Wednesday, May 25, 2016

अथ ब्रह्मा उवाच-3

अथ ब्रह्मा उवाच-3
उपरोक्त सब बातें मैंने भूमिका के तौर पर इसलिए कही है क्योंकि मैं जानता हूँ कि कोई भी मनुष्य अपने भीतर की कमी को जानने के बावजूद स्वीकार करने की हिम्मत नहीं रखता है | मैं यह चाहता हूँ कि आपमें इतनी हिम्मत पैदा हो कि आप अपनी कमियों को जान कर, समझ कर उन्हें दूर करने का प्रयत्न करें | इससे पहले कि गुरु आपको इन कमियों के बारे में बताकर आगे के मार्ग पर अग्रसर होने के लिए तैयार करे उससे पहले ही आप इन कमियों को जानकर अपने आपको गुरु से ज्ञान प्राप्त के लिए तैयार करलें | इससे गुरु को भी ज्ञान देने में और आपको भी ज्ञान प्राप्त करने की सुविधा रहेगी अन्यथा गुरु को क्या हानि है ? उनको तो आपके स्तर को पहचान कर, आपके स्तर पर आकर ही आपको ज्ञान देना है |
इसी प्रकार एक बार ज्ञान प्राप्ति के लिए मनुष्य, देवता और दानव; तीनों ही ब्रह्मा के पास पहुंचे और करबद्ध होकर उनसे प्रार्थना की कि वे उन्हें ज्ञान दें | ब्रह्माजी ठहरे, प्रजापिता | उनके लिए तो तीनों एक समान थे भले ही उनके स्वभाव और गुण भिन्न रहे हों | इस प्रकार ब्रह्माजी ने तीनों को एक समान समझते हुए एक ही प्रकार का ज्ञान दिया –‘द, द और द’ | तीनों ही श्रेणी के जिज्ञासुओं को एक समान ज्ञान, वह भी सांकेतिक भाषा में, केवल एक ही अक्षर-‘द’, इसके अतिरिक्त कुछ भी नहीं कहा, ब्रह्मा ने | परमात्मा के नाभि कमल से उत्पन्न ब्रह्माजी, इस सृष्टि के रचयिता ब्रह्माजी, भला बिना किसी आधार के केवल एकमात्र अक्षर “द” का ज्ञान कैसे दे सकते हैं ? तीनों ने ही विचार किया कि अवश्य ही इस एक अक्षरीय ज्ञान के अन्दर, इस ‘द’ के भीतर कोई न कोई रहस्य छिपा हुआ है | अब यह उनके स्वयं के विवेक पर ही निर्भर करता है कि वे इस ‘द’ के ज्ञान में छुपा कोई रहस्य समझ पाते हैं अथवा नहीं |
क्रमशः
प्रस्तुति- डॉ. प्रकाश काछवाल


|| हरिः शरणम् ||

Tuesday, May 24, 2016

अथ ब्रह्मा उवाच-2

अथ ब्रह्मा उवाच-2
आपने अपने निजी जीवन में चाहे कितनी भी प्रगति कर ली हो, अपने में उपस्थित कमी को जीवन में कभी भुला नहीं पाते हो | इस कमजोरी को आप किसी के समक्ष उजागर नहीं करते फिर भी आपका अंतर्मन इस कमी को सदैव याद अवश्य ही रखता है | यही कारण है कि जब आप किसी संत पुरुष के सानिध्य में होते हो, किसी गुरु के साथ सत्संग कर रहे हो तो आपको सदैव उनकी बातों से ऐसा लगता है जैसे कि इतना सब कुछ उस गुरु अथवा संत के द्वारा आपके लिए ही कहा जा रहा है | आप आश्चर्यचकित हो जाते हैं, जब अपने गुरु की कही बात आपको आपने भीतर का सच लगता है, आपके ह्रदय का सत्य लगता है | हाँ, गुरु आपके भीतर का सच जानता है | एक बात और कहूँ, गुरु आपके भीतर का ही सच नहीं, इस संसार के प्रत्येक मनुष्य के भीतर का सच जानता है, तभी तो वह गुरु है |
गुरु पहुंचा हुआ केवल मात्र एक मनुष्य ही तो है अन्यथा आप में और गुरु में अंतर ही क्या है , सिवाय इसके कि उन्होंने अपने लक्ष्य तक की यात्रा पूरी कर ली है और आपने अभी अपने लक्ष्य की ओर यात्रा प्रारम्भ तक नहीं की है | जब मनुष्य परमात्मा की तरफ जाने की यात्रा प्रारम्भ करता है, तब उसको यह रहस्य कुछ कुछ समझ में आने लगता है | साथ ही उसे यह भी समझना होता है कि अपने भीतर के सत्य को, अपनी वास्तविकता को खुलकर गुरु के सामने प्रकट करे अन्यथा गुरु आपके भीतर के उस सत्य को प्रकट कर ही देगा | गुरु सदैव आपके भीतर की बुराई पर चोट करता है और आपको लगता है कि गुरु ने आपको लक्ष्य करके चोट की है | गुरु चोट करता है उस प्रत्येक बुराई पर, जो आपके भीतर भी उपस्थित हो सकती है | गुरु केवल आपके भीतर उपस्थित बुराई अथवा कमी की बात नहीं करता है, वह बात करता है - प्रत्येक मनुष्य के भीतर हो सकने वाली बुराई की, उस कमी की, जो उसके परमात्मा की ओर अग्रसर होने में बाधक बनती है | आप अगर समझदार हैं, थोडा सा भी ज्ञान रखते है, तो गुरु की बात को समझने में तनिक सी भी देर नहीं लगेगी | भला आप क्यों समझदार नहीं होंगे, आखिर आप एक मनुष्य हैं और मैंने इस लेख के प्रारम्भ में ही स्पष्ट कर दिया है कि मनुष्य ही संसार का एक मात्र ऐसा प्राणी है, जिसको परमात्मा ने सोचने समझने की शक्ति दी है |
क्रमशः
प्रस्तुति- डॉ. प्रकाश काछवाल
|| हरिःशरणम् ||

Monday, May 23, 2016

अथ ब्रह्मा उवाच-1

अथ ब्रह्मा उवाच-1 
                    मनुष्य ही संसार में एक मात्र ऐसा प्राणी है,जिसको परमात्मा ने सोचने समझने की शक्ति प्रदान की है | इस शक्ति का सदुपयोग कर मनुष्य देवत्व को उपलब्ध हो सकता है और इन्हीं शक्तियों का दुरुपयोग कर दानव भी बन बैठता है | यही कारण है कि अपने मनुष्य होने की श्रेणी के अलावा मनुष्य को ही देवता और मनुष्य को ही दानव की श्रेणी में एक मनुष्य होने के बावजूद रख दिया जाता है | अगर सरल शब्दों में कहा जाये तो एक मनुष्य साधारण मनुष्य भी हो सकता है, वही मनुष्य देवता भी हो सकता है और वही मनुष्य दानव भी हो सकता है | सत्व को उपलब्ध मनुष्य देवता होता है, रजस में रत मनुष्य केवल साधारण मनुष्य होता है और तामसिक वृति का मनुष्य दानव हो सकता है |

                   मनुष्य हो चाहे इन तीनों में से किसी भी एक श्रेणी में रखे जाने योग्य हो, उसमें एक विशेषता समान रूप से उपस्थित होती है | वह विशेषता है- स्वयं को जानने की, स्वयं के बारे में जानने की | प्रत्येक व्यक्ति चाहे बाहर से कुछ भी नज़र आ रहा हो, भीतर से उसे स्वयं की प्रकृति का ज्ञान सदैव ही बना रहता है | मनुष्य की सबसे बड़ी विडंबना यही है कि वह स्वयं के बारे में सब कुछ अच्छा-बुरा जानते हुए भी अपने आपको सदैव अच्छा और सामने वाले को बुरा ही प्रदर्शित करता है अर्थात उसको स्वयं में सदैव अच्छाई और सामने वाले में बुराई ही नज़र आती है | प्रत्येक व्यक्ति में अच्छाई और बुराई दोनों ही उपस्थित रहती है और एक संत की दृष्टि के अनुसार प्रत्येक मनुष्य को स्वयं में बुराई और सामने वाले में अच्छाई खोजने का ही सदैव प्रयास करना चाहिए | 
क्रमशः 
                       || हरिः शरणम् ||

Sunday, May 22, 2016

ब्रह्मा का कथन

        आज हरिः शरणम् आश्रम से आये हुए एक सप्ताह हो गया है और यहाँ आने के बाद भी वहां का प्रवास ही यादों में बह रहा है | पवित्र स्थान और आदरणीय आचार्यजी का साथ फिर से कब मिलेगा, कह नहीं सकता क्योंकि सब कुछ परमात्मा के हाथ में है | जैसा कि आचार्यजी ने कहा भी है कि सत्संग केवल संत का साथ ही नहीं है, सनातन शास्त्रों का साथ, उनको पढ़ना और पढ़ी गई बातों पर विचार करना भी सत्संग होता है | उन्हीं की कही गई बातों को आत्मसात करते हुए इन दिनों प्रतिदिन कुछ न कुछ परमात्मा से सम्बंधित सामग्री का पठन प्रारम्भ किया है | वैसे पहले भी समय मिलने पर ऐसा करता रहता था, परन्तु जब से चिकित्सकीय व्यवसाय को प्राथमिकता देना बंद कर दिया है, इस और रुचि कुछ अधिक ही हो गयी है | 
                  अभी कल ही किसी महान व्यक्तित्व का आलेख पढ़ रहा था, जिसमें एक दृष्टान्त दिया गया था | दृष्टान्त कुछ इस प्रकार है- “एक बार ब्रह्मा जी के पास देवता, दानव और मनुष्य गये और उपदेश देने के लिए प्रार्थना की | ब्रह्मा जी ने तीनों को कहा .... " द द द " | तीनों प्रसन्न होकर चले गये | इसी पर विचार करके मेरा यह लेख है, जिसको आप आद्योपांत पढ़कर अपनी अमूल्य भावनाओं से मुझे अवगत कराएँ, यह मेरा आपसे विनम्र अनुरोध है | हो सकता है, मैंने इस दृष्टान्त का उचित और सही विश्लेषण नहीं किया हो |  मैं आपको सम्पूर्ण दृष्टान्त प्रारम्भ में ही इसलिए नहीं बता रहा हूँ क्योंकि आगे इस लेख में समय समय पर इसका विश्लेषण किया गया है | इस लेख का शीर्षक है- “अथ ब्रह्मा उवाच” | यह लेख आप प्रतिदिन एक एक कड़ी के रूप में पढ़ पाएंगे क्योंकि इसके लेखन का कार्य अभी चल रहा है | कल से आपकी सेवा में प्रस्तुत करने जा रहा हूँ, इस लेख “अथ ब्रह्मा उवाच” की पहली किश्त |
                        ||हरिः शरणम् ||

Saturday, May 21, 2016

बुद्ध-पूर्णिमा |

आज बुद्ध पूर्णिमा है, जिसका सम्बन्ध भगवान बुद्ध से है | भगवान बुद्ध का जन्म, उनको ज्ञान प्राप्ति और उनका महापरिनिर्वाण तीनों ही वैशाख शुक्ल पूर्णिमा के दिन ही हुए थे | इसी कारण से इस पूर्णिमा को बुद्ध-पूर्णिमा कहा जाता है | उनका जन्म ईसापूर्व 526 में नेपाल में स्थित कपिलवस्तु के निकट लुम्बिनी नामक स्थान पर हुआ था | उनके पिता का नाम शुद्धोधन और माता का नाम महामाया देवी था | उनका जन्म नाम सिद्धार्थ था | उनका विवाह 16 वर्ष की आयु में राजकुमारी यशोधरा के साथ हुआ था | विवाह के कई वर्ष बाद उनके पुत्र पैदा हुआ था जिसका नाम राहुल था | इससे कुछ समय पूर्व ही उन्होंने एक रोगग्रस्त व्यक्ति, एक वयोवृद्ध व्यक्ति, एक व्यक्ति की शवयात्रा और एक सन्यासी व्यक्ति को देखा, जिनके कारण उनका मन उद्वेलित हो गया | वे जरा और मृत्यु से मुक्त होने का उपाय खोजने का विचार करने लगे |पुत्र जन्म को उन्होंने स्वयं के वैराग्य के लिए एक बंधन माना | इस कारण से तत्काल ही वे 29 वर्ष की आयु में यशोधरा और दूधमुंहे राहुल को सोते हुए ही छोड़कर राजमहल को त्याग दिया |
उसके पश्चात उन्होंने पांच ब्राह्मण तपस्वियों के पास रहकर छः वर्ष तक निरंजना नदी के तट पर कठोर तपस्या की | वे कृशकाय हो चुके थे | वे एक रात निरंजना नदी को तैर कर पार कर रहे थे | उनके शरीर की उर्जा लगभग समाप्त हो चुकी थी | उनसे तैरना तक मुश्किल हो गया था | इतने में उनके हाथ नदी के दूसरे किनारे से लटकती पेड़ की कुछ जड़ें लग गयी | वे उनके सहारे ही कुछ समय तक नदी में लटकते रहे | थोड़ी देर बाद जब उनके शरीर में कुछ उर्जा का संचार हुआ तो वे हिम्मत कर नदी के बाहर आये | थोड़ी दूर चलकर वे एक वटवृक्ष के नीचे लेट गए और विचार करने लगे कि इतनी कठोर तपस्या का क्या फायदा जिससे जरा और मृत्यु से मुक्ति का रास्ता तक न मिल सके | उन्होंने कठोर तपस्या के सब प्रपंच त्यागने का निर्णय लिया | उस रात वे उसी वटवृक्ष के नीचे सो गए |
सुबह उठते ही उहोने अपने सामने सुजाता को खड़े पाया जिसके हाथ में खीर भरा कटोरा था | सुजाता ने उस वटवृक्ष से पुत्र प्राप्ति की कामना की थी जिसके पूर्ण होने पर आज पूर्णिमा के दिन वटवृक्ष देवता को प्रसाद अर्पण करने आई थी | उसने वहां लेटे सिद्धार्थ को वटवृक्ष देवता समझा और उनके जागने का इंतजार करने लगी | सिद्धार्थ ने जागते ही सुजाता के द्वारा भेंट किये खीर के कटोरे को हाथ में लेकर आनन्द के साथ उसको उदरस्थ किया | विगत रात को ही उन्होंने समस्त व्रत आदि को छोड़ने का निर्णय किया ही था | दिन भर वे अपने विगत दिनों की कठोर तपस्या के बारे में विचार करते रहे | उसी रात को उनको सम्यक ज्ञान की प्राप्ति हुई जिसे “सम्बोधि “ नाम से कहा जाता है, जिस वटवृक्ष के नीचे उन्हें ज्ञान प्राप्त हुआ उसे “बोधिवृक्ष” और जहाँ उन्हें यह ज्ञान प्राप्त हुआ उस स्थान को “बोधगया” कहा जाता है | वे स्वयं भगवान् बुद्ध कहलाये | उनके ज्ञान की प्रमुख बात है- किसी भी प्रकार की अति से बचना | यही सम्यक ज्ञान है |
ज्ञान प्राप्ति के पश्चात् उन्होंने अपने पांच ब्राह्मण तपस्वियों को खोजकर ज्ञान दिया | इसके बाद वे समस्त संसार को ज्ञान बांटने के लिए निकल पड़े | सर्वप्रथम उन्होंने अपना प्रवचन सारनाथ में दिया, जो कि बनारस के निकट है | बाद में उनके परिवार के सदस्य भाई, पिता और पुत्र भी उनके शिष्य बने | उन्होंने मगध प्रदेश के खूंखार डाकू अंगुलिमाल का ह्रदय परिवर्तित कर दिया जो बाद में अहिंसका नाम से बोध भिक्षु के रूप में प्रसिद्ध हुआ |
उनका महापरिनिर्वाण वैशाख शुक्ल पूर्णिमा के दिन ही 483 ईसापूर्व 80 वर्ष की आयु में हुआ | आज बोद्ध धर्म संसार के बड़े भाग मैं फैला हुआ है | सम्राट अशोक उनके अनुयायी थे | भीमराव अंबेडकर भी बोद्ध थे | हमारे पवित्र धर्मग्रन्थ श्री मद्भागवत महापुराण में भगवान् श्री कृष्ण के बाद, भगवान् विष्णु का 23 वां अवतार इनका होना भी बताया गया है |
देवद्विषां निगमवर्त्मनि निष्ठितानां
पूर्भिर्मयेन विहिताभिरदृश्यतूर्भिः |
लोकान् घ्नतां मतिविमोहमतिप्रलोभं
वेषं विधाय बहुभाष्यतऔपधर्म्यम् ||भागवत 2/7/37||
अर्थात देवताओं के शत्रु दैत्य लोग भी वेदमार्ग का सहारा लेकर मयदानव के बनाये हुए अदृश्य वेग वाले नगरों में रहकर लोगों का सत्यानाश करने लगेंगे, तब भगवान लोगों की बुद्धि में मोह और अत्यंत लोभ उत्पन्नकरने वाला वेश धारण करके बुद्ध के रूप में बहुत से उप-धर्मों का उपदेश करेंगे |
आज भी बुद्ध की शिक्षाएं हमारे जीवन के लिए उपयोगी हैं | आप सभी को बुद्ध पूर्णिमा की शुभ कामनाएं |
- डॉ.प्रकाश काछवाल
|| हरिः शरणम् ||


Thursday, May 19, 2016

ब्लॉग पर पुनः सक्रिय होने की सूचना |

                          प्रिय आत्मनः,
                                          इस वर्ष बुद्ध पूर्णिमा दिनांक 21/05/2016 को पड़ रही है | इस शुभ दिन  से मैं ब्लॉग पर पुनः सक्रिय हो रहा हूँ | इतने दिनों तक आपसे दूर रहा, इसका मुझे खेद है परन्तु यह भी सत्य है कि आप सभी को मैंने कभी भी विस्मृत नहीं किया | जो आप है, वही मैं भी हूँ, आप में और मुझमे कोई भेद नहीं है अतः मैं भी आप ही हूँ |आपसे दूर रहना उसी प्रकार है जैसे किसी अपने ही अंग को स्वयं से दूर कर देना | मैं दूसरी साइट्स पर लिख रहा हूँ वही अब आपको इस ब्लोगर  पर भी मिलेगा | आप अपनी सुविधानुसार किसी एक पर उसे पढ़ सकते हैं | आपका प्रेम ही मेरे जीवन की पूँजी है और इस जीवन की एक मात्र उपलब्धि भी | आशा है आप पूर्ववत प्रेम को बनाये  रखेंगे |
                          आभार |
                                      || हरिः शरणम् ||

Thursday, May 5, 2016

क्षमा-याचना

आप सभी बंधु बांधवों को प्रणाम | आप सभी से मैं क्षमा चाहता हूँ कि इतने दिनों तक आप से दूर रहा | कुछ मेरी विवशताएँ भी थी और कुछ मेरा आलस्य भी | विवशताएँ भी ऐसी थी कि  बहुत चाहकर भी समय निकल नहीं पाया और जब समय मिला तब शरीर की क्षमता ने साथ नहीं दिया  | आखिर यह शरीर भी कितने दिन साथ देगा जो छः दशक तक इस संसार को झेल चूका है | संसार की ठोकरें व्यक्ति के शरीर को इतना तोड़ कर रख देती है कि आप विवश हो जाते हैं-कुछ भी करने के लिए और साथ ही कुछ नहीं करने के लिए भी |
              खैर, यह सब तो इस मानव जीवन का ही एक हिस्सा  है |इन दिनों मैं हरिः शरणम् आश्रम हरिद्वार की फेस बुक के पेज पर लिख रहा हूँ और साथ ही हरिः शरणम् सुजानगढ़ की फेस बुक भी संभाल रहा हूँ | आप इसके लिंक पर जाकर प्रतिदिन अथवा समय समय पर लिखी गई पोस्ट को पढ़ सकते हैं |अंग्रेजी में  लिंक इस प्रकार है-
harisharnam sujangarh
आप अपनी फेस बुक पर जाकर find friends को क्लिक कर इस पर डाली गई पोस्ट पढ़ सकते हैं |शीघ्र ही इस ब्लॉग पर लौटूंगा |
    आपका आभार |