Friday, September 29, 2017

भज गोविन्दम् - श्लोक सं.4

भज गोविन्दम् – श्लोक-4
नलिनीदलगतसलिलंतरलं, तद्वज्जीवितमतिशयचपलम् |
विद्धि व्याध्यभिमानग्रस्तं, लोकंशोकहतं च समस्तम् ||4||
अर्थात हमारा जीवन क्षण भंगुर है | यह उस पानी की बूँद की तरह है. जो कमल की पंखुड़ियों से गिरकर समुद्र के विशाल जल स्रोत में अपना अस्तित्व खो देती है| हमारे चारों और प्राणी तरह-तरह की कुंठाओं एवं कष्ट से पीड़ित हैं | ऐसे जीवन में कैसी सुन्दरता ?
            मनुष्य का जीवन क्षण भंगुर ही है | आप स्वयं ही देख लीजिये, कल हम जिस व्यक्ति को स्वस्थ और घूमता फिरता देख रहे थे, वह आज हमारे बीच नहीं है | एक क्षण बाद क्या होगा कोई नहीं बता सकता | हम यहाँ इस भौतिक जीवन में आसक्त होकर इस प्रकार जी रहे हैं, मानो युग युगों तक यहाँ रहने के लिए आये है | आदि शंकराचार्य जी कह रहे हैं कि जैसे कमल के फूल की एक पंखुड़ी पर पानी की एक बूँद ठहरी हुयी रहती है, उसका कभी भी नष्ट हो जाना संभव है, वैसे ही इस संसार में मनुष्य का जीवन है | कमल की पंखुड़ी पर ठहरी हुई पानी की वह एक बूँद गर्मी और धूप से वाष्पीकृत होकर कभी भी अपना अस्तित्व खो सकती है अथवा अपने स्थान से फिसलकर विशाल समुद्र के पानी में गिरकर खो सकती है | इसी एक बूँद के भविष्य की तरह ही एक मनुष्य का जीवन है, जो कभी भी समाप्त हो सकता है | कबीर कहते हैं-
पानी केरा बुदबुदा, अस मानुस की जात |
देखत ही छुप जायेगा, ज्यों तारा परभात ||
मनुष्य का जीवन उसी पानी की बूँद के सामान है, जो कभी भी नष्ट हो सकती है | भोर का तारा (बुध) कुछ समय के लिए ही उदय होता है परन्तु ज्योंही सूर्य के दर्शन होने वाले होते हैं वह तारा अदृश्य हो जाता है | इसी प्रकार मनुष्य का जीवन है, कुछ समय के लिए मिला है और वह भी शीघ्र ही नष्ट होने जा रहा है | शंकराचार्य जी महाराज कह रहे हैं कि इस जीवन का अधिक से अधिक सदुपयोग कर लिए जाये, यही सत्य है |
              जीवन की सुन्दरता इसके सही उपयोग कर लेने में ही है | नहीं तो इस दुःख के सागर रुपी संसार में एक व्यक्ति के जीवन में किसी भी प्रकार की सुन्दरता नहीं है | जन्म लेने के बाद युवावस्था तक जो शारीरिक सुन्दरता दृष्टिगोचर होती है, वह सुन्दरता भी स्थूल शरीर की ही है और वह भी अस्थाई | एक दिन यह शरीर भी जर्जर होकर समाप्त हो जायेगा | केवल प्रभु का भजन ही जीवन को सुन्दर बना सकता है |
क्रमशः
प्रस्तुति-डॉ.प्रकाश काछवाल

|| हरिः शरणम् ||

Thursday, September 28, 2017

भज गोविन्दम् - श्लोक सं.3(समापन)-

भज गोविन्दम् – श्लोक सं.-3(समापन अंश)-
          आदि शंकराचार्य जी ने स्त्री के शरीर के आकर्षण के पीछे छुपे हाड़, मांस, वसा आदि का बारम्बार ध्यान में रखने का कहा है, जिससे उस आकर्षण के वशीभूत न हो सकें | क्या यही एक रास्ता है, स्त्री आकर्षण से बचने का, उस रूप के आकर्षण को स्पर्श की अवस्था तक न जाने देने के लिए ? आचार्य श्री गोविन्द राम शर्मा कहते हैं कि हाँ, एक और रास्ता है, इस आकर्षण को स्पर्श में न बदल देने के लिए | वह रास्ता है, ‘मातृ पर दारेषु’ के भाव का | इस भाव को सदैव ध्यान में रखना अर्थात अपनी पत्नी के अतिरिक्त प्रत्येक स्त्री को मां के समान समझना | मैं शत प्रतिशत सहमत हूँ उनके इस कथन से | परन्तु इस युग में, जिसमें हमें दूरदर्शन पर प्रतिदिन रिश्तों को तार-तार करते सिरिअल दिखाए जा रहे हैं, जहाँ एक पुरुष की पत्नी का पर पुरुष के साथ सम्बन्ध केवल आधुनिकता ही नहीं, प्रगतिशील तक माना जा रहा हो, वहां यह मान लेना कि आज की युवा पीढ़ी प्रत्येक स्त्री को अपनी मां के समान समझेगा, कल्पनातीत है | पतन की पराकाष्ठा तो तब हो जाती है, जब आज के तथाकथित धर्मगुरु भी स्त्री आकर्षण में बंधकर व्यभिचारिता के एक-एक कर आरोपी बनते जा रहे हैं | उन पर लग रहे इन आरोपों ने युवा पीढ़ी को सनातन धर्म से विमुख करने में आग में घी डालने का काम किया है | आज की युवा पीढ़ी हमारे धर्म शास्त्रों से विमुख हो रही है और इस पुरातन संस्कृति का सर्वनाश करने में लगी है, उसको सही मार्ग दिखाना हम सब का कर्तव्य बनता है |
       आचार्य जी के कथन से स्त्री के हो रहे शोषण पर अंकुश लग सकता है | इसके लिए युवा वर्ग को सनातन धर्म और संस्कृति की महानता से परिचित कराना आवश्यक है | जब व्यक्ति अपने धर्म और संस्कृति से थोडा सा भी जुड़ जायेगा तो फिर उसके लिए प्रत्येक स्त्री देवी-स्वरूपा ही होगी | जब ऐसी सूक्ष्म दृष्टि व्यक्ति में विकसित हो जाएगी, तो स्थूल शरीर को देखने की दृष्टि भी बदल जाएगी | जब हम स्त्री के स्थूल शरीर को स्थूल दृष्टि से मात्र एक भोग्य शरीर के रूप में देखेंगे तब तो शंकराचार्य जी का कथन ही एक मात्र रास्ता है, स्त्री के प्रति आकर्षण से बचने का | स्थूल दृष्टि में नारी का आकर्षण उसका भौतिक शरीर है और सूक्ष्म दृष्टि से देखने पर वह सर्वांग आकर्षक शरीर एक देवी स्वरूप नज़र आने लगता है | अंतर केवल दृष्टि का है | अतः एक स्त्री की तरफ स्थूल दृष्टि के कारण आकर्षित हों तो उसमें हाड़, मांस और वसा के संग्रह को देखें और सूक्ष्म दृष्टि से स्त्री की ओर आकर्षित हों तो उसमें एक देवी के रूप को देखें | फिर स्त्री के प्रति होने वाले व्यवहार में परिवर्तन स्वयंमेव आ जायेगा | एक स्त्री को देखने की दोनों ही दृष्टि सही और उचित हैं | इनमें से व्यक्ति को किस दृष्टि का उपयोग करना चाहिए, यह उस व्यक्ति के स्वभाव पर निर्भर करता है |
नारीस्तनभरनाभीनिवेशं, दृष्ट्वा माया मोहावेशम् |
एतन्मासं-वसादि-विकारं, मनसिविचिन्तयबारम्बारम् ||3||
अर्थात हम स्त्री की सुन्दरता से मोहित होकर उसे पाने की निरंतर कोशिश करते हैं | परन्तु हमें यह ध्यान रखना चाहिए कि यह सुन्दर शरीर केवल हाड़-मांस का टुकड़ा मात्र है |
|| भज गोविदं भज गोविन्दं गोविन्दं भज मूढ़मते ||
कल श्लोक सं.4
प्रस्तुति-डॉ.प्रकाश काछवाल

|| हरिः शरणम् || 

Wednesday, September 27, 2017

भज गोविन्गाम् - श्लोक सं.3(कल से आगे)-

भज गोविन्दम् – श्लोक सं.3(कल से आगे-4)-
           स्त्री की रचना प्रकृति ने की ही इस प्रकार है कि प्रत्येक स्त्री सुन्दर दिखाई दे | स्त्री के अंगों का आकार ही स्त्री को सुन्दरता प्रदान करता है, केवल उसका गौर वर्ण होना ही उसे सुन्दर कहलाने के लिए पर्याप्त नहीं है | शरीर विज्ञान के अनुसार जब बालिका युवावस्था की दहलीज पर कदम रखती है, तब उसके शरीर में पैदा होने वाले हार्मोंस के प्रभाव से शरीर के विशेष भागों में वसा का अधिक संचय प्रारम्भ हो जाता है | यह वसा का संचय उसके शरीर को सुडौल और आकर्षक बनाता है | इसी प्रकार एक बालक के युवावस्था में प्रवेश करने पर उसके भीतर पैदा होने वाले हार्मोंस के प्रभाव से उसका शरीर मांसपेशियों के कारण बलिष्ठ प्रतीत होने लगता है | इस प्रकार युवावस्था में एक स्त्री का आकर्षण पुरुष के प्रति और एक पुरुष का स्त्री के प्रति होना प्राकृतिक तौर पर स्वाभाविक है | इसी आकर्षण के पैदा होने का प्रारम्भ आँखों के माध्यम से शरीर में उत्पन्न होता है, जो स्पर्श दर स्पर्श जीवन पर्यंत चलता रहता है | तृप्ति फिर भी नहीं मिलती | जब हार्मोन्स का स्राव कम होने लगता है, तब तक मन में यह काम-भाव स्थाई रूप से अपना स्थान बना लेता है | युवावस्था के बीत जाने पर मनुष्य में स्पर्श-भोग शारीरिक स्तर पर होना लगभग असंभव हो जाता है परन्तु आँखों के माध्यम से स्त्री का आकर्षण उसे प्रभावित किये बिना नहीं रहता | इस कारण से उसके मन में ऐसे ही आकर्षण के प्रभाव से स्त्री के स्पर्श का चिंतन जीवन भर चलता रहता है | इसलिए आवश्यक है कि इस विपरीत लिंग के प्रति होने वाले आकर्षण के पीछे छुपे वसा और मांस आदि के आधार का बारम्बार ध्यान करें, जिससे शरीर के प्रति आकर्षण समाप्त हो सके और मन में स्पर्श-भोग की कामना तक न उठ पाए, चिंतन करना तो बहुत दूर की बात होगी | कोई बिरला ही इस अवस्था को छू सकता है | बहुत मुश्किल है, इस काम चिंतन की वृति को त्यागना | ब्रह्मलीन स्वामी श्री रामसुखदास जी महाराज कहा करते थे कि यह शरीर मल-मूत्र बनाने का एक कारखाना मात्र है | उनकी इस बात को स्त्री/पुरुष के प्रति आकर्षण होने के समय अगर ध्यान में रखें, तो काम-भाव से मुक्त हुआ जा सकता है |
         इसीलिए शंकराचार्य जी कह रहे हैं कि प्रकृति के गुणों के कारण स्त्री के स्तन, नाभि आदि अंगों के कारण उसमें आकर्षण होना स्वाभाविक है | परन्तु स्त्री/पुरुष के उस रूप के पीछे छिपे हुए हाड़-मांस, वसा आदि का बारम्बार चिंतन करते रहें | ऐसे चिंतन से धीरे-धीरे स्त्री/पुरुष में स्वाभाविक आकर्षण समाप्त हो जायेगा | इस आकर्षण से मुक्त होने के लिए गोविन्द को सदैव भजते रहें |
कल श्लोक 3 का समापन
प्रस्तुति- डॉ. प्रकाश काछवाल

|| हरिः शरणम् ||

Tuesday, September 26, 2017

भज गोविन्दम् - श्लोक सं.3(कल से आगे-3)-

भज गोविन्दम् – श्लोक सं.3(कल से आगे-3)-
            इतने विवेचन के बाद यह प्रश्न उठता है कि अपने आपको स्त्री के आकर्षण के वशीभूत होने से कैसे बचाया जाये ? शंकराचार्यजी महाराज ने कह तो दिया कि स्त्री के नाभिप्रदेश और स्तन के आकर्षण के पीछे छुपे रहस्य हाड़, मांस, वसादि का बार-बार ध्यान करें | स्त्री का शरीर ही केवल हाड़, मांस और वसा आदि से नहीं बना है बल्कि सभी शरीर चाहे वह किसी पुरुष का हो अथवा स्त्री का, इन तीनों के मिलने से ही बना है | अतः यह आवश्यक है कि एक पुरुष भी अपने शरीर को भी एक स्त्री के शरीर की भांति ही देखे | जब तक हमें हमारे शरीर में भी हाड़, मांस तथा वसा दिखाई नहीं देगी, तब तक हम किसी दूसरे के शरीर में यह सब नहीं देख पाएंगे | हम सभी प्राणी इन्हीं हाड़, मांस और वसा से बने पुतले मात्र हैं | हमें तभी स्त्री के शरीर के आकर्षण के पीछे भी यही हाड़-मांस और वसा दिखलाई देंगे, अन्यथा नहीं |
         एक मनुष्य में स्त्री के प्रति पुरुष और एक पुरुष के शरीर के प्रति यह आकर्षण क्यों होता है ? मानव शरीर विज्ञान की जरा सी भी जानकारी रखने वाला जानता है कि यह शरीर मां और पिता दोनों के संयोग से बनता है | हमारे शास्त्रों में इसी कारण से ईश्वर को अर्धनारीश्वर (XY गुणसूत्र के कारण) के रूप में भी दिखाया गया है | प्रत्येक पुरुष में नारी का अंश (X गुणसूत्र) अवश्य ही रहता है, परन्तु नारी में पुरुष का अंश (Y गुणसूत्र) नहीं | यही X गुणसूत्र ही एक पुरुष का स्त्री में और Y गुणसूत्र एक स्त्री का पुरुष में आकर्षण का मुख्य कारण है | स्त्री के शरीर में XX गुणसूत्र होते हैं और पुरुष में XY गुणसूत्र | एक पुरुष का स्त्री के प्रति अधिक आकर्षण स्त्री में (2) XX गुणसूत्रों के उपस्थित होने के कारण अधिक होता है | एक पुरुष के प्रति स्त्री का आकर्षण उसमें उपस्थित एक Y गुणसूत्र के कारण होता है | इसी प्रकार एक पुत्र का अपनी मां के प्रति लगाव अधिक होता है और एक पुत्री का अपने पिता के प्रति | हमारी संस्कृति और संस्कार ऐसे हैं जहाँ पर रिश्तों को समझने और उसके अनुसार व्यवहार करने को अधिक महत्त्व दिया जाता है | यही कारण है कि हम इस आधुनिक युग में भी काम के बढ़ते प्रभाव से कुछ सीमा तक अभी भी मुक्त हैं | पश्चिमी सभ्यता का प्रभाव भी इस युग में हमारे कई पवित्र रिश्तों को इस आकर्षण के कारण तार-तार करने लगा है | ऐसे समय में हमारे लिए शंकराचार्यजी कृत’ भज गोविन्दम्’ का यह तीसरा श्लोक मार्गदर्शक बना हुआ है |
क्रमशः
प्रस्तुति –डॉ.प्रकाश काछवाल

|| हरिः शरणम् ||

Monday, September 25, 2017

भज गोविन्दम् - श्लोक सं.3(कल से आगे-2)-

भज गोविन्दम् – श्लोक सं.3 (कल से आगे-2)-
           स्त्री का आकर्षण भी पुरुष के प्रति होता है परन्तु एक स्त्री पुरुष को सबसे अधिक आकर्षित करती है | यही कारण है कि शंकराचार्यजी महाराज ने इस श्लोक में स्त्री के आकर्षण को ही स्पष्ट किया है | गोस्वामी तुलसीदासजी बड़े ज्ञानी व्यक्ति थे | जीवन के प्रारम्भ के कुछ वर्षों में ही उन्होंने समस्त शास्त्रों का अध्ययन कर लिया था | बड़े ही विवेकपूर्ण व्यक्तित्व था, उनका | विवाह उपरांत व अपनी पत्नी के प्रति बहुत अधिक आसक्त हो गए थे | एक बार उनकी पत्नी अपने भाई के साथ अपने पीहर चली गयी | गोस्वामीजी से उसका वियोग सहन नहीं हुआ और वे उसी दिन अपनी ससुराल के लिए निकल पड़े | रात हो चुकी थी और रास्ते में पड़ने वाली नदी को पार करने के लिए कोई नाव का साधन भी उपलब्ध नहीं था | उस समय उनकी दृष्टि एक शव पर पड़ी जो नदी की धारा के साथ बहा जा रहा था | कामान्ध तुलसी ने शव का सहारा लिया और नदी को पार किया | रात को ससुराल के घर का दरवाजा अन्दर से बंद था | घर की दीवार से एक सर्प लटका हुआ था | कामासक्त तुलसी को वह एक रस्सी नज़र आया और उसको पकड़कर दीवार के ऊपर चढ़कर घर के भीतर कूद गए और अपनी पत्नी के शयन कक्ष में पहुँच गए | पत्नी ने अर्ध रात्रि को अपने पति को शयन कक्ष में देखा तो उसको बड़ा आश्चर्य हुआ | उसने तुलसी से पूछा कि वे किस प्रकार उसके पास तक पहुंचे ? तुलसी ने सारा घटनाक्रम बताया | सुनकर पत्नी बड़ी व्यथित हो गयी | उसने तुलसी को कहा-‘तुम्हारी जितनी आसक्ति इस मेरे हाड़-मांस के शरीर में है, उससे आधी आसक्ति भी अगर परमात्मा के प्रति होती तो तुम्हारा कल्याण हो गया होता |’ गोस्वामीजी को यह बात तीर की तरह लगी और फिर जीवन भर उन्होंने स्त्री के शरीर को मात्र हाड़-मांस ही समझा | तत्काल ही वे ससुराल से निकल पड़े और परमात्मा की शरण हो लिए | उसी घटना के परिणाम स्वरूप तुलसी ने रामचरितमानस जैसे ग्रन्थ की रचना की और गोस्वामी तुलसीदास कहलाये | यदि चुभती हुई बात सुनकर भी वे उस समय स्त्री के आकर्षण में जकड़े रहते तो आप कल्पना कर सकते हैं कि क्या होता ? आज गोस्वामी तुलसीदासजी का यह दृष्टान्त देने के लिए नहीं होता |
               प्रकृति की देन है, पुरुष और स्त्री | उनमें एक दूसरे के प्रति आकर्षण होना भी प्रकृति के स्वभाव के कारण है | अगर आकर्षण नहीं होता तो फिर सृष्टि-चक्र कैसे चलता ? आकर्षण होना अनुचित नहीं है, अनुचित है आकर्षण का आसक्ति में परिवर्तित हो जाना | काम-भोग अनुचित नहीं है, अनुचित है कामासक्त हो जाना | आदि गुरु शंकराचार्य जी महाराज कह रहे हैं कि स्त्री से न तो भागें और न ही उसे भोग कर उसमें आसक्त हो | दोनों ही अनुचित है | स्त्री के प्रति जब आकर्षण बढे तो बारम्बार यह चिंतन करें कि उसके आकर्षित करने वाले अंग केवल मात्र हाड़, मांस और वसा के अतिरिक्त कुछ भी नहीं है | इससे आप उस आकर्षण के वशीभूत नहीं होंगे |
क्रमशः
प्रस्तुति – डॉ. प्रकाश काछवाल

|| हरिः शरणम् ||

Sunday, September 24, 2017

भज गोविन्दम् -श्लोक सं.3(कल से आगे)-

भज गोविन्दम् – श्लोक-3(कल से आगे)-
         काम एक ऐसा विषय है, जिसे प्रत्येक व्यक्ति अपने जीवन में सुख प्राप्त करने के लिए भोगना ही चाहता है | काम और स्त्री का आपस में कितना गहरा सम्बन्ध है, उसका आप स्वयं अपने ह्रदय पर हाथ लगाकर देख सकते हैं | सत्य कहूँ, यह काम ही वह विषय है जिसके बारे में मनुष्य जीवन में सर्वाधिक सोचता है | क्यों सोचता है, यह विस्तृत विवेचन का विषय है | यह विषय उसके मन को कभी छोड़ता ही नहीं है | काम का चिंतन मनुष्य के मन में सदैव चलता ही रहता है | मनुष्य की मानसिक स्थिति को काम सर्वाधिक प्रभावित करता है | मनुष्य की पांचों ज्ञानेन्द्रियाँ इसमें सहयोग करती है | सर्वाधिक सहयोग करने वाली दो ज्ञानेन्द्रियाँ है - दर्शनेंद्रिय (नेत्र) और स्पर्शेन्द्रिय (त्वचा) | इसीलिए कहा जाता है कि काम सदैव आँखों के माध्यम से शरीर में प्रवेश करता है और उसकी पराकाष्ठा स्पर्श कर लेने में होती है | परन्तु एक बार के स्पर्श से मनुष्य कभी भी संतुष्ट नहीं हो सकता | स्त्री का स्पर्श ही मनुष्य की काम-तृष्णा को बढ़ा देता है तथा फिर और अधिक से अधिक बार स्पर्श करने की कामना मन में उठने लगती है | यही कारण है कि मनुष्य अपने जीवन में इस काम के बारे में सर्वाधिक सोचता है |
              शंकराचार्य जी ने यहाँ स्त्री के शरीर के अंगों, विशेष रूप से स्तन और नाभि की बात कही है | स्तन और नाभि का आकर्षण सर्वाधिक होता है, जो कृष्ण वर्ण की नारी को भी सुन्दरता प्रदान कर देता है | यह प्रकृति का नियम है जो कहता है कि विपरीत लिंग का आकर्षण स्वाभाविक है | परन्तु उस आकर्षण से प्रभावित होकर पुरुष काम में लिप्त तो हो जाता है परन्तु यह काम-भोग उसे जीवन भर तृप्ति नहीं दे सकता | इसीलिए विद्वानों ने कहा है कि काम अर्थात सेक्स ही वह विषय है जिसके बारे में मनुष्य जीवन भर विचार करता रहता है | विपरीत लिंग के आकर्षण के कारण एक स्त्री का भी एक पुरुष में आकर्षण होता ही है | स्त्री भी सतत काम के बारे में विचार करती रहती है परन्तु स्त्री की काम भावना प्रायः अव्यक्त ही रह जाती है, चाहे ऐसा हमारे संस्कारों के कारण ही होता हो | आज हमारे संस्कारों से हम दूर होते जा रहे हैं और उसके कारण पड़ने वाले प्रभाव को हम स्पष्टतः देख ही रहे हैं | आज स्त्री, नारी-स्वतंत्रता के नाम पर कामुक होकर काम-भोग को भी अपना एक अधिकार समझने लगी है |
क्रमशः
प्रस्तुति-डॉ.प्रकाश काछवाल

|| हरिः शरणम् || 

Saturday, September 23, 2017

भज गोविन्दम - श्लोक सं.-3

भज गोविन्दम- श्लोक-3
नारीस्तनभरनाभीनिवेशं, दृष्ट्वा माया मोहावेशम् |
एतन्मासं-वसादि-विकारं, मनसिविचिन्तयबारम्बारम् ||3||
अर्थात हम स्त्री की सुन्दरता से मोहित होकर उसे पाने की निरंतर कोशिश करते हैं | परन्तु हमें यह ध्यान रखना चाहिए कि यह सुन्दर शरीर केवल हाड़-मांस का टुकड़ा मात्र है |
          मनुष्य में एक मुख्य विशेषता है, जिसको बताने में सभी ज्ञानी व्यक्ति अधिक सतर्कता बरतते हैं | मैं कहता हूँ कि किसी विषय को जब सर्वाधिक स्पष्ट करने की आवश्यकता होती है, उसे छिपाते हुए अर्थात उस विषय को स्पष्ट करने में अगर शालीनता की सीमा से अधिक नियंत्रण रखा जाता है तो इसे दुर्भाग्य पूर्ण ही कहा जायेगा | जिस देश की संस्कृति संसार में सर्वोत्तम रही है और जहाँ एक से बढ़कर एक ज्ञानी व्यक्ति पैदा हुए हैं, वहां पर किसी भी प्रकार के ज्ञान को स्पष्ट करने में कोई कमी नहीं रहने दी जानी चाहिए | इसी प्रकार का एक ज्ञान है, काम-विज्ञान | इस विषय को स्पष्ट करने में हम सभी थोड़े बहुत चूक ही जाते हैं जबकि यह विषय हमारे यहाँ कोणार्क, खजुराहो आदि देवालयों में पत्थरों तक पर स्पष्ट रूप से उकेरा गया है |
     शंकराचार्य जी महाराज भी इस विषय पर स्पष्टता के साथ कह रहे हैं कि मनुष्य नारी देह के अंगों को देखकर उसमें मोहित हो जाता है और स्त्री को किसी भी प्रकार से प्राप्त कर भोगना चाहता है | लेकिन अगर हम गंभीरता के साथ देखें तो पाएंगे कि उस स्त्री की सुन्दरता के पीछे केवल हाड़ और मांस के अतिरिक्त कुछ भी नहीं है | क्या कोई मनुष्य हाड़ और मांस को ही जीवन भर प्राप्त करने का प्रयास करता रहेगा ? इस बात को मैं एक दृष्टान्त देते हुए स्पष्ट करने का प्रयास कर रहा हूँ | एक बार एक राज्य का राजा किसी गरीब घर की सुन्दर कन्या पर मोहित हो गया | उसने उस कन्या के पिता के समक्ष उस कन्या से विवाह का प्रस्ताव रखा | राजा आयु में बहुत बड़ा था और कन्या सुकुमार अवस्था की थी | कन्या नहीं चाहती थी कि उसका उस बूढ़े राजा के साथ विवाह हो | परन्तु राजा को स्पष्ट मना भी कैसे कर दे | उसने एक निर्णय लिया और कहा कि वह राजा से विवाह करने को तैयार है, परन्तु एक माह बाद राजा यहाँ आये, मुझे देखे और फिर उससे विवाह का निर्णय करे | राजा सहर्ष मान गया | एक माह बाद राजा वहां पहुंचा और कन्या को देखना चाहा | कन्या को उसके समक्ष प्रस्तुत किया गया | यह क्या, एक माह पहले वाली रूपवती कन्या तो अब बुढ़िया सी लगने लगी है | गाल पिचक गए हैं और शरीर में चमड़ी और हड्डियों के अतिरिक्त कुछ भी शेष नहीं रहा है | मांसल शरीर हड्डियों का ढांचा मात्र रह गया है | ऐसे अस्थिपंजर से विवाह कौन और किस लिए करे ? राजा यह देखकर हतप्रभ रह गया | राजा ने इसका कारण जानना चाहा कि उस सुन्दर कन्या का वह रूप-रंग कहाँ गया ? कन्या ने कोने में पड़े घड़ों की तरफ इशारा किया कि वह रूप-रंग इन घड़ों में बंद है |
            राजा ने एक घड़े को खुलवाया तो उससे आ रही मल की गंध को सहन नहीं कर सका | वास्तव में हुआ यह था कि राजा के विवाह प्रस्ताव के बाद से ही उस कन्या ने प्रतिदिन जुलाब लेना प्रारम्भ कर दिया जिससे उसे अतिसार हो गया और वह एक माह में ही सुन्दर से कुरूप होकर रह गयी | कहने का अर्थ यह है कि जब शरीर को रूपवान मांस ही बनाता है और बिना मांस के सुन्दरता भी केवल हड्डियों पर कैसे टिकती ? हमारे पूर्वजों ने पत्थरों पर विभिन्न काम मुद्राओं में रत स्त्री-पुरुष की मूर्तियाँ उकेरी ही इसलिए थी कि प्रत्येक मनुष्य को उस मुद्रा के पीछे छिपा पत्थर दिखाई पड़े जिससे उसकी एक स्त्री में आसक्ति दूर हो सके | स्त्री को केवल भोग्या समझकर उसे पाने की कामना न करें बल्कि उसकी सुन्दरता के पीछे छिपे आधार को देखें | उस आधार को समझते ही आपकी भी स्त्री के प्रति आसक्ति न रह पायेगी |
क्रमशः
प्रस्तुति – डॉ.प्रकाश काछवाल

|| हरिः शरणम् ||