Saturday, August 26, 2017

गुरु के सूत्र – 21

गुरु के सूत्र – 21
रसमय जीवन (कल से आगे) -
                        भाव-रस हमें संसार में रहते हुए भी संसार में लिप्त नहीं होने देता | प्रत्येक प्राणी के लिए करुणा और सहृदयता रखना ही भाव-रस है | भक्ति का प्रारम्भ ही भाव के साथ होता है | भाव के अभाव में भक्ति केवल एक दिखावा भर बन कर रह जाती है, जो मूल्यहीन है |अतः भोग-रस को छोड़कर शांत-रस को प्राप्त कर भाव-रस में डूबना होगा, तभी हम गोविन्द को पाने की ओर अग्रसर हो सकते हैं | स्वामी शरणानन्द जी महाराज कहा करते थे कि भाव-रस अखंड है परन्तु अनन्त नहीं है | भाव-रस में सदैव ही द्वैत की अवस्था बनी रहती है, जबकि हमें इससे आगे बढ़कर अद्वैत तक पहुंचकर एकाकार होना है | कहने का अर्थ यह है कि व्यक्ति को केवल भाव-रस पर आकर ही अटक नहीं जाना है | हमें उस रस को पाना है, जो अखंड भी हो और अनन्त भी हो | वह चौथा रस क्या है, आइये ! चलते हैं उस ओर |
                    रसपूर्ण जीवन का चौथा और सर्वोत्तम रस है, प्रेम-रस | स्वामी शरणानन्द जी महाराज के अनुसार प्रेम-रस अखंड भी है और अनन्त भी | अखंड और अनंत रस, जिसे प्रेम-रस कहा जाता है वह न तो कभी मध्य में आकर टूट सकता और न ही कभी समाप्त हो सकता है | अनंत केवल गोविन्द है और उसे अनंत प्रेम-रस से ही पाया जा सकता है | प्रेम कभी भी किसी से प्रतिदान में कुछ नहीं चाहता है | प्रेम स्वार्थी नहीं है | प्रेम में द्वैत है ही नहीं, प्रेम में केवल एकत्व है | प्रेम-रस से बढकर कोई दूसरा रस हो ही नहीं सकता | रस की सर्वोत्तम निधि प्रेम ही है और प्रेम पाकर, प्रेम बांटकर मनुष्य का जीवन सफल हो जाता है | अतः अपने जीवन को प्रेम-रस से परिपूर्ण कर ले | प्रेम के रसपूर्ण जीवन और परमात्मा में कोई अन्तर नहीं है | कबीर इस प्रेम के बारे में स्पष्ट करते हुए कहते हैं-
प्रेम गली अति सांकरी, ता में दो न समाय |
जब मैं था तब हरि नहीं, अब हरि है मैं नांय ||
                    प्रेम में ‘मैं’ की समाप्ति हो जाती है और ‘मैं’ की समाप्ति पर जो शेष रहता है, वह है प्रेम से परिपूर्ण गोविन्द | प्रेम में एक ही रहता है, दूसरा बचता ही नहीं है | दो का एक हो जाना ही प्रेम है | भक्त का भगवान हो जाना, आत्मा का परमात्मा हो जाना |
   ते दिन गए अकारथी, संगत भई न संत |
प्रेम बिना पशु जीवना, भक्ति बिना भगवंत ||
                   कबीर गुरु और प्रेम को सपष्ट करते हुए कहते हैं कि मनुष्य जीवन के वे दिन व्यर्थ ही बीत गए, जिस दिन उसने किसी संत से सत्संग नहीं किया अर्थात किसी गुरु का सानिध्य प्राप्त नहीं किया | गुरु ही हमें प्रेम से सरोबार कर देता है, प्रेम-रस में डुबो देता है | प्रेम बिना तो मनुष्य का जीवन पाशविक जीवन है | भक्ति भगवान के प्रति प्रेम ही तो है |
क्रमशः
प्रस्तुति- डॉ. प्रकाश काछवाल

|| हरिः शरणम् ||

Friday, August 25, 2017

गुरु के सूत्र - 20

गुरु के सूत्र – 20
चौथा सूत्र-रसमय जीवन(कल से आगे) -
                रंगशाला में नृत्य कार्यक्रम समय पर प्रारम्भ हुआ | तीनो नृत्यांगनाएं एक से बढ़कर एक प्रस्तुति दे रही थी | नृत्य और संगीत का तालमेल बहुत ही उच्च कोटि का था | महर्षि पतंजलि बार-बार आगे बढकर नृत्य और संगीत की प्रशंसा करते हुए दाद दे रहे थे | सभी शिष्य नृत्य और संगीत का आनंद ले रहे थे | एक शिष्य जिसक नाम चरित्र था, उसको अपने गुरु का इस प्रकार नृत्य और संगीत का रसास्वादन करना अनुचित लग रहा था | उसका ध्यान नृत्य और संगीत में कम और अपने आचार्य की भाव भंगिमाओं पर अधिक था | खैर ! मध्यरात्रि को आयोजन का समापन हुआ | सभी अपने अपने शयन कक्ष की ओर बढ़ चले | महर्षि पतंजलि से अपने शिष्य चरित्र की दुविधा अधिक समय तक छुपी न रह सकी | उन्होंने अपने उस शिष्य को संबोधित करते हुए कहा – ‘चरित्र ! मैं अनुभव कर रहा हूँ कि तुम किसी बड़ी दुविधा में हो, कहो क्या बात है ?’ चरित्र ने कहा – “आचार्य ! मेरी दुविधा है कि आपके द्वारा इस प्रकार नृत्य और संगीत का रसास्वादन करना कहीं चित्त वृति निरोध में बाधक तो नहीं है ?’ महर्षि पतंजलि, जो अष्टांग योग के प्रणेता हैं, ने कहा – ‘नहीं चरित्र ! नृत्य और संगीत को भोग-रस की तरह लेना ही चित्त वृति निरोध में बाधक है, इसे भाव-रस की तरह लेने से आप कला की केवल प्रशंसा ही करते है, उस कला को भोगते नहीं हैं | मैंने नृत्य और संगीत की उच्चतम कोटि की प्रशंसा की है, उन नृत्यांगनाओं की सुन्दरता की नहीं | सुन्दरता हमें भोग-रस प्रदान के लिए आकर्षित करती है और संगीत व नृत्य हमें भाव-रस प्रदान करता है | हमारा जीवन केवल भोग-रस प्राप्त के लिए नहीं ही है परन्तु वह भाव-रस को प्राप्त करने के लिए अवश्य है |’ इस उत्तर से चरित्र की दुविधा मिट गई और महर्षि पतंजलि के प्रति उसका आदर भाव और अधिक बढ़ गया |
                    महर्षि पतंजलि के जीवन का यह दृष्टान्त स्पष्ट करता है कि मनुष्य के जीवन में भोग और भाव, इन दो प्रकार के रसों में सूक्ष्म सा अंतर है | भोग-रस सुख-दुःख से व्यक्ति को मुक्त नहीं होने देता जबकि भाव-रस व्यक्ति को आनंद की अवस्था की ओर ले जाता है | भोग-रस अस्थाई रस है, जबकि भाव रस अखंड रस है | भोग-रस हमें आवागमन से मुक्त नहीं होने देता जबकि भाव-रस हमें मुक्ति की ओर ले जाता है | अज्ञान के कारण कई बार हम भोग-रस और भाव-रस के अंतर को समझ नहीं पाते हैं | योगाचार्य पतंजलि के इस दृष्टान्त से यह अंतर बहुत कुछ स्पष्ट हो जाता है |
क्रमशः
प्रस्तुति- डॉ. प्रकाश काछवाल

|| हरिः शरणम् ||

Thursday, August 24, 2017

गुरु के सूत्र - 19

गुरु के सूत्र – 19 
चौथा सूत्र – रसमय जीवन (कल से आगे) -
                बहुत ही महत्वपूर्ण भाव-रस, जहाँ कोई किसी से भिन्न नहीं, सभी अपने, कोई भी पराया नहीं  | चोर और साधू, पशु व मानव सभी में परमात्मा को देखना | भाव-रस हमें परमात्मा की और ले जाता है | महान कवि श्री मैथिली शरण गुप्त ने कहा भी है-
जो भरा नहीं है भावों से , बहती जिसमें रसधार नहीं |
वह ह्रदय नहीं है पत्थर है, जिसमे स्वदेश का प्यार नहीं ||
                  भाव-रस दया और करुणा का रस है | इस संसार में भोग-रस से निवृत हो व्यक्ति शांति को उपलब्ध होता है | शांति प्राप्त करने के उपरांत उसमें प्रत्येक प्राणी के प्रति दया और करुणा का भाव जगता है | इसीलिए इस भाव-रस को भावना प्रधान कहा गया है | गोविन्द की यात्रा के लिए मनुष्य का भाव-प्रधान होना आवश्यक है | भाव, भोग से एकदम विपरीत अवस्था है और प्रेम से पूर्व की अवस्था है | भोग-रस से प्रेम-रस के मार्ग पर अग्रसर होने पर मध्य में भाव-रस की उपलब्धि होती है |
                               महान योगाचार्य महर्षि पतंजलि के जीवन का एक वृतांत है | तत्कालीन राजा पुष्पराज ने एक बार अपने राजमहल में एक माह तक चलने वाले यज्ञ का आयोजन किया | उस यज्ञ में उन्होंने महर्षि पतंजलि को भी आमंत्रित किया | महर्षि ने पुष्पराज को स्पष्ट किया कि इतनी दीर्घ अवधि तक गुरुकुल छोड़ कर जाना संभव नहीं है क्योंकि इससे मेरे एक सौ विद्यार्थियों की शिक्षा अवरुद्ध हो जाएगी |  राजा पुष्पराज ने कहा कि मैं आपके साथ-साथ सभी एक सौ विद्यार्थियों के आवास, भोजन और शिक्षा की व्यवस्था कर देता हूँ | वहां आप यज्ञ में भी भाग ले सकते हैं और अपने शिष्यों को विद्याध्ययन भी करा सकते हैं | राजा पुष्पराज के आग्रह को आखिर महर्षि टाल नहीं सके और अपने शिष्यों सहित राजा के मेहमान बन गए |
                प्रातःकाल महर्षि पतंजलि यज्ञादि कार्यक्रमों में भाग लेते और तत्पश्चात गुरुकुल की तरह ही अपने शिष्यों को विद्याध्ययन कराते | इस प्रकार एक पक्ष बीत गया | एक दिन राजा ने महल की नाट्यशाला में एक भव्य नृत्य और संगीत के कार्यक्रम का आयोजन किया जिसमें राज्य की सुन्दरतम प्रसिद्ध तीन नृत्यांगनाओं को नृत्य करने के लिए आमंत्रित किया गया था | यह कार्यक्रम सांय काल को प्रारम्भ होकर मध्य रात्रि तक चलना था | राजा पुष्पराज ने महर्षि पतंजलि को भी इस नृत्य-संगीत कार्यक्रम को देखने के लिए निमंत्रित किया | महर्षि ने कहा कि मैं अकेला नहीं आ पाउँगा, अगर निमंत्रित करना है तो मेरे साथ मेरे सभी एक सौ शिष्यों को भी निमंत्रित करना होगा | राजा पुष्पराज ने सभी को आमंत्रण दिया और उनके बैठने की रंगशाला में उचित व्यवस्था कर दी |
क्रमशः
प्रस्तुति – डॉ.प्रकाश काछवाल

|| हरिः शरणम् ||

Wednesday, August 23, 2017

गुरु के सूत्र - 18

गुरु के सूत्र - 18
चौथा सूत्र – रसमय जीवन (कल से आगे) -
                        इस प्रकार कठोपनिषद में वर्णित यम-नचिकेता संवाद में यम ने नचिकेता को स्पष्ट कर दिया है कि जीवात्मा से पूर्व इस व्यक्त संसार में केवल बुद्धि ही सर्वश्रेष्ठ है | इन्द्रियों को बलपूर्वक दबाने के स्थान पर अपनी बुद्धि से विचार करते हुए स्वीकार करें कि भोग-रस अंततः हमें दुःख के अतिरिक्त कुछ भी नहीं दे सकते | शांति प्राप्त करने के लिए अपनी बुद्धि से मन में उठ रही विभिन्न कामनाओं को नियंत्रित करें | कामनाओं पर नियंत्रण मन को नियंत्रण में लेकर पाया जा सकता है | इस प्रकार कामनाओं पर नियंत्रण पाते ही आपकी इन्द्रियां स्वतः ही नियंत्रित हो जाएगी |  इस अवस्था को उपलब्ध होते ही आपके जीवन में शांत-रस का आगमन हो जायेगा | शांत-रस कामनाओं के शांत होने पर ही मिलना संभव हो सकता है |
                 अब चलते हैं, जीवन के एक और महत्वपूर्ण रस की ओर | यह महत्वपूर्ण तीसरा रस है-भाव-रस | शांत-रस प्राप्त कर लेने के उपरांत साधक को भाव-रस प्राप्त करने की ओर अग्रसर होना चाहिए | भाव-रस का अर्थ है, मनुष्य का भावना प्रधान होना, भक्ति-मार्ग पर अग्रसर होना | इस भाव-रस में मुख्यतः भावना प्रधान होती है | जैसा मैं हूँ वैसे ही सब प्राणी हैं | कोई किसी से अलग अथवा भिन्न नहीं है | जैसे भगवान् श्री कृष्ण कहते हैं –
यो मां पश्यति सर्वत्र सर्वं च मयि पश्यति |
तस्याहं न प्रणश्यामि स च मे न प्रणश्यति ||गीता-6/30||
अर्थात जो सम्पूर्ण भूतों में सबके आत्मरूप मुझको ही व्याप्त देखता है और सब भूतों को मुझके अंतर्गत देखता है, उसके लिए मैं और मेरे लिए वह कभी भी अदृश्य नहीं होता |
क्रमशः
प्रस्तुति- डॉ. प्रकाश काछवाल

|| हरिः शरणम् ||

Tuesday, August 22, 2017

गुरु के सूत्र - 17

गुरु के सूत्र – 17
चौथा सूत्र – रसमय जीवन (कल से आगे) -
           दूसरा रस है- शांत-रस | इस शांत-रस में सभी भोगों की कामनाएं शांत करनी होती है | यह शांत-रस किसी इन्द्रिय को जबरदस्ती दबाकर नहीं पैदा करना चाहिए बल्कि मन को नियंत्रण में लेकर भोग-रस की कामना का त्याग कर शांति के साथ शांत-रस का आनंद लेना चाहिए | आज मनुष्य विभिन्न प्रकार के भोग-रस में डूबा हुआ है, इस कारण से उसमें शांति के अवतरण की कल्पना नहीं की जा सकती | भोग-रस में आसक्ति के कारण व्यक्ति सदैव उन्हें अधिक से अधिक मात्रा में प्राप्त करने का प्रयास करता रहता है | इन्द्रियों पर उसका नियंत्रण समाप्त हो जाता है | अशांति उसे चारों ओर से घेर लेती है | यहाँ पर भोगों से दूरी बनाये रखना उसके लिए असंभव हो जाता है | भोगों में आसक्ति न रखने का एक ही उपाय है, कामनाओं पर नियंत्रण | इन्द्रियों को दबाना नहीं है बल्कि कामनाओं को दबाना है | मन में उठ रही कामनाओं को रोककर ही इन्द्रियों को नियंत्रण में रखा जा सकता है | एक बार कामनाएं नियंत्रित हो गयी तो फिर जो शांति-रस प्राप्त होता है, वह भोग-रस से भी अधिक आनंददायक होता है |
          हमारी समस्त इन्द्रियां और मन भी तो परमात्मा के कारण है | ऐसे में इन्द्रियों का दमन करना तो परमात्मा के सृजन का अनादर करना है | आप अगर स्वादेंद्रिय को नियंत्रण में रखने के लिए अपनी जिव्हा को काटकर भी फैंक देंगे, तो क्या आपको भोजन का रस नहीं आएगा ? भोजन का रस आपको कल्पना में मिलता रहेगा और उसको आप अपनी जिव्हा काटकर नियंत्रित नहीं कर सकते | भगवान् ने आपको स्वादेंद्रिय दी है, स्वाद की अनुभूति के लिए | आपका मन एक विशेष स्वाद की और अधिक अथवा सतत मिलते रहने की कामना करता है | अगर आपके मन में उसी स्वाद को प्राप्त करने की कामना नहीं उठेगी तो फिर आप सुगमता से मिल रहे भोजन का रस स्वादेंद्रिय से लेने को स्वतन्त्र है | भोजन न भी मिले तो आपके मन में किसी भी प्रकार का विचलन नहीं होना चाहिए | यही शांत-रस है |
             इस बारे में कठोपनिषद् कहती है –
इन्द्रियेभ्यः परा ह्यर्था अर्थेभ्यश्च परं मनः |
मनसस्तु परा बुद्धिर्बुद्धेरात्मा महान् परः ||
महतः परमव्यक्तमव्यक्तात् पुरुषः परः |
पुरुषान्न परं किंचित्सा काष्ठा सा परा गतिः || कठो.-1/3/10-11||
अर्थात इन्द्रियों से विषय बलवान है; विषयों से मन, मन से बुद्धि, बुद्धि से महान जीवात्मा होने से वह अधिक बलवान है | उस जीवात्मा से अधिक बलवान है भगवान की अव्यक्त माया शक्ति अर्थात प्रकृति; और सबसे श्रेष्ठ है परम पुरुष भगवान; उनसे अधिक श्रेष्ठ और बलवान अन्य  कोई नहीं है | वही सबकी परम अवधि और वही सबकी परम गति है |
क्रमशः
प्रस्तुति- डॉ. प्रकाश काछवाल

|| हरिः शरणम् ||

Monday, August 21, 2017

गुरु के सूत्र - 16

गुरु के सूत्र – 16
चौथा सूत्र – रसमय जीवन (कल से आगे) -
                             ययाति ने सत्य ही कहा है | सभी विषय-भोग ऐसे ही होते हैं जिन्हें मनुष्य जीवन भर भोगना तो चाहता है परन्तु वह यह नहीं जानता कि वह इन भोगों का स्वयं ही भोग बनता जा रहा है | जब तक इस बात का पता उसे चल पाता है, तब तक बहुत देर हो चुकी होती है | ययाति को इस बात का ज्ञान होते ही अपने पुत्र पूरु को उसकी युवावस्था लौटा दी और साथ ही साथ अपना राज्य उसको देकर शांत भाव से वन को प्रस्थान कर गए | मनुष्य को शांति तब तक प्राप्त नहीं हो सकती जब तक कि उसको यथार्थ का ज्ञान नहीं हो जाये | यथार्थ क्या है ?
                 यथार्थ वह नहीं है, जो हमें अपनी आँखों से दृष्टिगत है | यथार्थ उस दृश्य के पीछे छुपा हुआ है जिसे केवल वही व्यक्ति देख सकता है, जिसके आंतरिक चक्षु खुले हों | नेत्र और उनकी दृष्टि दोनों ही जड़ होते हैं अतः यथार्थ को देखने से वे कोसों दूर रहती है | परन्तु आंतरिक दृष्टि यथार्थ को देख सकती है | आंतरिक दृष्टि को जाग्रत करने का एक ही साधन है – ज्ञान | ज्ञान हमें यथार्थ तक ले जाता है | जब यथार्थ से हमारा सामना होता है, संसार का सब कुछ बहुत पीछे छूट जाता है | द्वंद्व तो इस संसार में है और संसार एक स्वप्न, एक कल्पना के अतिरिक्त कुछ भी नहीं है | स्वप्न हमें उद्वेलित करता है, जबकि यथार्थ का ज्ञान हमें शांति प्रदान करता है | संसार के भोग स्वप्न मात्र हैं, उनसे शांति को उपलब्ध नहीं हुआ जा सकता | अतः शांति को उपलब्ध होने के लिए भोग-रस का त्याग करना आवश्यक है |
                     हमें भोग-रस का त्याग कर दूसरे रस की ओर अग्रसर होना चाहिए | परन्तु भोगों को त्यागा कैसे जाये ? भोगों का त्याग करना सम्भव ही नहीं है | जैसा कि कर्म-सिद्धांत कहता है कि प्रत्येक कर्म का फल भोग के रूप में प्राप्त होकर ही रहता है, ऐसे में भोगों के त्याग की कल्पना भी नहीं की जा सकती | हाँ, यह सत्य है कि हमें अपने पूर्वजन्म के कर्मों का फल वर्तमान जीवन में भोग के रूप में मिलता है | अतः उन कर्मों के फलस्वरूप मिले भोगों को भोगना अनुचित नहीं है | यहाँ भोगों के त्याग से अर्थ है, उन भोगों में आसक्त न होना | भोगों में आसक्त होने से कैसे बचा जा सकता है, इस बारे में ईशावास्योपनिषद् कहता है –
ईशा वास्यमिदंसर्वं यत्किंच्य जगत्यां जगत् |
तेन त्यक्तेन भुंजीथा मा गृधः कस्य स्विद् धनम् ||
अर्थात अखिल ब्रह्माण्ड में जो कुछ भी जड़-चेतन संसार है; यह समस्त संसार ईश्वर से व्याप्त है | उस ईश्वर को साथ रखते हुए; त्यागपूर्वक इसे भोगते रहो | इसमें आसक्त मत होओ | धन, भोग्य पदार्थ आदि किसी के नहीं है | इस प्रकार इस मन्त्र को दृष्टिगत रखते हुए मिले हुए भोगों को भी त्यागपूर्वक भोग जा सकता है और विषय-भोग के प्रति अनासक्त हुआ जा सकता है |
क्रमशः
प्रस्तुति- डॉ. प्रकाश काछवाल

|| हरिः शरणम् ||

Sunday, August 20, 2017

गुरु के सूत्र - 15

गुरु के सूत्र – 15
चौथा सूत्र- रसमय जीवन (कल से आगे)
                प्रथम रस है, भोग-रस | जितनी भी हमारी इन्द्रियां है, वे भोग-रस प्राप्त कर हमें उसका ज्ञान कराती हैं | मनुष्य के शरीर की ये इन्द्रियां जब तक सक्रिय रहती है तब तक भोग-रस की उनकी मांग बढ़ती जाती है | यह रस भी मनुष्य के सांसारिक जीवन के लिए आवश्यक है परन्तु आध्यत्मिक जीवन के लिए इस भोग-रस का त्याग करना आवश्यक है | सांसारिक भोगों से मनुष्य कभी भी संतुष्ट नहीं हो सकता |
                    भागवत में ययाति-प्रसंग आता है | राजा ययाति को उनके श्वसुर शुक्राचार्य ने शाप दिया था जिसके कारण उनके शरीर को वृद्धावस्था ने असमय ही आकर जकड लिया था | सांसारिक भोगों से उन्हें अभी तक संतुष्टि नहीं मिल पाई थी | वे शुक्राचार्य से प्रार्थना करते हैं कि उन्हें सांसारिक व शारीरिक भोग के लिए कुछ समय और मिलना चाहिए क्योंकि उनकी पुत्री देवयानी का इसी में भला है | शुक्राचार्य कहते हैं कि श्राप तो अन्यथा हो नहीं सकता | इससे बच निकलने का एक ही उपाय है कि जो व्यक्ति प्रसन्नता से तुम्हें अपनी युवावस्था दे दे, उससे अपनी वृद्धावस्था बदलकर शारीरिक सुख भोग सकते हो | इस प्रकार शुक्राचार्य से उन्हें भोग-रस का पान करने के लिए समय तो मिल जाता है परन्तु युवावस्था कहाँ से लाये ? शारीरिक भोग के लिए युवा बने रहना आवश्यक है | राजा ययाति के समक्ष युवावस्था प्राप्त करने का एक मात्र साधन उसके पुत्र ही थे | उन्होंने एक-एक कर सभी पुत्रों से अपनी युवावस्था उन्हें देने का आग्रह किया | सभी पुत्रों ने युवावस्था देने से मना कर दिया | केवल सबसे छोटे पुत्र पूरु ने अपने पिता का आग्रह स्वीकार किया और उनसे वृद्धावस्था ले ली तथा उन्हें भोगों के लिए अपनी युवावस्था दे दी | युवावस्था पा कर ययाति ने कई वर्षों तक शारीरिक भोग भोगे | परन्तु फिर भी इन भोगों से उन्हें तृप्ति नहीं हुई बल्कि उलटे भोगों को प्राप्त करने की कामना दिन प्रतिदिन बढ़ती ही गई | अंततः उनको इस बात का ज्ञान हुआ कि शारीरिक भोगों से कभी भी कोई तृप्त नहीं हो सकता | ययाति इन भोगों के बारे में कहते हैं –
न जातु कामः कामानामुपभोगेन शाम्यति |
हविषा कृष्णवर्त्मेव भूय एवाभिवर्धते || भागवत-9/19/14||
अर्थात विषयों को भोगने से भोगवासना कभी शांत नहीं हो सकती | जैसे घी की आहुति डालने से अग्नि और अधिक भड़क उठाती है वैसे ही भोगवासनायें भी भोगों से प्रबल हो उठती है |
क्रमशः
प्रस्तुति- डॉ. प्रकाश काछवाल

|| हरिः शरणम् ||