Friday, February 17, 2023

स्वभाव

 स्वभाव 

       प्रत्येक प्राणी का स्वभाव जन्मजात होता है। पूर्वजन्म के कर्मों के आधार पर बने संस्कार ही नए जन्म में स्वभाव के रूप में प्रकट होते हैं। स्वभाव के अनुसार ही मनुष्य को उसी प्रकार के वर्ण (ब्राह्मण आदि) के परिवार में जन्म मिलता है।

व्याघ्रः सेवति काननं च गहनं सिंहो गुहां सेवते

हंसः सेवति पद्मिनीं कुसुमितां गृधः श्मशानस्थलीम् ।

साधुः सेवति साधुमेव सततं नीचोऽपि नीचं जनम्

या यस्य प्रकृतिः स्वभावजनिता केनापि न त्यज्यते ॥

शेर गहरे जंगल में और सिंह गुफा में रहता है; हंस विकसित कमलिनी के पास रहना पसंद करता है, गिद्ध को शमशान अच्छा लगता है । वैसे ही साधु, साधु की और नीच पुरुष नीच की संगति करता है; यानि कि जन्मजात स्वभाव किसी से छूटता नहीं है ।

शेष कल

प्रस्तुति -डॉ. प्रकाश काछवाल

।।हरि:शरणम्।।

Thursday, February 16, 2023

परधर्मो भयावहः

 परधर्मो भयावहः 

         बचपन में स्कूली शिक्षा के पाठ्यक्रम के अंतर्गत  एक  कहानी पढ़ी थी - रंगा सियार। जिसमें एक सियार भोजन की खोज में गांव में घुस आता है।वह एक रंगरेज के घर में एक ड्रम में, जिसमें रंग का मिश्रण भरा होता है, गिर जाता है। बड़ी मुश्किल से वह उस ड्रम से बाहर निकल पाता है, तब तक सुबह हो जाती है। वह जंगल की ओर चल पड़ता है। उस रंगीन सियार को देखकर सभी जानवर डरते हैं, यहां तक कि जंगल का राजा शेर भी।

      सभी जानवरों को भयग्रस्त देखकर उसने जंगल का राजा बनने के लिए एक युक्ति निकाली। उसने सभी डरे हुए जानवरों से कहा कि भगवान ने उसे आप सभी पर शासन करने भेजा है। पहले से डरे सभी जानवरों ने उसे अपना राजा स्वीकार कर लिया।राजा बनते हुए उसने अपनी पोल खुल जाने के डर से सभी सियारों को जंगल-निकाला दे दिया। बेचारे सियार क्या करते ? उस जंगल से निकल कर बाहर इधर उधर भटकने लगे।

      सियारों को लगा कि है तो यह हमारे जैसा ही, परंतु इस प्रकार इसका रंग-ढंग कैसे बदल गया? एक वृद्ध सियार ने कहा कि अगर यह हमारी बिरादरी का ही है, तो अपना स्वभाव नहीं बदल सकता।यह सोचकर सभी सियार "हू-हू" एक साथ करने लगे। थोड़ी देर तो रंगा सियार ने स्वयं पर नियंत्रण रखा।अंततः उसका सब्र जवाब दे गया और वह भी उनके स्वर में स्वर मिलाकर 'हू-हू' करने लगा। जंगल के अपदस्थ राजा शेर के सामने उसकी पोल खुल गयी। उस शेर ने तत्काल ही सियार का काम तमाम कर दिया।

   इस कहानी का संदेश है कि अपने स्वभाव के अनुसार ही चलें, दूसरे के स्वभाव के अनुसार चलने में हानि ही है। गीता में भगवान ने कहा है -"परधर्मो भयावहः। दूसरे का धर्म भले ही कितना ही अच्छा प्रतीत हो रहा हो, व्यक्ति को स्वधर्म का ही पालन करना चाहिए।"स्वभाव से ही स्वधर्म का पालन होता है।

प्रस्तुति -डॉ. प्रकाश काछवाल

।। हरि:शरणम्।।

Wednesday, February 15, 2023

सहज-योग

 सहज-योग

सगुण मार्ग में अटकने की और निर्गुण मार्ग में भटकने की संभावना रहती है।सगुण मार्गी प्रायः मंत्र पर,पूजा स्थल,धर्मग्रंथ आदि पर आकर अटक जाते हैं।लेकिन निर्गुण में तो निराकार होता है,वहां पकड़ने के लिए कुछ नहीं होता,वहां अटकना नहीं होता बल्कि भटकना हो सकता है ।निर्गुण निराकार की साधना भटकाव का कारण बन सकती है।

             सहज योग  इन दोनों के बीच मौज में,आत्मसफूर्त होकर जीने का नाम है।सहज योग यानि अपने स्वभाव में जीना।अपने स्वभाव में स्थित होना बड़ा कठिन है क्योंकि हम अपने स्वभाव से पहले ही बहुत दूर निकल आये हैं।सहज योग को कबीर ने गोविंद से मिलन का मार्ग बताया है।

प्रस्तुति -डॉ. प्रकाश काछवाल

।।हरि:शरणम्।।

Tuesday, February 14, 2023

एकोहं बहुस्यामः

 एकोहं बहुस्यामः

        छान्दोग्योपनिषद् कहती है मैं एक हूँ और अनेकों रूपों में प्रकट हुआ है | इसी प्रकार भागवत में ब्रह्माजी विराट्स्वरुप की विभूतियों का वर्णन करते हुए कहते हैं -

स एषः आद्यः पुरुषः कल्पे कल्पे सृजत्यजः |

आत्माssत्मन्यात्मनाssत्मानं संयच्छति च पाति च ||भागवत-2/6/38||

अर्थात वे अजन्मा और पुरुषोत्तम है | प्रत्येक कल्प में वे स्वयं अपने आपमें अपने आप की सृष्टि करते हैं, रक्षा करते हैं और संहार कर लेते हैं |

      भगवान एक अनुभूति है। भगवान अभी यहां है, यहां ही क्यों वे तो सर्वत्र हैं,सब समय हैं।जब सब कुछ वे ही हैं तो फिर क्या तो किसी से लेना और क्या किसी से मांगना ? 'योगक्षेमं वहाम्यहम्।' वे मेरे हैं और मैं उनका हूँ।यही भगवान के साथ अपनापन है।इसलिए जीवन में कभी भी उन्हें अपनी स्मृति से बाहर न होने दें।

प्रस्तुति –डॉ. प्रकाश काछवाल

|| हरिः शरणम् ||

Monday, February 13, 2023

कीर्तन

 कीर्तन 

मुक्त होने के लिए इनमें से किसी एक का होना आवश्यक है -प्रथम संसार से विमुखता और द्वितीय परमात्मा के सम्मुख होना।इन दोनों में से किसी एक कार्य को अपनाते ही दूसरा कार्य स्वतः ही मूर्तरूप लेने लगता है। संसार से विमुख होने के लिए प्रयास करना पड़ता है जिसमें शक्ति का व्यय होता है।इसके लिए सांसारिक सुख की इच्छा का त्याग करना पड़ता है।जबकि परमात्मा के सम्मुख होने के लिए आपकी इच्छा ही पर्याप्त है,जिसके लिए किसी प्रकार का श्रम करना नहीं पड़ता है।

         परमात्मा के सम्मुख होने के लिए नाम-संकीर्तन अपना महत्वपूर्ण स्थान रखता है। भावपूर्ण संकीर्तन आपको परमात्मा के निकट ले जाता है, जिससे संसार से दूरी स्वतः ही बढ़ने लगती है। चैतन्य महाप्रभु तो कीर्तन करते हुए तल्लीन होकर नाचने तक लगते थे, अपनी सुध-बुध तक खो बैठते थे।

      कलियुग में कीर्तन को मुक्ति का सुगम और सर्वोत्तम साधन बताया है। इस साधन को किसी भी श्रेणी और वर्ण का व्यक्ति अपना सकता है। परमात्मा का सान्निध्य प्राप्त करना है तो बिना और देरी किये भावपूर्ण नाम संकीर्तन  में डूब जाइए,समय किसी की प्रतीक्षा नहीं करता।

प्रस्तुति -डॉ. प्रकाश काछवाल

।। हरि:शरणम्।।

Sunday, February 12, 2023

नर्तकी - माया

 नर्तकी - माया

       भगवान ने माया बनाई, अनासक्त भाव से आनंद लेने के लिए और उसमें आसक्त होकर उलझ गया मनुष्य। माया में आसक्त मनुष्य को माया बहुत नचाती है। इसीलिए माया को नर्तकी भी कहा जाता है।अगर हम माया के आकर्षण में फंसकर उसमें आसक्त न हो तो यह नर्तकी हमें नहीं नचा सकती।उसके आकर्षण से कोई विरला ही बच सकता है अन्यथा इस कलियुग में तो चारों और मनुष्य इसके जाल में फंसकर नृत्य ही कर रहे हैं ।

       नर्तकी के अक्षरों को उल्टा पढ़ें तो कीर्तन शब्द बनता है। नाम संकीर्तन ही इस युग में माया के जाल से हमें मुक्ति दिला सकता है। शुकदेवजी महाराज भागवतजी में परीक्षित को यही कह रहे हैं-

कलेर्दोषनिधे राजन्नस्ति ह्येको महान् गुणः।

कीर्तनादेव कृष्णस्य मुक्तसंगः परं व्रजेत् ।।

 ।। भागवत-12/3/51।।

यों तो कलियुग दोषों का खजाना है, परंतु इसमें एक बहुत बड़ा गुण भी है।वह गुण यह है कि कलियुग में केवल भगवान श्रीकृष्ण का संकीर्तन करने मात्र से ही सारी आसक्तियां छूट जाती है और परमात्मा की प्राप्ति हो जाती है। 

      इसलिए नर्तकी से बचने के लिए आइए ! नाम संकीर्तन करें।

हरे राम हरे राम, राम राम हरे हरे।

हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे।।

प्रस्तुति -डॉ. प्रकाश काछवाल

।। हरि:शरणम्।।

Saturday, February 11, 2023

मदारी

 मदारी

        अभी गत 19 से 23 जनवरी की अवधि में जयपुर के होटल क्लार्क्स आमेर में “जयपुर साहित्य उत्सव” (Jaipur Literature Festival) सम्पन्न हुआ था, जिसमें अंतर्राष्ट्रीय स्तर के नामचीन साहित्यकारों ने भाग लिया था | मुझे भी कुछ भारतीय साहित्यकारों को सुनने का अवसर मिला जिनमें जावेद अख्तर और गुलज़ार मुख्य थे | गुलज़ार की छोटी सी कविता का एक अंश आपके साथ बांटना चाहता हूँ |

       “बचपन में मदारी का खेल देखकर सोचा करता था,

            कि मदारी भगवान् है |

      उम्र के इस मोड़ पर आकर पता चला

              कि भगवान् मदारी है ||”

      देखा जाए तो भगवान् ही मदारी है और यह संसार उसका खेल दिखाने का रंगमंच | हम सब उसके जम्बूरे हैं | वे ही इस खेल की पट्टकथा लिखने वाले हैं और वे ही निर्देशक | हम सब को रंगमंच पर उनके निर्देशानुसार अभिनय करना है | अपनी भूमिका समाप्त होते ही नयी भूमिका के लिए तैयार होना है | पुनः इस रंगमंच पर कब उतरना है अथवा उतरना है या नहीं, यह सब उस निर्देशक पर निर्भर करता है | हमें तो अपना अभिनय पूरी ईमानदारी के साथ निभाना है | न तो अभिनय के प्रति आसक्त होना है और न ही रंगमंच से बंधना है | केवल इसी बात का ध्यान रखना है | शेष परमात्मा जाने |

प्रस्तुति –डॉ. प्रकाश काछवाल

|| हरिः शरणम् ||