Friday, February 10, 2023

समः सर्वेषु भूतेषु

 समः सर्वेषु भूतेषु 

        मनुष्य जीवन एक बुद्धियुक्त जीव का जीवन है | अन्य प्राणियों में बुद्धि का विकसित न हो पाना एक अर्थ में उनके लिए उचित ही है क्योंकि उनका जन्म केवल भोग के लिए ही हुआ है | बुद्धि के विकसित न होने के कारण उनके भीतर कोई विचार ही नहीं उठता | ऐसे अल्पबुद्धि प्राणी के जीवन में कभी ज्ञान का पदार्पण भी होगा, ऐसा सोच ही नहीं सकते | इनसे विपरीत मनुष्य एक विचारशील प्राणी है | विचार ही मनुष्य को सभी प्राणियों में विशिष्ट बनाता है | विचार मनुष्य की बुद्धि में विवेक जाग्रत हो उठने का परिचायक है | विवेक और विचार के माध्यम से ही मनुष्य ज्ञान को उपलब्ध होता है और यही ज्ञान एक दिन तत्व-ज्ञान में परिवर्तित हो जाता है |

            तत्व-ज्ञान को उपलब्ध मनुष्य फिर पतन की ओर नहीं जा सकता | इसीलिए कहा जाता है कि तत्व-ज्ञान मनुष्य को जीवन में एक बार ही मिलता है | तत्व-ज्ञान के उपलब्ध हो जाने पर उस मनुष्य की जीवन-धारा एक दम से और स्थाई रूप से परिवर्तित हो जाती है, फिर लौटकर वह सांसारिक धारा में नहीं गिरता है | संसार की धारा का प्रवाह इतना तीव्र है कि मनुष्य के पाँव उखड़ते देर नहीं लगती | संसार की धारा में अगर अध्यात्म का आधार मिल जाए तो फिर संसार हमारा कुछ नहीं बिगाड़ पायेगा | अध्यात्म के आधार से तात्पर्य है - संसार और स्वयं के स्वरुप को पहिचानना | अध्यात्म के मार्ग पर चलते हुए अगर हम बार-बार संसार में लौट आते हैं तो इसका एक ही अर्थ है कि हम अभी भी तत्व-ज्ञान से कोसों दूर खड़े है |

              सभी प्राणी अपने वर्तमान जीवन में पूर्व मानव जीवन के कर्मों के भोग भोगने के लिए विवश होकर आए है | कदाचित् इस मामले में मनुष्य भी उनसे कमोबेश भिन्न नहीं है | जीवन में उपलब्ध होने वाले विषय-भोग ही प्राणियों को आहार, निद्रा, भय और मैथुन जैसे कर्मों को करने के लिए प्रेरित करते हैं | सभी प्राणी जीवन भर केवल इन चार प्रकार के कर्मों को करने में ही व्यस्त रहते हैं |

          मनुष्य कहने को तो अन्य सभी प्राणियों से भिन्न है परन्तु सांसारिक भोगों में रत मनुष्य में और अन्य प्राणियों में रूप और नाम के आधार पर भले ही भिन्नता दिखलाई पड़ती हो, आंतरिक रूप से उनमें कोई भिन्नता नहीं होती | मनुष्य भी जीवन भर इन्हीं चार कर्मों – आहार, निद्रा, भय और मैथुन में रत रहता है |

             भौतिक शरीर के सफल सञ्चालन के लिए नि:संदेह आहार की आवश्यकता पड़ती है परन्तु मुख्य रूप से यह जानना आवश्यक है कि एक मनुष्य के द्वारा लिया जाने वाला आहार कैसा होना चाहिए ? आहार तो एक पशु भी ग्रहण करता है परन्तु उसको इस बात का अल्प ज्ञान ही होता है कि उसके लिए क्या तो खाद्य है और क्या अखाद्य ? भगवान ने सभी प्राणियों को पांच ज्ञानेन्द्रिया दी है और उन ज्ञानेन्द्रियों के माध्यम से वह बहुत ही सरलता से खाई जा सकने वाली और न खाने योग्य वस्तुओं में अंतर कर सकता है | परन्तु जितना विवेक मनुष्य को मिला है उसके माध्यम से अगर वह चाहे तो कम से कम सात्विक, राजसिक और तामसिक भोजन में से किसी एक का चयन तो अवश्य ही कर सकता है ।

          पशु को केवल इस बात का ज्ञान ही रहता है कि कौन सा आहार उसके लिए विष के समान है और कौन सा उसके लिए पोष्टिक है ? जो प्राणी की देह के लिए घातक आहार होता है, वह उसको मुंह तक नहीं लगाता | पशु स्वाद से भ्रमित नहीं होता परन्तु मनुष्य स्वाद के चक्कर में आहार की गुणवत्ता को भूल जाता है | भोजन का स्वाद ही मनुष्य को उस स्वाद-विषय के प्रति आसक्त कर देता है, जिसके कारण वह अज्ञानवश खाद्य और अखाद्य आहार में अंतर करना छोड़ अपने स्वाद के लिए अखाद्य आहार तक ग्रहण कर लेता है |

            दूसरा कर्म जो प्रत्येक प्राणी करता है वह है – निद्रा | नींद शरीर के प्रतिदिन होने वाले क्षय (टूट-फूट) को कुछ सीमा तक सुधारने का एक साधन है | पर्याप्त नींद लेना, शरीर के सुचारू सञ्चालन के लिए आवश्यक होता है | निद्रावस्था में मनुष्य को एक प्रकार के सुख की अनुभूति होती है | नींद में मिलने वाले इसी सुख के कारण मनुष्य आलसी हो जाता है और प्रमादवश आज का कार्य कल पर टालता रहता है | मनुष्य के अतिरिक्त अन्य प्राणी भी नींद की आगोश में रहते हैं परन्तु उनकी नींद भी एक सीमा तक ही सीमित रहती है | नींद की सीमा समाप्त होते ही वह पुनः सक्रिय हो उठता है | परन्तु मनुष्य के जीवन में नींद की भी कोई सीमा नहीं है | वह भरपूर नींद लेकर भी अपने आप को थका महसूस कर सकता है और पुनः निद्रा देवी की गोद में जा सकता है |

         जिस प्राणी को जिस भी रूप का जीवन मिला है अर्थात जिस प्राणी को जैसा भी शरीर मिला है, उस शरीर को ही वह अपने लिए उपयुक्त मानने लगता है | एक सूअर जब गन्दगी में मुंह मारकर अपना आहार खोज रहा होता है, वह हमें भले ही घृणास्पद प्रतीत होता हो परन्तु जरा उस सूअर को तो जाकर पूछिए ! वह तो इसे ही अपने जीवन का परम सुख मानता है | कहने का अर्थ है कि सभी अपने अपने शरीर को पाकर संतुष्ट है | यही कारण है कि प्रत्येक प्राणी अपने उस शरीर को बचाने के लिए सदैव भय से ग्रस्त रहता है |

          जीव ही जीव का भोजन है,साथ ही साथ जीव ही जीव का जीवन भी है | एक जीव का जीवन दूसरे जीव के जीवन पर निर्भर रहता है | इसी को प्राकृतिक संतुलन कहते हैं | जब यह संतुलन बिगड़ जाता है तब प्रकृति उसे वापिस सही करने का अपने स्तर पर प्रयास करती है | उदाहरण के तौर पर - जब तक मृग इस धरा पर हैं, तब तक सिंहों का जीवन भी यहाँ बना रहेगा | दोनों में से किसी एक की नस्ल यहाँ समाप्त हो गयी तो समझ लें कि धीरे-धीरे दूसरे की नस्ल भी समाप्त हो जाएगी | मनुष्य भी इस भय के मामले में अन्य प्राणियों से भिन्न नहीं है | कहा जाता है कि जिस दिन कीटों का अस्तित्व इस धरती पर समाप्त हो जायेगा तब यहाँ अन्न उपजना भी बंद हो जायेगा और मनुष्य को भूखों मरने की स्थिति पैदा हो जाएगी | कहने को तो यह अतिश्योक्ति प्रतीत होती है परन्तु गंभीरता से देखें तो यह बात शतप्रतिशत सत्य भी है ।

        आहार, निद्रा और भय के बाद आता है - मैथुन कर्म | जीवन बचाने की जद्दोजहद ही प्राणियों को मैथुन कर्म करने के लिए प्रेरित करती है | मनुष्य के मामले में भी यही बात सत्य है | प्रत्येक मनुष्य यह सोचता है कि मैं रहूँ अथवा न रहूँ परन्तु मेरा वंश चलना चाहिए | मैथुन कर्म से मिलने वाले छद्म सुख में कोई भी पशु-पक्षी आसक्त नहीं होता | सभी प्राणियों के लिए परमात्मा ने मैथुन कर्म का एक निश्चित विधान किया है | उस विधान के अनुसार वे केवल ऋतुकाल में ही मैथुन कर्म कर सकते हैं अन्य समय में नहीं | ऐसा उनकी प्रजाति को संसार में चलाने के लिए, इस संसार में उस प्रजाति का अस्तित्व बनाये रखने के लिए आवश्यक है |

               मनुष्य के अतिरिक्त अन्य प्राणी मैथुन का सुख नहीं लेते और न ही उस कर्म में आसक्त होते है | परन्तु मनुष्य इसके विपरीत मैथुन कर्म, जोकि स्पर्श सुख से अधिक कुछ भी नहीं है, फिर भी उसे ही जीवन का सबसे बड़ा सुख मानते हुए बार-बार मिलते रहने की कामना करता रहता है | परमात्मा ने भी मनुष्य के लिए इस सम्बन्ध में भी एक विधान बनाया है कि वे केवल संतानोत्पत्ति के लिए ही मैथुन कर्म करे | हमारे ऋषि-मुनि भी गृहस्थ जीवन जीते थे और वे प्रकृति के विधान का पालन किया करते थे परन्तु आज मनुष्य इस विधान की अवहेलना करने लगा है और वह इस कर्म से मिलने वाले स्पर्श-सुख के प्रति बहुत अधिक आसक्त हो गया है | यही उसके पतन का मुख्य कारण भी बन गया है | इस आसक्ति के कारण ही वह बार-बार निम्न योनियों में जन्म लेने को विवश है |

         इस प्रकार अभी तक हमने सभी प्राणियों को परमात्मा द्वारा प्रदत्त स्वाभाविक कर्म की चर्चा की है | मनुष्य बुद्धि और विवेक के क्षेत्र में अन्य सभी प्राणियों से भिन्न भले ही है परन्तु यह भिन्नता उसके जीवन में दृष्टिगत भी होनी चाहिए | आज हम अपने चारों ओर दृष्टि डालें तो यह भिन्नता कहीं भी देखने में नहीं आती | क्यों नहीं आती, इसका कारण भी स्पष्ट है –वह कारण है, मनुष्य की विषयों के प्रति अत्यधिक आसक्ति का होना, जिसके कारण उसकी कामनाओं का जीवन में कभी अन्त आता ही नहीं है | इस प्रकार सार रूप से एक ही बात कही जा सकती है कि विषयासक्ति ही मनुष्य और पशु में भिन्नता नहीं रहने देती | जिस दिन से मनुष्य अपने विवेक और विचार को महत्त्व देने लगेगा तब इन दोनों में भिन्नता भी नज़र आने लगेगी |

        प्रश्न उठता है कि मनुष्य के लिए स्वयं के द्वारा विवेक का उपयोग करना क्यों आवश्यक है ? परमात्मा ने जब इस सृष्टि का सृजन किया तब उनका उद्देश्य केवल स्वयं की सच्चिदानंद अवस्था का अनुभव करना था | यह अनुभव उन्हें तभी हो सकता था जब उनके समक्ष कोई दर्पण हो; जिसमें वे अपना प्रतिबिम्ब देख सके | उस दर्पण के रूप में उन्होंने इस सृष्टि में कई जीव बनाने के बाद भी उनसे संतुष्ट न होने पर अंततः मनुष्य को बनाया | मनुष्य में भी आदि मानव से होते हुए आज के मनुष्य तक यह सृजन की यात्रा अभी भी चली आ रही है | आदि मानव में बुद्धि तो अन्य प्राणियों से कुछ अधिक थी परन्तु उस बुद्धि को विवेक में परिवर्तित करने की क्षमता उसमें नहीं थी | यह क्षमता आज के मानव में है । इस क्षमता का उपयोग करके ही बुद्धि को विवेक में परिवर्तित किया जा सकता है |

              मनुष्य के लिए विवेक का उपयोग करना इसलिए आवश्यक है जिससे वह स्वयं के  अस्तित्ववान होने के पीछे का कारण जान सके | उस कारण को जान लेने पर वह स्वयं ही उस सृजक की अवस्था को ही प्राप्त कर लेगा जिसके लिए उसका सृजन किया गया है | यही परमात्मा का उद्देश्य मनुष्य को बनाने में रहा है |

            मेरे समक्ष दो प्रश्न आए हैं - पहला, मनुष्य के सृजन का कारण समझ लेने से क्या हो जायेगा ? दूसरा,आज इस संसार में हम विभिन्न पदार्थों और क्रियाओं के माध्यम से जो शारीरिक सुख ले रहे हैं, क्या इतना सब कुछ मिलना भी एक मनुष्य जीवन में पर्याप्त नहीं है ? हंसी आती है उस बुद्धि पर जिसमें ऐसे प्रश्न उठते हैं | होने को क्या होगा – फिर चौरासी का चक्कर कभी भी मिट नहीं पायेगा | हम केवल यह जानकर ही खुश हो रहे हैं कि इस मनुष्य जीवन में इतना अधिक शारीरिक सुख मिल रहा है | जरा विचार कीजिये, हम अनन्त जन्मों से लेकर अब तक तक कहाँ कहाँ भटक रहे थे ? आज इस मनुष्य शरीर तक कैसे आ पहुंचे हैं और इस मनुष्य शरीर के समाप्त होने पर आगे हमारा जीवन कहाँ और कैसा होगा ? जिस दिन इस बात पर विचार करते हुए हम इस मनुष्य शरीर के मिलने का उद्देश्य समझ लेंगे तब इन सभी प्रश्नों के उत्तर हमें स्वयं के भीतर ही मिल जाएंगे, कहीं बाहर जाकर इनका उत्तर खोजना नहीं पड़ेगा | चाहे जितना बाहर जाकर इस विशाल संसार में भटक लीजिये, किसी को भी पूछने से इन प्रश्नों का उत्तर मिलना संभव नहीं है |

             मनुष्य की विकसित बुद्धि की यही विशेषता है कि वह अपने विवेक से विचार कर प्रत्येक प्रश्न का उत्तर जान सकता है | जिनका विवेक अभी तक सुषुप्त अवस्था में ही पड़ा है, उसके लिए तो ये दो ही नहीं, हजारों प्रश्न भी सदैव अनुत्तरित ही पड़े रहेंगे | इसलिए भगवान् ने जब मनुष्य शरीर में विकसित बुद्धि को महत्वपूर्ण स्थान दिया है तो प्रत्येक को उस बुद्धि का समुचित उपयोग करते हुए विवेक को जगाना चाहिए |

          विवेक के जाग्रत हो उठने का क्या प्रमाण है ? जब अदृश्य शक्ति को दृश्यता नहीं मिलती अथवा दृश्य शक्ति को हम समझ नहीं पाते और उसे समझने के लिए मन जब उद्वेलित हो उठे तो समझ लें कि बुद्धि के भीतर विवेक करवट लेने लगा है ? इस करवट के माध्यम से विवेक को सक्रिय अवस्था में लाने के लिए वे सभी प्रयास करने पड़ेंगे जो आपकी मुमुक्षा को शांत कर सके | कहने का अर्थ है कि व्यक्ति की मुमुक्षा ही बुद्धि में विवेक को जाग्रत कर सकती है |

            सब कुछ जान लेने की मुमुक्षा ही व्यक्ति को बाहर भटकाने का कार्य करती है | भटकते भटकाते जब व्यक्ति शास्त्र, सत्संग और सत्पुरुषों के सानिध्य से अपनी मुमुक्षा को उच्चत्तम स्तर पर ले जाता है तब बाहर की भटकन स्वतः ही बंद हो जाती है | फिर बाहर से भीतर की यात्रा प्रारम्भ होती है | जब हम अपने भीतर प्रवेश करते हैं तब अनुभव होता है कि जिस को हम बाहर भटकते हुए ढूंढ रहे थे वह तो स्वयं के ही भीतर है | यह विवेक ही है, जो हमें आश्वस्त करता है कि बाहर भटकने से कुछ भी नहीं मिलने वाला ।

              जिस समय मनुष्य अपने विवेक का समुचित उपयोग करने लगेगा तब भटकन स्वतः ही बंद हो जाती है | अब प्रश्न उठता है कि यह बाहर भटकने वाला कौन है ? यह बाहर भटकने वाला हमारा मन है | हमारा मन बड़ा ही चंचल है | मन की एक विशेषता है कि यह जीवन की प्रत्येक इच्छा को शांत करने के लिए बाहर का रास्ता दिखाता है | जन्म-जन्मान्तर से हम समस्त सुख स्वयं के बाहर ही तो खोज रहे हैं | इस कारण से यह मन भटकने का अभ्यस्त हो चूका है | प्रत्येक मनुष्य जीवन में यही मन अपनी मुमुक्षा को शांत करने के लिए इस शरीर को बाहर भटकने के लिए प्रेरित करता है |

                  मन से सूक्ष्म और प्रभावशाली बुद्धि है और बुद्धि से सूक्ष्म और उस पर भी अपना प्रभाव रखने वाला अहम् है | अहम् अर्थात मैं यानि हम स्वयं | विवेक बुद्धि में ही है और सक्रिय होते ही यह बुद्धि और अहम् के मध्य, इन दोनों को जोड़ने वाली एक कड़ी बन जाता है | यह कड़ी जितनी अधिक मजबूत होगी, हम अपनी बुद्धि पर स्वयं के प्रभाव को उतना ही अधिक स्पष्ट रूप से समझ पाएंगे | इसीलिए कहा जाता है कि मनुष्य को अपने मन और बुद्धि के स्थान पर विवेक को ही महत्त्व देना चाहिए | यह विवेक ही मनुष्य की अंतर्यात्रा को अंतिम परिणिति तक यानि अनुभूति तक पहुंचाता है |

           इस प्रकार यह स्पष्ट है कि 84 लाख प्राणियों से मनुष्य नाम का यह जीव विशिष्ट है | उसको विशिष्ट बनाती है, उसकी विकसित बुद्धि | बुद्धि तो अन्य सभी जीवों में भी होती है परन्तु उनके भीतर की बुद्धि केवल अपने शरीर के भरण-पोषण और उसकी सुरक्षा तक ही सीमित रहती है | इसका अर्थ है कि उन जीवों की बुद्धि अपने शरीर के बारे में सोचने से अलग कुछ भी नहीं सोच सकती | मनुष्य इस मामले में उनसे भिन्न है क्योंकि वह चाहे तो अपने शरीर के अतिरिक्त अन्य विषय पर भी बहुत कुछ सोच सकता है |

            मनुष्य की सोचने की क्षमता को ही विचार करना कहते हैं | लगता तो ऐसा है मानो विचार मन में उठ रहे हों परन्तु वास्तव में बुद्धि ही उनका जन्म स्थल है | बुद्धि का प्रभाव मन पर जब तक नगण्य रहता है तब तक सभी विचार मन में उठते प्रतीत होते है | जब मनुष्य अपनी इस दशा को पहिचान लेता है तब वह मन से बुद्धि को अलग कर लेता है | मन से बुद्धि के अलग होते ही बुद्धि का प्रभाव मन पर अधिक हो जाता है |

            मन पर प्रभावी बुद्धि को होना चाहिए क्योंकि बुद्धि उससे अधिक शुद्ध और सूक्ष्म है | बुद्धि से सूक्ष्म और शुद्ध अहम् है जिसका प्रभाव बुद्धि पर रहता है | परन्तु संसार के साथ अहम् जब अपना सम्बन्ध बना और मान लेता है तब सब कुछ उल्टा-पुल्टा हो जाता है और मन सब पर प्रभावी हो जाता है | हमें अहम् को संसार से अलग कर बुद्धि को मन पर अधिक प्रभावशाली बनाना है | बुद्धि के प्रभावशाली होते ही मन पर अंकुश लगने लगता है | इस अवस्था में आकर ही मनुष्य अन्य प्राणियों से स्वयं को अलग अनुभव करता है |

                  बुद्धि विचार का जन्मस्थल है | विभिन्न विचार ही बुद्धि को धार देते हैं और विवेक को जाग्रत करने में सहायक सिद्ध होते हैं | परन्तु इस विचार की भी एक सीमा है | विचार व्यक्ति को शांत नहीं होने देता क्योंकि एक विचार के लगते ही दूसरा विचार आने लगता है | यहाँ महत्वपूर्ण बात यह है कि सर्वप्रथम विचार को मन का न मानकर बुद्धि का मानें और फिर इस विचार को उर्ध्व गति दें तभी बुद्धि विवेक में परिणित होगी अन्यथा नहीं | विचार को अधोगति मिलते ही मन पुनः बुद्धि पर प्रभावशाली होने लगेगा और सब काता-कूता कपास हो जायेगा |

             विचार मनुष्य के विवेक के जाग्रत होने में सहायक हैं परन्तु इसके लिए विचारों पर भी नियंत्रण आवश्यक है | वैचारिक नियंत्रण से विवेक जाग्रत होता है और फिर उस विवेकशील विचार के माध्यम से मनुष्य अहम् तक पहुंचता है | अहम् तक पहुँचना भी पर्याप्त नहीं है | अहम् अर्थात स्वयं को जान लेने के लिए भी विचार के साथ साथ विवेक की आवश्यकता पड़ती है | बुद्धि और विचार व्यक्ति को स्थूल के बार में ज्ञान तो करा सकते है और अहम् तक भी ले जा सकते हैं परन्तु यह अहम् को जानना नहीं है बल्कि यह उसको जान लेने का मात्र अहंकार बनकर ही रह जाता है | फिर यह अहंकार ही एक दिन मनुष्य के पतन का कारण बनता है |

              अहम् तक पहुंच जाने के बाद प्रत्येक विचार का साथ छोड़ देना आवश्यक है | विचार के पीछे छूटते ही मनुष्य में अहंकार पैदा नहीं हो सकता | इस अवस्था में आकर अब हमारे पास केवल विवेक और अहम् ही शेष रह गए है | इन दोनों से भी आगे जो है, उस तक हमें पहुँचना है | इस अवस्था में आकर हमें विवेक का सदुपयोग करना है | विवेक का सदुपयोग क्या है?

               विवेक का सदुपयोग है - अहम् के प्रत्येक स्तर को जान लेना और फिर उस अहम् के सर्वोच्च स्तर अर्थात वास्तविक अहम् तक पहुँच जाना | अहम् के सर्वोच्च स्तर को छू लेना ही आत्म-बोध को उपलब्ध हो जाना है | सांसारिक मनुष्य में अहम् की दो सतह होती है अर्थात अहम् की दो परतें होती हैं | ये दो परत कौन कौन सी है ? आइए ! इस पर भी एक दृष्टि डाल लें | जब तक अहम् के इस युग्म को समझ नहीं पाएंगे तब तक हमारा वास्तविक अहम् तक पहुँचना केवल दिवास्वप्न ही बनकर रह जायेगा |

             जब दो वस्तुएं आपस में इतनी अधिक घुलमिल जाती है तब उन दोनों के मध्य अंतर करना लगभग असंभव सा प्रतीत होता है | दूध में पानी मिला दिया जाये तो पानी भी दूध प्रतीत होने लगता है क्योंकि दूध में पानी पहले से ही प्राकृतिक रूप से होता है जिस कारण से ऊपर से मिलाया हुआ पानी आसानी से दूध के साथ एक हो जाता है | इसी प्रकार गंगाजी में आकर गन्दा नाला भी गिर जाता है तो वह भी गंगा कहलाने लगता है | साधारण मनुष्य दोनों में अंतर नहीं कर पाता परन्तु विवेकवान समझ जाता है कि दूध में जल मिला हुआ है और गंगा में कहीं न कहीं गन्दा नाला आकर गिर रहा है | अहम् के बारे में बात करें तो वह बात इन दोनों उदाहरणों से थोड़ी भिन्न है | उपरोक्त उदाहरण दो अलग अलग गुणों वाले पदार्थों के बारे में बात करते हैं और यहाँ अहम् में एक ही गुण वाला स्वयं को दो रूपों में प्रदर्शित कर रहा है | स्वयं के दो रूपों के लिए अहम् ही उत्तरदायी है, कोई अन्य नहीं | जिस दिन अहम् का छद्म रूप विलीन हो जायेगा, उसका वास्तविक रूप प्रकट हो जाएगा | इसी कारण से यह कहा जाता है कि मनुष्य स्वयं (आत्मा) को स्वयं में ही पा लेता है, उसे बाहर कहीं पर भी भटकने की आवश्यकता नहीं है |

            स्वयं को स्वयं में ही पा लेने में व्यक्ति के विवेक की महत्वपूर्ण भूमिका रहती है | विवेक का अर्थ है कि किसी विषय का गंभीरता से अवलोकन करना | हमारे जीवन में अनेकों समस्याएं आती है | जो व्यक्ति विवेकवान है, वह बिना विचलित हुए उन परिस्थितियों से बाहर निकल आता है, जबकि साधारण मनुष्य विपरीत स्थिति में केवल रोता ही रह जाता है | विवेक ही अहम् के छद्म रूप को विलीन कर सकता है और अहम् के वास्तविक स्वरुप को प्रकट कर सकता है | विवेकवान इसी कारण से यह जानता है कि जो विषम परिस्थिति मेरे समक्ष आई प्रतीत हो रही है, वास्तव में मैं उस परिस्थिति की पहुँच से बहुत दूर हूँ अथवा यह कहा जा सकता है कि यह परिस्थिति मुझ तक पहुँच ही नहीं सकती | परिस्थिति क्यों नहीं पहुँच सकती, इसको स्पष्ट करने के लिए अहम् को विवेकपूर्वक जानना होगा |

             हमारा स्थूल शरीर अष्टधा प्रकृति के अंतर्गत है | अष्टधा प्रकृति में पांच भौतिक तत्वों के साथ मन, बुद्धि और अहंकार आते हैं | मन के भी दो भाग हैं - मन और चित्त | इस प्रकार मन, बुद्धि, चित्त और अहंकार चारों मिलकर अंतःकरण कहलाते हैं | अहंकार का अर्थ है अहम् का वह भाग जो शरीर के साथ हो गया है | अहम् + आकार = अहंकार | अहम् जब आकार ले लेता है तब वह शरीर के आकार को ही स्वयं का होना समझ लेता है | अहम् के आकार लेने से अर्थ है, अहम् का शरीर के साथ हो जाना | जो अहम् शरीर के साथ हो जाता है, उसी को मन भी कहते हैं | जबकि वास्तविकता यह है कि अहम् का वास्तविक स्वरुप उसके सांसारिक स्वरुप से एकदम भिन्न है |  

               अहम् (अहंकार)अष्टधा प्रकृति में सर्वोच्च पद पर है | अहंकार के अधीन बुद्धि होती है, बुद्धि के अधीन मन और मन के अधीन होती इन्द्रियां और शरीर | जब अहम् शरीर के साथ हो जाता है तो वह पदावनत होकर मन कहलाने लगता है | वह बुद्धि का भी अतिक्रमण कर जाता है और मन को सीधे आदेश देने लगता है | दूसरे शब्दों में कहा जा सकता है कि अहम् ही मन का कार्य करने लगता है | बुद्धि बेचारी अपने उच्च पदाधिकारी अहम् के अधीन होने के कारण उसके सामने मन को नियंत्रित न कर पाने में अपनी विवशता व्यक्त करती है | बुद्धि में छिपा विवेक जाग्रत तभी होता है जब मन के संग हुआ अहम् अपने वास्तविक स्वरुप के अहम् को सामने खड़ा देख थोडा सा निर्बल पड़ जाता है | बुद्धि उसकी इस निर्बलता का लाभ उठाते हुए विवेक और विचार को सक्रिय कर देती है जो कि अहम् को शक्ति प्रदान कर उसको अपने वास्तविक स्वरुप का ज्ञान कराने में सहायक हो जाते हैं |

           सार रूप से कहा जा सकता है कि अहम् तो एक ही है परन्तु उसको जब शरीर और संसार का साथ मिलता है तब वह अपना तादात्म्य उन्हीं के साथ कर लेता है | इस सांसारिक संग के कारण उसको अपने वास्तविक स्वरुप का बोध नहीं रहता | अहम् का वास्तविक स्वरुप उसके सांसारिक स्वरुप के भीतर गहराई में अनन्त काल तक दबा पड़ा रह सकता है | उस वास्तविक स्वरुप तक पहुँचने के लिए उसके इस सांसारिक आवरण को तोडना होगा, इस आवरण से उसे मुक्त करना होगा | इस आवरण को माया का आवरण भी कहा जाता है |

           माया के आवरण को स्वयं अहम् ने ही ओढ़ रखा है | वास्तव में यह आवरण छद्म आवरण ही है परन्तु साधारण बुद्धि इस आवरण को ही अहम् का वास्तविक स्वरुप समझने लगी है क्योंकि अहम् मन जैसा व्यवहार करने लगा है | इस आवरण का भेदन करना केवल विवेक के वश की बात है, अकेली बुद्धि भी इसके समक्ष असहाय है |

              विवेक जाग्रत होने में शास्त्र, सत्संग और सद्पुरुषों का सानिध्य मिलना तो महत्वपूर्ण है ही, परन्तु ये सब आपको केवल बाह्य रूप से ही प्रेरित कर सकते हैं | जबकि अहम् के वास्तविक स्वरुप को जानना स्वयं के भीतर की यात्रा है, अंतर्यात्रा है और प्रत्येक व्यक्ति की अंतर्यात्रा में उसे स्वयं को अकेले ही चलना पड़ता है | शास्त्र, गुरु और संतों की भूमिका उसकी इस यात्रा में नाम मात्र की होती है | बाह्य-यात्रा में आपको शास्त्र, संत और सत्संग मिलेंगे और ये सब आपके अहम् (स्वरूप)की ओर संकेत भर कर सकते हैं, उस अहम्  के वास्तविक स्वरूप तक पहुंचा नहीं सकते | जिस प्रकार राह में मंजिल की तरफ आगे बढ़ने पर मील के पत्थर आते है, वे केवल इतना ही संकेत भर करते हैं कि आप अपने गन्तव्य से कितनी दूर है और आप सही मार्ग पर हैं परन्तु आप वहां तक तक कैसे पहुँचेंगे, यह नहीं बतला सकते | गुरु भी आपको संकेत भर ही करता है | वह आपको अध्यात्म के मार्ग पर आगे बढ़ने को प्रेरित करता है | उनकी प्रेरणा से ही आप अपनी यात्रा के अंतिम लक्ष्य की ओर अग्रसर होते हैं और बाहर की यात्रा छोड़ स्वयं के भीतर प्रवेश करते हैं |

            जापान में एक मंदिर है, जिसमें ‘हाथ’ के आकार की एक मूर्ति है | उस मंदिर में हाथ कोई साधारण मुद्रा में नहीं है बल्कि वह अपनी तर्जनी से ऊपर आकाश की ओर संकेत कर रहा है और शेष अंगुलियाँ और अंगूठा इक्कट्ठे होकर मुठ्ठी बंद हो रखी है | इस हाथ की मूर्ति एक महत्वपूर्ण बात की ओर संकेत करती है कि परमात्मा ऊपर की ओर है | इसका दूसरा अर्थ है कि परमात्मा सर्वोच्च है | इस संकेत को जिसने समझ लिया वह सही मार्ग पकड़ लेगा।यह मंदिर दर्शंनार्थियों को अपने वास्तविक स्वरुप परमात्मा की ओर चलने के लिए प्रेरित करता है | पूजा करने वाले इस हाथ की मूर्ति का क्या अर्थ लेते हैं, वह बात कुछ अन्य भी हो सकती है | कोई कहता है कि यह मूर्ति ‘परमात्मा एक है’ - यह सन्देश देती है | यह हाथ की मूर्ति क्या संकेत करती है, यह बात तो केवल उस मूर्ति को गढ़ने वाला शिल्पी ही बता सकता है |

            भीतर की यात्रा प्रारम्भ करते ही मनुष्य को अकेलापन काटने लगता है | अल्पज्ञान और उद्देश्य के प्रति दृढ भाव न रखने वाले इस अकेलेपन से घबराकर पुनः बाहर की ओर निकल आते हैं | फिर भी गुरु प्रयास करते हुए उनको स्वयं के भीतर प्रवेश करने के लिए प्रेरित करता है | अंतर्यात्रा में अकेलेपन से घबराने का अर्थ है कि अहम् के वास्तविक स्वरूप तक पहुँचने की मुमुक्षा अभी बलवती नहीं हुई है |

           मनुष्य की सबसे बड़ी विडम्बना यह है कि जब वह अध्यात्म की यात्रा पर निकलता है तब संसार का आकर्षण उसे अपनी ओर एक चुम्बक की भांति खींचने लगता है | चुम्बक के बारे में जानने वाले जानते हैं कि प्रत्येक चुम्बक का अपना एक निश्चित चुम्बकीय क्षेत्र होता है | जब आप उस क्षेत्र से बाहर निकल जाते हैं, तब उस चुम्बक का आकर्षण भी प्रभावहीन हो जाता है | इसी प्रकार आध्यात्मिक जीवन में भी स्वयं के सांसारिक जीवन के आकर्षण क्षेत्र से बाहर निकलना आवश्यक है |

             संसार की मोह-माया ही वह आकर्षण है, जिससे मनुष्य जीवन भर मुक्त नहीं हो सकता | उस आकर्षण से मुक्त हो जाने का नाम ही जीवन-मुक्ति है | संसार में रहते हुए भी किसी के मोह ममता पाश में नहीं बंधोगे तो फिर अंतर्यात्रा में अकेलापन आपको कभी खलेगा नहीं बल्कि वह अकेलापन भी एकांत बन जायेगा और उस एकांत के आनन्द की अनुभूति करने वाले भी केवल आप ही होंगे | अंतर्यात्रा में आप जब अहम् तक पहुंचते हैं तब तक अगर आपका सांसारिक आकर्षण मिट चूका है तो यह अहम् से माया का आवरण हटा हुआ कहलाता है | माया ही अहम् के वास्तविक स्वरुप को प्रकट नहीं होने देती | माया से मुक्त होने का अर्थ है- आप स्वयं मुक्त हो गए हैं, आपका वास्तविक स्वरुप आपके सामने प्रकट हो गया है और आप आत्म-बोध को उपलब्ध हो गए हैं | इस अवस्था में असत से आप दूर हो जाते हैं और सत का स्वरुप प्रकट होते ही आपको अनुभूति होती है कि वास्तव में वह सत आप स्वयं ही हैं | इतने दिन जिसको बाहर भटकते हुए ढूंढ रहे थे, वास्तव में आपके भीतर वह प्रारम्भ से ही उपस्थित था |

            प्रायः साधक इस स्थिति को प्राप्त होकर यह समझते हैं कि उनकी यात्रा पूरी हो चुकी है | हाँ, यह सत्य है कि आपका उद्देश्य सत को जानना था और उस सत को जानकर आप स्वयं भी सत हो गए हैं | परन्तु क्या इतना जान लेना ही पर्याप्त है ? नहीं, हमें इससे भी आगे जाना है | हम यह तो जान चुके हैं कि जिसको हम अपने से बाहर खोज रहे थे, वह हमारे भीतर पहले से ही उपस्थित है |

             हम भी वही हो गए हैं जिसको हम जानने के लिए निकले थे | परन्तु जिस संसार के आकर्षण से मुक्त होकर हम इस अवस्था तक पहुंचे हैं, वह संसार वास्तव में है क्या ? संसार को असत कहा अवश्य जाता है परंतु क्या वह असत है ? इस असत कहे जाने वाले संसार की स्वयं की सत्ता भले ही न हो परन्तु जैसा इस दृष्टि से देखा जा रहा है, स्पर्श से अनुभव हो रहा है, घ्राण के माध्यम से सूंघा जा रहा है, रसना के माध्यम से जिस संसार का स्वाद लिया जा रहा है और जिस श्रवण यन्त्र के माध्यम से शब्दों का रस लिया जा रहा है, क्या ये सब असत है ? अगर सब असत है तो फिर इनकी प्रतीति क्यों हो रही है ?

            इस प्रकार के अनेकों प्रश्न ही तब तक अनुत्तरित रहेंगे जब तक असत के पीछे छिपे सत्तावान को समझ नहीं लिया जाता | प्रारम्भ में हमें उस सत्तावान पर श्रद्धा और विश्वास करना होगा, तभी हमें अनुभव में आएगा कि असत भी वास्तव में सत ही है और यह सत भी असत तब तक ही है जब तक इसको हम अपने  सुख का साधन समझ रहे हैं अथवा मान रहे हैं | प्राणविहीन देह में भी ये सभी ज्ञानेन्द्रियाँ वैसे की वैसी यथास्थान बनी रहती है जैसी प्राणवान शरीर में रहती है | फिर भी प्राण चले जाने के बाद उन ज्ञानेन्द्रियों के माध्यम से किसी रस की अनुभूति क्यों नहीं होता? 

                  मृत शरीर को किसी भी विषय रस का अनुभव क्यों नहीं होता ? इन्द्रियाँ उस शरीर में यथास्थान और सुरक्षित भी हैं फिर भी मृत देह प्रतिक्रिया क्यों नहीं दे पा रही है ? इसका कारण यह है कि अनुभूति शरीर की इन्द्रियों के माध्यम से होती अवश्य है परन्तु अनुभव करने वाला इस इन्द्रियधारी शरीर से भिन्न है | सत्य यह है कि शरीर और उसकी इन्द्रियां मात्र यंत्र से अधिक कुछ भी नहीं है | हम इस भौतिक जगत में विभिन्न यंत्रों का उपयोग करते हैं परन्तु क्या ये यंत्र स्वतः कार्य करते हैं ? नहीं, इन यंत्रों के उपयोग के लिए भी एक शक्ति की आवश्यकता होती है | इस प्रकार शरीर के सुचारू सञ्चालन के लिए आवश्यक उस शक्ति का नाम ही परमात्मा है |

          जिस सत को हमने अपनी अंतर्यात्रा में अन्तर्यामी के रूप में पहिचाना है वही सत इस सृष्टि के कण कण में भी सर्वव्यापी (ईश्वर) बनकर समाया हुआ है | ईश्वर और अंतर्यामी कहना केवल शब्दों का फेर मात्र है | एक उसके बिना किसी भी प्रकार के संसार की कल्पना तक नहीं की जा सकती | केवल इस दृष्टिगत भौतिक संसार की बात ही क्यों करें, सम्पूर्ण ब्रह्मांडों में अतिसूक्ष्म सा स्थान भी उससे रहित नहीं है | यह बात संतजन सदियों से कहते आ रहे हैं और हम सब उनकी हाँ में हाँ भी मिलाते रहते है परन्तु क्या हमें इसका अनुभव किया है ? ज्ञान होना और अनुभव होना, दोनों अलग-अलग बात है | शास्त्रों में भी पहले ही बहुत कुछ लिखा जा चूका है और आज के संतों से पहले भी बहुत से संतों ने विभिन्न प्रकार से यही बात कही है | फिर भी हमारा ज्ञान अनुभव में परिवर्तित क्यों नहीं हो पा रहा है ? इसका उत्तर भी वही एक ही है – संसार का आकर्षण |

              संसार के आकर्षण के कारण हमें सुख का अनुभव होता है और यह सुख आसक्ति को जन्म देता है | आसक्ति कामनाएं पैदा करती है और कामनाएं कर्मों के जाल में उलझाकर संसार से हमें मुक्त नहीं होने देती | संसार की आसक्ति से मुक्त हुए बिना भीतर की यात्रा प्रारम्भ नहीं हो सकती | भीतर की यात्रा पर निकले बिना उस सत (अंतर्यामी) तक नहीं पहुंचा जा सकता | इस प्रकार अंततः अन्तर्यामी की प्रतीति ही सर्वेश्वर/विश्वेश्वर की अनुभूति कराता है | जब तक सत तक नहीं पहुंचेंगे तब तक संसार भी असत ही बना रहेगा | इसलिए सर्वप्रथम बाह्ययात्रा को छोड़कर अंतर्यात्रा पर निकलना आवश्यक है | इस यात्रा से ही अंतर्यामी की अनुभूति होती है |

            अंतर्यामी को अनुभव कर सर्वेश्वर का अनुभव करना तभी हो सकता है जब हम इस संसार में एक परमात्मा के अतिरिक्त किसी और की सत्ता पर विश्वास न करें | देखा जाये तो उसके अतिरिक्त किसी अन्य की सत्ता यहाँ है भी नहीं | परमात्मा के अनुभव के सम्बन्ध में मैंने पहले कहा है कि संसार की प्रत्येक गतिविधि का सूक्ष्मता से अध्ययन करने से उसकी अनुभूति शीघ्र हो जाती है | यह अनुभूति कैसे हो सकती है ? आइये ! यह भी जान लेते हैं |           

           अहंकार में डूबा मनुष्य सदैव यही सोचता है कि मैं ही सब कार्यों का कर्ता हूँ | व्यक्ति यह भूल जाता है कि जिन इन्द्रियों के आधार पर वह कर्ता बना फिर रहा है, वे सभी इन्द्रियां मात्र यंत्र के अतिरिक्त कुछ भी नहीं हैं |

       हाँ, इन्द्रियाँ यंत्र मात्र है और उन यंत्रों के पीछे जिसकी शक्ति कार्य कर रही है, वही इन्द्रियों के माध्यम से विषय का अनुभव कराता है | उसकी अनुपस्थिति में इन्द्रियाँ ख़राब पड़े यंत्र के अतिरिक्त कुछ भी नहीं रह जाती है | लकवाग्रस्त व्यक्ति के पैर भी वही होते हैं, हाथ भी वहीँ पर रहते हैं, कहीं खो नहीं जाते फिर भी वह चलने-फिरने और कुछ भी करने में विवश है | वह चाहकर भी कुछ नहीं कर सकता | उसको किसी दूसरे की इन्द्रियों की दया पर निर्भर रहना पड़ता है |

            रोगी को ठीक करना और रोगी का ठीक हो जाना - इन दोनों में बड़ा अंतर है | ठीक करने में शतप्रतिशत सम्भावना रहती है कि किसी विशेष उपाय से बीमारी मिटा दी जाएगी जबकि उस रोगी के ठीक होने से अर्थ है कि बीमारी से मुक्त होने की सम्भावना केवल वैज्ञानिक उपाय पर ही निर्भर नहीं है बल्कि कोई इन उपायों से अलग एक शक्ति और भी है जो उसके ठीक होने अथवा न होने में प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से भूमिका निभाती है | प्रत्येक चिकित्सक रोगी को ठीक करने का उपाय अवश्य करता है परन्तु कभी भी यह नहीं कहता कि इस बीमार को मैंने ही ठीक किया है | बीमारी से मुक्त हो जाने पर प्रत्येक चिकित्सक यही कहता है कि रोगी ठीक हो गया है |

             इसीलिए प्रायः सभी चिकित्सक ईश्वर पर पूर्ण श्रद्धा रखते हैं | बड़े बड़े चिकित्सक और चिकित्सालयों का एक ही कथन होता है – I/we treat, He cures अर्थात मैं या हम चिकित्सा करते हैं, रोग मुक्त वह (परमात्मा) करता है |

               रोग का निदान करने में वैज्ञानिकों को कुछ सीमा तक सफलता मिली है जिसके कारण यह बताया जा सकता है कि रोग शरीर के किस अंग की कौन सी प्रक्रिया में अवरोध उत्पन्न होने से हुआ है | जैसे लकवा सुषुम्ना नाड़ी में आये किसी व्यवधान से होता है और आज वैज्ञानिक उसको ठीक भी कुछ सीमा तक करने का दावा करते हैं | एक बीमारी होती है – मोटर न्यूरोन डिजीज जिसको अल्प शब्दों में MND भी कहा जाता है |  इसमें सुषुम्ना नाड़ी में किसी प्रकार का व्यवधान भी नहीं आता और न ही मस्तिष्क रोगग्रस्त होता है, फिर भी रोगी की एक-एक कर सभी कर्मेन्द्रियाँ धीरे-धीरे कार्य करना बंद कर देती है |  इस बीमारी की विशेषता है कि ग्यारह इन्द्रियों में से केवल कर्मेन्द्रियों का कार्य ही प्रभावित होता है, शेष पांच ज्ञानेन्द्रियाँ और मन सभी स्वस्थ बने रहते है | वैज्ञानिकों के पास इस बीमारी का उपचार आज भी नहीं है |

            इस बीमारी के बारे में क्या कहेंगे ? प्रत्येक चिकित्सक ही नहीं बल्कि संसार के किसी भी प्राणी के पास इस प्रश्न का उत्तर नहीं है | चिकित्सक भी यही कहते हैं कि इस रोग का उपचार किन्हीं दवाइयों से नहीं हो सकता केवल ईश्वर ही रोगी को इस रोग से मुक्त कर सकते हैं | मेरे कहने का अर्थ है कि जानने की सीमा जहाँ आकर समाप्त हो जाती है, मानने की प्रक्रिया वहीं से प्रारम्भ होती है | ये तो उदाहरण चिकित्सा जगत के हैं परन्तु ऐसे असंख्य उदाहरण हमें अपने दैनिक जीवन में भी अनुभव में आ सकते हैं |  आवश्यकता है कि हम अपने चारों ओर के क्रियाशील संसार की प्रत्येक गतिविधि का सूक्ष्मता से अवलोकन करें | इस अवलोकन के उपरांत जो अनुभव होगा, निसंदेह वह अतीन्द्रिय अनुभव होगा और ऐसा अनुभव करना ही परमात्मा की अनुभूति होना है |

              अंतर्यामी को जान लेना संसार में ईश्वर की उपस्थिति की अनुभूति कराता है और यही ईश्वर अपनी समग्र उपस्थिति से सर्वेश्वर बन जाता है | अंतर्यामी से सर्वेश्वर तक ज्ञान हो जाने की यात्रा ही योग है | मनुष्य के उद्देश्यपूर्ण जीवन का अंतिम विश्राम स्थल सर्वेश्वर की अवस्था तक पहुँचना है | अंतर्यामी तक पहुँचने को ही प्रायः मनुष्य अंतिम अवस्था मानकर आगे बढ़ने का प्रयास नहीं करते | प्रयास करने का यहां मंतव्य यह नहीं है कि प्रयास से ही परमात्मा को जाना जा सकता है | नहीं, परमात्मा को अनुभव करना किसी जानने की प्रक्रिया के अधीन नहीं है | जानना और मानना, ये दो बातें प्रत्येक मनुष्य के जीवन में सदैव रहेगी | हाँ, यह अवश्य है कि जान लेने का प्रयास कर लेने से मानना तनिक सुगम अवश्य हो जाता है |

          जानना इन्द्रियों के माध्यम से होता है जबकि मानना श्रद्धा और विश्वास का विषय है | श्रद्धा रखने और विश्वास करने के लिए किसी प्रकार की क्रिया की कोई आवश्यकता नहीं होती जबकि जानने के लिए एक निश्चित प्रक्रिया और साधन की आवश्यकता होती है | जानना इन्द्रियों के माध्यम से होता है और सभी इन्द्रियाँ प्रकृति की देन है | इसका अर्थ हुआ कि केवल प्रकृति को ही इन्द्रियों के माध्यम से जाना जा सकता है |

            आपने पैदा होने के बाद सर्वप्रथम अपनी मां को ही जाना है क्योंकि आपने पैदा होने के बाद उन्हीं को सदैव अपने साथ पाया है | पिता के बारे में आप कुछ भी नहीं जानते | जिसको आप जान चुके हैं, वही मां जब कहती है कि ये तुम्हारे पिता है, तब आपने मान लिया कि ये ही मेरे पिता हैं | कहने का अर्थ है कि ‘जाने हुए’ के माध्यम से किसी को मान लेना सुगम हो जाता है | जानने और मानने में केवल यही अंतर है |

             आज के वैज्ञानिक युग में जैविक पिता को भी डी.एन.ए. जांच करा कर जाना जा सकता है | इसके लिए उच्च श्रेणी की प्रयोगशालाओं में परीक्षण कर पिता का पता लगाया जा सकता है |  यह बात तो है केवल सांसारिक पिता को जानने की, जिसको कुछ परीक्षणों के माध्यम से फिर भी जाना जा सकता है परन्तु जो सबके पिता है, परमपिता है, उनको जानना किसी महान वैज्ञानिक के भी वश की बात नहीं है |

             प्रकृति हमारी मां है क्योंकि हमारा शरीर प्रकृति की ही देन है और प्रकृति के माध्यम से हम इस संसार में आए भी हैं परन्तु यह प्रकृति तो हमारी पिता नहीं है | यह सत्य है की प्रकृति का अस्तित्व पिता के कारण ही है | जो प्रकृति का जनक है वही परोक्ष रूप से हमारा जनक भी है | इस प्रकार जो सबका पिता है, वही परमात्मा कहलाता है | प्रकृति को हम अपनी इन्द्रियों से अनुभव कर सकते हैं, इसलिए प्रकृति को हम जानते हैं परन्तु परमात्मा का अनुभव इन्द्रियों के माध्यम से नहीं हो सकता इसलिए उनको मानना पड़ता है | प्रकृति हमें अकेले अपने स्तर से पैदा नहीं कर सकती, उसे पुरुष (परमात्मा) का सहारा लेना ही पड़ता है परन्तु वह परमात्मा अगोचर है, उसे देखा नहीं जा सकता इसलिए उसको जाना भी नहीं जा सकता | देखना इन्द्रियों के माध्यम से होता है, शरीर के माध्यम से होता है इसलिए प्रकृति का अनुभव इन्द्रियों के अधीन हुआ | परमात्मा का अनुभव अतीन्द्रिय है इसलिए उसको माना ही जा सकता है, इन्द्रियों से जानने का प्रयास करेंगे तो हम जीवन भर उस एक को जानने में कभी सफल नहीं होंगे |

            इस प्रकार स्पष्ट है कि परमात्मा को माना ही जा सकता है | ऐसे में प्रश्न उठता है कि फिर हमें परमात्मा का अनुभव कैसे होगा ? चलो मान लिया कि परमात्मा हैं परन्तु उनकी उपस्थिति का अनुभव भी तो होना चाहिए बिना अनुभव के मान लेने में भी क्या सार है ? तो  आइये ! इसी प्रश्न के उत्तर को भी जानने का प्रयास करते हैं |

            परमात्मा का अनुभव या तो उसको हो सकता है जो संसार की प्रत्येक गतिविधि का सूक्ष्मता से अध्ययन करे अथवा यह अनुभव उसको हो सकता है जिसको सर्वत्र परमात्मा ही दिखलाई पड़ रहे हों | दोनों ही मार्ग एक दूसरे से सम्बंधित भी हैं और पूरक भी, क्योंकि दोनों का लक्ष्य एक ही है – परमात्मा की अनुभूति |

         आज के युग में जब विज्ञान के माध्यम से प्रकृति के एक एक कर सभी रहस्य खोलने का प्रयास हो रहा हो, ऐसे में किसी भी व्यक्ति के लिए सीधे सपाट रूप से परमात्मा को मानना बहुत ही कठिन होता जा रहा है | पुरातन काल में भक्ति के माध्यम से परमात्मा की स्वीकार्यता कर ली जाती थी और उससे उनको परमात्मा का अनुभव भी हो जाता था परन्तु आधुनिक युग में ऐसा होना असंभव सा प्रतीत होता जा रहा है | इसका अर्थ यह नहीं है कि केवल भक्ति के माध्यम से उसका अनुभव नहीं हो सकता | आज भी भक्ति मार्ग से उसका अनुभव हो सकता है परन्तु श्रद्धा और विश्वास की कमी के चलते ऐसा होना लगभग असंभव सा होता जा रहा है |      

        चलिए ! दोनों मार्गों का विवेचन करते हुए प्रकृति को साथ लेकर परमात्मा तक की यात्रा पर चलते हैं | प्रकृति हमारी मां है, इसमें दो मत नहीं हो सकते | यह हमारे ऊपर निर्भर करता है कि हम मां के पास रहकर, उनकी उपासना करते हुए वहीं तक सीमित रहेंगे अथवा मां की उपासना करते हुए आगे बढकर पिता तक पहुँचने का प्रयास करेंगे | प्रकृति को जाना जा सकता है क्योंकि हमारी इन्द्रियाँ और यह शरीर सब प्रकृति की देन है | प्रकृति को प्रकृति से ही जाना जा सकता है | प्रकृति ही बताएगी कि हमारे पिता कौन है ? तभी हम परमात्मा को मान पाएंगे |

        हमारी इन्द्रियों में एक इन्द्रिय है – नेत्र | नेत्रों के माध्यम से हम इस संसार को देख पाते हैं | हमें इस देखने की पूरी प्रक्रिया का सूक्ष्मता से अवलोकन करना होगा, तभी हम इस देखने की प्रकृति को जान पाएंगे | नेत्र इन्द्रिय को अध्यात्म कहा जाता है, उसके विषय अर्थात रूप को अधिभूत कहा जाता है और इस नेत्र गोलक में जो सूर्य का अंश स्थित है उसको अधिदैव कहा जाता है | नेत्र इन्द्रिय अध्यात्म है क्योंकि इसके माध्यम से हम दृश्य को देखकर स्वयं के बारे में जान सकते हैं | अधिभूत इस नेत्र का विषय है और इसका विषय है – रूप | रूप अधिभूत इसलिए है कि उत्पन्न होना और नष्ट हो जाना इसका मूलभूत स्वभाव है | सूर्य का अंश नेत्रगोलक में स्थित होकर अधिदैव कहलाता है | सूर्य का अंश है, प्रकाश | प्रकाश की अनुपस्थिति में किसी रूप अर्थात दृश्य का अनुभव नहीं किया जा सकता ।

             इस प्रकार यह स्पष्ट है कि नेत्र इन्द्रिय के माध्यम से हम इसकी प्रकृति को जान सकते हैं | ये तीनों अर्थात नेत्र इन्द्रिय (अध्यात्म), इसका विषय अर्थात रूप (अधिभूत) और सूर्य देव का अंश अर्थात प्रकाश (अधिदैव), ये तीनों परस्पर सापेक्ष (Inter related) है | परन्तु सौरमंडल में स्थित सूर्य इनसे निरपेक्ष है | इसी प्रकार हमारी आत्मा भी इन तीनों का मूल कारण है, इन तीनों का साक्षी है और इन तीनों से परे भी है | आत्मा इन तीनों से निरपेक्ष है | मूल बात यह है कि एक आत्मा ही इन तीनों के मूल में है और वही इन तीनों को प्रकाशित करता है |       

           इसी प्रकार स्पर्शेन्द्रिय (त्वचा) अध्यात्म है, इसका विषय, स्पर्श अधिभूत है और इसमें उपस्थित वायु का अंश अधिदैव है | श्रवण इन्द्रिय (कान) अध्यात्म है, शब्द विषय अधिभूत है और दिशा इसका अधिदैव है | स्वाद इन्द्रिय (जिह्वा) अध्यात्म है, रस विषय अधिभूत है और वरुण (जल देवता) इसका अधिदैव है | घ्राण इन्द्रिय (नाक) अध्यात्म है, गंध विषय अधिभूत है और अश्विनी कुमार अधिदैव है | ये जो त्रिविध तत्व हैं (अध्यात्म, अधिभूत और अधिदैव) इनका आत्मा से कोई सम्बन्ध नहीं है | इन तीनों को जान लेना ही प्रकृति को जान लेना है और जिसके कारण उनके विषय अनुभव में आते हैं वह स्वयं इस प्रकृति से अतीत है, निरपेक्ष है और उसकी शक्ति से ही प्रकृति के माध्यम से इन तीनों का अस्तित्व है | यहाँ तक कि प्रकृति का अस्तित्व भी उसी ‘एक’ के कारण है |

           इस प्रकार यह स्पष्ट होता है कि प्रकृति को जान कर प्रकृति के पीछे की शक्ति को स्वीकार किया जा सकता है | उस शक्ति की स्वीकार्यता ही उस शक्तिमान को मान लेना है | जिसको जाना जाता है, उसके अधिष्ठान को मानना ही पड़ता है | प्रकृति का अधिष्ठान यह परमात्मा ही है | वह असीम है उसके आदि और अंत को जानने में प्रकृति भी सक्षम नहीं है, फिर भला हम उसे कैसे जान सकते हैं ? इसलिए उसको मान लेना ही हमारे लिए उचित है | प्रकृति को जान लेने का प्रयास करना संसार की गतिविधियों का सूक्ष्मता से अध्ययन करना है और प्रकृति से आगे जब जानना असंभव हो जाता है, तब  जाकर भक्ति का पदार्पण होता है | जानने में न आने वाले को मान लेना, परमात्मा के प्रति समर्पण है और उस समर्पण का नाम ही भक्ति है |                

       इस प्रकार अंतर्यामी से सर्वेश्वर तक की यात्रा पूरी हो जाती है | प्रकृति को जान लेने के उपरांत यह अनुभव में आता है कि प्रकृति भी परमात्मा पर आश्रित है | इस प्रकार जितना भी हमें इस शरीर के माध्यम से हमारे अनुभव में आता है, वह सब प्रकृति है और जब इन इन्द्रियों से परे देखेंगे अर्थात अंतर्दृष्टि से देखेंगे तब सबमें और सर्वत्र एक परमात्मा को ही देखेंगे | एक परमात्मा के अलावा अन्य किसी की उपस्थिति का हमें अनुभव तक नहीं होगा | जब सारे दृश्य मिट जाएँ, विषय विषय न रहे, जब प्रकृति का अनुभव होना बंद हो जाये अर्थात प्रकृति के प्रति हम उदासीन और अनासक्त हो जाएँ तब जो एकान्तिक अनुभव होता है उसी को परमात्मा की अनुभूति होना कहते हैं |

             कहा जाता है कि सत्ता कभी दो की नहीं हो सकती | जहां दो की सत्ता होती है, वहां अराजकता पैदा हो जाती है | सत्ता एक की ही होती है और उस एक को पहिचान लेने वाला जीवन ही उद्देश्यपूर्ण जीवन है अन्यथा मनुष्य के अतिरिक्त सभी प्राणी निरुद्देश्य ही अपने जीवन का बोझ उठाए फिर रहे हैं | आहार, निद्रा, भय और मैथुन में रत मनुष्य और अन्य प्राणियों में तब कोई अंतर नहीं रह जाता जब मनुष्य भी उद्देश्यपूर्ण जीवन नहीं जी रहा होता है | मनुष्य को इन चार में उलझकर अपना जीवन बर्बाद नहीं करना चाहिए क्योंकि यह मानव शरीर बार-बार नहीं मिलेगा | सभी भोग योनियों में घूमकर अंत में यह मानव शरीर मिलेगा तब तक न जाने कितनी शताब्दियाँ बीत जाएगी | इसलिए अपने उद्देश्यपूर्ण जीवन के प्रति सतर्क और सावधान रहें, तभी हम आत्म-बोध को उपलब्ध हो पाएंगे और परमात्मा तक की हमारी यात्रा सम्पन्न हो पायेगी |

             इतने विवेचन के बाद स्पष्ट हो जाता है कि परमात्मा को मान लेना ही इस जीवन में सर्वोत्तम कार्य है | अन्तर्यामी तक पहुँच जाना तो ज्ञान को उपलब्ध हो जाना है ही परन्तु सर्वेश्वर तक की यात्रा ही मनुष्य जीवन का एक मात्र उद्देश्य होना चाहिए | अब प्रश्न उठता है कि अंतर्यामी और सर्वेश्वर में कोई भेद नहीं है, सिवाय शब्दों के तनिक फेर के, तो फिर अंतर्यामी से सर्वेश्वर की यात्रा क्यों आवश्यक है ? नि:संदेह अंतर्यामी और सर्वेश्वर में कोई भेद नहीं है परन्तु केवल इतने में ही संतुष्ट हो जाना मूल से दूर रह जाना ही है |

             अंतर्यामी में आप तो स्वयं वही हो जाते हो परन्तु शेष सृष्टि को किस दृष्टि से देख रहे हो, यह जानना भी महत्वपूर्ण है | केवल आपका परमात्मा हो जाना, आपमें अहंकार का भाव पैदा कर सकता है | हमारे अहंकार के मूल में स्वयं को अन्य सभी से श्रेष्ठ और विशेष होना ही मान लेना है | अंतर्यामी तक पहुँचकर अपने आप को विशिष्ट मान लेने का अर्थ यह है कि सृष्टि के अन्य सभी ज्ञान के क्षेत्र में आपसे निम्न स्तर के हैं | यह सूक्ष्म अहंकार ही आपको कभी भी अपनी स्थिति से नीचे गिरा सकता है | इसलिए सर्वप्रथम यह आवश्यक है कि अंतर्यामी तक पहुंचकर भी हम अहंकार से न भर उठें | इसके लिए यह आवश्यक है कि हम अंतर्यामी से आगे बढ़ें और सर्वेश्वर तक जा पहुंचें | सर्वेश्वर तक पहुँच जाने से इस सृष्टि में सब ओर परमात्मा ही नज़र आयेंगे और हम भ्रम में पड़ कर अहंकार ग्रस्त होने से बच सकेंगे | अंतर्यामी तक की यात्रा में यह स्वीकार कर लिया जाता है कि आप स्वयं ही परमात्मा हैं जबकि सर्वेश्वर तक पहंचने के बाद केवल एक परमात्मा ही रह जाते हैं उसके अलावा अन्य कोई नहीं रहता |

               पूर्ण ज्ञान की अवस्था को प्राप्त कर लेने से ही अंतर्यामी से लेकर सर्वेश्वर तक की स्वीकार्यता होती है अन्यथा नहीं | कहने को तो रावण भी बड़ा ज्ञानी था | परन्तु उसी ज्ञान के आधार पर वह स्वयं को भगवान् समझ बैठा था | उसको लगता था कि उसके कारण ही सब जीव जीवन जी रहे हैं और उसके मारने से ही वे मारे जाते हैं | इसी अल्प-ज्ञान के कारण उसको बड़ा अहंकार हो गया था |

           हिरण्यकशिपु के साथ भी यही हुआ था | ज्ञान और बल के क्षेत्र में वह भी किसी से कम नहीं था परन्तु उसी ज्ञान ने उसको अहंकार से भर दिया था | जिसका प्रहलाद जैसा भगवद्भक्त पुत्र हो, उसका अन्त जिस प्रकार हुआ, क्या उस प्रकार किसी का हो सकता है ? हाँ, अंतर्यामी की स्थिति पर ही अटक जाने और सर्वेश्वर तक की अवस्था में न पहुँचने वाले अहंकार से भरे हुए प्रत्येक हिरण्यकश्यप के साथ ऐसा होता आया है और भविष्य में भी ऐसे ही होता रहेगा |

         हिरण्यकशिपु भी तो यही कहता था कि मैं ही भगवान हूँ | मेरे सिवाय किसी की भी पूजा न करो परन्तु जो सर्वेश्वर की अवस्था तक पहुँच चूका हो, वह प्रहलाद भला इस बात को कैसे स्वीकार कर सकता है ? ’मैं ही भगवान् हूँ’ और ‘मैं भी भगवान् हूँ’ दोनों बातों में बड़ा अंतर है | प्रहलाद यही तो कहता था कि सब भगवद्स्वरूप है | ऐसा कहने से उसके पिता भी तो भगवान् हो जाते हैं परन्तु ज्ञान और बल का अहंकार भला स्वयं के अतिरिक्त किसी और के भगवान् होने को स्वीकार कैसे कर सकता है ? ऐसे अहंकारित ज्ञानी का अंत भी वैसे ही होता है, जैसा हिरण्यकशिपु का हुआ था | उसकी ज्योति भले ही भगवान् में लीन हो गई हो परन्तु परमात्मा का प्रेम जो उसके पुत्र प्रहलाद को मिला उससे वह वंचित ही रहा |

               अहंकार मनुष्य की आन्तरिक दृष्टि छीन लेता है फिर उसे स्वयं के सिवाय सभी बौने नज़र आते हैं | हाँ, ‘अहम् ब्रह्मास्मि’ सत्य है, ‘तत्वमसि’ भी सत्य है परन्तु ‘सर्वं खल्विदं ब्रह्मम्’ पूर्ण सत्य है |

         जब अहंकार से भरा हिरण्यकश्यप अपने पुत्र को मारने को तत्पर हुआ तब उसने तलवार निकाल कर प्रहलाद से पूछा था कि क्या इस खम्भे में भी तुम्हारा भगवान् है ? प्रहलाद का उत्तर था – ‘पिताजी इस खम्भे में ही क्यों, मुझे तो सर्वत्र परमात्मा ही दिखलाई पड़ रहे हैं | एक परमात्मा के अतिरिक्त यहाँ कोई अन्य है ही नहीं | इस खम्भे में भी, आपमें भी और मुझ में भी, सबमें वह परमात्मा समान रूप से उपस्थित है | खम्भा है ही कहाँ ? यह तो स्वयं परमात्मा ही है |’

        प्रहलाद, एक अल्पवय बालक, जब परमात्मा के बारे में इतनी बड़ी बात कह देता है, इसका अर्थ है कि इस छोटी सी सारगर्भित बात को समझ पाना किसी के लिए भी असंभव नहीं होना चाहिए |  वह बात और है कि इतनी सी बात को हम अपने भीतर गहराई तक ले जाने का तनिक सा भी प्रयास नहीं करते | जब तक ज्ञान अंतस की गहराई में नहीं उतरता तब तक वह अज्ञान ही रहता है | जिस दिन हम अपनी कथनी को करनी में परिवर्तित कर देंगे तब जीवन में धीरे-धीरे प्रत्येक प्रकार के अहंकार से दूर होते चले जायेंगे और जीवन में अंतर्यामी से सर्वेश्वर तक की स्वीकार्यता होती चली जाएगी |

         जब तक स्वयं में और अन्य जीव में, परमात्मा में और संसार में एकत्व के आधार पर भिन्नता बनी रहेगी तब तक यही कहा जायेगा कि हमें ज्ञान नहीं हुआ है | फिर भला सर्वेश्वर की अनुभूति कैसे होगी ? आवश्यकता है कि हम यह जानने का प्रयास करें कि आखिर हम में और अन्य जीव में भिन्नता कहाँ जाकर प्रकट हो रही है ? भिन्नता भौतिक दृष्टि से तो थोड़ी बहुत फिर भी हो सकती है परन्तु मूलतः भिन्नता किसी भी स्तर पर नहीं है | आपस की इस दूरी को मिटा डालने से ही यह भिन्नता समाप्त होगी अन्यथा नहीं |

                प्रत्येक जीव का शरीर पांच तत्वों से मिलकर बना है | मनुष्य में भी कोई छठा तत्व अलग से मिला हुआ नहीं है, जिससे कहा जा सके कि उसका शरीर अन्य जीवों से भिन्न है | सभी जीवों में समान रूप से संसार का ज्ञान प्राप्त करने के लिए ज्ञानेन्द्रियां है और उस ज्ञान के अनुसार स्वतंत्र रूप से कर्म करने के लिए कर्मेन्द्रियाँ भी हैं | सभी जीवों के पास मन, चित्त, बुद्धि और अहंकार, ये अंतःकरण भी है | मनुष्य और अन्य जीवों में इनकी गुणवत्ता में अंतर अवश्य है परन्तु इनसे विहीन कोई जीव नहीं है | इनकी गुणवत्ता में अंतर तो एक मनुष्य से दूसरे मनुष्य में भी रहता है | किसी मनुष्य का रंग गोरा है तो कोई काला | किसी की विलक्षण बुद्धि है और कोई मूर्खता के कार्य करता है | गुणवत्ता के आधार पर भिन्न होना ही मनुष्य को अन्य जीवों से भिन्न बनाता है परन्तु तत्वों की दृष्टि से सभी में समान तत्व हैं |

             कहने का अर्थ है कि भौतिक दृष्टि से प्राणियों के शरीर भले ही भिन्न भिन्न नज़र आते हों परन्तु शरीर के बाह्यकरण और अंतःकरण के स्तर पर उनमें कोई भिन्नता नहीं है | आँखों से सभी प्राणी देखते हैं और सभी को स्पर्श का अनुभव समान रूप से होता है | सब प्राणियों में बुद्धि के स्तर पर मुख्य रूप से भिन्नता होती है | प्राणी के बौद्धिक स्तर के अनुसार ही हमारी उनसे व्यवहार करने के स्तर पर भिन्नता रहती है | व्यावहारिक भिन्नता सांसारिक स्तर पर बनाये रखना आवश्यक भी है | व्यावहारिक भिन्नता न रखने से अराजकता की स्थिति कभी भी उत्पन्न हो सकती है | मूर्ख व्यक्ति के साथ उस प्रकार का व्यवहार नहीं किया जा सकता जैसा कि एक ज्ञानी व्यक्ति के साथ किया जाता है | गाय और कुत्ते के साथ किया जाने वाला व्यवहार भी भिन्न होता है | शेर को आप छू नहीं सकते जबकि गाय को सहलाया भी जा सकता है |  

             सभी प्राणी भौतिक रूप से समान होते हुए भी व्यवहार के स्तर पर भिन्न हो जाते हैं | इस भिन्नता का कारण है - उनका स्वभाव | स्वभाव बनता है, जीव के पूर्व मानव जीवन के कर्मों से | परन्तु जो जीव को विभिन्न शरीरों की यात्राऐं करवाता है, वह सभी में समान रूप से उपस्थित है, यह महत्वपूर्ण बात है | इस बात को समझने वाला ही वास्तव में ज्ञानी है | ऐसा व्यक्ति ही अंतर्यामी से होकर सर्वेश्वर तक पहुंचता है | सर्वेश्वर की स्वीकार्यता ही ज्ञानी को भक्त की स्थिति में ला खड़ा करती है | इस अवस्था को जीवन-मुक्त्त अवस्था कहा जाता है | फिर परमात्मा से उसकी दूरी न के बराबर ही रह जाती है | इस दूरी के मिटते ही वह स्वयं ही परमात्मा हो जाता है | यह दूरी भी केवल इस भौतिक शरीर के रहते ही है | इस भौतिक शरीर के नष्ट होते ही वह स्वयं ही परमात्मा हो जाता है |

       परमात्मा से अपनी दूरी को समाप्त करने के लिए ही यह शरीर मिला है और यही इस शरीर का कार्य है तथा इसके मिलने का उद्देश्य भी | अंतर्यामी और सर्वेश्वर तक पहुँचने के लिए मनुष्य शरीर आवश्यक है क्योंकि मनुष्य ही विलक्षण बुद्धि का स्वामी है | परमात्मा से स्वयं की दूरी केवल शरीर के स्तर पर मानी गयी दूरी है, वास्तव में कोई दूरी है ही नहीं | इस बात का अनुभव करने के लिए गीता में मुख्य रूप से तीन मार्ग बतलाये गए हैं | ये मार्ग ‘योग’ कहलाते हैं क्योंकि इन मार्गों के अनुसार चलने से परमात्मा के साथ योग हो जाता है | कर्म, ज्ञान और भक्ति योग, कहने में भले ही ये तीन अलग-अलग प्रतीत होते हों परन्तु वास्तव में ये तीनों एक दूसरे के पूरक हैं |

         कर्म योग में अपनी कामना का त्याग करना पड़ता है अर्थात कामना रहित होना पड़ता है | ज्ञान योग में स्वयं के सच्चिदानंद स्वरुप होने का अनुभव करना होता है | भक्ति-योग में केवल यह मानना होता है कि मैं भगवान् का हूँ | तीनों ही रास्तों से व्यक्ति आत्म-बोध को उपलब्ध हो सकता है | आत्म-बोध को उपलब्ध होते ही परमात्मा से दूरी समाप्त हो जाती है और आप स्वयं ही परमात्मा हो जाते हैं |

          अब प्रश्न उठता है कि किसी भी योग को साधने का उपाय क्या है ? किसी भी योग को साधने का एक ही उपाय है – संसार से माने गए सम्बन्ध को तोड़ लेना | कहने को तो यह एकदम सरल प्रतीत होता है परन्तु इस मरणधर्मा शरीर के रहते ऐसा करना असंभव हो जाता है क्योंकि हमारा संसार के साथ सम्बन्ध इस शरीर के कारण ही तो है | शरीर को केवल आप स्थूल शरीर तक ही सीमित न समझें बल्कि सूक्ष्म शरीर भी साथ में शामिल कर लें | मनुष्य के सूक्ष्म शरीर की संसार के साथ एकता रखने में महत्वपूर्ण भूमिका रहती है |

           स्थूल शरीर से तो मनुष्य केवल सुख-दुःख का अनुभव करता है जबकि सूक्ष्म शरीर ही वास्तव में सुख-दुःख का जनक है क्योंकि सभी कामनाएं इसी शरीर में उत्पन्न होती है | सूक्ष्म शरीर में उत्पन्न होने वाले बहुत से संकल्प-विकल्पों को पूर्णता तक पहुंचाने के लिए आवश्यक कर्म करने में स्थूल शरीर ही मुख्य भूमिका निभाता है | अतः शरीर से तात्पर्य सूक्ष्म और स्थूल शरीर दोनों से ही है | इस प्रकार परमात्मा और हमारे मध्य की जो दूरी है उसको मिटाने के लिए इस शरीर को साधने की आवश्यकता है |

             इस शरीर के रहते संसार से सम्बन्ध विच्छेद करना मुश्किल है क्योंकि स्थूल शरीर तो फिर भी एक दिन मिट जायेगा परन्तु सूक्ष्म शरीर तो कारण शरीर बनकर अनंतकाल तक एक एक कर विभिन्न स्थूल शरीर प्राप्त करता रहेगा | सूक्ष्म शरीर के कारण ही कामनाओं का अंत नहीं आता क्योंकि एक कामना पूरी होती है तो फिर दूसरी कामना मन में जन्म ले लेती है | जब एक-एक कर कामनाएं पूरी होने लगती है तो वे मनुष्य में लोभ और अहंकार को जन्म देने लगती है | यह लोभ फिर नयी-नयी कामनाओं को पैदा करता है | कामनाएं पूरी होने से लोभ के साथ मनुष्य में अहंकार पैदा होता है और इस अहंकार के कारण स्वार्थ की भावना उत्पन्न होने लगती है | अगर कामनाएं पूरी नहीं होती तो मनुष्य क्रोध पैदा होने के कारण अशांत हो जाता है और यह अशांति उसको अनुचित कर्म करने की ओर ले जाती है | इस प्रकार स्पष्ट है कि मनुष्य का मन (सूक्ष्म शरीर) ही परमात्मा से उसकी दूरी का कारण है | इस मन को किस प्रकार समझाएं कि वह संसार में रुचि न लेकर परमात्मा में रुचि लेने लगे |

          सूक्ष्म शरीर में मन के साथ बुद्धि और अहम् भी रहते हैं | जैसा कि पहले स्पष्ट किया जा चूका है कि हम अहम् के दो रूप होने की कल्पना कर सकते हैं – एक रूप जो संसार के साथ जुड़ जाता है, उसके कारण अहंकार पैदा होता है और दूसरा रूप आत्मा (परमात्मा) की ओर रहता है जोकि सुप्त पड़ा रहता है | हमें सर्वप्रथम अपने अहम् को संसार से पूर्ण रूप से अलग करना होगा और इसके लिए हमारी बुद्धि में विवेक का जाग्रत होना आवश्यक है | प्रत्येक मनुष्य की बुद्धि में विवेक सुषुप्त अवस्था में रहता है और परिस्थिति अनुसार समय समय पर वह जाग्रत भी होता रहता है | विवेक की भूमिका ही अहम् को संसार से मुक्त कराने में रहती है |

       सांसारिक अहम् को तुष्टि और पुष्टि सांसारिक कामनाओं के पूरी होने से मिलती है | इस अहम् के कारण ही मनुष्य में ‘मैं’, ‘मेरा’ और ‘मेरे लिए’ की भावना पैदा होती है | व्यक्ति में ‘मैं’ अहंकार का प्रतीक है, ‘मेरा’ संसार में आसक्ति का प्रतीक है और ‘मेरे लिए’ उसकी स्वार्थ भरी भावना से सम्बंधित है | आप चाहे किसी भी योगमार्ग से आत्म-बोध को उपलब्ध होकर परमात्मा से अपनी दूरी मिटायें, इन तीन को मिटाना सबसे पहले आवश्यक है | ‘मेरे लिए’ को मिटाना मुख्य रूप से कर्म-योग है | ‘मेरा’ को मिटाना प्रधानतः ज्ञान योग है और ‘मैं’ को मिटाना ही भक्ति-योग है |

      ‘मैं’, ‘मेरा’ और ‘मेरे लिए’ – इन तीनों में से किसी एक का लोप हो जाने से शेष रहे दो का भी लोप हो जाता है | इस प्रकार कहा जा सकता है कि कर्म, ज्ञान और भक्ति-योग एक दूसरे के पूरक हैं, एक दूसरे से भिन्न नहीं | किसी एक को साधने से तीनों योग एक साथ ही सध जाते हैं | परमात्मा को न तो सत कहा जा सकता है और न ही असत; कहने का अर्थ है; सत और असत को समान मानकर निस्वार्थ भाव से संसार की सेवा करना | यह कर्म-योग हुआ | परमात्मा सत भी हैं और असत भी हैं, कहने का अर्थ हुआ सब में परमात्मा को देखो | यह ज्ञान योग हुआ | इसी प्रकार परमात्मा सत भी है, असत भी हैं और इन दोनों से परे भी हैं, इसका अर्थ है ‘वासुदेव सर्वम्’ अर्थात एक परमात्मा के अतिरिक्त दूसरा कोई नहीं है | यह भक्ति-योग हुआ | तीनों ही मार्ग उपयुक्त हैं । मनुष्य अपने स्वभावानुसार किसी भी एक मार्ग को मुख्य और सुगम समझकर उस पर गतिमान हो सकता है |

             जिस प्रकार एक व्यक्ति में प्रकृति के तीनों गुण विद्यमान रहते हैं; फिर भी उसमें किसी एक गुण की प्रधानता रहती है उसी प्रकार कर्म, ज्ञान और भक्ति योग के मार्ग अलग अलग भले ही प्रतीत होते हों, तीनों योग के मार्ग पर मनुष्य एक साथ ही चलता है | हाँ, इन तीनों में से कोई एक योग-मार्ग उसके लिए प्रधान अवश्य रहता है |

                               परमात्मा बहुत ही उच्च कोटि के सृजक हैं | सब कुछ करते वही हैं परन्तु प्रत्यक्ष रूप से नहीं बल्कि परोक्ष रूप से | परमात्मा ने स्वयं ही इस प्रकृति का सृजन किया और सब अधिकार प्रकृति को दे दिए | अब प्रकृति की मर्जी, वह उस सृष्टि का कैसे सञ्चालन करे ? मर्जी प्रकृति की चलती अवश्य है परन्तु परमात्मा के बनाये नियमों के अनुसार ही क्योंकि प्रकृति को भी परमात्मा ने नियमों में बाँध कर रखा है | उन्हीं नियमों के अंतर्गत ही प्रकृति अपनी मर्जी चला सकती है, नियमों को ताक पर रखकर नहीं | यह शरीर भी प्रकृति की देन है | इसको भी कुछ नियम मानने पड़ते हैं | इनमें से अगर एक भी नियम का उल्लंघन होता है तो तत्काल ही शरीर भी क्षतिग्रस्त/रोगग्रस्त हो जाता है |  

            परमात्मा कर्ता होते हुए भी अकर्ता है क्योंकि वह कर्मों में आसक्त नहीं है | परमात्मा के इसी भाव को अनासक्त होना कहा जाता है | जबकि मनुष्य इसके ठीक विपरीत आचरण करता है | वह जानता है कि सब कुछ प्रकृति के नियमों के अनुसार ही होता है परन्तु वह उसको स्वयं के द्वारा किया जाना मान लेता है | यही कर्तापन उसमें अभिमान पैदा करता है और अभिमान ही मनुष्य को पतन की ओर धकेलता है |

         प्रश्न उठता है कि मनुष्य कर्ता बनता ही क्यों है ? परमात्मा ने जब प्रकृति का सृजन किया तब उसमें तीन गुण डाल दिए | प्रकृति में जो भी क्रिया होती है, वह इन तीनों गुणों के कारण ही होती है | परमात्मा निर्गुण है अर्थात उनमें कोई गुण नहीं है, इसलिए वे अक्रिय हैं जबकि प्रकृति सगुण है क्योंकि इसमें तीन गुण है; इसलिए वह सक्रिय है | मनुष्य परमात्म-स्वरुप है, इसलिए उसको भी अक्रिय होना चाहिए | परन्तु जब वह अपने आपको शरीर (प्रकृति) मान लेता है तब वह स्वयं में हो रही क्रियाओं को अपने द्वारा होनी मान लेता है | यही कारण है कि वह प्रत्येक क्रिया जोकि उसके शरीर के गुणों द्वारा सम्पन्न होती है, उनको वह स्वयं द्वारा किया जाना मानकर उस कर्म का कर्ता बन बैठता है |

        प्रश्न है कि मनुष्य अपना वास्तविक स्वरुप क्यों भूल जाता है ? प्रकृति के गुण उसको एक प्रकार से शारीरिक और सांसारिक सुख उपलब्ध कराते हैं | गुणों की आपसी क्रियाएं ही ऐसी हैं कि उनका कोई न कोई एक निश्चित परिणाम अवश्य ही होता है | गुण आपस में क्रिया करते रहते हैं और इस प्रकार की क्रियाएं शरीर और प्रकृति में अनादि काल से चली आ रही है और प्रलय पर्यन्त सतत चलती रहेगी | उन्हीं क्रियाओं का परिणाम है कि जिस शिशु का जन्म होता है, वह जीवन की एक-एक कर शरीर की सभी अवस्थाओं से गुजरता है | जन्म, जरा, व्याधि और मरण – जीवन की ये सभी अवस्थाएं भी इन्हीं गुणों की आपसी क्रियाओं का परिणाम है |

              शरीर की मृत्यु हो जाने के उपरांत भी मृत देह में भी गुणों की ये क्रियाएं चलती रहती है | उन्हीं क्रियाओं के परिणाम स्वरुप मृत देह का विखंडन (decomposition) होता है | विखंडित देह पुनः पांच भौतिक तत्वों में परिवर्तित हो जाती है और फिर से एक नए शरीर के सृजन (creation)के लिए तैयार हो जाती है | इस प्रकार प्रकृति का यह चक्र निरंतर चलता रहता है | देह को ही स्वयं होना मान लेना ही अपने स्वरुप से दूर चले जाना है | प्रत्येक मनुष्य अपने जीवनकाल में अनेकों शरीरों को मृत होते देखता है | यहाँ तक कि प्रतिदिन उसका भी शरीर मृत होता जा रहा है, फिर भी वह यह नहीं समझता कि मैं यह शरीर नहीं हूँ । देखा जाए तो उसके इस ‘मैं’ में कोई परिवर्तन नहीं होता है | जिस ‘मैं’ में कोई परिवर्तन नहीं हो रहा है, वही उसका वास्तविक स्वरुप है | लेकिन यह ‘मैं’ संसार वाला अहम् नहीं है बल्कि संसार से मुक्त हुआ अहम् है |

           इस प्रकार हम कह सकते हैं कि जो मनुष्य जीवन में मृत्यु को सदैव स्मृति में बनाये रखता है वह कभी भी प्रकृति की क्रियाओं में उलझकर न तो कर्ता बनता है, न भोक्ता बनता है और न ही कभी अपने स्वरुप को भूलता है | स्वयं के स्वरुप को भूलने का महत्वपूर्ण कारण है – प्रकृति का सुख लेना | प्रकृति के सुख लेने को ही संयोगजन्य सुख लेना कहा जाता है |प्रकृति ही अपने गुणों के माध्यम से हमारा विभिन्न शरीरों और पदार्थों के साथ साथ विषयों  से संयोग कराती है जोकि हमारे सुख-दुःख का कारण बनते हैं। सुख के दिनों में मनुष्य सब कुछ भूल जाता है, यहाँ तक कि अपने आप को भी | जो क्रियाएं हमें सुख देती है, उसका रस लेने से हम स्वयं को रोक नहीं पाते क्योंकि रस लेना भी एक प्रकार की प्राकृतिक गुणों की क्रिया ही है | जीभ पर मिश्री रखेंगे तो वहां पर मिश्री नाम के पदार्थ के गुण जीभ के गुणों के साथ क्रिया कर उसका स्वाद बतलाएंगे ही | इस प्रकार यह एक सामान्य प्रक्रिया है | इस क्रिया से जिस प्रकार का रस हमें अनुभव में आता है, उस रस के प्रति आसक्ति का भाव ही हमें प्रकृति के साथ बांधता है ।

             इस प्रकार प्रकृति के साथ यह बंधन न तो प्रकृति करती है जोकि सक्रिय है और न ही परमात्मा जोकि अक्रिय हैं, बल्कि हम स्वयं प्रकृति के आकर्षण से भ्रमित होकर प्रकृति में  आसक्त हो जाते हैं। इसी आकर्षण के वशीभूत होकर हम स्वयं को भूलकर अपना संबंध प्रकृति के साथ होना मान बैठते हैं | इस बंधन के कारण ही मनुष्य एक दिन छटपटाने लगता है और चिल्लाने लग जाता है कि कोई आकर उसे इस बंधन से मुक्त करे | जो बंधा है वही उस बंधन से मुक्त हो सकता है, क्योंकि एकमात्र वही है जो इस बंधन का कारण जानता है | कोई दूसरा आकर उसे मुक्त नहीं कर सकता | देखा जाये तो प्रकृति के साथ अपना सम्बन्ध मान लेने से पहले मनुष्य मुक्त ही तो था, बंधन तो उसने स्वयं ने ही अपनी इच्छा से स्वीकार किया है | मुक्त तो हम सदैव से है । हमारी आसक्ति ने इस बंधन को स्वीकार किया है | जिस दिन हम अनासक्त होकर प्रकृति के गुणों की सभी क्रियाओं को सहज भाव से स्वीकार करने लगेंगे उस दिन हमें स्वयं के मुक्त होने का अनुभव हो जायेगा |

        स्मरण रहे, परमात्मा से मनुष्य होने तक की यात्रा में परमात्मा कभी अलग नहीं हुए हैं और न ही कहीं कम और कहीं अधिक ही हैं | ‘समं सर्वेषु भूतेषु तिष्टन्तं परमेश्वरम्’ (गीता -13/27)का अर्थ भी यही है कि समान रूप से परमात्मा सभी में और सर्वत्र उपस्थित हैं | हमें इस बात की विस्मृति संसार के साथ बंध जाने से हुई है | यह बंधन हमारा ही स्वीकार किया हुआ है और हम ही इस बंधन से बाहर निकलकर मुक्ति को पुनः अनुभव कर सकते हैं |

               अब इस विषय के सम्बन्ध में मुख्य प्रश्न हमारे सामने आता है कि हम इस प्रकृति के साथ माने गए बंधन से बाहर कैसे निकालें, कैसे हम इस बंधन को तोड़ सकते हैं, जिससे हमें स्वयं के मुक्त होने का अनुभव हो ? इसी बात पर हम चर्चा को आगे बढ़ाते हैं |

            संसार में भौतिक रूप से दो रचनाएँ एक समान न होते हुए भी आंतरिक रूप से सभी एक समान हैं | इस बात को समझने वाला ही उस ‘एक’ के साथ योग कर सकता है अन्यथा भौतिकता की चकाचौंध में उलझकर इस सृष्टि के वर्तुल (circle) में कोल्हू के बैल की तरह घूमता रहेगा | प्रायः लोग ग्रहों की स्थिति देखकर उस तिथि के बारे में घोषणा कर देते हैं कि इतने वर्ष पहले ऐसा ही योग पड़ा था | नहीं, परमात्मा ने जब समय के दो पल तक एक समान बनाये ही नहीं है, ऐसे में कई वर्ष पूर्व की ग्रह-स्थिति की पुनरावृति भला कैसे हो सकती है ? आपको मेरा यह कथन असत्य लग सकता है परन्तु गंभीरता से अवलोकन करेंगे तो पाएंगे कि मैं सत्य कह रहा हूँ |

            भौतिक रूप से सब कुछ असमान होते हुए भी सब रचनाओं में एक समानता अवश्य है परन्तु उस समानता को देखने के लिए हमें दूसरी प्रकार की दृष्टि चाहिए | वह दृष्टि परमात्मा की कृपा से और गुरु के माध्यम से मिलती है | उस दृष्टि के मिलते ही भौतिक रूप से असमान प्रतीत हो रही सभी रचनाएँ भी एक समान हो जाती है | आपकी वह दृष्टि प्रकृति का भी अतिक्रमण कर परमात्मा तक पहुंच जाती है | अंततः सब रचनाओं में केवल वही ‘एक’ दिखलाई पड़ने लगेगा |

          वास्तव में देखा जाये तो उसको ‘एक’ कहना भी अनुचित जान पड़ता है | ‘एक’ कहने से अर्थ है कि फिर कहीं न कहीं कोई दूसरा भी  उपस्थित है | सत्य है कि जब केवल एक ही बचता है,  वह तब तक ‘एक’ ही कहा जायेगा जब तक कि उस ‘एक’ को एक कहने वाला कोई दूसरा मौजूद हो | अंततः कहने वाला भी जब मौन हो जाता है तब वह ‘एक’ भी नहीं रहता | इसका अर्थ है कि कहने वाला भी  उस एक में ही समाहित है | फिर उसके बारे में किसी भी प्रकार का वर्णन नहीं किया जा सकेगा | जब तक देह है, तब तक प्रकृति और परमात्मा दोनों रहेंगे, जब देह होते हुए भी देह नहीं रहेगी तब केवल वही एक शेष बचेगा दूसरा कोई नहीं | फिर प्रकृति भी परमात्मा हो जाती है |

                मनुष्य जीवन की यात्रा वास्तव में देखा जाए तो प्रकृति को परमात्मा से मिलाने की यात्रा है, उन दोनों के एक हो जाने की यात्रा है | संसार में बहुत से रूप और नाम देखने को मिलते हैं | सभी के आकार और नाम भिन्न भिन्न हैं | सब कुछ आपस में भिन्न होते हुए भी उनमें कोई एक समानता रहती अवश्य है और वही समानता प्रकृति और परमात्मा के अंतर को समाप्त करती है | प्रकृति और परमात्मा तब तक ही दो प्रतीत हो रहे हैं, जब तक सांसारिक दृष्टि से हम इन्हें देखते हैं | आध्यात्मिक दृष्टि से देखेंगे तो ये दो हैं ही नहीं, केवल एक परमात्मा ही हैं |

           परमात्मा ने संसार बनाया नहीं है बल्कि स्वयं परमात्मा ही संसार के रूप में अवतरित हुए हैं | जैसे घर बनाने के लिए हमें मिट्टी, सीमेंट, पत्थर आदि इकठ्ठे करने पड़ते हैं, तब जाकर हमसे एक मकान का निर्माण होता है, वैसे परमात्मा ने नहीं किया है | मकान के निर्माण के लिए हमने इन साधनों को स्वयं के बाहर से एकत्रित किया है, इसलिए हम और मकान दो हुए | परन्तु परमात्मा ने प्रकृति के सृजन के लिए स्वयं से बाहर जाकर कुछ भी नहीं लिया क्योंकि उनसे बाहर कुछ नहीं है।इस प्रकार उन्होंने स्वयं के बाहर जाकर कुछ नहीं किया, बल्कि स्वयं ही प्रकृति के रूप में परिवर्तित होकर अवतरित हुआ है | ऐसे में भला प्रकृति और परमात्मा दो कैसे हुए ? वे दोनों दो न होकर एक ही तो हैं |

              इस बात को स्वीकार करने के लिए अपने शरीर का ही उदाहरण लें | हमारी दो आँखें है, दो हाथ हैं, दो पैर हैं | इस प्रकार हमारे शरीर के बहुत से अंग है | क्या ये सभी अंग हमसे अलग हैं ? नहीं है | हाथ अगर शरीर से अलग भी कर दिया जाये तो हम यही कहेंगे कि यह मेरा हाथ है | इसी प्रकार परमात्मा से प्रकृति और जगत, यहाँ तक कि हमारा शरीर भी उस परमात्मा से अलग नहीं हैं | हमारे में और परमात्मा में रत्ती भर भी अंतर नहीं है |

            सभी प्राणियों के शरीर असमान प्रतीत होते हुए भी आधारभूत परमात्मा के कारण समान ही है | हमारी दृष्टि ने इनको भिन्न मान लिया है वास्तव में भिन्नता किसी भी स्तर पर है नहीं | एक कोशिकीय जीव अमीबा भी केवल एक ज्ञानेन्द्रिय होते हुए भी पांचों ज्ञानेन्द्रियो का रस इस एक से ही ग्रहण कर लेता है | कोई कर्मेन्द्रिय न होते हुए भी वह सब कुछ उस एक इन्द्रिय से ही कर लेता है, यहाँ तक कि प्रजनन भी | प्राणियों की सर्वोच्च श्रेणी में मनुष्य आता है | वह अपनी इन्द्रियों से जो जो कार्य करता है, अर्थात रस लेता, करता अथवा चिंतन करता है वैसे ही अन्य सभी प्राणी भी करते हैं | इस प्रकार हम कह सकते हैं कि शरीरों में भिन्नता होते हुए भी सभी जीव एक समान हैं |

               असमानता के बाद भी सभी में समानता जिसके कारण है, उसी को परमात्मा कहते हैं | परमात्मा सभी जीवों में समान रूप से व्याप्त हैं | इसका अर्थ यह नहीं है कि शरीर के भीतर कोई एक भाग बना हुआ है, जिसमें परमात्मा निवास करते हैं | शरीर के प्रत्येक रोम रोम में वह उपस्थित है | प्रत्येक कोशिका के प्रत्येक भाग में वह समान रूप से व्याप्त है | चेतन चर-अचर प्राणियों के रोम रोम से लेकर अचेतन के कण कण में वह समान रूप से व्याप्त है | यहाँ तक कि सूई की नोंक जितना स्थान भी उस परमात्मा से रहित नहीं है | गीता में ‘वासुदेव सर्वम्’ जो कहा गया है, उसका एक ही अर्थ है कि परमात्मा सर्वत्र व्याप्त हैं |

         ‘वासुदेव सर्वम्’ भी तभी तक कहा जाता है जब तक हमें अपनी दृष्टि से भौतिक संसार दिखलाई पड़ रहा है | जब यह दृष्टि भी व्यापक और दिव्य हो जाती है तो ‘सर्वम्’ का भी सर्वथा लोप हो जाता है और केवल एक ‘वासुदेव’ ही रह जाते हैं | परन्तु ऐसा होना इस शरीर के रहते असंभव सा  लगता है; इसलिए सर्वत्र परमात्मा है, इसी बात को स्वीकार कर लिया जाता है | इस मरणधर्मा शरीर में जो मनुष्य समान रूप से व्याप्त अविनाशी परमात्मा को ही देखता है वास्तव में वही व्यक्ति सही देखता है |

            जिस दृष्टि से प्राणियों के नाशवान शरीर में अविनाशी परमात्मा को देखा जा सके, वह दृष्टि हमें कैसे मिल सकती है ? पूर्व में जैसे बताया गया है कि इसके लिए परमात्मा की कृपा और गुरु का सान्निध्य मिलना आवश्यक है | सांसारिक बुद्धि में विवेक के उपस्थित होते हुए भी वह जाग्रत अवस्था में नहीं होता है | परमात्मा की कृपा से योग्य गुरु और शास्त्र इस दिशा में हमारा मार्गदर्शन करते हैं | विवेक का सदुपयोग कर हम उस दृष्टि को प्राप्त कर सकते हैं जिससे एक परमात्मा के अतिरिक्त कोई अन्य दिखलाई ही न पड़े |

            विभिन्नता और विषमताओं से भरे संसार से निकलकर हमें सर्वत्र समान रूप से व्याप्त उस परमात्मा की ओर चलना है जहाँ पहुंचकर विषमताओं की अशांति समानता की शांति में परिवर्तित हो जाती है | हमें अपने उस मूल स्वरुप को पाना है, जिसको हमने खोया नहीं है बल्कि विस्मृत किया है |

         सांसारिक दृष्टि से केवल ‘मैं’, ‘मेरा’ और ‘मेरे लिए” ही दिखलाई पड़ता है | विवेक सर्वप्रथम ‘मेरे लिए’ को तोड़ता है | ‘मेरे लिए’ मानना स्वार्थ बुद्धि है, यह वस्तु और व्यक्ति के प्रति आपका राग है | इस राग के कारण ही मनष्य बंधन में पड़ता है | इस राग के टूटते ही व्यक्ति परमात्मा को अपने निकट अनुभव करता है | ‘मेरे लिए’ का विसर्जन होते ही मनुष्य में स्वार्थ भाव समाप्त होकर निष्कामता का जन्म होता है | गीता में इसी को ‘कर्म-योग’ कहा गया है | इस अवस्था में मनुष्य को ‘शांत-रस’ उपलब्ध होता है |

           विवेक का दूसरा प्रहार ‘मेरा’ पर होता है, जिसके टूटते ही हमारी दृष्टि में सभी प्राणी स्वयं के समान ही हो जाते हैं | इस अवस्था में मनुष्य पहले तो परमात्मा को स्वयं में और फिर स्वयं को सभी में देखता है और अंत में सब में परमात्मा को अनुभव करता है | जब कोई दूसरा है ही नहीं, फिर किसमें तो राग हो और किससे द्वेष ? इसे गीता में ‘ज्ञान-योग’ कहा गया है | इस स्थिति में आकर व्यक्ति ‘अखंड-रस’ को प्राप्त करता है |

       विवेक का अंतिम प्रहार होता है, ‘मैं’ पर | इस ‘मैं’ का टूटना बड़ा ही कठिन है क्योंकि शरीर के रहते देहाभिमान का चले जाना दूर की कौड़ी होता है | ‘मैं’ के समाप्त होते ही सर्वत्र एक परमात्मा ही दिखलाई पड़ने लगते हैं – प्रत्येक मन से लेकर प्रत्येक कण-कण तक में | सबको समान समझकर प्रेम करना ही इस सर्वोच्च स्थिति तक मनुष्य को ले जा सकता है | यह प्रेम की उच्च अवस्था है, यही भक्ति है | इस अवस्था में मनुष्य ‘अनन्त-रस’ को उपलब्ध हो जाता है ।

          इस विवेचन का अर्थ यह न लें कि पहले ‘मेरे लिए’ का विसर्जन करना है और फिर एक-एक कर ‘मेरा’ और ‘मैं’ का | जिस दिन हम इन तीनों में से किसी एक का भी विसर्जन करने के लिए आतुर हो जायेंगे फिर इन तीनों का विसर्जन धीरे धीरे स्वतः ही हो जायेगा |ये तीन केवल विवेचन के लिए है परन्तु जिस दिन इनमें से किसी एक को भी हम विसर्जित कर देंगे, उसी दिन आत्म-बोध को उपलब्ध हो जायेंगे | यही कारण है कि गीता में भगवान् ने मुख्य रूप से तीन योग भले ही कहे हों अंततः वे सभी योग परमात्मा में आकर ही विलीन हो जाते हैं |

            हमारी संकुचित दृष्टि को विस्तार देना ही संसार से निकलकर परमात्मा तक पहुंचना है | प्रकृति को दोष देना अनुचित है | प्रकृति को परमात्मा ने अपने आनंद के लिए स्वयं में ही  सृजत किया है | जहाँ हम इन दोनों को भिन्न होना मान लेते हैं तभी हमें परमात्मा नीरस और प्रकृति सरस प्रतीत होने लगती है | परन्तु उस प्रकृति के सृजन का आनंद हम तभी ले पाएंगे जब हम इसे केवल सुख प्राप्त करने का एक साधन नहीं समझेंगे | केवल एक रस और उस एक रस के प्रति हमारी आसक्ति हमें उस रस के साथ चिपका देती है | फिर हमारे अथक प्रयास से भी वह आसक्ति हमें उस रस से मुक्त नहीं होने देती जबकि स्वरुप से हम मुक्त हैं | हमें आसक्त होकर किसी भी रस के बंधन में नहीं पड़ना है | बंधन ही हमें अपने स्वरुप से दूर कर देता है | स्वरुप की स्मृति पुनः प्राप्त करने के लिए हमें फिर कई पापड़ बेलने पड़ते हैं |

         इस संसार में हमें मानव शरीर अपने स्वरुप तक पहुँचने के लिए ही मिला है, केवल इन्द्रिय भोगों में डूबने के लिए नहीं | संसार में असंख्य आकर्षण भरे पड़े हैं परन्तु हमें उनमें आकर्षित होकर बंधना नहीं है | इस प्रकृति के गुणों से मिलने वाले सुख-दुःख दोनों का ही आनंद लीजिये | जिस दिन केवल सुख को चाहेंगे और दुःख को दूर से ही नमस्कार करेंगे उस दिन इस प्रकृति के साथ बन्ध कर संसार में लिप्त हो जायेंगे |

           संसार में लिप्त न होने के लिए हमें सर्वत्र समान रूप और समभाव से व्याप्त एक परमात्मा को ही देखना चाहिए फिर संसार हमारा कुछ भी नहीं बिगाड़ पाएगा | यह संसार परमात्मा की ही माया है और माया से मुक्त वही हो सकता है जो इसमें सदैव मायापति को ही देखता है | सर्वत्र मायापति को देखने से हमारे लिए माया केवल खेल बन कर रह जाती है, फिर वह हमें विचलित नहीं कर सकती | यह संसार हमें सुहावना तब तक ही प्रतीत होता है जब तक हम उससे सुख लेने की अपेक्षा से बन्धे हुए हैं | अपेक्षाएं समाप्त हुई नहीं कि माया भी विलीन हो जाती है | मृग मरीचिका माया ही है परन्तु केवल प्यासे के लिए | प्यास बुझाने की आशा सूर्य की तेज धूप को भी कहीं दूर जल होने का आभास करा देती है |

           संसार से अनुराग करना मोह है | इसलिए संसार से राग न रखें | प्रेम और मोह में अंतर जिस दिन हम समझ लेंगे तब संसार में राग रखने को प्रेम न कहकर मोह कहेंगे | प्रेम तो कोई बैरागी ही कर सकता है | संसार से वैराग्य का अर्थ है - परमात्मा से प्रेम | संसार में परमात्मा को समान रूप से सर्वत्र व्याप्त देखेंगे तथा परमात्मा में समस्त संसार को व्याप्त देखेंगे, फिर जो संसार से प्रेम होगा वह भी परमात्मा से प्रेम होना कहलाएगा | संसार में आसक्ति रखना अनुराग है और संसार से अनासक्त हो जाना वैराग्य है |

          संसार में मोह रखना अज्ञान है और परमात्मा से प्रेम करना ज्ञान है | जिस दिन हमें यह ज्ञान हो जायेगा कि सब कुछ परमात्मा ही है, फिर मोह का स्थान ज्ञान ले लेगा | गीता में भगवान् श्री कृष्ण अर्जुन को कहते हैं –

       ब्रह्मभूतः प्रसन्नात्मा न शोचति न कांक्षति |

       समः सर्वेषु भूतेषु मद्भक्तिं लभते पराम् ||18/54||

   वह ब्रह्मरूप बना हुआ, प्रसन्न मन वाला साधक न तो किसी के लिए शोक करता है और न ही किसी की इच्छा करता है | ऐसा सम्पूर्ण प्राणियों में समभाव वाला साधक मेरी पराभक्ति को प्राप्त हो जाता है |

             व्यक्ति जब साधक की उच्च अवस्था को उपलब्ध हो जाता है तब उसके और परमात्मा के मध्य केवल शरीर भर की दूरी रह जाती है और इस दूरी के रहने का कारण है कि इस शरीर से जो कुछ भी पूर्व मानव जीवन में चाहा गया है, उसको अभी तक पाना शेष रहा है | उस भोग के भोगने जितने समय तक ही उस परमात्मा से दूरी है | शरीर के गिरते ही वह दूरी भी समाप्त हो जाती है | प्रायः लोग योग के मार्ग पर चलने वालों के शारीरिक कष्ट को देखकर अलग अलग राय रखते और व्यक्त करते हैं | याद रखें, पूर्व के किसी भी मानव जीवन में आपने जो कुछ भी चाहा है और उस चाहे गए को प्राप्त करने के लिए जैसे भी कर्म किये हैं, उनका परिणाम आपको इस जीवन में मिलकर ही रहेगा, यह शाश्वत नियम है | इस नियम से संत भी अलग नहीं है, क्योंकि आखिर वे भी हैं तो मनुष्य ही परन्तु ध्यान रहे, वे कभी भी विपरीत परिस्थिति में विचलित नहीं होते |  

             जीवन में शोक और कामना, ये दो ही मनुष्य को अशांत करती है | शोक, उसका- जो जिन्दगी में चाहा और जिसको चाहा गया , वह मिला नहीं | शोक के मूल में कामना ही है | जिस दिन जीवन में कामना समाप्त हो जाएगी, शांति तत्काल ही उपलब्ध हो जाएगी | कामना समाप्त होने से अर्थ कामना पूरी होना नहीं है बल्कि मन में कामना का जन्म न लेने से है | कामना किसी की भी और कभी भी पूरी नहीं हो पायी है क्योंकि कामनाओं का कभी अंत आता ही नहीं है | एक कामना पूरी होने को होती है कि उससे पहले ही मन में दूसरी कामना का अंकुर फूटने लगता है |

            जीवन में ‘मेरा’ और ‘मेरे लिए’ में जब भी बाधा उत्पन्न होती है, तब मन बड़ा क्षुब्ध हो जाता है | दुखी मन से हमारे ‘मैं’ को बड़ी ठेस लगती है | ‘मैं’ का अर्थ है, अहंकार | अहंकार के कारण ही मनुष्य जीवन में सुखी-दुखी होता रहता है क्योंकि जिसका ‘मैं’ जितना बड़ा होता है उसका ‘मेरा’ और ‘मेरे लिए’ भी उतना ही विस्तृत हो जाता है | हमारा स्वरुप ‘मैं’ विहीन है | ‘मैं’ है तब तक अहम् संसार के साथ बंधा है | अहम् को संसार से मुक्त करते ही ‘मैं’ भी गिर जाता है फिर जो शेष रहता है, वह हमारा स्वरुप है | अहम् खंडित नहीं है, अहम् तो एक ही है | जब वह जगत के साथ तादात्म्य स्थापित कर लेता है तब मूल अहम् (स्वरुप) को भूल जाता है | संसार से सम्बन्ध विच्छेद होते ही अहम् भी अपने मूल स्वरुप को प्राप्त कर लेता है |

            सत्ता कभी भी दो नहीं होती | अहम् जब संसार से योग कर लेता है तब वह उसी को सत्तावान समझ बैठता है | वह भूल जाता है कि दिखलाई पड़ने वाली संसार की सत्ता तभी तक है जब तक वह (संसार) स्वयं किसी सत्तावान पर आश्रित है |

           अहम् के संसार से दूर होते ही वह अपने मूल स्वरुप को प्राप्त कर लेता है | जैसा कि मैंने कहा है कि सत्ता सिर्फ एक की रहती है और जो सत्तावान का स्वरुप है, वही हमारा स्वरुप है | इससे सिद्ध होता है कि सत्तावान और हमारे में कोई अंतर नहीं है | इस प्रकार यदि हम प्रकृति के पीछे की सत्ता को देखें तो हमें एक वही सत्तावान नज़र आएगा | मूल बात यह है कि सर्वत्र सत्ता केवल उसी की है, जिसे परमात्मा कहा जाता है | जो कुछ भी हमारी दृष्टि से देखने में आता है अथवा हमारी दृष्टि से परे है, सबमें समान रूप से एक परमात्मा ही व्याप्त है |

               परमात्मा, जिसके आदि और अन्त का हम पता नहीं लगा सकते क्योंकि वह अनादि है, अनन्त है; सृष्टि में समभाव से उसकी उपस्थिति को हमें अनुभव करना है | जिसको इस बात का अनुभव हो जाता है वह परमात्मा की पराभक्ति को प्राप्त हो जाता है | फिर वह सदैव प्रसन्न रहता है, न तो किसी से अपेक्षा करता है और न ही उसको कभी कोई शोक होता है | भक्ति की पराकाष्ठा ही पराभक्ति कहलाती है | पराभक्ति का अर्थ है, आपका शरीर सहित परमात्मा से योग हो जाना | फिर शरीर के समाप्त होने तक ही आप भक्त रहते हैं, शरीर के छूटते ही आप स्वयं ही परमात्मा हो जाते हैं |

               क्यों आवश्यक है – परमात्मा को सभी प्राणियों में समभाव से स्थित देखना ?क्योंकि मनुष्य के अहम् को संसार से मुक्त करने के लिए ऐसा देखना आवश्यक है, परन्तु ऐसा देखना किसी प्रकार की जोर जबरदस्ती से नहीं हो सकता | इसके लिए सतत सत्संग और गुरु के सानिध्य की आवश्यकता होती है | ये तभी उपलब्ध होते हैं जब परमात्मा के प्रति  हमारी पूर्ण श्रद्धा हो और साथ ही पूर्ण विश्वास भी हो |

              परमात्मा के प्रति श्रद्धा और विश्वास को दृढ़ता मिलती है सत्संग से | कुसंग व्यक्ति के विवेक को जाग्रत नहीं होने देता और परमात्मा से वह सदैव विमुख ही बना रहता है | सत्संग भी हरि-कृपा से मिलता है | सत्संग आपको आदर्श गुरु के दर तक ले जाता है | गुरु के प्रति उतनी ही श्रद्धा होनी चाहिए जितनी परमात्मा के प्रति होती है क्योंकि परमात्मा के द्वार की कुंजी गुरु के पास ही रहती है | हम शास्त्र पढकर ज्ञानी तो हो सकते हैं परन्तु उस ज्ञान का सदुपयोग नहीं कर सकते | ज्ञान के सफल क्रियान्वन के लिए गुरु ही हमें मार्गदर्शन देता है |

             गुरु के निर्देशन में आप उस भाव को प्राप्त हो जाते हैं, जिसके कारण आपको जगत में केवल और केवल एक परमात्मा की अनुभूति होने लगती है | इस अनुभूति से आपकी दृष्टि में अपने और और पराए का भेद मिट जाता है | इस भेद के समाप्त होते ही सारे राग-द्वेष आदि समाप्त हो जाते हैं | काम, क्रोध, मद, लोभ, राग और द्वेष नामक जो षट्विकार हैं, वे अहम्  में पैदा होते हैं और तभी तक माने जाते हैं, जब तक संसार के साथ हमने अपना सम्बन्ध मान रखा है |

         वास्तव में देखा जाये तो हम संसार के साथ किसी भी प्रकार से सम्बंधित नहीं है | केवल छद्म सुख मिलने की सम्भावना के आधार पर हम इस संसार को अपना मान बैठे हैं | वास्तविक सुख संसार से कभी मिल नहीं सकता | संसार के साथ मान लिए इस सम्बन्ध के कारण ही हम सुखी दुखी होते रहते हैं और समस्त विकारों को अपने में होना मान लेते हैं | वास्तव में हम विकार रहित ही हैं | हमें विकार रहित होना नहीं है और न ही विकार रहित होने के लिए किसी प्रकार का कोई प्रयास करना है | हमें केवल संसार के साथ माने गए सम्बन्ध का त्याग करना है |

            संसार के साथ सम्बन्ध रखने से ही राग-द्वेष पैदा होते हैं | राग-द्वेष का जनक काम है | हमारी कामना पूरी होती है तो राग पैदा होता है और कामना किसी कारण से पूरी नहीं हो पाती तो उन कारणों के प्रति द्वेष पैदा होता है | काम और राग द्वेष के मध्य जो तीन विकार हैं, वे क्रोध, लोभ और मद है | मद अर्थात अहंकार, जो हमारे संसार के साथ बने सम्बन्ध को पुष्ट करता है | क्रोध काम की पूर्ति में बाधा लगने से उत्पन्न होता है और कामना पूरी होने के कारण नई और अधिक चाह का जन्म लेना ही लोभ है |

               अंततः कामना ही मूल कारण बनती है, स्वरुप को विस्मृत करने में | इसके लिए हमें संसार से दृष्टि हटानी होगी | संसार से जीवन में कभी भी कोई मनुष्य संतुष्ट नहीं हुआ है | जीवन में जो मिला है उसमें संतोष कर लेना नई कामनाओं को पैदा होने से रोकता है | इसलिए सबसे आवश्यक है- संतुष्टिपूर्ण जीवन | संतोष कर लेना एक साधारण बात है | जीवन में जो मिला है, वह परमात्मा का प्रसाद है और जो नहीं मिला है वह हमारे जीवन के लिए आवश्यक नहीं है – ऐसा मानना ही हमें संसार से मुक्त करता है |

          जीवन में संतोष का भाव तभी आएगा जब नई नई कामनाओं के जन्म लेने पर अंकुश लगे | इसके लिए हमें अपने अहंकार को समाप्त करना होगा | कामना की पूर्ति ही अहंकार को जन्म देती है | कामनाएं मन में तभी नहीं उठेगी जब हम जीवन के इस सत्य को समझ लेंगे कि जो कुछ भी इस जीवन में मिलता है, वह हमारे पूर्व मानव जीवन के कर्मों का प्रारब्ध है | उस प्रारब्ध से अधिक अथवा कम हम प्राप्त नहीं कर सकते | यह विचार आते ही मन में संतुष्टि के भाव प्रकट होने लगते हैं | संतोष ही हमें जीवन में वास्तविक सुख देता है | संतोष के धारण करते ही फिर मन में नई कामनाओं का जन्म लेना असंभव हो जाता है |

          प्रारब्ध पर विश्वास रखना भी ज्ञान है । यह ज्ञान हमें सकाम कर्म की ओर नहीं ले जा सकता | जीवन है तब तक शरीर भी है | जीवन में इस शरीर से कर्म भी होंगे | संतोषी जीव अपने लिए कोई कर्म नहीं करता क्योंकि वह प्रारब्ध पर विश्वास करता है | ऐसे में उससे जो भी कर्म होंगे वे सभी निष्काम कर्म और दूसरों की भलाई के लिए ही होंगे | ज्ञान हो जाना, इससे ही सिद्ध होता है कि मनुष्य सभी प्राणियों में स्वयं को देखने लगता है | फिर वह स्वार्थवश कोई कर्म नहीं कर सकता |

         परमात्मा को समभाव से सभी प्राणियों में देखने का अर्थ हुआ कि न तो कोई अपना है और न ही कोई पराया | ऐसे जीवन में स्वार्थ का कोई स्थान नहीं रहता है | सभी से प्रेम और सभी का हित करना ही इस मनुष्य जीवन का उद्देश्य बन जाता है | इस अवस्था तक मनुष्य के जीवन को ले जाना ही हमारा उद्देश्य होना चाहिए, तभी हमें परमात्मा की भक्ति प्राप्त हो सकती है |

                    जितना अभी तक विवेचन हुआ है, उसमें मुख्य बात निकल कर आती है, वह है- सांसारिक अहम् का सक्रिय होना | इस अहम् को संसार से मुक्त कर परमात्मा की तरफ उन्मुख करना ही जीवन का उद्देश्य है | अहम् संसार के साथ तादात्म्य स्थापित कर लेता है, तब वह अपने मूल स्रोत से भटक जाता है, यह बात शतप्रतिशत सत्य है | परन्तु मुख्य प्रश्न अभी भी हमारे समक्ष मुंह बाए खड़ा है कि संसार से तादात्म्य से इस अहम् को मुक्त कैसे करें ? अहम् जो इस संसार में रच-बस चूका है, उसके पीछे का कारण हमें जानना होगा |

            संसार का संग अहम् इसलिए कर लेता है क्योंकि वह विषयों और इन्द्रियों के संयोग से मिलने वाले सुख से प्रभावित हो जाता है और यह मानने लगता है कि जो सुख है वह इस संसार में ही है | इसको संसार से मुक्त करने के लिए हमारे समक्ष दो उपाय हैं, जिसके अनुसार आचरण करें तो अहम् सुगमता से इस संसार से मुक्त हो सकता है | प्रथम उपाय – विषय और इन्द्रियों का संयोग ही न होने दें | संसार में विषय-रस बिखरे पड़े हैं और वे शरीर की इन्द्रियों के साथ संयोग करने के लिए सदैव आतुर रहते हैं | हमें विषय-रस के प्रति सचेत रहना होगा जिससे वे हमारी इन्द्रियों के साथ संपर्क तक नहीं कर सके | इस उपाय का पालन करना बड़ा ही कठिन है क्योंकि प्रकृति ने हमारे शरीर और विषय-रस की रचना ही इस प्रकार की है कि न चाहते हुए भी कभी न कभी हम उनके संपर्क में आ ही जाते हैं | इसीलिए मैंने विषय-रस और इन्द्रियों के संयोग की अवस्था में सावचेत रहने का कहा है ।

            अहम् को संसार से मुक्त करने का दूसरा उपाय है – मन पर नियंत्रण करना | मन पर नियंत्रण करने से हम उन विषयों और इन्द्रियों के संयोग से मिलने वाले रस के प्रति आसक्त नहीं होंगे | आसक्ति के कारण ही जीवन में हम उसी रस के बार-बार मिलने की कामना करते हैं | इन कामनाओं के कारण सदैव असंतुष्ट ही बने रहते हैं | असंतुष्ट व्यक्ति कभी शांति को उपलब्ध नहीं हो सकता | इसके लिए हमें जो भी विषय-रस इन्द्रियों के माध्यम से प्राप्त होते हैं, उनसे सुख नहीं लेना है |

         प्रत्येक विषय-रस एक प्रकार का छद्म सुख देने वाला होता है | इस इन्द्रिय रस की सबसे बड़ी विशेषता यह होती है कि प्रायः ये सभी रस पहले तो सुख देने वाले होते हैं परन्तु अंत में सभी दुखदायी सिद्ध होते हैं | इसलिए जो भी भोग हमें इन्द्रियों और विषयों के संयोग से मिलते हैं, उनको त्यागपूर्वक भोगना चाहिए | त्यागपूर्वक भोगने का अर्थ है उनको अनासक्त होकर भोगना | जब अनासक्त होकर भोगते हैं तो फिर दुःख मिलने की कोई सम्भावना नहीं रहती | हमारे जीवन में दुःख का सबसे बड़ा कारण यही है कि जो कुछ भी हमें मिला है, वह या तो सदैव के लिए हमारे पास ठहरता नहीं है या फिर जो मिला है उसको हम स्वयं के लिए अपर्याप्त मानते हैं | इसके लिए हम फिर संग्रह में लग जाते है जिससे भोग अधिक समय तक ठहरें और कभी भी उनकी कमी न हो |

           संग्रह का अर्थ है परिग्रह | जितना अधिक संग्रह होगा हमारा उतना ही सांसारिक मान-सम्मान होगा और हमारे भीतर अहंकार और अधिक बलवान होता जायेगा | इसीलिए कहा जाता है कि अगर आप एक बार भोगों के चक्कर में पड़ गए तो फिर उस चक्रव्यूह से निकलने का कोई मार्ग नहीं रह जाता है |

          इस प्रकार अहम् को संसार से मुक्त करने के लिए जिन दो उपायों की चर्चा हमने की है, उससे हमारे गुणों में परिवर्तन होता है | अंततः सात्विक गुण शेष दो गुणों राजसिक और तामसिक गुणों को दबाकर बढ़ने लगता है | अगर इतना सब इस मनुष्य जीवन में कर लें तो फिर अहम् को शरीर (संसार) से मुक्ति मिल सकती है | सत्व गुण ही इस शरीर में सर्वोच्च अवस्था है | सत्व गुण की ऊंचाई तक पहुंचा व्यक्ति एक छलांग लगाकर गुणातीत हो सकता है | इस छलांग में सहायक होते हैं – गुरु | जिस प्रकार राजसिक और तामसिक गुण व्यक्ति को सुख प्रदान करते हैं उसी प्रकार सात्विक सुख का भी मनुष्य सुख लेने लग जाता है | गुरु इस सुख को भी जीवन का वास्तविक सुख नहीं बताते हैं | वास्तविक सुख तो गुणातीत होने में है | गुणातीत मनुष्य को कोई भी गुण और उनसे होने वाली क्रियाएं प्रभावित नहीं करती |

                        राजसिक गुण की अवस्था में जो मनुष्य क्रिया को (कर्म) अपने द्वारा ‘करना’ मानता है वह सात्विक गुण की अवस्था में आकर क्रिया को प्रकृति द्वारा ‘होना’ मानने लगता है | जबकि गुणातीत मनुष्य केवल ‘है’ को मानता है अर्थात जो कुछ भी प्रकृति के गुणों द्वारा क्रिया हो रही है, उसके पीछे जो है, उस ‘है’ को मानता है | इस प्रकार गुणों से गुणातीत तक पहुँचने की यात्रा मनुष्य के लिए ‘करने’ से ‘होने’ होते हुए ‘है’ तक पहुँचने की यात्रा है | जब ‘है’ तक की यात्रा पूरी हो जाती है तब जीवन में शांति का प्रादुर्भाव होता है क्योंकि जब केवल ‘है’ ही तो फिर कोई दूसरा कैसे हो सकता है | फिर तो सभी ओर एक वही है- प्रत्येक प्राणी शरीर के रोम रोम से लेकर सृष्टि के प्रत्येक कण कण तक में | इसीलिए मन की खटपट तभी मिट सकती है जब मन इस प्रकार से शुद्ध हो जाये कि कोई दूसरा दिखे ही नहीं | फिर ऐसे मन और परमात्मा में कोई भेद नहीं रह जाता है |                 

       ‘करना’ से ‘होना’ की अवस्था को प्राप्त करना ज्ञान के कारण ही संभव होता है | मनुष्य को जब ज्ञान हो जाता है तब वह समझ जाता है कि सभी क्रियाएं जो इस प्रकृति (शरीर) में हो रही है, वह गुणों के कारण ही होना संभव हो पा रही है | इनके होने में मनुष्य की स्वयं की कोई भूमिका नहीं है | परन्तु जब भक्ति का प्रादुर्भाव होता है, तब यह ‘होना’ भी ‘है’ में बदल जाता है | भक्ति में केवल एक भगवान् को ही माना जाता है, किसी अन्य का आस्तित्व भी उस परमात्मा के कारण ही होता है, ऐसा माना जाता है | फिर प्रकृति और परम का भेद मिट जाता है और एक ‘है’ के सिवाय किसी का अस्तित्व नहीं रहता | यह भक्ति-योग है |

           जब सब कुछ ‘है’ ही है तो फिर ‘होने’ और ‘करने’ का प्रश्न ही नहीं उठता | सारा संसार ही परमात्मा हो जाता है और मनुष्य मनुष्य में भेद की बात तो छोड़ दीजिये, जड़-चेतन तक का भेद मिट जाता है | वास्तव में देखा जाये तो जड़ हो अथवा चेतन, मनुष्य हो अथवा कोई अन्य प्राणी आपस में भिन्न भिन्न प्रतीत भले ही हो रहे हों, ‘है’ के स्तर पर भिन्न कुछ भी नहीं है | जब तक मन में भिन्नता रहेगी तब तक ‘करना’ कभी भी मिटेगा नहीं और न ही ‘वासुदेव सर्वम्’ का बोध होगा | इस बोध तक पहुँचने के लिए ज्ञान को आत्मसात करते हुए ‘करने’ को ‘होने’ में बदलना होगा और ‘समः सर्वेषु भूतेषु’ को मानते हुए आगे बढ़ना होगा | तभी हम पराभक्ति को प्राप्त होंगे |

                   ब्रह्मभूत का अर्थ है – जो अभी शरीर की अवस्था में है और ब्रह्म होने की अवस्था से कुछ कदम दूर है परंतु ब्रह्म हुआ नहीं है | उसका अंतःकरण निर्मल हो गया है, इतना निर्मल की स्वयं में और किसी अन्य प्राणी में कोई अंतर उसकी दृष्टि में नहीं है | भला ऐसा ब्रह्मभूत क्यों तो प्रसन्न नहीं होगा, क्यों उसके मन में कोई कामना शेष रहेगी और क्यों उसे किसी बात का दुःख होगा ?

            पूर्व में हमने संयोगजन्य सुख की बात की थी |देखा जाय तो मन वास्तव में अहम् का ही विस्तार है | अहम् जब प्रकृति से सुख लेना प्रारम्भ करता है तभी वह उसके साथ तादात्म्य स्थापित कर लेता है | यह सुख बिना किसी संयोग के मिल नहीं सकता, इसीलिए इस सुख को संयोगजन्य सुख कहा जाता है | संयोगजन्य सुख ही अहम् के इस सांसारिक/शारीरिक संग का कारण बनता है | संयोग जनित सुख अर्थात जो सुख किसी दो के एक साथ मिल जाने से उपलब्ध होता है | यह दो का संयोग है – विषय और इन्द्रिय का | जब तक विषय का संयोग किसी इन्द्रिय के साथ नहीं होता तब तक मनुष्य को उस विषय का ज्ञान नहीं हो सकता |

            जब जीवन में प्रथम बार विषय का इन्द्रिय के साथ संयोग होता है तब जो सुख हमें अर्थात अहम् को मिलता है वह मन के माध्यम से मिलता है | बिना किसी विषय को अनुभव करे मन में कोई विकार (काम, क्रोध, लोभ, मद, राग-द्वेष आदि) नहीं आ सकता | कहने का अर्थ है कि जीवन की प्रारम्भिक अवस्था में मन एकदम निर्मल होता है और उसके विकारग्रस्त होने का कारण यह संयोजन्य सुख ही बनता है | विकाररहित मन और अहम् में कोई अंतर नहीं है | दूसरे शब्दों में कहा जा सकता है कि शुद्ध मन अहम् में विलीन हो जाता है |

               प्रश्न उठता है कि विषय और इन्द्रिय के संयोग को रोक लेने से क्या अहम् संसार से मुक्त हो सकता है ? मन और अहम् का संग ही हमारे सांसारिक बंधन का कारण है | अतः मन को निर्मल करने से अहम् का संसार से मुक्त होना संभव हो सकता है | मन को विकाररहित भी रखा जा सकता है और उसे विकारों से मुक्त भी किया जा सकता है |

        मन को विकारों से मुक्त करने के लिए क्या इन्द्रिय और विषय के संयोग को रोका जा सकता है ? इस प्रश्न पर विचार करने से यह कार्य असंभव सा प्रतीत होता है | कारण – प्रथम तो संसार में विषय और इन्द्रिय एक दूसरे के लिए ही बने हैं और इनका संयोग संसार में रहते हुए होना अवश्यम्भावी है | दूसरा कारण – प्रकृति के समस्त भूत शरीर कर्म के अधीन है अर्थात प्रारब्ध के कारण प्रत्येक प्राणी को अपने कर्मों के अनुसार विषयों को और कर्मफल को भोगना ही पड़ता है | ये भोग तभी उपलब्ध होंगे, जब विषयों का संयोग इन्द्रियों के साथ होगा | प्रकृति का यह शाश्वत नियम है और इस नियम से परे परमात्मा द्वारा धारण किया हुआ शरीर भी नहीं है ।

            इस प्रकार यह स्पष्ट होता है कि विषय और इन्द्रिय का संयोग होना तो अवश्यम्भावी है | ऐसे में मनुष्य केवल अपने स्तर पर इतना ही कर सकता है कि वह उस संयोग से उत्पन्न हुए सुख के साथ अपना सम्बन्ध नहीं बनाए अर्थात इस संयोग जनित सुख का आनंद तो ले परन्तु बार-बार वही सुख मिलने की कामना न करे | इस प्रकार मिले हुए विषय-भोग को उपनिषद् में अनासक्त रहते हुए त्यागपूर्वक भोगना कहा गया है |

           बात घूमफिरकर वापिस कामना पर आ टिकती है | कामना मन में उठती है और काम के लिए ही मन के साथ अहम् हो जाता है । मन के साथ अहम् होने का अर्थ हुआ कि हम स्वयं को ही शरीर मान बैठे हैं | अहम् को मन से मुक्त करने के लिए मन को निर्मल करना होगा। मन को निर्मल करने का एक उपाय तो हुआ - प्रत्येक विषय को त्यागपूर्वक भोगना और दूसरा उपाय है कामना को मन में जन्म ही न लेने देना | दोनों ही उपायों से मन को विकाररहित कर निर्मल बनाया जा सकता है । निर्मल मन और अहम् का वास्तविक स्वरुप एक ही है । निर्मल मन और परमात्मा में भी कोई अंतर नहीं है |

           इतने विवेचन से निष्कर्ष निकलता है कि शुद्ध मन, अहम् और परमात्मा एक ही हैं | ये सभी एक ही हैं तो फिर अलग अलग नाम से क्यों कहे जाते हैं ? परमात्मा निर्गुण निराकार है | सगुण साकार होते ही वह अवतार कहलाता है | सगुण साकार होते हुए भी हमें जीव कहा जाता है,परमात्मा क्यों नहीं कहा जाता ? हमें परमात्मा न कहकर जीव कहा जाता है क्योंकि हमारा मन शुद्ध नहीं है ।मन के शुद्ध न होने का कारण है कि हम अपने पूर्व मनुष्य जीवन की कामनाएं और कर्म मन में साथ लेकर आए हैं। अहम् परमात्मा का अंश है और उसमें जीवभाव मन के कारण ही है | 

       मन शुद्ध अहम् ही है परन्तु संसार का संग कर लेने से ही वह जीव बन गया है | वास्तव में जीव भी परमात्मा का अंश है परन्तु मन के माध्यम से सांसारिक सुख में डूबकर वह अपने आपको संसार ही मानने लग गया है | इस सांसारिक अहम् को जीवभाव से मुक्त करते ही वह भी साक्षात् परमात्मा हो जायेगा ।

               अहम् को जीवभाव से मुक्त करने के लिए कई उपाय इस श्रृंखला के माध्यम से बताने का प्रयास किया है | किसी भी एक उपाय से आप इसको संसार से मुक्त कर सकते हैं | सभी भूतों में सम भाव से स्थित परमात्मा को देखना इसका सर्वोत्तम उपाय है | ऐसा देखना केवल ज्ञान और भक्ति के माध्यम से ही हो सकता है |

        ज्ञान के माध्यम से कर्म-योग फलित होता है और भक्ति के माध्यम से ज्ञान और कर्म –योग दोनों | कर्म, ज्ञान और भक्ति तीनों आपस में सम्बंधित है और एक दूसरे के सहयोगी भी | अंततः जो उपलब्धि होती है वह है आत्म स्वरुप की स्मृति | जब यह स्मृति पुनः प्राप्त होती है, तब अनुभव होता है कि इतने वर्षों तक व्यर्थ में ही बार-बार विभिन्न शरीर लेते हुए संसार में भटकते रहे हैं | जिसकी खोज में हम बाहर भटक रहे थे वह स्वयं अपने भीतर ही मिल जाता है और जब उस भीतरी तत्व के दिव्य-दर्शन होते हैं तब समस्त संसार ही परमात्मामय हो जाता है |  आपके भीतर बैठा परमात्मा आपके समक्ष प्रकट होकर सारे संसार में आपको दिखलाई पड़े, ‘समः सर्वेषु भूतेषु’ श्रृंखला का एकमात्र यही उद्देश्य है |

           संसार में हमारी भौतिक दृष्टि जहाँ तक पहुँचती है और उस दृष्टि से परे भी, जहाँ तक हमारी कल्पना उड़ान भर सकती है, एक परमात्मा के अतिरिक्त अन्य कोई नहीं है | कहने को तो यह ज्ञान-मार्ग है जोकि हमें संसार से मुक्त करता है | कर्म-मार्ग और भक्ति-मार्ग भी हमें संसार के बंधनों से मुक्ति दिलाते हैं परन्तु ज्ञान हो जाने के बाद ही वे फलीभूत होते हैं | ज्ञान से कर्म-योग और भक्ति-योग दोनों ही सध सकते हैं | इसका अर्थ यह नहीं है कि भक्ति-योग में ज्ञान नहीं हो सकता | ज्ञान उसमें भी होता है तभी तो जितने भी भक्त आज तक हुए हैं, वे सभी तत्व-ज्ञानी हुए हैं |

          कर्म की प्रकृति ज्ञान से परिवर्तित होती है और ज्ञानी भी एक दिन भक्त बनता है | ‘समः सर्वेषु भूतेषु’ श्रृंखला’ वास्तव में परमात्मा का ज्ञान कराती है और उस ज्ञान से ही मनुष्य पराभक्ति को प्राप्त होता है | इस श्रृंखला का सन्देश यही है कि मुक्त होने के लिए सर्वत्र परमात्मा की उपस्थिति का अनुभव होना आवश्यक है | इस प्रकार मुक्त हो जाने के बाद ही परमात्मा की पराभक्ति प्राप्त होती है | फिर व्यक्ति पुनः संसार में नहीं लौटता अर्थात संसार में रहते हुए भी वह संसारी नहीं बनता |

इसी के साथ इस लम्बी श्रृंखला का समापन होता है | बड़े धैर्य के साथ आप साथ में बने रहे इसके लिए आपका आभार |

प्रस्तुति -डॉ. प्रकाश काछवाल

|| हरिः शरणम् ||



Wednesday, December 7, 2022

एक परमात्मा ही है।

 एक परमात्मा ही है

"परमात्मा एक है" और "एक परमात्मा ही है ", इन दो वाक्यों में साधारण व्यक्ति को केवल शब्द विन्यास का अंतर ही दिखलाई पड़ेगा।परंतु गूढ़ दृष्टि से देखें तो अंतर बहुत बड़ा है।"परमात्मा एक है", इसका अर्थ है कि परमात्मा के अतिरिक्त भी कोई अन्य है जबकि "एक परमात्मा ही है", यह वाक्य स्पष्ट करता है कि परमात्मा से भिन्न कोई दूसरा है ही नहीं।

       "परमात्मा एक है", इसको द्वैतवाद कहा जाता है और "एक परमात्मा ही है" वह अद्वैतवाद है। सनातन धर्म की विशेषता है कि वह इन दोनों वाद में विश्वास करता है। यही कारण है कि सनातन धर्म में मतभेद होते हुए भी मनभेद नहीं है। जो सम्प्रदाय "परमात्मा एक है" केवल इसी बात में विश्वास रखते हैं और जो कोई उनके इस कथन में विश्वास नहीं करता, उसके वे पक्के विरोधी बन जाते हैं।आज देश इसी वैचारिक भिन्नता का सामना कर रहा है। इस भिन्नता से उबरने का एक ही रास्ता है कि हम "एक परमात्मा ही है", इस बात को दृढ़ता से स्वीकार करें।

प्रस्तुति -डॉ. प्रकाश काछवाल

।। हरि:शरणम्।।

Tuesday, December 6, 2022

शरीर और साधना

 शरीर और साधना 

क्या साधना के लिए शरीर का स्वस्थ होना आवश्यक है ?

"साधना साधिता पूर्वं सोSधुना नैव सक्षम:।

असमर्थ्यादयं शोक: देहाभिमानमूलक:।।

पहले मैंने साधना संपन्न की किन्तु इस समय मैं असमर्थ हूं। असमर्थता से होने वाला यह शोक देहाभिमानमूलक है।अर्थात् पूर्व में किया अब नहीं कर पा रहा हूं -ऐसे विचार देहाभिमानी को होते हैं। साधक को यह निश्चय करना चाहिए कि मैं देह नहीं हूं। इसलिए मेरा करने न करने से कोई सम्बन्ध नहीं है।"

    स्वामीजी कहते हैं कि मात्र क्रिया से आत्मबोध नहीं होता। अस्वस्थ शरीर के द्वारा जबरदस्ती की जाने वाली क्रियाएं परमात्मा तक पहुंचने में सहयोग प्रदान करने के स्थान पर कई बार बाधक बन जाती है। अपने परम उद्देश्य तक पहुंचने के लिए हमें प्रत्येक क्रिया और कामना का त्याग करना होगा।शरीर से क्रियाएं ही होती है।अतः परमात्मा की प्राप्ति के लिए केवल शरीर का स्वस्थ बने रहना  आवश्यक नहीं है। शरीर भले ही अस्वस्थ रहे परंतु परमात्मा के प्रति लगन में कमी कभी नहीं आनी चाहिए।

प्रस्तुति -डॉ. प्रकाश काछवाल

।। हरि:शरणम्।।

Monday, December 5, 2022

जासु कृपाँ अस भ्रम मिट जाई

 जासु कृपाँ अस भ्रम मिट जाई

      सत्य सदैव के लिए ही सत्य होता है। असत्य चाहे कितनी बार बोल लिया जाए वह कभी भी सत्य नहीं हो सकता।इस संसार में चारों ओर सत्य से प्रतीत होने वाला असत्य बिखरा पड़ा है। यहाँ क्या सत्य है और क्या असत्य, पता लगाना मुश्किल अवश्य है परंतु असम्भव नहीं। 

       कांच के सहस्त्रों टुकड़ों के मध्य पड़ा इकलौता हीरा अपनी चमक को कभी खो नहीं सकता। भ्रम में जीने वाले मनुष्य कांच के टुकड़ों को हीरे समझ बैठे हैं और उनको बीन रहे हैं, उनका संग्रह कर अहंकार से भर रहे हैं परंतु जिस दिन पता चलेगा कि ये केवल कांच के टूकड़े मात्र हैं, तब तक बहुत देर हो चुकी होगी और जीवन के संध्या काल में हाथ मलने के अतिरिक्त कुछ भी नहीं कर पाएंगे।

      हमें इस भ्रम को मिटाना होगा।भ्रम के मिटते ही कांच के टुकड़ों के मध्य पड़े हीरे को पहिचान लेंगे। फिर कांच महत्वहीन हो जाएगा। यह शरीर और संसार के पदार्थ ही कांच है और इनके मध्य पड़ा हीरा परमात्मा है। भ्रम का निवारण होते ही संसार छूट जाएगा और परमात्मा शेष रह जाएंगे।

    इस हीरे की पहिचान कौन कराएगा ? हीरे को कांच के माध्यम से नहीं पहिचान सकते, हीरे की पहिचान स्वयं हीरे से ही हो सकती है। इसी प्रकार परमात्मा की पहिचान केवल परमात्मा ही करा सकता है।उनकी कृपा से ही समस्त भ्रम मिट सकते हैं और हमें आत्म-बोध हो सकता है। बड़ी सूक्ष्मता से इस विषय पर कल से चिंतन करना प्रारम्भ करेंगे, एक नई श्रृंखला "जासु कृपाँ अस भ्रम मिट जाई" में।

           अभी गत दिनों हमने सत और असत पर एक लम्बा विवेचन किया है | इस विवेचन के पश्चात् स्पष्ट हो जाना चाहिए था कि इस संसार में और संसार से परे जो कुछ भी है, एक परमात्मा ही है | परन्तु मनुष्य का कुछ ऐसा ही स्वभाव है कि वह जब पढता और सुनता है, तब तो उसे वह बात उचित प्रतीत होती है परन्तु सांसारिक जीवन के साथ उस बात का सामंजस्य बिठाना उसके लिए कठिन हो जाता है | जब आध्यात्मिक जीवन और सांसारिक जीवन को भिन्न-भिन्न मान लिया जाता है, तब भ्रम की अवस्था पैदा होती है | यही कारण है कि मनुष्य अपने जीवन में शास्त्र, सत्संग और संत-सानिध्य का पूरा लाभ नहीं उठा पाता है |

          सांसारिक जीवन को अध्यात्म से जोड़ देने का एक लाभ अवश्य है, वह लाभ है मनुष्य के जीवन से दुःख का चले जाना | भले ही आपको यह बात जम नहीं रही हो परन्तु यह शत-प्रतिशत सही है | हाँ, हमें अपनी भ्रम की इस दशा को छोड़ना होगा और प्रभु पर असीम श्रद्धा और विश्वास रखना होगा | बिना इसके जीवन में आनंद का आगमन नहीं हो सकता | यह भ्रम कैसे मिटे ? भ्रम के मिटाने में प्रभु की कृपा होना आवश्यक है और यह कृपा हमें परमात्मा पर पूर्ण श्रद्धा और विश्वास रखने से ही प्राप्त होती है |

            जीवन में अध्यात्म मार्ग पर चलने को प्रारम्भ करने से ही भ्रम की स्थिति पैदा होती है, उससे पूर्व नहीं | कारण - जब तक हम नींद में रहते हैं, तब तक हमें देखा जाने वाला स्वप्न ही सत्य प्रतीत होता है परन्तु जब नींद टूटने लगती है और जागृति जीवन में आने लगती है, तब नींद में देखा जा रहा सत्य से प्रतीत होने वाला स्वप्न अथवा जागरण अवस्था में देखा जाने वाला सत्य - इन दोनों में कौन सा वास्तव में सत्य है, इस बात का भ्रम पैदा होना स्वाभाविक है | इसी भ्रम के कारण और निवारण को जानने और समझने का प्रयास हम इस श्रृंखला ‘जासु कृपाँ अस भ्रम मिट जाई’ के अंतर्गत करेंगे ।

        संसार में जितने भी प्राणी हैं, उन्होंने पूर्व मानव जीवन में किये गए कर्मों के अनुसार फल भोगने के लिए भिन्न-भिन्न शरीर धारण किये हैं | उन शरीरों से भोगे जाने वाले भोग समाप्त होते ही शेष बचे कर्मों के भोग भोगने के लिए नए मनुष्य शरीर के साथ इसी संसार में जन्म लेंगे | सभी शरीरों के अंत में मिलने वाले इस मनुष्य शरीर का जीव कितना लाभ उठा पाता है, यह उसके विवेक पर निर्भर करता है | मनुष्य शरीर के मिलने का कारण केवल शेष रहे भोग भोगना ही नहीं है बल्कि परमात्मा के साथ योग करना ही इसका मूल उद्देश्य है | इस स्थिति में आकर मनुष्य अगर पुनः भोगों में आसक्त होकर नए-नए कर्म करने में लग गया तो वह इसी संसार में उलझ कर रह जायेगा और फिर से नए-नए शरीर लेता रहेगा | इस प्रकार वह संसार के आवागमन-चक्र से कभी भी मुक्त नहीं हो पायेगा |

           जीव को मनुष्य जीवन मिलता ही इसलिए है कि वह जन्म-मरण के चक्र से मुक्त हो सके, लेकिन न जाने वह हर बार इस बात को क्यों भूल जाता है ? क्यों वह समझ नहीं पाता कि 84 के आवागमन से छूटना उसके लिए कितना आवश्यक है ? मनुष्य जीवन का उद्देश्य भोगों में आसक्त होना नहीं है बल्कि उस सत्य तक पहुँचना है, जहाँ पहुँच जाने के बाद फिर लौटकर संसार में आना नहीं पड़ता | मनुष्य का सबसे बड़ा भ्रम यही है कि उसने इस शरीर में रहते हुए सांसारिक भोगों को ही सत्य समझ लिया है | वास्तव में देखा जाये तो इन विषय-भोगों का सत्यता से दूर-दूर तक कोई सम्बन्ध ही नहीं है ।

         मनुष्य जब अज्ञान के कारण अपने वास्तविक स्वरुप को भूलकर स्थूल और सूक्ष्म शरीर में अहंबुद्धि कर लेता है तब उसका झुकाव रजोगुण की तरफ हो जाता है | वास्तव में देखा जाये तो अपने शरीर को ही स्वयं का होना मान लेना उसका भ्रम मात्र है | रजोगुण की प्रधानता हो जाने के कारण उसमें विभिन्न संकल्प-विकल्प जन्म लेते हैं और वह अज्ञानी मनुष्य कामनाओं के वशीभूत होकर विषयों को भोगने के लिए विभिन्न प्रकार के कर्म करने लगता है | इस प्रकार बार-बार विषयों का सेवन करने से उसका चित्त/मन विषयों के प्रति आसक्त हो जाता है और विषय भी उसके मन में प्रवेश पा जाते हैं |

         विषय भोगों से मिलने वाला सुख मनुष्य का केवल भ्रम मात्र है | अगर यह सुख ही शाश्वत और सत्य होता तो फिर वही सुख एक दिन दुःख में परिणित क्यों हो जाता है ? संसार में सुख-दुःख दोनों दिन-रात की तरह आते जाते रहते हैं | परन्तु मनुष्य इस भ्रम में जीता रहता है कि यह सुख सदा के लिए रहेगा | इसी भ्रम में वह जीवन भर दुःख का भोग करता है और सुख की प्रतीक्षा |  

        मनुष्य के लिए भ्रम क्या है ? भ्रम किसको कहते हैं ? जो जैसा दिखलाई पड़ रहा है, प्रतीत हो रहा है, अथवा ज्ञानेन्द्रियों के माध्यम से हमें जैसा ज्ञान हो रहा है, वह वास्तव में वैसा न होकर उससे एक दम भिन्न प्रकार का होता है | उसे ही भ्रम होना कहते हैं |

   मनुष्य अपने जीवन काल में सदैव भ्रम में ही जीता रहता है | जिसे वह अपने सगे-सम्बन्धी, पुत्र, पत्नी आदि समझता है, वे सभी स्वार्थ के साथी हैं | जिस दिन उनका स्वार्थ पूरा नहीं होगा और न ही स्वार्थ पूरा होने की आशा रहेगी, उसी दिन वे आपसे दूर हो जायेंगे | सभी सम्बन्ध आपसी स्वार्थ-पूर्ति पर टिके होते हैं | सम्बन्ध में स्वार्थ क्या है ? स्वार्थ है-एक दूसरे के लिए सुख की व्यवस्था करना | मैं जो अपने पुत्र से चाहता हूँ लगभग वैसा ही कुछ पुत्र भी मेरे से पाने की आशा रखता है | जिस दिन किसी एक पक्ष से यह आशा समाप्त हो जाएगी, उसी दिन यह सम्बन्ध भी समाप्त हो जायेगा | सभी आपसी सम्बन्ध अपेक्षाओं पर ही टिके होते हैं और अपेक्षाएं भी केवल एक दूसरे से सुख पाने की रहती है | एक दूसरे से सुख की अपेक्षा करना भी एक प्रकार का भ्रम ही है |

      आधुनिक विज्ञान के अनुसार भ्रम तीन प्रकार का होता है -

        (क) मतिभ्रम (Hallucination) – इस प्रकार के भ्रम में कोई बाहरी कार्य होता ही नहीं है बल्कि केवल उसके होने का भ्रम होता है अर्थात जिसकी प्रत्यक्ष उपस्थिति नहीं होती फिर भी उसके उपस्थित होने का अनुभव करना | दूसरे शब्दों में कहा जा सकता है - बाहरी उत्तेजना की अनुपस्थिति में बन गयी एक धारणा | जैसे व्यक्ति अकेला कमरे में बैठा बोल रहा है अर्थात उसे लगता है जैसे दीवार उससे बातें कर रही है जबकि वास्तव में दीवार बातें नहीं कर रही होती है | दूसरा उदाहरण - जैसे बाज़ार में चलते हुए उसे लगता है कि कोई उसका पीछा कर रहा है जबकि वास्तव में कोई भी उसका पीछा नहीं कर रहा होता है | इसी प्रकार व्यक्ति शांत वातावरण में बैठे कल्पना करता है जैसे घंटियों की आवाज़ उसके कानों में गूंज रही है | महर्षि पतंजलि ने अपने योग-दर्शन में मतिभ्रम को मन की विकल्प वृत्ति बताया है ।

        इस प्रकार पहले प्रकार का भ्रम हुआ – मतिभ्रम | दूसरे प्रकार का भ्रम है – भ्रान्ति |

        (ख) भ्रान्ति (delusion)- इस प्रकार के भ्रम में प्रत्यक्ष रूप से किसी भी बात के बारे में एक गलत धारणा बना ली जाती है | यह भ्रम एक प्रकार का दृढ विश्वास होता है जो तर्कसंगत तर्क के सामने / उसके विरोध में मजबूती से खड़ा हो जाता है | जैसे यह मान लेना कि पृथ्वी समतल यानि चपटी है | अब कोई भी व्यक्ति उसको बताये कि पृथ्वी गोल है, तो वह इस बात को स्वीकार कभी नहीं करेगा | इसी प्रकार एक अन्य भ्रान्ति आजकल लोगों में फ़ैल रही है कि कोरोना का टीका व्यक्ति को नपुंसक बना देता है, जबकि इस टीके का पौरुषत्व से कोई सम्बन्ध ही नहीं है | ऐसी ही कई भ्रांतियां हम जीवन भर अपने मन के भीतर पाले बैठे रहते हैं |

            उपरोक्त दोनों प्रकार के भ्रम मानसिक रुग्णता के अंतर्गत आते हैं जिनकी एक मनोरोग चिकित्सक चिकित्सा कर सकता है | मनोरोग चिकित्सक मतिभ्रम और भ्रान्ति दोनों ही प्रकार के भ्रम का उपचार कर सकता है | परन्तु तीसरे प्रकार के भ्रम की चिकित्सा कोई गुरु ही कर सकता है क्योंकि इसकी कोई औषधि नहीं है | अतः यह तीसरी प्रकार का जो भ्रम है वह वास्तव में सही रूप से भ्रम कहलाने योग्य है | किसी भी साधारण और भले-चंगे मनुष्य को भी इस प्रकार का भ्रम हो सकता है | इस भ्रम का उपचार किसी औषधि से नहीं होता बल्कि केवल ज्ञान से ही इसका निवारण संभव है |

         तीसरी प्रकार का जो भ्रम है, उसको जानना बड़ा ही महत्वपूर्ण है | अध्यात्म में इसी भ्रम का महत्त्व है क्योंकि यह भ्रम बिना ज्ञान के मिटता नहीं है | आइये ! इस भ्रम को भी जान लेते हैं |  

        (ग) भ्रम (Illusion)- इस प्रकार के भ्रम में बाहर प्रत्यक्ष रूप से कोई न कोई वस्तु अवश्य ही उपस्थित होती है परन्तु उसका अनुभव हमारी ज्ञानेन्द्रियों द्वारा कुछ भिन्न प्रकार से कर लिया जाता है | दूसरे शब्दों में कहा जा सकता है कि इस प्रकार के भ्रम में बाहरी उत्तेजना की उपस्थिति में हमारी इन्द्रियों द्वारा उसकी गलत व्याख्या कर ली जाती है | जैसे कमरे में पड़ी रस्सी को सांप समझ लेना | इसमें रस्सी बाहरी उत्तेजना है | रात को सूनसान क्षेत्र से अँधेरे में हवा से हिलते हुए आक के पौधे को कोई मनुष्य अथवा भूत समझ लेना | यहाँ आक का पौधा बाहरी उत्तेजना है | महर्षि पतंजलि ने अपने योगदर्शन में इस भ्रम को मन की विपर्यय वृति कहा है |

            भ्रम की जो तीन अवस्थाएं बताई हैं, वे सब ‘माया’ के अंतर्गत आ जाती है | माया को ही हम सत्य समझ लेते हैं, अतः माया भी एक भ्रम हुई | माया का ज्ञान हमारे शरीर और इन्द्रियों के माध्यम से होता है | माया भ्रम इसलिए हो जाती है क्योंकि हमें जो दिखलाई पड़ रहा है, उसको ही हम सत्य समझ लेते हैं | माया शाश्वत नहीं है | उसका एक दिन विलीन हो जाना निश्चित है | यह संसार और शरीर, सब कुछ माया के अंतर्गत है | संसार को ही सत्य समझ उसमें आसक्ति कर लेने के कारण ही हम सत्य से दूर हो जाते हैं | असत को सत मान लेना ही हमारा भ्रम है |

        असत संसार को ही सत मान लेना हमारा भ्रम है | इसीलिए इस संसार को ‘माया’ कहा गया है | माया अर्थात भ्रम, जो दिखलाई तो अवश्य ही दे रही है और दिखने के कारण हमें वह सत्य भी प्रतीत हो रही है परन्तु वास्तव में वह सत्य है नहीं |

          इस संसार में चारों और आकर्षण ही आकर्षण भरे पड़े हैं जो प्रतिपल मनुष्य को अपनी ओर आकर्षित करने में लगे हुए हैं | इस प्रकार के आकर्षण में फंसने को ही आसक्त होना कहते हैं | जब हमें भूख लगती है तब हम भोजन की ओर आकर्षित होते हैं और जब प्यास लगती है तो जल की ओर | जब किसी भी प्रकार भूख मिटे तब तक तो ठीक है परन्तु भूख मिटाने के लिए हमें विशेष प्रकार के व्यंजन ही चाहिए, ऐसी कामना रखना ही मनुष्य को उन पदार्थों के प्रति आसक्त कर देता है |

            मनुष्य जीवन की यह सबसे बड़ी विडंबना है कि उसकी भूख-प्यास कभी मिटती नहीं है | भूख-प्यास भी एक प्रकार की नहीं है | जितनी हमारी ज्ञानेन्द्रियाँ है, उतनी प्रकार की ही हमारी भूख है | नाक की भूख गंध है | मनुष्य प्रतिपल सुगंधित वातावरण में ही रहना चाहता है | कान की भूख शब्द है | उसके माध्यम से मनुष्य प्रत्येक समय अपनी प्रशंसा और अन्य की आलोचना ही सुनना चाहता है | आँख की भूख सुन्दरता है | मनुष्य सदैव ही सुन्दर वस्तु की चाहना करता है | हमारी जीभ सदैव ही स्वादिष्ट भोजन की कामना करती है | त्वचा की भूख तो सबसे बड़ी भूख है | इसके माध्यम से मनुष्य सदैव स्पर्श सुख में खोया रहना चाहता है |

           ज्ञानेन्द्रियों के माध्यम से जो कुछ भी हम ज्ञान प्राप्त कर रहे हैं, वह वास्तव में असत का ज्ञान है | असत का ज्ञान वास्तविक ज्ञान न होकर अज्ञान है | आधुनिक विज्ञान के अनुसार सभी ज्ञानेन्द्रियों का विकास चर्म से ही हुआ है | इसीलिए कहा जाता है कि चर्म से बनी इन पाँचों ज्ञानेन्द्रियों के माध्यम से मनुष्य सभी समय चर्म-सुख में खोया रहना चाहता है | इन इन्द्रियों से मिलने वाला सुख वास्तव में सुख नहीं है | अतः ‘इन्द्रियों से सुख प्राप्त होता है’ यह मान लेना हमारा भ्रम ही है |

           भ्रम मनुष्य में पैदा होता है, परमात्मा की बनाई इसी माया के कारण | हाँ, यह माया भी प्रभु की है | प्रभु की इस माया को जो समझ जाता है वह इस माया के पार चला जाता है | माया से पार जाने के लिए हमारे सभी भ्रम मिटने आवश्यक है | इसलिए सर्वप्रथम माया को जानना आवश्यक है | यह सत्य है कि परमात्मा ने इस सृष्टि की रचना की है | जीव का शरीर बनाने के बाद वह स्वयं अंतर्यामी रूप से उसमें प्रवेश करता है | प्रवेश करने के पश्चात् वह सबसे पहले अपने आप को ही एक मन के रूप में और बाद में दस इन्द्रियों के रूप में विभक्त कर लेता है | इस अवस्था में आकर अब वह एक जीव बन गया है जो इस मन और इन्द्रियों के माध्यम से विषयों का भोग करता है |

      जब यह जीव विषय-भोग में रत रहता है तब उसमें संसार के प्रति आसक्ति-भाव पैदा हो जाता है और इस शरीर को ही ‘मैं’, ‘मेरा’ और ‘मेरे लिए’ मानने लगता है | इस प्रकार वह शरीर को ही अपना स्वरुप समझने लगता है और अपने मूल स्वरुप को भूल जाता है | कर्मेन्द्रियों से कर्म करके वह उनके फल रूप में सुख-दुःख भोगता है | परन्तु इन भोगों से वह जीवनभर संतुष्ट नहीं हो पाता | इस प्रकार भोगों से संतुष्टि प्राप्त करने के लिए वह नए-नए शरीरों की यात्रा करता रहता है और संसार में भटकने लगता है | यही भगवान् की माया है |

            मनुष्य जीवन की सबसे बड़ी समस्या यह है कि वह विभिन्न प्रकार के कर्म करता हुआ दुःख से बाहर निकलना चाहता है और सुख को प्राप्त करना चाहता है | वह यह नहीं समझ पाता कि यह सब माया है | वह माया से बाहर आने के लिए विभिन्न प्रकार के सकाम कर्म करता है परन्तु वह यह नहीं जानता कि सकाम कर्म करते हुए माया से पार नहीं हुआ जा सकता |

         यहाँ आकर प्रश्न उठता है कि फिर इस भ्रम से बाहर निकलने का उपाय क्या है ? इस माया से बाहर कैसे निकला जा सकता है ? इस माया से बाहर निकलने के लिए हमें गुरु की शरण में जाना होगा | हमारे गुरु भी ऐसे हों, जो वेदों के पारदर्शी विद्वान, तत्वज्ञानी और अनुभवी हों | गुरु के पास जाकर उनकी निष्कपट भाव से सेवा करें और उनके माध्यम से माया के स्वरुप, इसकी उत्पत्ति और विलयन को समझें | जब आप इस ज्ञान को आत्मसात कर लेंगे तब पहले शरीर और संतान आदि में अपनी आसक्ति छोड़ अनासक्त हो जाएँ | सर्वत्र और सबमें परमात्मा को देखें | अपने धर्म का पालन करें | जो कुछ मिल जाये उसी में संतोष धारण करें | अपनी समस्त इन्द्रियों को स्थिर रखें | केवल एक परमात्मा का ही आश्रय लें | परमात्मा की कृपा से ही हमारे सभी भ्रम मिट पाएंगे और हम उसकी इस माया से पार हो जायेंगे |

         मनुष्य की महत्वपूर्ण आवश्यकताएं रोटी, कपडा और मकान हैं | इसके बाद आता है उसका परिवार | माया के पार जाने के लिए पहले घर छोड़ना पड़ता है | घर छोड़ने से आशय केवल घर का त्याग कर वन अथवा आश्रम में चले जाना नहीं है बल्कि घर में निवास करते हुए उसमें आसक्ति न रखना है | कपडे की आवश्यकताएं भी सीमित की जा सकती है और रोटी की भी | परिवार में आसक्ति छोड़ना तभी सुगम होगा जब रोटी, कपड़ा और घर से हम अनासक्त हो जाएँ | सबसे मुश्किल है, स्वयं के ‘मैं’ होने का अहंकार छोड़ना | अहंकार का परित्याग किये बिना माया से पार नहीं हुआ जा सकता | ‘मैं’ को छोड़ने से ही हम अपने वास्तविक स्वरुप तक पहुंचेंगे अन्यथा नहीं |

             माया से पार हो जाना जितना सरल प्रतीत होता है उतना है नहीं | महान व्यक्ति भी माया से निकलकर पुनः माया में फंस जाते हैं | इसके लिए देवर्षि नारद के जीवन का एक दृष्टान्त देना चाहूँगा | काम को जीत लेने के बाद नारदजी एक बार प्रभु की माया में फंसकर विश्वमोहिनी से विवाह का सपना पाल बैठे थे | उस समय तो श्री हरि ने श्राप लेकर भी उनको माया में फंसने से बचा लिया था | जैसा कि मैंने पहले कहा है , अहंकार का त्याग करना असंभव सा है क्योंकि किसी न किसी बात को लेकर अहंकार अपना फन बार-बार उठाता रहता है | नारदजी को भी तो काम को जीत लेने का अहंकार हो गया था जिसको श्री हरि ने तोडना आवश्यक समझा था | नारदजी द्वापर युग में भी फिर एक बार माया के जाल में फंस गए थे |

            हुआ यूँ कि एक बार नारदजी के मन में विचार आया कि संसार के लोग माया में फंसकर अपना स्वरुप तक भूल जाते हैं | सांसारिक लोग क्यों सब कुछ जानते हुए भी इस माया के वश में हो जाते हैं ? मुझे भी एक बार फिर से माया का साक्षात्कार कर लेना चाहिए | देखता हूँ, माया कैसे मुझे अपने वश में कर लेती है ?

          नारदजी तो तीनों लोकों में निर्बाध घूम सकते हैं, उनके लिए दूर से भी दूर की यात्रा कर लेना असंभव नहीं है | अपनी मन की इच्छा पूरी करने के लिए एक दिन नारदजी पहुँच गए, द्वारकाधीश के यहाँ | द्वारका पहुँचते ही भगवान के समक्ष अपनी इच्छा प्रकट कर दी | भगवान् श्री कृष्ण ने कहा 'त्रिलोकी में घूमते घूमते आप थक गए होंगे, कुछ समय के लिए तनिक विश्राम तो कर लीजिये | माया से सामना तो आपका कभी और किसी दिन भी हो सकता है |' इस प्रकार कई दिन तक नारदजी द्वारका में ही रहे | एक दिन भगवान् ने उनसे द्वारका के बाहर वन-भ्रमण पर चलने का आग्रह किया |

          राजमहल को छोड़कर पैदल ही दोनों (नारदजी और श्री कृष्ण) वन की ओर चल पड़े | वन में टहलते टहलते भगवान् श्री कृष्ण को प्यास लगी | उन्होंने नारदजी को एक पात्र देते हुए कहा – “जाइए पता कीजिये , पास में ही कोई गाँव होगा, वहां जाकर मेरे लिए थोडा सा जल ले आइये | आज मैं कुछ ज्यादा ही थक गया हूँ, इस पेड़ के नीचे जरा विश्राम कर लेता हूँ | आप जल लेकर शीघ्र ही लौट आइए |” नारद मुनि पात्र लेकर जल लेने के लिए वहां से चल दिए | थोड़ी ही दूर चलते ही उन्हें एक गाँव दिखलाई पड़ा |

                नारदजी ने उस गाँव में प्रवेश किया | वे उस गाँव के एक सुन्दर से घर के सामने जा पहुंचे और आवाज देते हुए गृह-स्वामी से जल देने का आग्रह किया | घर का दरवाज़ा खुला और एक अतिसुन्दर कन्या ने मुनि से आने का प्रयोजन पूछा | मुनि नारद तो उसकी सुन्दरता देखकर मुग्ध हो गए | द्वार पर मुनि को अचंभित खड़े देखकर कन्या ने अपने पिता को द्वार पर ही बुला लिया | कन्या के पिता ने आते ही मुनि को प्रणाम किया और आदर सहित घर के भीतर ले गए | उचित आसन देकर गृहस्वामी ने मुनि से आने का प्रयोजन पूछा | नारदजी जल लेना तो भूल गए और सीधे ही कन्या से विवाह करने का प्रस्ताव उसके पिता के समक्ष रख दिया |

          कन्या के पिता ने कहा – “यह कन्या मेरी एक मात्र संतान है | इसके विवाह के लिए मेरी एक शर्त है | आपको विवाह उपरांत यहीं हमारे पास ही रहना होगा |” नारदजी तो कन्या के रूपजाल में गहराई तक उलझ गए थे | भगवान् के लिए जल लेना तो भूल गए और तत्काल ही उस शर्त को स्वीकार कर लिया | इस प्रकार नारदजी और कन्या का विवाह हो गया |

            नारदजी विवाह उपरांत अपनी ससुराल में ही रहने लगे | घर और कृषि का कार्य नारदजी सम्हालने लगे | धीरे धीरे समय बीतता जा रहा था | समय पाकर कन्या के पिता का देहावसान हो गया था | तब तक नारदजी दो बच्चों के पिता बन चुके थे | नारदजी का गृहस्थाश्रम निर्बाध गति से सुखपूर्वक बीत रहा था | तभी एक दिन समय ने करवट ली |

         प्राकृतिक प्रकोप से हो रही अतिवृष्टि ने गाँव को अपनी चपेट में ले लिया | गाँव के प्रायः घर एक-एक कर गिरते हुए खंडहर में बदलते जा रहे थे | नारदजी ने विचार किया कि समय रहते हमें भी इस घर को छोड़ देना चाहिए | उन्होंने अपनी पत्नी का हाथ पकड़ा और दोनों बच्चों को कंधे पर बिठाकर उस गाँव से बाहर निकल आये | सामने उफान मारते नदी बह रही थी | सुरक्षित स्थान की ओर जाने के लिए नदी को पार करना आवश्यक था | हिम्मत कर हाथ पकड़कर नारदजी अपनी पत्नी के साथ धीरे-धीरे नदी को पार करने लगे |

         नदी के तेज बहाव में पहले उनसे अपनी पत्नी का हाथ छूटा और वह तेज जलधारा में बह गयी | फिर एक बालक भी उनके कंधे से फिसलकर नदी में जा गिरा | नदी के बीच पहुंचे ही थे कि दूसरा बच्चा भी नदी की धारा में बह गया | अब स्वयं के प्राण बचाने के लिए नारदजी पूरा जोर लगाकर नदी को शीघ्रता से पार करने का प्रयास कर रहे थे | तभी उनके पाँव भी उखड गए और वे नदी की तेज जल-धारा में बहने लगे | प्राणों की सुरक्षा के लिए वे सहायता के लिए चिल्लाने लगे – “बचाओ ! बचाओ !!” 

         तभी भगवान् श्री कृष्ण ने नारदजी को जोर जोर से हिलाते हुए पूछा – “नारद ! तुम कब आए ? मेरे लिए लाया गया जल कहाँ है ?” सुनकर नारदजी चौंके - “कहाँ गए मेरे बच्चे ? कहाँ है मेरी पत्नी ? ओह सब कुछ एक सपना था, भ्रम था |” प्रभु बोले – “नारद, यही माया है | माया में उतरकर इसको जानने समझने का प्रयास न करो | इसमें उतरोगे तो उलझते जाओगे, इसका आदि-अंत मिलना असम्भव है, फिर बाहर निकलना भी संभव नहीं रहेगा |केवल एक प्रभु की शरण में ही सदैव बने रहो, फिर मेरी यह माया भी तुम्हारा कुछ नहीं बिगाड़ सकेगी |’

            गोस्वामी तुलसीदासजी महाराज, जिन्होने श्री रामचरितमानस जैसे महान ग्रन्थ की रचना की है, वे भी एक बार भ्रम के शिकार हो गए थे | एक बार उनके मन में अपने इष्ट प्रभु श्री राम के दर्शन की प्रबल इच्छा हुई | वे उनके दर्शन करने के लिए जगन्नाथपुरी की ओर चल दिए | मंदिर के सामने भारी भीड़ को देखकर उन्हें बड़ी प्रसन्नता हुई | वे भी भीड़ के साथ दर्शन करने हेतु मंदिर में प्रवेश कर गए | गर्भगृह में मूर्ति की ओर देखते ही उन्हें बड़ी निराशा हुई | उन्होंने सोचा कि ये मेरे इष्ट कैसे हो सकते हैं, इनके तो हाथ भी नहीं है | भला, यह फिर कुछ करते भी कैसे होंगे ? बिना हाथों के तो वे धनुष-बाण कैसे धारण करेंगे ?

             बिना हाथों की प्रभु की मूर्ति को देखकर, तुलसी उन्हें अपना इष्ट स्वीकार करने को तैयार नहीं थे | निराशा का भाव लिए वे दुखी मन से मंदिर के बाहर निकल आये | सूर्य अस्ताचल की ओर चला जा रहा था | सूरज को ढलते देखकर तुलसीदासजी महाराज मुंह लटकाए हुए एक निर्जन स्थान पर जाकर बैठ गए | थके-हारे और भूखे प्यासे गोस्वामीजी को आज अपनी यह यात्रा बड़ी निरर्थक प्रतीत हो रही थी |

           धीरे-धीरे रात गहराती जा रही थी | भूख के मारे तुलसीदासजी महाराज बड़े व्याकुल हो रहे थे | तभी एक छोटा सा बालक एक थाली में भोजन लिए उनके सामने आ खड़ा हुआ | गोस्वामी तुलसीदासजी के पास बैठकर बालक बड़े प्रेम से बोला –‘बाबा, जगन्नाथजी ने आपके लिए प्रसाद भेजा है | ग्रहण कीजिये |’ तुलसीदासजी ने कहा –‘मैं यह प्रसाद नहीं लूँगा, इसे वापिस ले जाइए |’

       गोस्वामीजी तो जगन्नाथ भगवान् की बिना हाथों की मूर्ति देखकर बहुत व्यथित थे | उनके इष्ट तो शस्त्रधारी हैं, भला वे बिना हाथों के किसी अस्त्र-शस्त्र का उपयोग कैसे करेंगे ? भूख तो उनको थी परन्तु उन्होंने मना कर दिया | आहत मन भले ही दिखावे के तौर पर करे, भोजन का बहिष्कार कर ही देता है | बालक ने उनसे एक बार फिर से प्रसाद ग्रहण करने का आग्रह किया | बालक ने कहा – ‘जगन्नाथ का भात, जगत पसारे हाथ’, और आप इस प्रसाद को ग्रहण करने से मना कर रहे हैं | आपकी इनसे ऐसी क्या नाराजगी है, जो आप उनके द्वारा भेजे गए प्रसाद के हाथ तक नहीं लगा रहे हैं ?’ तुलसीदासजी ने कहा –‘मैं अपने इष्ट को भोग लगाये बिना कुछ भी ग्रहण नहीं करता हूँ और जगन्नाथ के जूठे हुए प्रसाद का मैं मेरे इष्ट को भोग नहीं लगा सकता |’

            इतना सुनते ही बालक खिलखिलाकर हंस पड़ा और बोला – ‘यह आपके इष्ट ने ही तो भेजा है |’ तुलसीदासजी तो पहले से ही भीतर भरे पड़े थे | उबल पड़े – ‘बिना हाथ वाला मेरा इष्ट नहीं हो सकता |’

         ‘बिना हाथ वाला मेरे इष्ट धनुर्धारी राम नहीं हो सकते’, इतना सुनते ही बालक ने गोस्वामीजी से मुस्कुराकर पूछा कि फिर आपने श्री रामचरितमानस में उनके स्वरूप का इस प्रकार वर्णन क्यों किया है -

         बिनु पद चलइ सुनइ बिनु काना | 

        कर बिनु करम करइ बिधि नाना ||

         आनन रहित सकल रस भोगी |

          बिनु बानी बकता बड़ जोगी ||

               एक छोटे से बालक के मुंह से इतनी बड़ी बात सुनकर गोस्वामीजी का चेहरा देखने लायक था | वे समझ गए कि यह कोई साधारण बालक नहीं है | “कहीं ये ही तो मेरे ईष्ट नहीं है ? मेरा भ्रम दूर करने के लिए ही तो कहीं ये बालक बनकर नहीं आये हैं ?” उनकी आँखे खुल गयी | उनकी आँखों से लगातार आंसू झरने लगे, मुंह से बोल तक नहीं निकल पा रहे थे |

         बालक ने अपने दोनों हाथों से थाल को उतारकर तुलसीजी के सामने रख दिया और उनके आंसू अपने हाथों से पोंछते हुए बोला – “मैं ही राम हूँ | मेरे इस मंदिर के चारों द्वारों पर हनुमान का पहरा रहता है | विभीषण प्रतिदिन मेरे दर्शन करने को लंका से चलकर आता है | तुम भी सुबह मेरे दर्शन करने आ जाना |’’ इतना कहकर थाली वहीं छोड़ वह बालक अदृश्य हो गया | तुलसीजी इस बात को सुनकर बड़े संतुष्ट हुए | फिर उन्होंने बड़े प्रेम से वह प्रसाद ग्रहण किया |

       बालक द्वारा लाये गए जगन्नाथजी के प्रसाद को ग्रहण करते हुए तुलसीदासजी का रोम-रोम हर्षित हो रहा था | साथ ही मन में बड़ी भारी ग्लानि भी हो रही थी कि मेरे भ्रम का निवारण करने के लिए मेरे इष्ट को मेरे पास बालक बनकर आने का कष्ट उठाना पड़ा | फिर भी ख़ुशी इस बात की थी कि प्रातः मेरे इष्ट उसी मंदिर में दर्शन देकर मुझे कृतार्थ करेंगे | रात भर तुलसीजी के नेत्रों में नींद नहीं थी | राम-राम रटते सुबह हुई | दैनिक क्रियाओं से निवृत होकर तुलसीदासजी महाराज मंदिर की ओर बढे | द्वार पर ही हनुमानजी महाराज ने उनका अभिवादन किया | पलकें झुकाए धीरे-धीरे चलते हुए गोस्वामीजी ने मंदिर में प्रवेश किया |

              मंदिर के गर्भ-गृह के पास पहुंचकर गोस्वामीजी ने अपना सिर ऊपर उठाया और मूर्तियों की ओर देखा | उन्हें पूर्व की भांति जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा की मूर्तियाँ ही दिखलाई पड़ी | तत्काल ही उनका स्थान श्री राम, लक्ष्मण और सीताजी की मूर्तियों ने ले लिया | इस प्रकार तुलसी को अपने इष्ट के दर्शन उन मूर्तियों में हुए | भगवान् ने अपने भक्त का भ्रम दूर करते हुए उनकी इच्छा का पूरा सम्मान किया | तुलसीदासजी भाव विभोर हो गए | उनको समझ में नहीं आ रहा था कि वे अपने इष्ट की स्तुति किस प्रकार करे | देखा जाए तो जो राम है, वही कृष्ण है | दोनों में अंतर कर देना हमारी मानसिक रूग्ण अवस्था को ही प्रदर्शित करता है और केवल इसी कारण से हमें इन दोनों के अलग अलग होने का भ्रम पैदा हो जाता है |

     जहाँ तुलसीदासजी जगन्नाथपुरी में ठहरे थे उस स्थान को ‘तुलसी चौरा’ कहा जाता है | आज के समय वह स्थान तुलसीदासजी की पीठ “बड़छता-मठ” के नाम से प्रसिद्ध है | गोस्वामीजी को भ्रान्ति रुपी भ्रम था कि मेरे इष्ट तो केवल श्री राम ही हैं | वे राम, जो शस्त्रधारी हैं, जो अपने धनुष बाण से निर्बलों की सहायता करते हैं | वे राम जिन्होंने इस धरा को असुरों से मुक्त किया और शरणागत की रक्षा की | परन्तु वे भूल गए कि श्री राम उसी ब्रह्म के अवतार हैं जो ब्रह्म बिना पैरों के ही चलता है, कान न होते ही सुनता है, बिना हाथों के बहुत प्रकार के कार्य कर लेता है, बिना जिह्वा के छहों रस का आनंद लेता है और बिना वाक् इन्द्रिय के बहुत योग्य वक्ता भी है | बिना त्वचा के ही स्पर्श का अनुभव कर लेता है, बिना आँखों के देख भी लेता है और बिना नाक के सब गंधों को ग्रहण भी करता है | वह विभिन्न रूप धारण कर सकता है । अतः जगन्नाथ और श्री राम में कोई भेद नहीं हो सकता | इनमें भेद करना ही हमारा भ्रम है।

          इसी प्रकार हमें भी भ्रम होता है, निर्गुण और सगुण के बारे में | दोनों में कोई भेद नहीं है । भ्रम होता है-इनमें भेद मान लेने के कारण | गोस्वामीजी मानस में कहते भी हैं कि निर्गुण और सगुण में कुछ भी भेद नहीं है परन्तु वाद-विवाद करने वालों में से कोई भी उनकी बात को नहीं समझता | सगुण होने का अर्थ है, जो प्रकृति के तीनों गुणों से ओतप्रोत है और वह एक मनुष्य की तरह ही प्रतीत होता है | निर्गुण होने का अर्थ है कि उसमें प्रकृति का कोई गुण नहीं होता अर्थात वह गुणातीत होता है |

           मनुष्य का स्वभाव है कि वह अपने समकक्ष और अपने जैसा प्रतीत होने वाले को अधिक महत्त्व देता है | यही कारण है कि वह अवतारों और विभिन्न देवताओं की पूजा करता है | इनकी पूजा करने के लिए उसने उनकी मूर्तियों का निर्माण किया | इन मूर्तियों की पूजा करने के लिए उसने विभिन्न प्रकार की क्रियाओं को महत्त्व दिया | मनुष्य की सबसे बड़ी विडम्बना है कि वह साधन और क्रिया को महत्त्व अधिक देता है, जिस कारण वह साध्य से विमुख हो जाता है | साधन में विभिन्न प्रकार की क्रियाएं आती है, जिनसे हम साध्य को साधने का प्रयास करते हैं | ध्यान रखें, क्रियाओं पर अधिक ध्यान देने से साध्य से ध्यान हट जाने की प्रबल संभावनाएं बन जाती है |

             वास्तविकता तो यह है कि परमात्मा तक पहुँचने के लिये प्रत्येक क्रिया अंततः जाकर  प्रायः महत्वहीन ही सिद्ध होती है | परन्तु हम हैं कि इन क्रियाओं के जाल में इस प्रकार उलझ जाते हैं कि साध्य का मार्ग तक भूल जाते है | मार्ग भूलते ही नहीं है बल्कि उस मार्ग पर अग्रसर होने में उन क्रियाओं को ही बाधा बना कर खड़ी कर देते हैं ।

           मेरे कहने का मंतव्य यह नहीं है कि परमात्मा को पाने के लिए क्रियाओं को करना अनुचित है | मैं यह कहना चाहता हूँ कि जिसके लिए ये क्रियाएं की जा रही हैं, उस 'एक' पर ही एकटक दृष्टि जमाये रखना क्रियाओं से अधिक महत्वपूर्ण है | इसलिए क्रियाओं के जाल में अटककर परमात्मा के मार्ग से भटके नहीं |

       तुलसी ने निर्गुण निराकार ब्रह्म के बारे में मानस में स्पष्ट किया है –

              बिनु पद चलइ सुनइ बिनु काना |

              कर बिनु करम करइ बिधि नाना ||

             आनन रहित सकल रस भोगी | 

             बिनु बानी बकता बड़ जोगी ||

             तनु बिनु परस नयन बिनु देखा |

              ग्रहइ घ्रान बिनु बास असेषा ||

             असि सब भाँति अलौकिक करनी | 

              महिमा जासु जाइ नहिं बरनी ||

जेहि इमि गावहि बेद बुध

 जाहि धरहिं मुनि ध्यान ||

 सोइ दसरथ सुत भगत हित

 कोसलपति भगवान || बालकाण्ड – 118 ||

      वह ब्रह्म बिना पैरों के ही चलता है, कान न होते ही सुनता है, बिना हाथों के बहुत प्रकार के कार्य कर लेता है, बिना जिह्वा के छहों रस का आनंद लेता है और बिना वाक् इन्द्रिय के बहुत योग्य वक्ता भी है | बिना त्वचा के ही स्पर्श का अनुभव कर लेता है, बिना आँखों के देख भी लेता है और बिना नाक के सब गंधों को ग्रहण करता है | उस ब्रह्म की करनी सभी प्रकार से ऐसी अलौकिक है कि जिसकी महिमा कही नहीं जा सकती | जिसका वेद और पण्डित इस प्रकार वर्णन करते हैं और मुनि जिसका ध्यान धरते हैं, वही दशरथ नंदन, भक्तों के हितकारी, अयोध्या के स्वामी भगवान् श्री रामचन्द्रजी हैं |

         गोस्वामीजी ने इन चौपाइयों के माध्यम से स्पष्ट किया है कि जो निर्गुण निराकार है वही सगुण साकार के रूप में प्रकट होता है | निर्गुण निराकार होते हुए भी ब्रह्म बिना इन्द्रियों के ही सभी इन्द्रियों के काम कर लेता है |

       गीता में भगवान् श्री कृष्ण अर्जुन को निर्गुण निराकार की बात को स्पष्ट करते हुए कहते हैं कि उस 'एक' के कारण ही व्यक्ति की सभी इन्द्रियों का कार्य करना संभव होता है | वे कहते हैं कि -

      सर्वेन्द्रियगुणाभासं सर्वेन्द्रियविवर्जितम् |

      असक्तं सर्वभृच्चैव निर्गुणं गुणभोक्तृ च || गीता -13/14||

अर्थात वे परमात्मा सम्पूर्ण इन्द्रियों से रहित हैं और सम्पूर्ण इन्द्रियों को प्रकाशित करने वाले हैं, आसक्ति रहित है और सम्पूर्ण संसार का भरण-पोषण करने वाले हैं तथा गुणों से रहित हैं और सम्पूर्ण गुणों के भोक्ता हैं |

      परमात्मा बिना इन्द्रियों के भोक्ता कैसे बन गए हैं, यह बात भगवान् श्री कृष्ण इससे पूर्व के श्लोक में स्पष्ट करते हैं -

     सर्वतः पाणिपादं तत्सर्वतोSक्षिशिरोमुखम् |

     सर्वतः श्रुतिमल्लोके सर्वमावृत्य तिष्ठति || गीता- 13/13 ||

अर्थात वे परमात्मा सब जगह हाथों और पैरों वाले, सब जगह नेत्रों, सिरों और मुखों वाले तथा सब जगह कानों वाले हैं | वे संसार में सबको व्याप्त करके स्थित है |

          इससे स्पष्ट है कि प्राणियों में जो कुछ भी कार्य इन्द्रियों के द्वारा किया जाता है और उन इन्द्रियों के माध्यम से जो कुछ भी भोगा जाता है, उन सब के पीछे परमात्मा की भूमिका है अन्यथा ये सभी इन्द्रियां बेकार पड़ी मशीन के अतिरिक्त कुछ भी नहीं है |

                यह सत्य है कि निर्गुण निराकार से ही सगुण साकार आता है | गुणातीत होने का अर्थ है, गुणों से जो प्रभावित नहीं है अर्थात उसे कुछ करने के लिए गुणों का सहारा लेने की आवश्यकता नहीं होती | निर्गुण बिना किसी गुण के होते हुए भी सब कुछ कर सकता है | इसलिए जब संसार में हम कोई अप्रत्याशित घटना घटित होते हुए देखते हैं तो कहते हैं कि सब कुछ परमात्मा ही करता है | वह जब निर्गुण है, निराकार है तो ऐसा करना उसके द्वारा कैसे संभव हो सकता है ? यही बात हमारे भीतर भ्रम को जन्म दे देती है |

            परमात्मा निर्गुण निराकार है जबकि जगत सगुण साकार है | परमात्मा दिखलाई नहीं पड़ रहे हैं, संसार तो दृष्टिगत भी है और आकर्षक भी | हमें जो कुछ दिखलाई पड़ रहा है, उसी की सत्य मानकर स्वीकार करते हैं, यही हमारा सबसे बड़ा भ्रम है | वास्तव में निर्गुण निराकार ने ही सगुण साकार सृष्टि की रचना की है | निर्गुण निराकार के बिना सगुण साकार का जन्म नहीं हो सकता | साथ ही यह भी सत्य है कि सगुण साकार के कारण ही निर्गुण निराकार की महत्ता है | स्वामीजी कहते हैं कि सगुण साकार में निर्गुण निराकार भी आ जाता है, अतः सगुण साकार की उपासना ज्यादा प्रभावी है | कहने का अर्थ है कि सगुण साकार यह संसार है जिसको भगवान् ने अपना आदि अवतार भी कहा है और इस संसार का आविर्भाव निर्गुण निराकार से हुआ है | दूसरे शब्दों में कह सकता हूँ कि संसार का सत्य यही है कि वह स्वयं परमात्मा पर आश्रित है |

         निर्गुण निराकार से इस जगत का निर्माण हुआ है और वह परमात्मा इस जगत के कण-कण में व्याप्त है | इसका अर्थ हुआ कि बिना परमात्मा के इस जगत का अस्तित्व नहीं है | इसी बात को गोस्वामीजी ने मानस में इस प्रकार कहा है –

      एहि बिधि जग हरि आश्रित रहई | 

       जदपि असत्य देत दुख अहई ||

        यह सारा संसार परमात्मा पर ही आश्रित है | इस संसार में रहते हुए हम सुखी-दुखी होते रहते हैं, जबकि इस प्रकार सुख-दुःख भोगने का कोई औचित्य नहीं है |

             संसार असत्य है क्योंकि यह प्रतिक्षण परिवर्तित हो रहा है | परमात्मा अक्षर है, असीम है, अपरिवर्तनशील है और साथ ही निराकार भी | संसार का अस्तित्व स्वयं निर्गुण निराकार परमात्मा पर टिका है | सत्य केवल एक परमात्मा ही है | इस प्रकार संसार का अस्तित्व संसार के स्तर पर स्वीकार करना भी विचारणीय हो गया है | वास्तव में संसार को कार्य कहा जाता है और प्रत्येक कार्य के पीछे कोई न कोई कारण अवश्य ही होता है | संसार के होने का कारण परमात्मा है | इस प्रकार संसार भी परमात्मा ही हुआ | अतः परोक्ष रूप से कहा जा सकता है कि परमात्मा सत्य हैं और संसार भी सत्य है | संसार को असत्य बनाती है, हमारी उसके प्रति आसक्ति | यह संसार हमारे लिए तभी सत्य सिद्ध हो सकता है, जब हम उस संसार को भी परमात्मा माने और संसार को परमात्मा तभी स्वीकार किया जा सकता है जब हम इसके प्रति अनासक्त हों |

           संसार असत् है क्योंकि हमारी उसमें आसक्ति है | इसे हमने अपना और अपने लिए मान लिया है | संसार के असत् होने को स्वीकार करना आवश्यक है, तभी हमारे जीवन से दुःख दूर हो सकते हैं अन्यथा नहीं | इसके लिए हमें ज्ञान प्राप्त करना होगा | ज्ञान ही हमें सत् तक ले जा सकता है | असत् को सत् मान लेना ही हमारे जीवन में दुःख का एक मात्र कारण है | हमारा यह दुःख तब तक दूर नहीं होगा जब तक हम इस असत्य के पीछे छिपे सत्य को पहिचान नहीं लेते | यह पहिचान ज्ञान होने से ही हो सकती है अन्यथा नहीं | अज्ञान हमारी निद्रावस्था है जबकि ज्ञान हो जाना जाग्रत अवस्था कहलाती है |

               सुषुप्ति अवस्था से जाग्रत अवस्था में आने से ही सारा भ्रम मिट जायेगा | सुषुप्ति की अवधि में एक स्वप्नावस्था भी आती है, जिसका सत्य से दूर दूर का कोई सम्बन्ध नहीं होता है | सपने में एक राजा भी भिखारी बन जाता है, इसका अर्थ यह नहीं है कि वह वास्तव में वह भिखारी हो गया है | राजा जनक के जीवन का एक प्रसंग है | एक बार जनकजी अपने राजनिवास के शयनकक्ष में सो रहे थे | तभी उनको एक स्वप्न आया कि वे एक भिखारी हैं | कई दिनों से उन्हें भोजन नहीं मिला है | भूख के मारे उनका हाल बेहाल हो रहा है | वे कुछ खाने की खोज में इधर उधर भटक रहे है | तभी एक स्त्री भोजन लेकर उनके सामने आती है | स्त्री भोजन तो ले आयी परन्तु जनकजी के पास तो उसे लेने के लिए कोई पात्र तक नहीं है | देखिए, स्वप्न भी व्यक्ति को कहाँ से कहाँ ले जाता है, कल्पना से बाहर की बात है |

         मरघट में इधर स्त्री भोजन लिए खड़ी है और उधर जनकजी के पास उस भोजन को प्राप्त करने के लिए कोई पात्र नहीं है | मरघट में भला भोजन के लिए पात्र कहाँ से मिलेगा ? जनकजी ने इधर उधर दृष्टि दौड़ाई | एक भग्न नर मुंड उन्हें दिखलाई पड़ा | उन्होंने भोजन लेने के लिए उसी खप्पर को एक पात्र बना लिया | स्त्री ने भोजन उस खप्पर में डाल दिया | जनकजी अपनी क्षुधा शांत करने के लिए एक पेड़ के नीचे बैठ गए | ज्योंही वे उस भोजन को उदरस्थ करने वाले थे कि एक चील कहीं से उडती हुई आई | उस चील ने उस खप्पर में से भोजन उठाना चाहा परन्तु यह क्या ? चील के झपटते ही वह भोजन भरा खप्पर जनकजी के हाथ से नीचे गिर गया | खप्पर के नीचे गिरते ही उसमें से भोजन बिखरकर मिट्टी में मिल गया | भोजन अब खाने योग्य नहीं रह गया था | भूख से बिलबिला रहे भिखारी जनकजी के मुंह से एक चीख निकल गयी | इस चीख के साथ ही राजा जनकजी की आँख खुल गयी | यह क्या ? पसीने से लथपथ जनकजी तो राजमहल में सोये हुए है | वे सोचने लगे – “ओह ! यह तो एक स्वप्न था | मैं तो अभी राजा हूँ | फिर स्वप्न में जो जनक भिखारी बना घूम रहा था वह कौन था ?”

           स्वप्न में अपनी दशा देखकर जनकजी को भी भ्रम हो गया | वे समझ नहीं पा रहे थे कि अभी जो मैं हूँ वह सत्य है अथवा जो स्वप्न मैंने देखा वह सत्य है | सत्य का निर्णय कौन करे ? सत्य का निर्णय केवल वही कर सकता है जिसने सत्य को जान लिया हो | सत्य पढने, बोलने, लिखने अथवा सुन लेने तक ही सीमित नहीं है बल्कि सत्य तो अनुभव करने की बात है | जब तक सत्य का अनुभव नहीं होता तब तक सारा पढ़ा, बोला, लिखा, सुना ज्ञान उच्छिष्ट के अतिरिक्त कुछ भी नहीं है |

             सत्य क्या है, वह स्वप्न अथवा यह सांसारिक जाग्रत अवस्था ? इस सत्य को जिसने जान लिया, वह ज्ञानी हो कर सारी माया के पार हो गया | ज्ञान को स्वयं के भीतर उतारकर आचरण में लाने से ही वह भ्रम को दूर करने में सहायक है अन्यथा ज्ञान उच्छिष्ट बनकर रह जाता है | जिसने इस ज्ञान को केवल पढ़ने, सुनने, लिखने और बोलने तक सीमित रखा उसका सारा ज्ञान वमन के अतिरिक्त कुछ भी नहीं है | जब आप पौष्टिक भोजन करते हैं, तब वह भोजन आपको तुष्टि और पुष्टि तभी दे पायेगा जब वह भोजन आपके भीतर जाकर रचे, पचे, उसका रस बने और धमनियों के माध्यम से शरीर में दौड़ते हुए एक शक्ति बन जाए | वमन कर देने पर वह भोजन चाहे कितना ही पौष्टिक हो आपको पुष्ट नहीं कर सकता |

           सत्य का अनुभव जिस व्यक्ति ने कर लिया है उसी व्यक्ति को गुरु कहा जाता है | गुरु ही वह माध्यम है जिससे हमें सत्य की ओर जाने की राह मिलती है | गुरु ही हमारे सभी भ्रम दूर कर सकता है | जनकजी का भ्रम दूर उनका गुरु ही करेगा, यह जानकर विदेहराज पहुँच गए अपने गुरु अष्टावक्र के पास | ज्ञान का शरीर सौष्ठव और सुन्दरता से कोई सम्बन्ध नहीं है | घड़ा बाहर से भले ही कितना ही सुन्दर हो, जब तक वह अपने भीतर के जल को शीतल नहीं कर देता तब तक उसकी सुन्दरता व्यर्थ है | इसी प्रकार शरीर चाहे कितना ही बदसूरत हो, टेढ़ा-मेढा हो अगर भीतर ज्ञान भरा पड़ा है तो ही वह शरीर सबसे सुन्दर है | अष्टावक्र मुनि का शरीर आठ स्थानों से वक्रता लिए हुए था, इसी कारण उनका नाम अष्टावक्र पड़ा था | जनकजी ने अष्टावक्र जी को प्रणाम किया और अपने आने का प्रयोजन बताया |

             जनकजी पूछ रहे हैं कि गुरुवर ! स्वप्न में जो मैं भिखारी था वह सत्य था अथवा जो मैं वर्तमान में एक राजा हूँ, वह सत्य है | अष्टावक्र जी ने बहुत ही सुन्दर उत्तर दिया – “राजन ! न तो स्वप्न ही सत्य था और न ही अभी वर्तमान में जो आप राजा हैं, वह सत्य है | दोनों ही भ्रम मात्र है | आप शारीरिक नींद से जाग जाते हैं तो स्वप्न असत्य सिद्ध हो जाता है | उसी प्रकार आप आत्मिक रूप से जिस दिन जाग जायेंगे तो आपका यह राजा होना भी असत्य सिद्ध हो जायेगा | देखा जाये तो यह सारा संसार ही स्वप्न से अधिक कुछ भी नहीं है | नींद का सपना तो शरीर के जागने से टूट सकता है परन्तु शरीर के जागते रहते जो आप अपने को राजा बना देख रहे हैं वह भी एक सपना ही है जोकि बिना ज्ञान के टूटना असंभव है |”

          इसी प्रकार हम भी इस मनुष्य शरीर में स्वयं के बहुत कुछ होने का अहंकार लिए जी रहे हैं, वह भी हमारा मात्र भ्रम ही है | जिस दिन हमें ज्ञान हो जायेगा उस दिन हमारा यह भ्रम समाप्त होगा उससे पहले नहीं | संसार को एक सपना बताते हुए शंकर भगवान् पार्वतीजी को मानस में कह रहे हैं –

            उमा कहउं मैं अनुभव अपना | 

            सत हरि भजनु जगत सब सपना ||

       सत्य केवल एक परमात्मा है | उसके लिए सभी कर्म करना, उनका भजन करना है | यह सारा जगत एक भ्रम के अतिरिक्त कुछ भी नहीं है | यह भ्रम तभी दूर हो सकता है जब ज्ञान हो जाये और यह ज्ञान बिना प्रभु की कृपा के अनुभव में आ नहीं सकता | इसलिए प्रभु की कृपा से ही भ्रम का निवारण हो सकता है अन्यथा नहीं |       

            भ्रम को मिटाने के लिए ज्ञान प्राप्त करना आवश्यक है | इसी बात को गोस्वामी तुलसीदासजी महाराज मानस में स्पष्ट करते हुए कहते हैं कि -

                    जौं सपनें सिर काटै कोई | 

                    बिनु जागें न दूरि दुख होई ||

       जिस प्रकार सपने में कोई हम पर आक्रमण करके हमारा शीश काटने लगता है तब हमें बहुत दुःख पहुंचता है | अपने सिर के कटने की पीड़ा किसी से भी सहन नहीं होती | सिर काटे जाने का यह दुःख तभी समाप्त हो सकता है, जब हम नींद से जाग जाएँ | इसी प्रकार इस संसार में हम आसक्त होकर बहुत से सुख-दुःख झेल रहे हैं | इसका एक मात्र कारण है कि हम इसी संसार को सत्य समझ रहे हैं | संसार का दुःख तभी दूर हो सकता है जब इस संसार की क्षणभंगुरता का ज्ञान हमें हो जाये |

          कबीर ने अपने दोहों के माध्यम से संसार की क्षण भंगुरता को बहुत ही सरल शब्दों के माध्यम से स्पष्ट किया है | कबीर कहते हैं –

        पानी केरा बुलबुला अस मानुस की जात |

        देखत ही छुप जायेगा ज्यों तारा प्रभात ||

      यह मनुष्य जीवन जो हमें परमात्मा की असीम कृपा से मिला है, वह जीवन पानी में बने बुलबुले के सामान है | पानी में बने बुलबुले का कोई विश्वास नहीं है, न जाने वह कब फूट कर मिट जाए | भोर का तारा बुध को कहा जाता है | सूर्योदय से कुछ समय पहले ही उसके दर्शन होते हैं | सूर्योदय होते ही वह दिखलाई पड़ना बंद हो जाता है।

         कबीर के कहने का मंतव्य है कि जो यह मनुष्य जीवन अल्प समय के लिए मिला है, उसको व्यर्थ न गवाएं बल्कि परमात्मा की प्राप्ति में लगायें | यह संसार एक भ्रम के अतिरिक्त कुछ भी नहीं है | संसार की वास्तविकता को जान कर उससे भ्रममुक्त होना आवश्यक है | भ्रम निवारण हुए बिना असत्य ही सत्य प्रतीत होगा और ऐसे में सत्य तक पहुंचना असंभव हो जायेगा |

          संसार के सत्य होने का भ्रम जो हमारे भीतर गहराई तक बैठ गया है, उस भ्रम का निवारण कैसे हो ? जैसा कि मैंने पूर्व में बताया है कि सांसारिक भ्रम से हमें वही बाहर निकाल सकता है जिसने संसार के सत्य होने के भ्रम को तोड़ दिया है | अनुभव सिद्ध व्यक्ति ही हमें इस अवस्था से बाहर निकाल सकता है और वह व्यक्ति है – गुरु | गुरु उस रास्ते पर चल चूका है, जिस पर चलकर वह सत्य को उपलब्ध हो गया है | जब सत्य की खोज पूरी हो जाती है, तभी संसार असत्य सिद्ध होगा उससे पहले नहीं | हमारे पास दो रास्ते हैं – ज्ञान प्राप्त कर संसार को मात्र माया अथवा भ्रम मान लेना | यह ज्ञान हमें उपलब्ध करता है –गुरु | योग्य गुरु जो हमें मायिक संसार से बाहर निकलने में सहायता प्रदान करता है, वह बिना प्रभु की कृपा के हमें मिलता नहीं है | इसलिए दूसरा रास्ता है- परमात्मा के प्रति समर्पण | जब हम परमात्मा के प्रति पूर्णरूप से समर्पित हो जाते है, तब हमरा भ्रम अनायास ही मिट जाता है | इसीलिए मानस में तुलसी लिखते हैं -  

     जासु कृपाँ अस भ्रम मिटि जाई।

      गिरिजा सोइ कृपाल रघुराई।।

     आदि अंत कोउ जासु न पावा।

      मति अनुमानि निगम अस गावा।।

          इसलिए परमात्मा के प्रति समर्पित होकर इस संसार को असंग रहते हुए देखें | फिर संसार में भी परमात्मा दृष्टिगत होंगे | एक परमात्मा के अतिरिक्त इस संसार में जो कुछ भी आप देख रहे हैं, वह सब आपका भ्रम है | संसार तभी तक असत्य है जब तक हम उसे भोग और सुख प्राप्त करने की दृष्टि से देखते हैं अन्यथा परमात्मा का आदि अवतार होने से संसार असत्य कैसे हो सकता है ?

           अगर माया असत है, भ्रम है, तो फिर सत्य क्या है ? एक बार आदि शंकराचार्यजी महाराज अपने शिष्यों के साथ भ्रमण पर थे | उस समय विद्युत् का उत्पादन नहीं होता था, केवल तारों और ग्रहों, उपग्रह आदि के प्रकाश से ही रात के समय आवागमन का मार्ग दिखलाई पड़ता था | उस मद्धम प्रकाश में एक शिष्य ने देखा कि यात्रा के आगे के मार्ग में एक सर्प लेटा हुआ है | उसने शंकराचार्य महाराज से कहा कि महाराज, आगे रास्ते में एक सर्प लेटा हुआ है | प्रत्युतर में आचार्यजी ने प्रश्न किया कि ध्यान से देखो क्या वह सर्प ही है ? शिष्य ने ध्यान से देखा तो उसे अनुभव हुआ कि वह सर्प न होकर एक टेढ़ी-मेढ़ी लकड़ी है, जिसे उसने पहले भ्रमवश सर्प समझ लिया था | उस शिष्य ने कहा कि नहीं महाराज, यह सांप नहीं है बल्कि यह तो एक लकड़ी है | आचार्यजी ने फिर पूछा कि क्या तुमने उसको छूकर देखा है ? शिष्य ने कहा कि नहीं | इस पर शंकर ने कहा - “तो फिर सावधानी रखते हुए उसे छूकर देखो और पता लगाओ कि वास्तव में वह है क्या ?”

       शिष्य ने सावधानी रखते हुए उसके थोडा और पास जाकर उसे ध्यान से देखा | अब वह टेढ़ी मेढ़ी लकड़ी भी उसे दिखलाई नहीं पड़ी | स्पष्ट था कि उसे अब वह न तो सर्प ही प्रतीत हो रहा था और न ही लकड़ी | निर्भय होकर उस शिष्य ने उस वस्तु का अपने हाथ से स्पर्श किया और फिर ऊपर उठा लिया | शिष्य दूर खड़ा-खड़ा ही बोला –‘महाराज, यह तो रस्सी है | भ्रमवश इसी रस्सी को मैंने पहले तो सर्प समझा और बाद में टेढ़ी-मेढ़ी एक लकड़ी | मेरा यह भ्रम था | सत्य में तो यह एक रस्सी है |’ 

        शिष्य ने पहले जिसको सर्प समझा था और बाद में लकड़ी, वह दोनों ही न होकर अस्त-व्यस्त पड़ी एक साधारण सी रस्सी निकली | इस पर आदि शंकराचार्य महाराज ने कहा है कि सत्य तो यह है कि वह रस्सी भी नहीं है बल्कि उसका एक रस्सी होना भी भ्रम ही है | रस्सी को बिखेरना शुरू करोगे तो वहां धागे निकलेंगे | धागे को ध्यानपूर्वक देखोगे तो वे भी धागे न होकर रूई होगी | इस प्रकार आगे बढ़ते बढ़ते हुए कहाँ तक पहुंचोगे, आप कल्पना कर सकते हो | इसलिए मैं कहता हूँ कि जो एक बार असत्य सिद्ध हो गया, समझो वह सदैव के लिए ही असत्य सिद्ध हो गया | तो फिर वह सर्प नहीं था, लकड़ी भी नहीं थी, रस्सी भी नहीं थी, धागा भी नहीं है, रूई भी नहीं है तो फिर आखिर वह है क्या ? प्रश्न को आपके विचारार्थ यहीं पर छोड़े जाता हूँ |

       चलिए ! आगे बढ़ते हैं | शंकराचार्यजी महाराज ने सत्य की ओर संकेत तो कर दिया परन्तु शिष्य ने उसे कैसे और किस प्रकार समझा वह उसके विवेक पर निर्भर करता है | हम सब उस शिष्य की तरह ही इस संसार को लेकर एक प्रकार के भ्रम में जी रहे हैं | जो दिखलाई पड़ रहा है, उसी को सत्य समझ बैठे है, जबकि सत्य क्या है, उसकी एक झलक मात्र से हम अभी भी कोसों दूर खड़े हैं | संसार के प्रति हमारा यह भ्रम कैसे मिटेगा और उस सत्य तक हम कैसे पहुँच पाएंगे ? कौन हमें उस सत्य तक पहुंचाएगा ?

        बिना परमात्मा की कृपा के किसी भी भ्रम का मिटना असंभव है | जगदीश्वर की धर्मपत्नी दक्षसुता सती को भी एक बार इसी प्रकार का भ्रम हो गया था और उस भ्रम को मिटाने के लिए उन्हें पार्वती के रूप में इस संसार में पुनः जन्म लेना पड़ा | जब शंकर भगवान् की पार्वती पर कृपा हुई तभी वह राम-कथा सुनकर इस भ्रम से मुक्त हो सकी |  

             भगवान् की बनाई माया के प्रति हमारा भ्रम पैदा ही क्यों होता है ? सबसे अधिक भ्रम तब होता है, जब हम सगुण रूप में  प्रकट हुए परम ब्रह्म पर भी अविश्वास जताने लगते हैं | भगवान् राम को भी उस समय कितनों ने परमब्रह्म के रूप में देखा और जाना था ? यहाँ तक कि दशरथ महाराज को भी उनमें अपना पुत्र ही दिखलाई पड़ रहा था | इसी पुत्र की आसक्ति ने उनके प्राण तक ले लिए थे |

              दक्ष-पुत्री सती के साथ भी तो यही हुआ था | शंकर भगवान् तो जानते थे कि सगुण और निर्गुण के मध्य कोई भेद नहीं है परन्तु सती उनकी पत्नी होते हुए भी इस बात को नहीं जान सकी थी | जिसका परिणाम उन्हें शंकर से परित्यक्त होने के रूप में मिला और धर्मपत्नी के पद से च्युत होना पड़ा था | शंकर भगवान् के साथ आसन पर सदैव उनके वाम पार्श्व में बैठने वाली सती को एक दिन उनके सम्मुख बैठना पड़ा |

            शंकर जैसा गुरु किसी को भी नहीं मिल सकता, फिर भी सती को ज्ञान नहीं हो सका कि इस सृष्टि के कण-कण में परमात्मा व्याप्त हैं | जो कुछ भी आप संसार में देख रहे हैं, वह उसी की लीला मात्र है | अभिनय और वास्तविकता में अंतर को पहिचानना आवश्यक है | इस बात को जो जान लेता है वही ज्ञानी हो जाता है | हाँ, अभिनय की सर्वोच्च अवस्था में अभिनय और वास्तविकता में अंतर करना एक साधारण मनुष्य की क्षमता के बाहर की बात है | इस अंतर को गुरु ही स्पष्ट कर सकता है | इसके लिए आवश्यक है कि गुरु के प्रति पूर्ण श्रद्धा और विश्वास हो | सती ने शंकर के कहे पर ही तो विश्वास नहीं किया था | उसी अविश्वास का परिणाम उन्हें अपने पति से परित्यक्त होकर भुगतना पड़ा |

           गुरु भी तो परमात्मा की कृपा से ही मिलते हैं | बिना उसकी कृपा के गुरु भी आपको ज्ञान नहीं दे सकता | गुरु द्वारा प्रदत्त ज्ञान की भूमिका आपके भीतर के विवेक को जाग्रत करने में है | विवेक सभी व्यक्तियों में जन्म से ही उपस्थित रहता है, उसको पैदा नहीं करना पड़ता | विवेक को तो जाग्रत किया जा सकता है और उसमें एक गुरु की भूमिका ही महत्वपूर्ण होती है |

              जैसा कि पहले ही स्पष्ट किया जा चूका है कि माया का दूसरा नाम भ्रम ही है और यह भ्रम पैदा होता है, माया में उपस्थित प्रकृति के तीन गुणों के कारण | परमात्मा की बनाई इस माया से सभी प्राणी मोहित हो जाते है | परन्तु मनुष्य के पास तो विवेक है फिर भी मनुष्य भ्रमित क्यों हो जाता है ? प्रकृति के तीनों गुण आपस में जिस प्रकार तालमेल रखते हुए कार्य करते हैं, उससे भ्रम की स्थिति पैदा हो जाती है | भगवान् कहते हैं कि इन तीन गुणों के कारण जो भी भाव मनुष्य में होते हैं, वे सब मेरे कारण ही होते हैं | परन्तु मनुष्य उन भावों में उलझकर भ्रमित होकर रह जाता है | जैसे सात्विक भाव के कारण मनुष्य को सुख मिलता है और राजसिक भाव के कारण मनुष्य कर्म करने को उद्यत होता है | इसी प्रकार तामसिक भाव में मनुष्य ज्ञान से विमुख हो जाता है | इस प्रकार इन तीनों के कारण मनुष्य अपने ही गुणों के सामने पराजित हो जाता है | इन गुणों से उत्पन्न भावों से मोहित प्राणी भगवान् को नहीं जान सकता क्योंकि वह गुणों के आपसी कार्य को अपने द्वारा करना मान लेता है |

         भगवान् कह रहे हैं कि जो भी तीनों भाव (सात्विक, राजसिक और तामसिक भाव ) हैं, वे सभी मेरे कारण ही होते हैं फिर भी वे भाव न तो मुझमें हैं और न ही मैं उनमें हूँ |(गीता-7/12) | परमात्मा तो गुणातीत है | अगर हम अपने इन भावों पर दृष्टि न रखकर अपनी समग्र दृष्टि को केवल परमात्मा पर रखेंगे तो फिर हम इन भावों के मूल अर्थात गुणों से तनिक भी प्रभावित न होकर भ्रमित भी नहीं होंगे | हम कुछ भी नहीं करते बल्कि गुण ही गुण में बरतते है (गुणा वर्तन्त इत्येव-गीता - 14/23) अर्थात गुणों के आपसी व्यवहार के कारण ही यह संसार गतिमान है, ऐसा मानने वाला फिर संसार में रहते हुए भी कभी भ्रमित नहीं होगा |

                गीता में भगवान् श्री कृष्ण अपनी इस माया के बारे में बताते हुए अर्जुन को कह रहे हैं –

         दैवी ह्येषा  गुणमयी मम ममय दुरत्यया |

         मामेव ये प्रपद्यन्ते मायामेतां तरन्ति ते || गीता – 7/14 ||

          भगवान अर्जुन को कह रहे हैं कि मेरी यह माया दुरत्यय है अर्थात इससे पार होना कठिन है |  जो केवल मेरी शरण होते हैं, वे इस माया से पार हो जाते हैं |

                  हम सब मृग मरीचिका के बारे में तो जानते ही हैं | तेज गर्मी में जब मृग को प्यास लगती है, तब वह जल की तलाश में मैदान में इधर उधर भटकता है | कहीं दूर उसको जल होने का आभास होते ही वह उस ओर दौड़ पड़ता है | दौड़ते दौड़ते वह बहुत दूर पहुँच जाता है परन्तु जल-स्रोत निकट आने के स्थान पर उससे उतना ही दूर बना रहता है | वह पलटकर देखता है तो उसे अपने पीछे भी वैसा ही जल स्रोत दिखलाई पड़ता है | वह पलटकर फिर पीछे की ओर दौड़ने लगता है | वह दिन भर इधर उधर दौड़ता रहता है परन्तु जल स्रोत तक कभी भी पहुँच नहीं पाता |

               इधर उधर दौड़ते दौड़ते आखिर एक समय मृग की शक्ति चूक जाती है और वह भूमि पर गिर पड़ता है | इतनी अधिक दौड़ का परिणाम क्या निकला ? कुछ भी नहीं | जल स्रोत केवल माया थी, वहां जल कभी था भी नहीं | यही हमारे जीवन में होता है | माया के कारण हम इसी भ्रम में जी रहे होते हैं कि कल सुख मिलेगा | सुख की खोज में हम इधर उधर दौड़ते रहते हैं, परन्तु सुख कभी मिलता ही नहीं है | सुख क्यों नहीं मिलता ? क्योंकि सुख भी एक भ्रम ही है | मनुष्य की मानसिक दशा के अलावा सुख-दुःख कुछ भी नहीं है | यह मानसिक दशा जब तक परिवर्तित नहीं होगी तब तक माया हमें छलती रहेगी |

           परमात्मा की माया के पार वही हो सकता है जिसने मायापति की शरण ले ली है | परमात्मा की शरण लेने का अर्थ है, सब कुछ परमात्मा ही है, यह स्वीकार कर लेना | फिर जीवन में सुख मिलता है, तो वह भी परमात्मा है और दुःख आया है तो भी परमात्मा का आगमन हुआ है, यह मान लेना | यह स्वीकार कर लेना भी सहज नहीं है क्योंकि हमें जो कुछ दिखलाई पड़ रहा है, केवल उसी को महत्वपूर्ण मानते हैं | दिखलाई माया पड़ती है परमात्मा नहीं | जिस दिन हम माया के पीछे छिपे परमात्मा को देख लेंगे उस दिन ही हम परमात्मा की शरण हो जायेंगे | ऐसा तभी होगा जब हमारे भीतर जो विवेक सोया पड़ा है उसे हम जाग्रत कर लेंगे |

       श्रीरामचरितमानस में लक्ष्मणजी निषादराज गुह को कह रहे हैं –

           एहिं जग जामिनि जागहिं जोगी |   

            परमारथी प्रपंच बियोगी ||

           जानिअ तबहिं जीव जग जागा | 

           जब सब बिषय बिलास बिरागा ||

           होइ बिबेकु मोह भ्रम भागा |

           तब रघुनाथ चरन अनुरागा ||

       अर्थात इस जगतरूपी रात्रि में योगी लोग जागते हैं, जो परमार्थी हैं और प्रपंच से दूर बने हुए हैं | जगत में जीव को तभी जागा हुआ मानना चाहिए जब उसे सम्पूर्ण भोग-विलासों से वैराग्य हो जाये | विवेक होने पर मोह रुपी भ्रम भाग जाता है और ज्ञान हो जाने पर श्री रघुनाथजी के चरणों में प्रेम हो जाता है |

               संसार से प्रेम को हमें एक तीव्र मोड़ देकर 180 अक्षांश तक घुमाना होगा और उसे परमात्मा के प्रेम में परिवर्तित करना होगा तभी हम इस माया के भ्रम से मुक्त हो सकेंगे अन्यथा नहीं |

              पुनः चलते हैं शंकराचार्य जी महाराज के उस कथन की ओर जिसमें उन्होंने अपने शिष्य को कहा था कि जो बात एक बार असत्य सिद्ध हो जाती है, समझ लो वह सदैव के लिए असत्य सिद्ध हो गयी | पहले जो सांप दिखलाई दे रहा था, वह फिर एक लकड़ी प्रतीत होने लगी | छूकर देखने से वही लकड़ी एक रस्सी में परिवर्तित हो गयी थी | रस्सी का ताना-बाना उधेडा गया तो वह कई धागों में परिवर्तित हो गयी | उन धागों का जब विश्लेषण किया गया तो वह रूई में परिवर्तित हो गयी | आदि शंकर का कहना था कि यह भी रूई न होकर परमात्मा ही है | अगर हम गंभीरता से देखें तो एक परमात्मा के अतिरिक्त इस संसार में कुछ और है ही नहीं | इसलिए सर्वत्र एक परमात्मा को ही देखो | जब सब ओर परमात्मा ही दृष्टिगोचर होंगे तो फिर किसी प्रकार का भ्रम होने का प्रश्न ही पैदा नहीं होगा | भगवान् श्रीकृष्ण गीता में कहते हैं –

      यो मां पश्यति सर्वत्र सर्वं च मयि पश्यति |

     तस्याहं न प्रणश्यामि स च में न प्रणश्यति || गीता-6/30||

              जो सबमें मुझे देखता है और मुझमें सबको देखता है, उसके लिए मैं अदृश्य नहीं होता और वह मेरे लिए अदृश्य नहीं होता |

             सबमें एक उसको ही देखने का अर्थ है कि एक परमात्मा के अतिरिक्त अन्य कोई इस संसार में है ही नहीं | माया के पीछे मायापति को देखने से माया भ्रम नहीं हो सकती | फिर माया हमें छल नहीं सकती | माया हमें तभी तक भ्रमित करती है जब तक हम माया को ही सत्य समझकर उसमें आसक्त हो जाते हैं | एक परमात्मा की शरण ले लेने से माया प्रभावहीन होकर रह जाती है |

                इसी बात को मानस में तुलसीदासजी ने भगवान् शंकर के मुख से इस रूप में कहलाया हैं -       

  “जासु कृपाँ अस भ्रम मिट जाई | 

    गिरिजा सोइ कृपाल रघुराई ||”

              हे गिरिजे ! जिनकी कृपा से इस प्रकार का भ्रम मिट जाता है, वही कृपालु श्री रघुनाथजी है |

      भ्रम है, माया को ही सत्य समझ लेना | सत्य कभी भी परिवर्तित नहीं होता जबकि असत कभी स्थिर नहीं रह सकता | इस संसार में सत के अतिरिक्त कुछ भी नहीं है | 

              “नासतो विद्यते भावो नाभावो विद्यते सतः” (गीता-2/16) कहता है कि असत की तो सत्ता विद्यमान नहीं है और सत का कहीं अभाव नहीं है | लेख के प्रारम्भ में मैंने कहा था कि हमारी इन्द्रियां जो कुछ भी देखती है, सुनती है, स्पर्श का अनुभव करती है, सूंघती है अथवा स्वाद लेती है, उन सबका अनुभव मन के माध्यम से जीव को होता है | जीव ही इन सभी का भोक्ता है | जीव परमात्मा का अंश है | इस प्रकार परोक्ष रूप से परमात्मा ही भोक्ता हो गए | साथ ही भगवान् कह रहे हैं कि मैं न तो कुछ करता हूँ और न ही लिप्त होता हूँ | ऐसे में भ्रम की स्थिति पैदा क्यों हो जाती है ?

            भ्रम तभी उत्पन्न होता है जब जीव स्वयं को इन भोगों में आसक्त कर लेता है | भोगों के प्रति आसक्ति जीव को भोक्ता तो बना देती है परन्तु परमात्मा से उसे दूर कर देती है | ऐसे में मूल स्वरुप परमात्मा तक पहुँचने का एक ही मार्ग शेष बचता है, और वह मार्ग है परमात्मा के शरणागत हो जाना | शरणागति की अवस्था ही परमात्मा की कृपा होना है | उनकी कृपा से ही सभी प्रकार के भ्रमों का निवारण हो जाता है | इसीलिए गोस्वामीजी ने मानस में भगवान् शंकर के मुख से कहलाया है –

          “जासु कृपाँ अस भ्रम मिट जाई”

सार-संक्षेप -

          हमारे जीवन में भ्रम मुख्य भूमिका निभाता है | प्रत्येक स्थान पर और प्रतिदिन भ्रम से हमारा आमना–सामना होता रहता है | एक बार भ्रम में पड़ने के बाद भी हम चेतते नहीं है और पुनः किसी दूसरे भ्रम के शिकार हो जाते हैं | माया को भ्रम का कारण माना गया है, इसीलिए माया को भ्रम भी कहा जाता है | जो दिखलाई पड़ रहा है, उसको सत्य तभी माना जा सकता है जब हम उसमें आसक्त न हों | मनुष्य आसक्त हुए बिना रह नहीं सकता क्योंकि वह दिखलाई पड़ रही माया को ही सत्य समझ लेता है | माया ही उसे जीवन में सुख-दुःख, राग-द्वेष, जय-पराजय, लाभ-हानि आदि द्वंद्वों में उलझा देती है | यह जीवन इतना छोटा सा है कि हमें इन फालतू द्वंद्वों में ही फंसकर नहीं रह जाना चाहिए |

              सत्य केवल एक ही हो सकता है और वह सत्य है-परमात्मा | दिखलाई न पड़ने के उपरांत भी हम उसका होना तो मान लेते है परन्तु उसके होने पर भी हमारा अडिग विश्वास नहीं रहता | माया का उद्भव कहाँ से होता है ? जहाँ से उसका सृजन हुआ है वह मायापति ही परमात्मा कहलाता है | जब हम उसकी माया में भी उसे ही देखने लगेंगे तब हमारे सभी भ्रम मिट जायेंगे | माया के पीछे परमात्मा को देखना ही भ्रम निवारण कर सकता है | इसके लिए हमें गुरु की शरण लेनी होगी, एक वही हमारा विवेक जाग्रत करने में सिद्धहस्त है | स्वामीजी कहते हैं कि प्रत्येक मनुष्य में विवेक होता ही है उसे पैदा नहीं किया जा सकता बल्कि उसे जाग्रत करना होता है | विवेक के जाग्रत होते ही फिर परमात्मा तक पहुंचकर उनकी कृपा प्राप्त की जा सकती है | उनकी कृपा होते ही फिर किसी भी प्रकार का भ्रम पैदा नहीं हो सकता | भ्रम से ब्रह्म की हमारी यात्रा प्रभु कृपा से ही संपन्न हो सकती है | इसलिए सदैव याद रखें - परमात्मा की कृपा से ही माया से मुक्त हुआ जा सकता है |

       “जासु कृपाँ अस भ्रम मिट जाई”

        इसी के साथ यह श्रृंखला समाप्त होती है | आप सभी का साथ बने रहने का आभार |

प्रस्तुति- डॉ.प्रकाश काछवाल

|| हरिः शरणम् ||