Thursday, September 7, 2017

आचार्यजी सत्संग @ सुजानगढ़ - 5

आचार्यजी सत्संग @ सुजानगढ़ – 5
भज गोविन्दम’ स्तोत्र की रचना आदिगुरू शंकराचार्य ने की थी। यह मूल रूप से बारह पदों में सरल संस्कृत में लिखा गया एक सुंदर स्तोत्र है। इसलिए इसे ‘द्वादश मंजरिका’ भी कहते हैं। बाद में उनके शिष्यों ने इसमें कुछ श्लोक और जोड़ दिए हैं | इस प्रकार इसमें आज तक कुल 31 श्लोक हो गए हैं | ‘भज गोविन्दम’ में शंकराचार्य जी ने संसार के मोह में ना पड़ कर भगवान श्री कृष्ण की भक्ति करने का उपदेश दिया है। उनके अनुसार, संसार असार है और केवल एक भगवान का नाम ही शाश्वत है। उन्होंने मनुष्य को पुस्तकीय ज्ञान में समय ना गँवाकर और भौतिक वस्तुओं की लालसा, तृष्णा व मोह छोड़ कर भगवान का भजन करने की शिक्षा दी है। इसलिए ‘भज गोविन्दम’ को ‘मोह मुगदर’ यानि मोह नाशक भी कहा जाता है, जिसका अर्थ है- वह शक्ति जो आपको सांसारिक बंधनों से मुक्त कर दे । शंकराचार्य जी का कहना है कि अन्तकाल में मनुष्य की सारी अर्जित विद्याएँ और कलाएँ किसी काम नहीं आएंगी, काम आएगा तो केवल हरि का नाम। “भज गोविन्दम” श्री शंकराचार्य की एक बहुत ही खूबसूरत रचना है।
भज गोविन्दं भज गोविन्दं, गोविन्दं भज मूढ़मते। सम्प्राप्ते सन्निहिते मरणे, नहि नहि रक्षति डुकृञ् करणे ॥1
हे भटके हुए प्राणी, सदैव परमात्मा का ध्यान कर क्योंकि तेरी अंतिम सांस के वक्त तेरा यह सांसारिक ज्ञान तेरे काम नहीं आएगा, सब कुछ नष्ट हो जाएगा।
         यह “भज गोविन्दम” कृति का प्रथम श्लोक है | इस रचना में कुल 31 श्लोक हैं, जो एक से बढकर एक हैं | ज्ञान और भक्ति का अनूठा संगम देखना हो तो “भज गोविन्दम” के भीतर तक प्रवेश करके देखें | इस रचना की व्याख्या करना कोई सरल कार्य नहीं है | यह रचना आपके अन्तःस्थल को परिवर्तित करने की क्षमता रखती है | इस महान कृति पर प्रवचन करने आ रहे हैं, हरिः शरणम् आश्रम, बेलडा (हरिद्वार) के आचार्य श्री गोविन्द राम शर्मा | हमें अपने सौभाग्य से ज्ञान और भक्ति के रस में आकंठ डूबने के लिए यह दुर्लभ अवसर इस जीवन में मिल रहा है, इसे हाथ से न जाने दें और पहुँच जाएँ, श्री माहेश्वरी सेवा सदन, डॉ. छाबडाजी के निवास स्थान के पास, सुजानगढ़, जहाँ पर दिनांक 9 सितम्बर 2017 से 15 सितम्बर 2017 तक प्रतिदिन सायं 4 से 6 बजे तक “भज गोविन्दम” पर प्रवचन होंगे |
सानुरोध......
डॉ.प्रकाश काछवाल

|| हरिः शरणम् ||

Wednesday, September 6, 2017

आचार्यजी सत्संग @ सुजानगढ़ - 4

आचार्यजी सत्संग @ सुजानगढ़ – 4
पूँछेहु मोहि कि रहौं कहँ मैं पूँछत सकुचाउँ |
जहँ न होहु तहँ देहु कहि तुम्हहि देखावौं ठाउँ || रामचरितमानस-2/127 ||
वाल्मीकि जी कह रहे हैं कि हे राम ! आपने मुझसे पूछा कि मैं कहाँ रहूँ ? परन्तु मैं यह पूछते हुए सकुचा रहा हूँ कि जहाँ आप न हों, पहले मुझे वह स्थान बता दीजिये | उसके बाद मैं आपको आपके रहने योग्य स्थान दिखा पाऊँगा |
भगवान श्री राम महर्षि वाल्मीकि के आश्रम पहुंचे हैं और उन्हें पूछ रहे हैं कि मैं कहाँ रहूँ ? परमात्मा, जो कि सर्वत्र व्याप्त है, उनके द्वारा ऐसा पूछना मन में एक भ्रम उत्पन्न करता है | आपका यह भ्रम परमात्मा की कृपा से ही दूर हो सकता है | तभी तो महर्षि वाल्मीकि कह रहे हैं –‘प्रभु ! आपको वही व्यक्ति जान सकता है, जिसे आप जना देना चाहते हैं अन्यथा आपको जानना किसी के भी वश में नहीं है |
सोइ जानइ जेहि देहु जनाई | जानत तुम्हहि तुम्हइ होइ जाई ||रामचरितमानस- 2/127/3||
            एक बार जिसने उसको जान लिया, फिर किसी अन्य को जानने की आवश्यकता नहीं है | इसी को आत्म-बोध होना कहते हैं | एक बार आत्म-बोध हो गया, फिर संसार असत्य हो जाता है | वाल्मीकि जी को आत्म-बोध था, फिर भी उन्होंने भगवान श्री राम के पूछने पर वे सभी स्थान विस्तार से बताये हैं, जहाँ परमात्मा निवास करते हैं |
           इस मार्मिक प्रसंग को और अधिक गहराई से समझने के लिए हम नित्य-स्तुति, गीता और भागवत-पाठ के बाद रामचरितमानस के इस प्रसंग का अर्थ सहित पठन करेंगे |
स्थान –
दिनांक- 7 व 8 सितम्बर 2017      श्री परशुराम भवन, सुजानगढ़
दिनांक- 9 से 15 सितम्बर 2017     श्री माहेश्वरी सेवा सदन, डॉ.छाबड़ा जी
                                के निवास स्थान के पास , सुजानगढ़ |
सानिध्य – आचार्य श्री गोविन्द राम शर्मा, हरिः शरणम् आश्रम, बेलडा, हरिद्वार
सानुरोध -----
डॉ. प्रकाश काछवाल

|| हरिः शरणम् ||  

Tuesday, September 5, 2017

आचार्यजी सत्संग @ सुजानगढ़ - 3

आचार्यजी सत्संग @ सुजानगढ़ – 3
आत्मानमेवात्मतयाविजानतां
    तेनैव जातं निखिलं प्रपंचितम् |
ज्ञानेन भूयोऽपि च तत् प्रलीयते
     रज्ज्वामहेर्भोगभवाभवौ यथा ||भागवत-10/14/25||
अर्थात जो पुरुष परमात्मा को आत्मा के रूप में नहीं जानते, उन्हें उस अज्ञान के कारण ही इस नाम रूपात्मक निखिल प्रपंच की उत्पत्ति का भ्रम हो जाता है | किन्तु ज्ञान होते ही इसका आत्यंतिक प्रलय हो जाता है | जैसे रस्सी में भ्रम के कारण ही सांप की प्रतीति होती है और भ्रम के निवृत होते ही उसकी निवृति हो जाती है |
     संसार के जनक प्रजा पिता ब्रह्माजी भगवान की स्तुति करते हुए कहा रहे हैं कि समस्त संसार एक प्रपंच के अतिरिक्त कुछ भी नहीं है | अँधेरे में जैसे हम एक रस्सी को सांप समझ लेते हैं, उसी प्रकार संसार जो कि केवल एक नाम-रूप का स्वप्न मात्र ही है और हम उस स्वप्न को ही यथार्थ मान बैठे हैं | ज्ञान ही इस स्वप्न को तोड़ सकता है | एक बार ज्ञान हो जाने पर सारा संसार स्वप्न ही नज़र आने लगता है | इतने समय से हम असत को सत समझ रहे हैं, यही हमारा अज्ञान है | अज्ञान का अन्धकार मिटते ही चारों और सत ही सत नज़र आने लगता है |
              भ्रम की निवृति बहुत ही आवश्यक है | एक परमात्मा ही सत्य है | ब्रह्माजी द्वारा की जा रही इस स्तुति को आत्म-सात करने के लिए प्रतिदिन भागवत-पाठ करना आवश्यक है | हम भी आपके साथ इसी प्रसंग का प्रतिदिन भागवत के एक पृष्ठ का अर्थ सहित पाठ करेंगे और परमात्मा की स्तुति का अर्थ समझने का प्रयास करेंगे |
स्थान –
दिनांक- 7 व 8 सितम्बर 2017      श्री परशुराम भवन, सुजानगढ़
दिनांक- 9 से 15 सितम्बर 2017     श्री माहेश्वरी सेवा सदन, डॉ.छाबड़ा जी
                                के निवास स्थान के पास , सुजानगढ़ |
सानिध्य – आचार्य श्री गोविन्द राम शर्मा, हरिः शरणम् आश्रम, बेलडा, हरिद्वार
सानुरोध -----
डॉ. प्रकाश काछवाल

|| हरिः शरणम् ||  

Monday, September 4, 2017

आचार्यजी सत्संग @ सुजानगढ़ - 2

आचार्यजी सत्संग @ सुजानगढ़  – 2
न मां कर्माणि लिम्पन्ति न में कर्मफले स्पृहा |
इति मां योSभिजानाति कर्मभिर्न स बध्यते || गीता- 4/14||
अर्थात कर्मों के फल में मेरी स्पृहा नहीं है, इसलिए मुझे कर्म लिप्त नहीं करते हैं | इस प्रकार जो मुझे तत्व से जान लेता है, वह भी कर्मों से नहीं बंधता |
         मनुष्य की सबसे बड़ी विडम्बना यही है कि वह प्रत्येक कार्य का स्वयं कर्ता बन बैठता है | भगवान श्री कृष्ण अर्जुन को यही समझा रहे हैं कि ‘कर्म मैं भी करता हूँ परन्तु कर्मों में मेरी आसक्ति नहीं है | कर्मों में आसक्ति न होने से कर्म मुझे बांधते नहीं है और न ही मैं कर्मों में लिप्त होता हूँ | मेरी इस तात्विक बात को जो समझ लेता है, वह मुझे भी जान लेता है और वह भी फिर कभी कर्म-बंधन में नहीं पड़ता |’
           अर्जुन को यह बात श्री कृष्ण ने आज से लगभग 5000 वर्ष पूर्व समझाई थी | वह द्वापर युग का अंतिम चरण था, बीत गया | अभी कलियुग चल रहा है | गीता ही हमारे लिए श्री कृष्ण है और हम अर्जुन | अतः गीता ही हमें कर्म-योग को समझने के लिए एक मात्र साधन है | तो आइये ! प्रातः 5 बजे होने वाली सामूहिक नित्य-स्तुति कार्यक्रम में भाग लें, जहाँ आप और हम मिलकर सामूहिक रूप से नित्य-स्तुति के बाद प्रातः कालीन सत्र में गीता के इस महत्वपूर्ण अध्याय चार का गीता-प्रबोधिनी से नित्य 5 श्लोकों का उनके अर्थ और स्वामीजी द्वारा की गई व्याख्या सहित पठन करेंगे |
स्थान –
दिनांक- 7 व 8 सितम्बर 2017      श्री परशुराम भवन, सुजानगढ़
दिनांक- 9 से 15 सितम्बर 2017     श्री माहेश्वरी सेवा सदन, डॉ.छाबड़ा जी
                                के निवास स्थान के पास , सुजानगढ़ |
सानिध्य – आचार्य श्री गोविन्द राम शर्मा, हरिः शरणम् आश्रम, बेलडा, हरिद्वार
सानुरोध -----
डॉ. प्रकाश काछवाल

|| हरिः शरणम् || 

Sunday, September 3, 2017

आचार्यजी सत्संग @ सुजानगढ़ - 1

आचार्यजी सत्संग @ सुजानगढ़ – 1
त्वमादिदेवः पुरुषः पुराण-
स्त्वमस्य विश्वस्य परं निधानम् |
वेत्तासि वेद्यं च परं च धाम
त्वया ततं विश्वमनन्तरूप ||गीता-11/38||
अर्थात आप ही देव और पुराण पुरुष हैं तथा आप ही इस संसार के आश्रय हैं | आप ही सबको जानने वाले, जानने योग्य और परम धाम हैं | हे अनन्तरूप ! आपसे ही सम्पूर्ण संसार व्याप्त है |
ब्रह्मलीन स्वामी रामसुखदासजी महाराज द्वारा संकलित नित्य-स्तुति का यह एक श्लोक है | ब्रह्म मुहूर्त की पवित्र बेला में जब सामूहिक रूप से यह नित्य-स्तुति की जाती है, तब परमात्मा के विराट स्वरूप में समाहित होकर आप अपने आपको खो देते हैं | आप, आप न होकर उस विराट स्वरूप का एक हिस्सा हो जाते हैं | स्वयं को खो देना ही अध्यात्म की यात्रा का एक मात्र लक्ष्य होता है | स्वयं को विराट के साथ एकाकार कर लेना ही परमात्मा को पा लेना है |
                 हमारे साथ अगर आप भी अपने आप को समाप्त करने की यात्रा पर अग्रसर होना चाहते हैं तो सामूहिक नित्य-स्तुति में सम्मिलित होकर लाभ उठायें | नित्य-स्तुति प्रातः ठीक 5 बजे प्रारम्भ होती है | इससे पूर्व 4.30 बजे से गीता-पाठ होता है | कृपया समय से पूर्व पधारकर अपना स्थान ग्रहण कर लें |
स्थान –
दिनांक- 7 व 8 सितम्बर 2017      श्री परशुराम भवन, सुजानगढ़
दिनांक- 9 से 15 सितम्बर 2017     श्री माहेश्वरी सेवा सदन, डॉ.छाबड़ा जी
                                के निवास स्थान के पास , सुजानगढ़ |
सानिध्य – आचार्य श्री गोविन्द राम शर्मा, हरिः शरणम् आश्रम, बेलडा, हरिद्वार
सानुरोध -----
डॉ. प्रकाश काछवाल

|| हरिः शरणम् ||  

Saturday, September 2, 2017

आचार्यजी सत्संग @ सीकर

आचार्यजी सत्संग @ सीकर
गीता में कर्म-योग
भगवान श्री कृष्ण ने गीता में कर्मयोग के बारे में अर्जुन को ज्ञान देना प्रारम्भ करते हुए दो महत्वपूर्ण बातें बताई।प्रथम महत्वपूर्ण बात तो यह बताई कि इस संसार मे कोई भी व्यक्ति किसी भी काल में क्षण मात्र के लिए भी कर्म किये बिना नहीं रह सकता ।(गीता-3/5)।वे आगे कहते हैं कि परमात्मा जब भी इस धरा पर मनुष्य रूप में अवतरित होते हैं, वे भी यहां कर्म करने को बाध्य होते हैं। अतः प्रत्येक कर्म के करने के कारण उत्पन्न होने वाले निश्चित फल को देखते हुए भी कर्मों से पलायन करना अनुचित है ।
दूसरी महत्वपूर्ण बात यह बताई कि कर्म करने के लिए पहले कर्म के स्वरूप को जान लेना चाहिए ।(गीता-4/17)। जब कर्म करने ही हैं, तो फिर क्यों न भली- भांति विचार करके ही कर्म किये जायँ।
कर्म,विकर्म और अकर्म क्या हैं और इनके स्वरूप को जान लेना क्यों आवश्यक है ? अर्जुन की तरह आप भी इस प्रश्न का उत्तर जानने को उत्सुक हैं, तो दिनांक 6 सितंबर 2017 को बद्री विहार, सीकर में सायं 4 से 6 बजे तक होने वाले सत्संग में पधारें । वहां पर हरि :शरणम् आश्रम,बेलड़ा (हरिद्वार) के आचार्य श्री गोविंदराम शर्मा "गीता में कर्म-योग" विषय पर व्याख्यान देंगे।
सानुरोध.........
डॉ. प्रकाश काछवाल
।। हरि: शरणम् ।।

Friday, September 1, 2017

गुरु के सूत्र - 27 समापन कड़ी

गुरु के सूत्र – समापन कड़ी – 27  
सार- संक्षेप –
                गुरु के सूत्र हमें परमात्मा के मार्ग पर अग्रसर करते हुए उस अवस्था तक पहुंचा सकते हैं, जिसे मानव जीवन की सर्वोत्तम अवस्था कहा जा सकता है | सर्वप्रथम हमें संतुष्ट जीवन के सूत्र को अपनाना होगा | व्यक्ति अपने जीवन से तभी संतुष्ट हो सकता है, जब वह मिल रहे प्रत्येक साधन और सामान को परमात्मा का प्रसाद मानते हुए स्वयं में रमा रहे | आत्म संतुष्टि मनुष्य को बाहर भटकते रहने से कभी भी नहीं मिल सकती | उसको स्वयं के भीतर प्रवेश करना होगा | इस संसार में परमपिता ने कोई भी दो वस्तुएं अथवा व्यक्ति समान नहीं बनाये हैं | सबको मनुष्य जीवन अपने पुरुषार्थ के अनुसार मिला है और उसके जीवन में उपलब्धियां भी उसी पुरुषार्थ से बने प्रारब्ध के अनुसार होगी | स्वयं की तुलना किसी दूसरे व्यक्ति से करना ही असंतोष को आमंत्रित करना है | अतः स्वयं में ही संतुष्ट रहना ही संतुष्ट जीवन का आधार है |
                     संतुष्ट जीवन से व्यक्ति स्वाधीन जीवन की और बढ़ता है | स्वाधीनता स्वयं के अधीन होने का नाम है | परमात्मा और प्रकृति के नियमों को आत्मसात कर जीवन जीना ही स्वाधीन जीवन कहलाता है | जैसे आपका स्वाधीन जीवन है, वैसे ही प्रत्येक प्राणी के स्वाधीन जीवन की कामना रखें | जीवन में कभी भी किसी को अपने अधीन करने की नहीं सोचें | पराधीन जीवन सदैव ही अभिशाप होता है | अतः स्वयं स्वाधीन होकर जीने के साथ साथ अन्य प्राणियों को भी स्वाधीन होकर जीने दें |
                स्वाधीन जीवन के साथ साथ व्यक्ति को होश पूर्वक जीना चाहिए | ऐसे जीवन को हम चैतन्य जीवन कहते हैं | जहाँ पर और जिस स्थिति में आकर हम होश खो देते हैं, हमारा जीवन पशु से भी बदतर स्थिति को प्राप्त हो जाता है | मनुष्य ही एक मात्र ऐसा प्राणी है जो स्व-चेतन (Self conscious) की स्थिति को प्राप्त हुआ है | मनुष्य के अतिरिक्त अन्य प्राणी चेतन होते हुए भी स्व-अचेतन (Self unconscious) की स्थिति में रहते हैं | उन्हें स्वयं के होने के कारण का ज्ञान नहीं होता, इसीलिए अन्य प्राणियों को मात्र भोग-योनि कहा गया है | मनुष्य स्व-चेतन है, अतः उसकी योनि भोग के साथ साथ कर्म-योनि अथवा योग-योनि भी कहलाती है | होश पूर्वक होकर जीना ही चैतन्य जीवन है |
                  गुरु का अंतिम सूत्र है कि जीवन रसमय होना चाहिए | रस विहीन जीवन बोझिल जीवन होता है | बोझिल जीवन के कारण व्यक्ति आनंद को कभी भी उपलब्ध नहीं हो सकता | भोग-रस सांसारिक जीवन के लिए आवश्यक अवश्य है क्योंकि भोग पूर्व जन्म के कर्मों का परिणाम है और उन्हें भोगने ही होंगे | भोग-रस से निकलकर ही व्यक्ति शांत-रस को उपलब्ध हो सकता है | भोगों की कामनाओं पर नियंत्रण पाकर ही व्यक्ति शांति को उपलब्ध हो सकता है | शांत-रस के बाद भाव-रस की ओर अग्रसर होकर मनुष्य परमात्मा की भक्ति को प्राप्त होता है | भाव-रस की पराकाष्ठा मनुष्य को प्रेम-रस की ओर ले जाती है | प्रेम-रस से व्यक्ति संत और महंत की अवस्था प्राप्त कर परमात्म-तत्व तक पहुँच जाता है | प्रेम-रस अनंत और अखंड है | आनन्द की यह अवस्था मनुष्य को सच्चिदानंद स्वरूप तक ले जाती है | प्रेम-रस ही आत्मा को परमात्मा बना देता है | इस प्रकार ‘गुरु के सूत्र’ को जीवन में उतारकर हम अपनी यात्रा को गोविन्द तक ले जा सकते हैं | केवल गोविन्द तक पहुंचकर ही मनुष्य की यह यात्रा समाप्त हो सकती है अन्यथा यह यात्रा सांसारिक यात्रा बनकर अनवरत चलती रहेगी, कभी भी समाप्त नहीं होगी |
प्रस्तुति- डॉ. प्रकाश काछवाल

|| हरिः शरणम् ||