Saturday, August 19, 2017

गुरु के सूत्र - 14

गुरु के सूत्र -14
                अब आते हैं गुरु के अंतिम और अतिमहत्वपूर्ण सूत्र पर | यह अंतिम सूत्र प्रत्येक व्यक्ति के लिए सर्वाधिक महत्त्व का है क्योंकि आनंद की अवस्था को उपलब्ध करने के लिए यह सूत्र ही मुख्य आधार बनता है | यह सूत्र है – जीवन रसमय हो, नीरस नहीं | इस जीवन को रसमय बनाकर तभी जिया जा सकता है, जब आप संसार की वास्तविकता को समझ लें | जब आप समझ जाते हैं कि इस संसार में जो कुछ भी दिखाई दे रहा है, वह सब कुछ एक प्रपंच के अतिरिक्त कुछ भी नहीं है | आज आचार्य श्री गोविन्द राम शर्मा ने अपने शाश्वत सूत्र में लिखा है उसका भावार्थ भी यही है कि हम इस संसार की माया में उलझकर अपनी सरसता को खो बैठे हैं | हम यह नहीं समझ पा रहे हैं कि जादूगर अपने खेल में साधारण कागज को जलाकर सौ रुपये के नोट में कभी भी नहीं बदल सकता | हम तो उस जादूगर के खेल को ही वास्तविकता समझ बैठते हैं, जब कि वह हमारे देखने की क्षमता को केवल मात्र भ्रमित ही करता है, जो कुछ भी हमें दिखता है, वास्तव में वैसा होता नहीं है | जो इस खेल को समझ जाता है, वह फिर इस खेल में नहीं उलझता और अपने जीवन को रसमय बना लेता है | आइये, गुरु के इस महत्वपूर्ण सूत्र ‘रसमय जीवन’ पर विचार करते हैं |
4. रसमय जीवन –
                  जीवन रस से भरा हो | रसपूर्ण जीवन ही मनुष्य और पशु के जीवन में अंतर करता है | भला, शुष्क जीवन भी कोई जीवन होता है | रस से परिपूर्ण जीवन मनुष्य को सरलता से परमात्मा की ओर ले जाता है | जीवन में उपलब्ध रसों के बारे में भी हमें ज्ञान होना आवश्यक है क्योंकि मनुष्य के जीवन में सभी रसों का महत्वपूर्ण स्थान है | वैसे कुल रस नौ हैं परन्तु वास्तव में देखा जाये तो मनुष्य के जीवन में निम्न चार प्रकार के रस  महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं | भोग-रस, शांत-रस,भाव रस और प्रेम-रस | इन रसों के एक प्रकार के रस से क्रमश दूसरे प्रकार के रस पर स्थानांतरित होते जाना ही, गुरु से गोविन्द के रास्ते पर आगे बढ़ते जाना है | आचार्य श्री गोविन्द राम शर्मा कहते हैं कि संसार में सभी मनुष्य भोगों में डूबे हुए हैं | जब तक वे उन भोगों से अपना पिंड छुड़ाकर शांत नहीं हो जायेंगे तब तक परमात्मा के मार्ग पर प्रगति नहीं हो सकती | तो आइये ! चलते हैं, प्रत्येक रस को अल्प रूप से जानने के लिए तथा एक रस से दूसरे रस पर जाने के रास्ते को पहचानने के लिए |
क्रमशः
प्रस्तुति- डॉ. प्रकाश काछवाल
|| हरिः शरणम् ||

Friday, August 18, 2017

गुरु के सूत्र – 13

गुरु के सूत्र – 13
तीसरा सूत्र – चैतन्य जीवन (कल से आगे)
                         हम आज जी रहे हैं परन्तु भीतर विचार चल रहे हैं कल के | या तो हम बीते हुए कल पर विचार कर रहे होते हैं अथवा आनेवाले कल की कोई योजना बना रहे होते है | यह होशपूर्वक जीना नहीं है क्योंकि जिस समय में आप जी रहे हो, बह समाप्त होता जा रहा है | ध्यान रहे, बीता हुआ कल पुनः नहीं आता और न ही आने वाला कल कभी आएगा | परन्तु आज सदैव ही आज बना रहेगा, अतः जीना है तो आज में जियें, दोनों में से किसी भी एक कल में नहीं | आज में जीना ही होशपूर्वक जीना है | आज में रहते हुए किसी भी कल के बारे में सोचना कल्पना में जीना है और कल्पना में जीना स्वप्न में जीना है, मूर्छा में जीना हैं |
                      यह आवश्यक नहीं है कि आप जागते हुए भी होश में रहें | हम जागते हुए भी बेहोशी या निद्रा में हो सकते हैं और सोते हुए भी होश में रह सकते हैं | होशपूर्वक जीना उसी को कहते हैं जो केवल जागते हुए ही होश में न रहे बल्कि निद्रावस्था में भी होश में रहे | तथागत के बारे में कहा जाता है कि वे जब रात को सोते थे तो सम्पूर्ण रात्रि में एक ही करवट सोये रहते थे | इसका कारण था कि कहीं करवट बदलने पर उनसे कोई जीव हिंसा नहीं हो जाये | हो सकता है कोई छोटा सा जीव दूसरी ओर विचरण कर रहा हो और करवट बदलने पर वह जीव उनके नीचे दबकर कुचल जाये | इसे कहते हैं, होशपूर्वक जीना, निद्रावस्था में भी होश नहीं खोना | गीता में भगवान् श्री कृष्ण कहते हैं –
या निशा सर्वभूतानां तस्यां जागर्ति संयमी |
यस्यां जाग्रति भूतानि सा निशा पश्यतो मुने: || गीता-2/69 ||
अर्थात सम्पूर्ण सांसारिक प्राणियों के लिए जो रात होती है, संयमी व्यक्ति उस समय भी जाग्रत रहता है | जब सांसारिक व्यक्ति जागते हैं उस समय मुनि के लिए वह समय रात्रि के समान है |
              इसका अर्थ यह नहीं है कि मुनि जब संसार के लिए दिन होता है, तब सो जाता है | इसका अर्थ यह है कि जब सांसारिक व्यक्ति दिन के समय अपने सांसारिक कार्य कलापों में व्यस्त हो जाते हैं तब भी मुनि होशपूर्वक रहता है और उन सांसारिक कार्यों में व्यस्त नहीं होता | इस प्रकार कहा जा सकता है कि एक स्थितप्रज्ञ दिन हो अथवा रात सदैव होशपूर्वक जीवन जीता है | गुरु आपको मानव जीवन के उद्देश्य से परिचित कराता है, जिससे आप आज और अभी को जी सको, होश में रहते हुए जी सको | अतः सर्वप्रथम उनकी इस बात को आत्मसात करें और होशपूर्वक जीने का प्रयास करें |
क्रमशः
प्रस्तुति- डॉ. प्रकाश काछवाल

|| हरिः शरणम् ||

Thursday, August 17, 2017

गुरु के सूत्र - 12

गुरु के सूत्र – 12
तीसरा सूत्र – चैतन्य जीवन (कल से आगे)
               क्या बेहोशी में भी पूजा की जा सकती है ? हाँ, हो सकती है क्योंकि आज आप पूजा करते समय, परमात्मा से प्रार्थना करते समय  साथ में अतिरिक्त कार्य भी कर रहे होते हो | इसी को बेहोशी में पूजा करना कहते हैं | ऐसी पूजा अर्थहीन पूजा है, निरर्थक प्रार्थना है | जब आप परमात्मा का ध्यान कर रहे हो, आपके बाहर भीतर सब जगह, परमात्मा के अतिरिक्त और कुछ भी नज़र नहीं आना चाहिए | जो कुछ भी आप उच्चारित कर रहे हो, आपके कान केवल उसे ही सुनने चाहिए, दृष्टि उस समय केवल परमात्मा पर होनी चाहिए, गंध केवल उसी की महसूस होनी चाहिए | कहने का अर्थ यह है कि सभी इन्द्रियां और मन उसी कार्य में लगा होना चाहिए जिसको वर्तमान में आप कर रहे हो, इसी को होशपूर्वक जीना कहते हैं |
                हम बचपन में नानी के घर जाया करते थे | मेरी बड़ी नानी सुबह शाम भगवान की आरती किया करती थी | आरती करते समय वह घर का मुख्य द्वार खोलकर रखती थी | वह पूजा घर में दीपक जलाती और सस्वर आरती बोलती- “ॐ जय जगदीश हरे,स्वामी जय जगदीश हरे ----“| एक दिन मैंने देखा कि आरती के मध्य में ही गली से एक श्वान घर के मुख्य द्वार से घर में प्रवेश कर रहा है | नानी ने आरती गाते हुए भी उसे घर में प्रवेश करते देख लिया | आरती को बीच में ही छोड़ वह बोल पड़ी-‘दुर्र, दुर्र’ अर्थात वह उस श्वान को बाहर निकल जाने के लिए उसे दुत्कार रही थी | इस समय उनका मस्तिष्क तो कार्य कर रहा था क्योंकि उन्होंने श्वान को अंदर आते देख लिया था परन्तु क्या उनका ध्यान उस समय परमात्मा से की जा रही प्रार्थना में था ? नहीं, अगर उनका ध्यान प्रार्थना में होता तो उसे घर में प्रवेश करते हुए भी परमात्मा ही नज़र आते, श्वान नहीं | उनका ध्यान परमात्मा पर न होकर घर में हो रही गतिविधियों पर था | जो कार्य आप कर रहे हो, उसमें अगर आपका ध्यान नहीं है तो वह कार्य बेहोशी में ही कर रहे हो |
क्रमशः
प्रस्तुति- डॉ. प्रकाश काछवाल

|| हरिः शरणम् ||

Wednesday, August 16, 2017

गुरु के सूत्र - 11

गुरु के सूत्र – 11
तीसरा सूत्र- चैतन्य जीवन (कल से आगे)
              पशु केवल भयग्रस्त रहते हुए आहार, निद्रा और मैथुन की क्रियाओं में ही सदैव रत रहता है | आज इस आधुनिक भौतिक युग में मनुष्य भी इन चारों अर्थात आहार, निद्रा, भय और मैथुन के चक्र व्यूह से बाहर कहाँ निकल पाया है ? इसे एक प्रकार से मूर्छा का जीवन नहीं कहेंगे तो क्या कहेंगे ? एक पशु भी यांत्रिक जीवन जीता है और आज मनुष्य भी एक यांत्रिक जीवन जी रहा है | मनुष्य के लिए आवश्यक है कि वह अपना जीवन होशपूर्वक जिए | उसे स्वयं का ज्ञान होना आवश्यक है तभी उसके जीवन को होश वाला जीवन कहा जा सकता है | होशपूर्ण जीवन ही मानव प्रजाति की पशुजीवन पर श्रेष्ठता सिद्ध करता है |
                 आप प्रातः उठकर केवल रास्ते में खुलने वाली किसी खिड़की अथवा दरवाजे के पास खड़े हो जाइये और फिर वहां से आते-जाते हुए लोगों का गहराई के साथ निरीक्षण करें | आपको पता चल जायेगा कि प्रायः सभी व्यक्ति एक प्रकार की मूर्छा में यांत्रिक जीवन जी रहे हैं | उद्देश्यहीन होकर इधर उधर भटक रहे हैं | जीवन का उद्देश्य केवल खान-पीना, सोना, भयग्रस्त रहना और संतानोत्पति ही रह गया है | अपने इन्हीं  उद्देश्यों की पूर्ति के लिए आज का मनुष्य अपना हीरे जैसा अनमोल जीवन गवां रहा है |
                जिसका मस्तिष्क सक्रिय हो, जो अपने दैनिक कार्य सुगमता पूर्वक कर रहा हो, केवल इतने को ही  नहीं कहा जा सकता कि व्यक्ति होश पूर्वक जी रहा है | आज में जीना होशपूर्वक जीना है | आप जो दैनिक कार्य कर रहे हैं, क्या वह भी आप होशपूर्वक कर रहे हैं ? मैं कहता हूँ कि, नहीं | आपको एक आदत पड़ चुकी है, वह कार्य करने की | आपकी यह आदत बन चुकी है, एक ही प्रकार के कार्य को नियमित रूप से करने के कारण | याद कीजिये वह दिन, जब आप जीवन में पहली बार पाठशाला गए थे | उस दिन आप होश पूर्वक गए थे, पाठशाला | ज्यों ज्यों आप बड़े होते गए, आपको शाला जाने की आदत बन गयी और आप यंत्रवत शाला जाने लगे | इसी प्रकार जब आपके मन में परमात्मा का विचार आया और आपने प्रारम्भिक स्तर पर उनकी पूजा-अर्चना प्रारम्भ की, तब आपको कितना आनंद मिला था ? क्या वह आनंद आज भी उस प्रकार की पूजा में मिल रहा है ? नहीं , न | कभी सोचा कि वह आनंद कहाँ चला गया ? प्रथम बार आपने वह पूजा होश में की थी और अब वही पूजा आप एक प्रकार की बेहोशी में कर रहे हो |
क्रमशः
प्रस्तुति- डॉ. प्रकाश काछवाल

|| हरिः शरणम् ||

Tuesday, August 15, 2017

गुरु के सूत्र - 10

गुरु के सूत्र – 10
दूसरा सूत्र - स्वाधीन जीवन(कल से आगे)
                         धर्म हमें अपने अधीन होने को कहता है अर्थात स्वयं के अधीन | स्वतंत्रता केवल तंत्र के अधीन होने का कहती है, तंत्र के बाहर आप स्वच्छंद हैं, कुछ भी कर सकते हैं | स्वाधीनता कहती है नहीं, स्वच्छंद नहीं बल्कि स्व-अधीन | कुछ आपके कार्यों पर स्वयं का भी अंकुश होना चाहिए | धर्म कहता है – सत्य, अहिंसा, तप और दान – ये चार मनुष्य के पालन करने योग्य हैं | स्वतत्रता आपको इस प्रकार के धर्म से मुक्त रखती है, हाँ, असत्य और हिंसा पर अंकुश अवश्य लगाये रखती है | स्वाधीनता आपको धर्म के इन चारों अंगों की पालना करने को कहती है | आप नहीं करते, वह बात अलग है परन्तु आप अगर स्वाधीन है तो आपको इनका पालन अवश्य करना चाहिए |
                  आप स्वाधीन हैं, इसका अर्थ यह है कि इस संसार में प्रत्येक प्राणी स्वाधीन हैं | केवल सनातन धर्म ही ऐसी स्वाधीनता की बात करता है | किसी भी प्राणी को किसी भी विशेष कार्य को करने अथवा न करने के लिए विवश नहीं करें | वे आपकी बात मानें अथवा न मानें; आपको इस बात से किसी भी प्रकार से प्रभावित नहीं होना है | आपको प्रत्येक प्राणी की स्वाधीनता का सम्मान करना है | स्वाधीनता ही सबके लिए सुखदाई होती है | सनातन धर्म में वर्णित वाक्य ‘वसुदेव कुटुम्बकम्’ और ‘सर्वे भवन्तु सुखिनः’ का भाव हमें सभी की  स्वाधीनता की रक्षा करने की कामना करता है |
              संतुष्ट और स्वाधीन जीवन के बाद गुरु का तीसरा महत्त्व पूर्ण सूत्र है- जीवन चैतन्य होना चाहिए | चैतन्य जीवन का अर्थ है- होश पूर्वक जीना |
  3.तीसरा सूत्र - चैतन्य जीवन –
                    जीवन मूर्छा में रहते हुए न जीयें | आपका जीवन होशपूर्ण होना चाहिए | इस संसार की भौतिकता में मनुष्य इस स्तर तक डूबा हुआ है कि वह आज एक व्यक्ति न रहकर एक मशीन बन कर रह गया है | यांत्रिक जीवन गतिमान प्रतीत अवश्य होता है परन्तु वास्तव में वह गतिहीन जीवन ही होता है | एक यंत्र की यात्रा उस यंत्र के लिए केवल उद्देश्यहीन यात्रा है | जबकि मानव जीवन उद्देश्यपूर्ण है | आपको अपने मनुष्य होने का उद्देश्य पता होना चाहिए | उद्देश्यहीन मानव जीवन तो एक प्रकार से पशुवत जीवन ही है |
क्रमशः
प्रस्तुति- डॉ. प्रकाश काछवाल

|| हरिः शरणम् ||

Monday, August 14, 2017

गुरु के सूत्र - 9

गुरु के सूत्र – 9
  2.दूसरा सूत्र - स्वाधीन जीवन –
                 स्वाधीन होकर जीयें | पराधीन जीवन अभिशाप है | जीवन में आप स्वयं के अधीन रहें दूसरों के अधीन नहीं | साथ ही साथ किसी दूसरे को भी पराधीन करने का विचार मन में न रखें | स्वाधीन का अर्थ सांसारिक मन के अधीन होना नहीं है बल्कि आत्मा (आध्यात्मिक मन)के अधीन होना है | आपकी आत्मा जो भी कहेगी वह सदैव सत्य ही कहेगी | आपको अपनी आत्मा की बात सुननी है और फिर उसी का अनुसरण करना है | किसी दूसरे व्यक्ति की बात को सुनकर उसके अनुसार चलना ही पराधीन होना है | आपके अतिरिक्त आपका कोई मित्र नहीं है | गीता में भगवान् श्री कृष्ण कहते हैं –
 उद्धरेदात्मनाSत्मानं नात्मानमवसादयेत् |
आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः ||गीता-6/5 ||
अर्थात अपने द्वारा अपना संसार सागर से उद्धार करें और अपने आपको अधोगति में न डालें क्योंकि आप ही तो स्वयं के मित्र है और आप ही अपने शत्रु हैं |
                   अपना स्वयं का मित्र होना अर्थात स्वाधीन होना | गोस्वामी तुलसीदास जी ने भी अपने काव्य श्री रामचरितमानस में कहा है –‘पराधीन सपनेहूँ सुख नाहीं’ अर्थात जो व्यक्ति पराधीन है, उसको स्वप्न में भी सुख प्राप्त नहीं हो सकता, वास्तविक जीवन में तो सुख की कल्पना तक नहीं की जा सकती | इसलिए आध्यात्मिक जीवन के लिए यह आवश्यक है कि अपना जीवन स्वाधीनता पूर्वक जीयें | सभी प्रकार की द्वंद्वात्मक स्थिति से स्वयं को दूर रखें |
                  स्वाधीनता के साथ जीने का अर्थ है अपने स्वभाव के अनुसार जीना | प्रायः हम देखते हैं कि इस संसार में व्यक्ति एक दूसरे को देखकर जी रहे हैं | हम सदैव यही सोचते रहते हैं कि उसके पास जो है, वह मेरे पास क्यों नहीं है ? अथवा यह सोचते हैं कि अगर मैं ऐसा करता हूँ या करूँगा तो लोग क्या कहेंगे ? हमारा सम्पूर्ण जीवन दूसरे के अनुसार जीने में ही व्यर्थ चला जाता है | जीवन की यह उधेड़बुन आपको स्वाधीनता पूर्वक जीने नहीं देती | स्वाधीन होकर जीने का अर्थ हैं स्वयं के विवेकानुसार जीना |
                         स्वाधीन होकर जीना और स्वतंत्रतापूर्वक जीना, इन दोनों में समानता होते हुए भी एक मूलभूत अंतर है | स्वतंत्र का अर्थ होता है स्वयं के द्वारा स्वीकार किये गए एक तंत्र के अनुसार जीना | हमारा देश स्वतन्त्र है, इस देश के तंत्र को स्पष्ट करता है, यहाँ का संविधान | हमें उस संविधान की पलना करनी ही पड़ती है | परन्तु हम जिस प्रकार अपन निजी जीवन जीते हैं, उस तंत्र से थोडा अलग हटकर भी जीते हैं | जीवन की सभी बातें संविधान में नहीं लिखी होती | हमारा आचरण कैसा होना चाहिए, उसको हमारा संविधान कुछ सीमा तक नियंत्रित अवश्य कर सकता है, सम्पूर्ण रूप से नहीं | हम स्वाधीन होकर अपना आचरण अधिक शुद्ध रख सकते हैं | स्वाधीन का अर्थ है अपने अधीन होकर जीना | स्वाधीन जीवन ही हमारा धर्म कहलाता है | स्व-विवेक के अनुसार जीवन जीना ही धर्म के अनुसार जीना है |
क्रमशः
प्रस्तुति- डॉ. प्रकाश काछवाल

|| हरिः शरणम् ||

Sunday, August 13, 2017

गुरु के सूत्र - 8

गुरु के सूत्र – 8
प्रथम सूत्र – संतुष्ट जीवन (कल से आगे)
                    इस बौद्ध भिक्षुक के दृष्टान्त को यहाँ उद्घृत करने का मंतव्य यह है कि अभाव आपके मन की एक स्थिति है और संतोष भी आपकी एक मनः स्थिति है | आपको अपने मन की स्थिति को परिवर्तित करना है | इस परिवर्तन की प्रक्रिया को ही अध्यात्म की और जाना कहा जाता है | वास्तव में देखा जाये तो किसी भी प्रकार का कोई अभाव कहीं पर है ही नहीं | धन का संचय कर धनवान होना कहीं से भी अनुचित नहीं है, अनुचित है केवल धनवान ही बने रह जाना | अतः धन को सद्कार्यों में लगा दें | जितना धन मिलता है, उसमें ही संतोष रखें | नहीं तो इस जीवन में मैंने सदैव केवल धनवानों के पास ही धन का अभाव देखा है | संतुष्ट जीवन आपका प्रथम प्रयास है, गोविन्द की और जाने के लिए | गुरु अपने इस मार्गदर्शन द्वारा आपको आश्वस्त करता है कि परमात्मा की शरण में जाने पर भी आपको कभी भी कोई अभाव नहीं होगा | आचार्य श्री गोविन्द राम शर्मा कहते हैं कि मनुष्य के जीवन में अभाव उसकी कामनाओं के कारण है और कामनाओं का कारण मन है | तीन प्रकार की कामनाएं यथा पुत्रेषणा, वित्तेषणा और लोकेषणा व्यक्ति को अपने पाश में बाँध लेती है | ये तीनों एषणायें एक ही क्या कई जन्मों में भी पूर्ण होकर मनुष्य को संतुष्ट नहीं कर सकती | इस प्रकार कामनाओं का पूर्ण न होना, असंतुष्ट बने रहना है | असंतुष्ट भाव ही अभाव है | जब आप अपने आपको आध्यात्मिकता में प्रवृत कर देते हैं, वासुदेव कुटुम्बकम का भाव उत्पन्न हो जाता है, तब समस्त संसार ही आपका परिवार हो जाता है, समस्त संसार की सम्पति भी आपकी और ऐसे में मान सम्मान की चाह तो कहीं मन में रह ही नहीं पाती | इस प्रकार स्पष्ट है कि आध्यात्मिकता में कोई अभाव कहीं रहता ही नहीं है |
               आज हमारी स्थिति ऐसी है कि दो कदम परमात्मा की ओर बढाकर चार कदम पुनः संसार की ओर ले जाते हैं, इसका कारण एक मात्र यही है कि संसार को त्याग देने पर आप के मन में अभाव का भय बना रहता है | इस अभाव के भय से आप गोविन्द के मार्ग को त्याग देते हैं | गुरु आपको इस वास्तविकता से परिचय करता है कि परमात्मा आपके जीवन में कभी भी कोई अभाव पैदा होने ही नहीं देगा | संतुष्ट जीवन के बाद दूसरा सूत्र है, स्वाधीन जीवन का |
क्रमशः
प्रस्तुति- डॉ. प्रकाश काछवाल

|| हरिः शरणम् ||