Saturday, August 12, 2017

गुरु के सूत्र - 7

गुरु के सूत्र – 7
प्रथम सूत्र- संतुष्ट जीवन (कल से आगे)
             भगवान बुद्ध का एक शिष्य एक बार भिक्षा के लिए गाँव के एक वैभवशाली व्यक्ति के घर गया | उस बौध भिक्षुक ने भिक्षा के लिए आवाज लगाई | गृह स्वामी स्वयं बाहर आया | उसने देखा कि भिक्षुक के हाथ में जो काष्ठ का कटोरा है, लकड़ी का जो भिक्षा पात्र है, वह गल सा गया है, क्षतिग्रस्त हो गया है | उसने भिक्षुक के हाथ से वह कटोरा ले लिया और भीतर चला गया | भीतर से उसने एक बहुमूल्य स्वर्ण पात्र लिया और उसमें भिक्षा सामग्री डाल कर बौद्ध भिक्षु को दे दिया | स्वर्ण पात्र को देखकर भी बौद्ध भिक्षु के मन में कोई विचार नहीं आया | उसने उस कीमती भिक्षापात्र को अपने हाथ में उसी प्रकार ले लिया जैसे वह सदैव उस काष्ठ पात्र को लिया करता था | वह लौट चला, अपने बौद्ध मठ की तरफ |
              किसी अन्य व्यक्ति ने बौध भिक्षु के हाथ में वह बहुमूल्य स्वर्ण पात्र देख लिया | उसने किसी भी प्रकार उस स्वर्ण पात्र को प्राप्त करने का विचार किया | वह उस भिक्षु का पीछा करने लगा | वह किसी ऐसे अवसर की तलाश कर रहा था, जब वह भिक्षु मार्ग में अकेला हो और वह उस स्वर्ण पात्र को उससे छीन सके | उस छोटे से गाँव में बौद्ध मठ कोई अधिक दूर नहीं था | उस व्यक्ति, जिसे चोर कहा जा सकता है, को पूरे रास्ते उस पात्र को छीनने का कोई अवसर नहीं मिल पाया | बौद्ध भिक्षु मठ में प्रवेश कर चूका था | अन्य बौद्ध भिक्षुकों के साथ बैठकर उसने भिक्षा को प्रतिदिन की भांति ग्रहण किया |
               रात हुई | सभी भिक्षुक विपशना के बाद अपने अपने स्थान पर शयन करने के लिए चले गए | रात को शयन-कक्ष के आस पास अचानक हलचल होने से उस भिक्षुक की नींद टूट गयी | उसको अपने शयन-कक्ष की खिड़की के पास किसी मानव की छाया दृष्टिगोचर हुई | भिक्षु तत्काल ही सब कुछ समझ गया | वह तुरंत ही उठ खड़ा हुआ और उस स्वर्ण पात्र को अपने हाथ में उठा लिया | भिक्षु खिड़की के पास पहुंचा और उस स्वर्ण पात्र को खिड़की के रास्ते बाहर फैकते हुए ऊँची आवाज में बोला – ‘ले ! इसे ले जा | तूं भी सोजा और मुझे भी सोने दे |’ भिक्षुक के मन में स्वर्ण-पात्र को इस प्रकार फैंक देने के उपरांत भी किसी प्रकार का भाव नहीं आया | इसे कहते हैं, संतुष्टि में जीना | मैं कहता हूँ कि उस धनाढ्य व्यक्ति ने काष्ठ पात्र लेकर स्वर्ण पात्र भिक्षुक को दे दिया परन्तु अगर कोई व्यक्ति उसका वह काष्ठ पात्र भी छीन लेता और बदले में उसे कुछ भी नहीं देता तो भी उस भिक्षुक के कोई फर्क नहीं पड़ता | ऐसा जीवन ही संतुष्टि का जीवन है अन्यथा अभाव के सिवाय भला यहाँ इस संसार में है भी क्या ? गीता में भगवान् श्री कृष्ण कहते भी हैं कि ‘संतुष्टः सततं योगी यतात्मा दृढ निश्चयः |’गीता-12/14| अर्थात जो व्यक्ति स्वयं में ही संतुष्ट है और दृढ निश्चय वाला है वह योगी है |
क्रमशः
प्रस्तुति- डॉ. प्रकाश काछवाल

|| हरिः शरणम् ||

Friday, August 11, 2017

गुरु के सूत्र - 6

गुरु के सूत्र – 6
             गुरु आपको मुक्ति के द्वार तक ले जा सकता है, परन्तु मुक्ति पाने की इच्छा आपकी स्वयं की होनी चाहिए | मुझे आज तक कोई भी व्यक्ति ऐसा नहीं मिला है, जिसने परमात्मा को पाने की कामना की हो, प्रयास भी बड़े मनोयोग से किये हों और उसे परमात्मा न मिल पाए हों | हाँ, शत-प्रतिशत सत्य कह रहा हूँ मैं | परन्तु दुर्भाग्य है कि आजकल परमात्मा की कामना करना और उसको प्राप्त करने का प्रयास केवल जिव्हा तक का विषय बनकर रह गया है, वह भीतर की कामना नहीं बन सका है | जिस दिन व्यक्ति के भीतर परमात्मा को पाने की तीव्र कामना जगेगी, उस दिन गुरु भी मिल जायेंगे और परमात्मा भी | हरिः शरणम् आश्रम, हरिद्वार के आचार्य श्री गोविन्द राम शर्मा कहते हैं कि मात्र क्रिया में उलझकर रह जाने से परमात्मा के द्वार नहीं खुलेंगे | क्रिया आपको भ्रम में रखती है कि आप गोविन्द की यात्रा पर है | अगर राम-राम कहने और जपने से ही मुक्त हुआ जा सकता तो पिंजरे में बंद रहे कई तोते आज तक मुक्त हो चुके होते | नाम-जप को प्रथमतः उपासना बनाना होगा, फिर विवेक जाग्रत करना होगा तभी आपका नाम-जप प्रभावशाली होगा | राम-राम की ध्वनि आपके भीतर तक पहुंचनी चाहिए, केवल जिव्हा से बाहर आने मात्र से राम नहीं मिल सकेंगे |
                  जिस दिन नाम-सुमिरन आपके भीतर तक, आपके अंतर्मन को छू लेगा, आपके मन में परमात्मा को पाने की कामना अंकुरित हो जाएगी | इस अंकुरण को खाद-पानी देगा, गुरु | इस प्रकार के खाद-पानी को ही ‘गुरु के सूत्र’ कहते हैं | मैं जानता हूँ कि आपके भीतर भी यह अंकुर प्रस्फुटित हो चूका है | आइये ! इस अंकुरण को एक स्वस्थ-सुन्दर पेड़ बनाने के लिए गुरु के पास चलते हैं, गुरु से प्रथम सूत्र जानने के लिए |
   1.संतुष्ट जीवन –
                    मनुष्य का जीवन अभाव पूर्ण जीवन न हो | सद्गुरु कहते हैं कि आज मनुष्य अपनी कामनाओं और वासनाओं में इस प्रकार लिप्त हो गया है कि वह अपने जीवन में प्रतिपल कुछ न कुछ अभाव का ही अनुभव करता रहता है | संतुष्ट जीवन आध्यात्मिक जीवन की आधारशिला है | अभाव पूर्ण जीवन सदैव मन को उद्वेलित किये रहता है जबकि संतुष्टि मन को स्थिरता प्रदान करती है | संतुष्टि का अर्थ है जो मिला हुआ है उसमें ही प्रसन्न रहना और जो नहीं मिला उसकी कभी भी चाहना न करना | जीवन में सांसारिक भोग-विलास से आज तक कोई संतुष्ट नहीं हो सका है | संतोष भीतर से उपजता है, बाहर से नहीं | जिस दिन आप प्रत्येक मिलने वाली चीज को परमात्मा प्रदत्त प्रसाद मानने लगेंगे, संतोष आपके द्वार पर आ खड़ा होगा |
क्रमशः
प्रस्तुति- डॉ. प्रकाश काछवाल

|| हरिः शरणम् ||

Thursday, August 10, 2017

गुरु के सूत्र - 5

गुरु के सूत्र -5
                आइये ! आगे बढ़ते हैं और जानने का प्रयास करते हैं की गुरु के सूत्र हमारे लिए कैसे उपयोगी हैं | मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है | वह इस संसार में समाज बनाकर रहता है | सभी यह बात कहते हैं कि समाज व परिवार उसको बांधते हैं | दूसरे शब्दों में यह कहा जा सकता है कि संसार हमें बांधता है | नहीं, यह कहना असत्य है कि संसार हमें बांधता है, संसार हमें बांधता नहीं है बल्कि हम संसार के साथ बंध जाते हैं | स्वेच्छा से हम संसार, समाज और परिवार के साथ बंधे हुए हैं, किसी ने हमें बांध नहीं रखा है | हम जब चाहें ये बंधन तोड़कर मुक्त हो सकते हैं | परन्तु क्या करें ? मुक्ति की कामना मन में उठती ही तो नहीं है | जब मुक्त होने की कामना हमारे भीतर जन्म लेगी, हम स्वयं आगे की यात्रा की तैयारी करने में व्यस्त हो जायेंगे | यह यात्रा गुरु के सानिध्य से प्रारम्भ होती है, जो गोविन्द को प्राप्त कर समाप्त हो जाती है |
                    ब्रह्मलीन परम श्रद्धेय स्वामी रामसुखदासजी महाराज से एक बार एक व्यक्ति ने पूछा कि आप कहते हैं कि परमात्मा हमें मीठे लगें, परन्तु वे हमें मीठे कैसे और कब लगेंगे ? स्वामीजी ने तुरंत ही एक वाक्य में बहुत ही शानदार उत्तर दिया कि – ‘जब आपको संसार खारा लगने लगेगा |’ जब संसार से मन उचटने लगे तब हमें समझ लेना होगा कि परमात्मा को पाने का समय आ गया है | जब संसार खारा लगने लगता है, तब परमात्मा के प्रति मन में प्रेम उपजता है | मन व्याकुल हो उठता है, उस गोविन्द को पाने के लिए, जो कि मानव जीवन का एक मात्र लक्ष्य है | गोविन्द को पाना सबसे सरल भी है और अत्यंत दुष्कर भी | दुष्कर तो इसलिए क्योंकि संसार हमें सबसे प्यारा लगता है | उसे हम छोडना ही नहीं चाहते | जब संसार से विमुख होने लगते हैं तब गोविन्द को पाना गुरु सरल बना देता है | इसीलिए गुरु हमारे आध्यात्मिक जीवन के लिए आवश्यक है | गुरु हमें तैयार करता है, इस यात्रा के लिए | गुरु हमें संसार में रहते हुए भी तैयारी के लिए इस जीवन में कुछ सूत्र देता है | यह सूत्र मैं आपके साथ साझा कर रहा हूँ | हो सकता है कि कुछ गुरु अपने द्वारा दिए जाने वाले सूत्रों में कुछ शाब्दिक परिवर्तन कर देते हों परन्तु सभी का उद्देश्य एक ही रहता है – शिष्य के आत्म-ज्ञान के लिए मार्ग प्रशस्त करना |
क्रमशः
प्रस्तुति- डॉ. प्रकाश काछवाल

|| हरिः शरणम् ||

Wednesday, August 9, 2017

गुरु के सूत्र -4

गुरु के सूत्र – 4 
                      सूत्र का दूसरा अर्थ है, फार्मूला | गुरु हमें परमात्मा को प्राप्त करने के कुछ सूत्र देता है | उन सूत्रों से हम परमात्मा की पहेली को हल कर सकते हैं | प्रत्येक पहेली के लिए जैसे गणित में सूत्र होते हैं, उसी प्रकार परमात्मा तक पहुँचने के लिए भी सूत्र होते हैं | गुरु हमें वे सूत्र समय-समय पर हमारी प्रगति देखते हुए बताता रहता है | उन सूत्रों से हम गोविन्द को पा सकते हैं | इन सूत्रों की परिभाषा वायुपुराण में बताई गई है | इस सूत्र के बारे में वायु-पुराण में लिखा है - 
अल्पाक्षरं असंदिग्धं सारवत् विश्वतोमुखम् | 
अस्तोभं अनवद्यं च सूत्रं सूत्र विदो विदुः ||
अर्थात कम अक्षरों वाला, संदेह रहित, सार स्वरुप, निरंतरता लिए हुए, त्रुटिहीन कथन को सूत्रविद सूत्र कहते हैं | वायुपुराण के अनुसार सूत्र संक्षिप्त, सारगर्भित, किसी भी प्रकार के संदेह से रहित और सम्पूर्ण रूप से सत्य होना चाहिए | साथ ही साथ सूत्र में निरंतरता का अभाव नहीं होना चाहिए क्योंकि जिस बात में निरंतरता नहीं होती, उससे व्यक्ति का मन उचट जाता है और वह उस ओर ध्यान नहीं दे पाता है | वैसे वायुपुराण में सूत्र शब्द की बहुत लम्बी व्याख्या की गयी है और विभिन्न प्रकार के सूत्र बताये गए हैं | परन्तु इस विषय “गुरु के सूत्र” को समझने के लिए और सूत्र को सम्पूर्ण रूप से जानने के लिए अधिक गहराई में जाने की आवश्यकता नहीं है | इस दूसरे प्रकार के सूत्र के उदाहरण हैं, ब्रह्म-सूत्र, काम-सूत्र, पतंजलि योग-सूत्र आदि |
क्रमशः
प्रस्तुति- डॉ. प्रकाश काछवाल

|| हरिः शरणम् ||

Tuesday, August 8, 2017

गुरु के सूत्र - 3

गुरु के सूत्र – 3
                     सर्वप्रथम हम सूत के अनुसार इस ‘सूत्र’ की भूमिका पर विचार करते हैं | यह सूत अथवा सूत्र किन्हीं दो या अधिक वस्तुओं अथवा व्यक्तियों को आपस में बांधने में प्रयुक्त किया जाता है | जैसे रक्षा-सूत्र, मंगल-सूत्र आदि | गुरु के सम्बन्ध में इस सूत्र की भूमिका भी महत्त्वपूर्ण है | इसके लिए हमें अपने बचपन में एक बार झांकना होगा | आधुनिक युग में बच्चों के द्वारा खेल-खेल में कुछ सीखने के तरीके एक दम बदल गए हैं | हम अपने बचपन में दादी-मां की कहानियों से, मित्रों के साथ खेल कर अथवा खेल दिखाने वालों के खेल देखकर ही बहुत कुछ सीख समझ लेते थे | राजस्थान में कठपुतली का खेल प्रसिद्ध है | उदयपुर के राजस्थान कठपुतली कला केंद्र में इस खेल का प्रदर्शन अभी भी होता है | हमारे बचपन में कठपुतली का खेल दिखाने वाले गली मोहल्लों में आया करते थे | उस समर अमरसिंह राठौड़ नाम से कठपुतली का खेल बड़ा प्रसिद्ध था | इस खेल में परदे के आगे लकड़ी की बनी पुतलियाँ तो परदे के सामने रहा करती हैं और परदे के पीछे होता है इनको नचाने वाला, जिसे सूत्रधार कहा जाता है | प्रत्येक कठपुतली से चार सूत्र अर्थात धागे बंधे होते हैं, जो दूसरे सिरे से सूत्रधार की अँगुलियों से बंधे होते हैं | इस प्रकार दो हाथों से वह दो कठपुतलियों को एक साथ नचा सकता है |
                      खेल प्रारम्भ होता है और परदे के पीछे खड़ा सूत्रधार अपनी अँगुलियों के इशारों से दो कठपुतलियों को नचाते हुए खेल को प्रारम्भ करता है | खेल के चरम बिंदु पर पहुँच कर वह दो कठपुतलियों का आपस में युद्ध करना तक दिखा देता है | प्रायः रात का समय होता था, उस समय अल्प प्रकाश में ये सूत्र हमें दिखाई नहीं देते थे | हम उस खेल का बड़ा आनंद उठाते थे | इसी प्रकार गुरु के हाथों में भी हमें अपने सांसारिक सूत्रों को सौंप देना होता है | अब जैसे गुरु हमें नचाना चाहे हमें नचा सकता है | बिना गुरु के हाथों अपने सूत्र सौंपें ज्ञान प्राप्त करना असंभव है | कठपुतली के खेल में जैसे महत्वपूर्ण भूमिका सूत्रधार की होती है वैसे ही ज्ञान को आत्मसात करने में सूत्रधार की भूमिका में गुरु होता है | अतः आवश्यक है कि गुरु को सर्वप्रथम हम अपने सभी सूत्र सौंप दें और फिर उनके संकेतों का हम अनुगमन करें |
क्रमशः
प्रस्तुति- डॉ. प्रकाश काछवाल
|| हरिः शरणम् ||

Monday, August 7, 2017

गुरु के सूत्र - 2

गुरु के सूत्र – 2
                      ‘गुरु की चोट, विद्या की पोट’, यह कहावत मुझे मेरी माँ सदैव ही कहा करती थी | हमारे समय में शाला में हम जब अपन गृह कार्य करके नहीं जाते थे अथवा कोई पाठ याद करके नहीं जाते थे या कभी कक्षा में शैतानी कर लिया करते थे, तब शिक्षक हमारी डंडे से खूब पिटाई किया करते थे | कभी कभी तो मुर्गा भी बना दिया करते थे या बेंच पर हाथ ऊपर कर खड़ा होने की सजा दे दिया करते थे | शाला के बाद जब हम घर पहुंचते तो जैसा कि स्वाभाविक होता है,इस सजा की शिकायत माँ से करते | तब माताजी यही कहावत कहते हुए बताती थी कि इस सज़ा से आपका ही भला होना है, शिक्षक को कोई लाभ नहीं मिलने वाला | उस समय हमें बड़ा बुरा लगता कि माँ भी शिक्षक का पक्ष ले रही है परन्तु आज अनुभव होता है कि उस समय माँ सही कहती थी |
                इसी प्रकार आध्यात्मिकता में, गुरु से गोविन्द तक की यात्रा में हमारा गुरु भी हमारे लिए सब कुछ करता है | उसका प्रत्येक वाक्य ब्रह्म वाक्य समझना चाहिए | वह जो भी आदेश दे, स्वीकार करना चाहिए | एक मात्र वही है, जो गोविन्द तक पहुंचा है और वही हमारा गोविन्द के पास पहुँचने में मार्गदर्शन कर सकता है | आइये ! हम विचार करते हैं कि वह एक शिष्य को गोविन्द तक पहुँचाने में किस प्रकार मार्गदर्शन करता है ? गुरु हमें जो मार्गदर्शन देता है, उनको सूत्र कहा जाता है | आइये ! हम सर्वप्रथम हम इसी शब्द “सूत्र”पर विचार करते हैं |
सूत्र -  
              गुरु हमें कुछ कहता है, हमारे साथ कुछ करता है, जिसके कारण हम अपने लक्ष्य तक पहुंचने में सफल हो जाते है | गुरु का करना और कहना, दोनों ही उसके सूत्र हैं | हमें हमारे गुरु के इन्हीं सूत्रों का अनुसरण करना है | सूत्र किसे कहते हैं ? आइये ! पहले इस बात पर विचार कर लेते हैं | सूत्र शब्द के दो अर्थ हैं, पहला अर्थ है, धागा अथवा सूत (Thread) और दूसरा अर्थ है, संकेत, सिद्धांत अथवा सूत्र (Formula) |
क्रमशः
प्रस्तुति- डॉ. प्रकाश काछवाल

|| हरिः शरणम् ||

Sunday, August 6, 2017

गुरु के सूत्र - 1

हरिः शरणम् | आज स्वदेश आये चार दिन हो गएँ हैं और जेट लेग से भी लगभग पूर्णतया मुक्त हो चूका हूँ | आज से एक नए विषय ‘गुरु के सूत्र’ पर चर्चा प्रारम्भ करने जा रहा हूँ जो कि इससे पूर्व के विषय ‘यात्रा-गुरु से गोविन्द तक’  से ही सम्बंधित है | इन दोनों ही विषयों का आधार संत श्री मोरारी बापू के द्वारा दिनांक 26 जून व 1 जुलाई 2017 को कोलिराडो (सं.रा.अमेरिका ) के एडिस पार्क में दिए गए दो प्रवचनों पर आधारित है | इस विषय को और अधिक स्पष्ट करने का प्रयास कर रहा हूँ, हरिः शरणम् आश्रम, बेलडा (हरिद्वार) के आचार्य श्री गोविन्द राम शर्मा से समय समय पर मिले सत्संग के आधार पर | इस श्रृंखला में गुरु के द्वारा बताये गए उन सूत्रों पर चर्चा करेंगे, जिन पर चलकर हम अपनी आध्यात्मिक यात्रा को आगे बढ़ा सकते हैं | आशा है, आपके लिए यह श्रृंखला लाभकारी होगी | हरिः शरणम् |
गुरु के सूत्र
               हमने अभी गुरु से गोविन्द तक श्रृंखला में इस बात पर चिंतन किया था कि हमें गुरु गोविन्द के पास तक किस प्रकार ले जाता है | आज इस नई श्रृंखला में इस बात पर चिंतन करेंगे कि हमें गुरु किस प्रकार गोविन्द के पास जाने के लिए तैयार करता है | हम कोरे नहीं है बल्कि उलजलूल ज्ञान से भरे हुए हैं | उस ज्ञान से हमें गुरु पहले पहले तो मुक्त करता है और फिर वास्तविक ज्ञान से हमारा परिचय कराता है | इसके लिए गुरु किसी भी सीमा तक जा सकता है, पात्रता तो आप में होनी चाहिए | ऐसा नहीं है कि गुरु हमारे आत्मबल को सहारा नहीं देता, हमें सदैव ही गुरु प्रेरित करता रहता है, जीवन में कभी भी हतोत्साहित नहीं होने देता | इसी लिए कबीर कहते हैं –
गुरु कुम्हार शिष्य कुम्भ है; गढ़ गढ़ काढ़े खोट |
अन्दर हाथ सहार दे; बाहर बाहे चोट ||
अर्थात गुरु एक कुम्हार की भांति है, जो अपने घड़े को सदैव ही मजबूत और पक्का बनाने का प्रयास करता है | जिस प्रकार कुम्हार एक कच्चे घड़े को पक्का करने के लिए बाहर से थपथपाता रहता है परन्तु भीतर दूसरे हाथ से उस सहारा भी दिए रखता है; उसी प्रकार हमारा गुरु भी हमें आध्यात्मिकता की राह में भीतर से सहारा देते हुए बाहर से ज्ञान की चोट देता रहता है |
क्रमशः
प्रस्तुति- डॉ. प्रकाश काछवाल

|| हरिः शरणम् ||