिण्ड अगर किसी दूसरे पिण्ड की परिक्रमा कर रहा है तो उनके बीच उपरोक्त दो बलों के अलावा दो बल और कार्य करते हैं|जिन्हें क्रमश:अभिकेंद्रित(Centripetal force)और अपकेंद्रित (Centrifugal force)बल कहते हैं|अभिकेन्द्रित बल घूमने वाले पिण्ड को मुख्य पिण्ड की तरफ ले जाने की कोशिश करता है ,जबकि अपकेंद्रित बल उसे  दूर ले जाने की|दोनों बल जब समान या सन्तुलित अवस्था में रहते है,तो यथा स्थिति में परिक्रमा पथ बना रहता है|हालाँकि इन बलों का मन से ज्यादा कोई संबंध नहीं है|अभी तक मन के सम्बन्ध में आकर्षण व प्रतिकर्षण बल ही अधिक महत्वपूर्ण है|आगे हम अन्य बलों की चर्चा करेंगे,जो इस मन से सम्बन्धित है|
क्रमश:
         || हरि शरणम्  ||

Thursday, July 25, 2013

पुनर्जन्म का वैज्ञानिक आधार-एक परिकल्पना|क्रमश:१२|मन-१

                      शरीर का विकास किस तरह से होता है,संक्षेप में समझाने का प्रयास किया गया है|वैसे यह इतना विशाल विषय है कि इसको समझने के लिए इस विज्ञानं और श्रीमद्भागवत महापुराण का गहराई से अध्ययन करना जरूरी है|यहाँ पर ,पुनर्जन्म का विषय होने के कारण केवल उन्हीं विषयों पर चर्चा की गयी है,जिन्हें जानना जरूरी है,अन्यथा पुनर्जन्म के बारे में समझाना मुश्किल होता|फिर भी अगर आवश्यक हुआ तो सम्बन्धित विषय को साथ साथ में स्पष्ट करने का प्रयास करूँगा|
                        प्रकृति के २४ तत्व तथा २५ वां महतत्व मिलकर शरीर का पूर्णरूपेण निर्माण करते है|प्रकृति के २४ तत्वों में से २० से होने वाले शारीरिक विकास की चर्चा पूर्व में कर चुके है|अब इस स्थूल विकास से सूक्ष्म विकास कि तरफ ध्यान करते है|शेष बचे चार हैं-मन,बुद्धि,चित्त और अहंकार|गीता में भगवान श्रीकृष्ण कहते है-
             इन्द्रियाणि पराण्याहुरिन्द्रियेभ्य: परं मनः |
             मनसस्तु परा बुद्धिर्यो बुद्धे: परतस्तु सः ||गीता३/४२||
 अर्थात्,इन्द्रियां स्थूल शरीर से सूक्ष्म और बलवान है,इन इन्द्रियों से मन,मन से बुद्धि अधिक सूक्ष्म और बलवान है|परन्तु इन सबसे सूक्ष्म और बलवान है,वह आत्मा ही है|
                   स्थूल शरीर पांच भौतिक पदार्थों से बना है|पदार्थ का आधार तत्व है ,और तत्व का आधार परमाणु,यानि उर्जा|अतः यह स्पष्ट है कि उर्जा का स्थूल रूप ही यह भौतिक शरीर है|इस उर्जा के स्थूल रूप(Macro)से हम सूक्ष्म रूप(Micro) की तरफ चलेंगे|स्थूल शरीर से सूक्ष्म इन्द्रियां है,जिनके विकास की जानकारी भागवत में पूर्ण रूप से दी गयी है|इन्द्रियों से सूक्ष्म मन है|इन्द्रियां तो स्थूल शरीर का ही एक भाग है ,जो हम साक्षात् देख सकते है,और उनका  अनुभव भी कर सकते है|परन्तु मन इससे भी सूक्ष्म है,जिसको हम देख तो नहीं सकते परन्तु अनुभव जरूर कर सकते है|मन ,इन्द्रियों की तरह नहीं है| ना ही इसका कोई विकास गर्भावस्था में होता है|फिर आखिर यह मन है क्या ?
                              मन शरीर की कोई अवस्था का नाम नहीं है|आत्मा और शरीर को आपस में जोड़ने वाली कड़ी का नाम ही मन है|समस्त दसों इन्द्रियां और इन इन्द्रियों के पांचो विषय(Subject,characteristics),पांच तत्वों से बने भौतिक शरीर में अवस्थित हैं|उपरोक्त सभी स्थूल प्रकृति से सम्बन्धित है|मन अपरा पृकृति से सम्बन्धित है,परन्तु यह अपरा और परा यानि सूक्ष्म के बीच की अवस्था है,जो कि प्रकृति को परमात्मा से जोड़ती है|प्रकृति भी परमात्मा की ही शक्ति है|
                      प्रकृति भी उर्जा है,परमात्मा भी उर्जा है|उर्जा ,शक्ति , बल आदि एक ही है|उर्जा के बारे में आवश्यकता अनुसार पहले विवरण आ चूका है|उर्जा कभी नष्ट नहीं होती,केवल उसका स्वरुप परिवर्तित हो सकता है|उर्जा का अपना प्रभाव होता है जो उससे संबन्धित क्षेत्र को प्रभावित करता है|जब दो उर्जा क्षेत्र किसी एक जगह पर कार्य कर रहे हो तो एक नया तीसरा क्षेत्र प्रभाव में आजाता है,अर्थात् एक नया क्षेत्र बन जाता है|इस नवनिर्मित क्षेत्र से दोंनो क्षेत्र प्रभावित होते हैं,जिससे दोनों अपना अपना प्रभुत्व बनाए रखने का प्रयास करते हैं|जिससे दोनों के बीच एक संतुलन (Balance)बन जाता है|इस संतुलन के कारण उस निश्चित क्षेत्र में कोई अव्यवस्था की स्थिति नहीं बनती,और सभी कार्य सुचारू रूप से बेरोकटोक चलते रहते है|
                              मानव शरीर में भी ऐसा ही होता है|पहला उर्जा क्षेत्र यह भौतिक शरीर है,जिसमे पांच तत्व,पांच ज्ञानेन्द्रियाँ,पांच कर्मेन्द्रियाँ और पांच ज्ञानेन्द्रियों के विषय शमिल है|यह पहला उर्जा क्षेत्र प्रकृति का है|दूसरा उर्जा क्षेत्र आत्मा का है|दोनों के प्रभाव क्षेत्र में जो तीसरा उर्जा क्षेत्र बन जाता है ,वही मन है|यह मन अपने मुख्य उर्जा क्षेत्रों से उर्जा लेते हुये उन्ही को प्रभावित करता है|और दोनों मुख्य उर्जा क्षेत्र अपना अपना प्रभुत्व बनाये रखने के लिए एक सामंजस्य स्थापित कर लेते है|इस संतुलन के कारण मानव जीवन सुचारू रूप से चलता रहता है|जहाँ पर भी इस  संतुलन में विषमता आती है,जीवन का सुगमता पूर्वक चलना दुर्भर हो जाता है|अतः इस संतुलन का बने रहना आवश्यक हो जाता है|
          क्रमश:
                      ||हरि शरणम् ||