Wednesday, September 18, 2013

पुनर्जन्म-कब और कहाँ?-६

क्रमश:
                     तीनों गुणों के अनुसार ही व्यक्ति का स्वभाव होता है |उसे उसकी प्रकृति कहा जाता है|उन्ही गुणों के अनुसार वह व्यक्ति कर्म करता है|उसकी बुद्धि भी गुणों के अनुरूप ही होती है|सात्विक,राजसिक और तामसिक गुण प्रत्येक व्यक्ति में होते हैं |जिस गुण की बहुलता ज्यादा होती है वह व्यक्ति उसी प्रकृति का माना जाता है|सात्विक व्यक्ति में राजसिक और तामसिक गुण अल्प मात्रा में और नियंत्रण में होते है |जिसके कारण सात्विक व्यक्ति के कर्म बहुदा सात्विक ही होते हैं|परन्तु कभी कभी उससे भी राजसिक या तामसिक कर्म हो ही जाते हैं|राजसिक व्यक्ति में राजस गुण बहुतायत में होते हैं|राजसिक गुण सात्विक और तामसिक गुणों  को नियंत्रण में रखते हुए बढ़ते हैं|राजसिक व्यक्ति ज्यादातर राजसिक कर्म ही करते हैं,परन्तु कभी कभी उससे सात्विक या तामसिक कर्म भी जीवन में हो जाते हैं|इसी प्रकार तामसिक प्रकृति के व्यक्ति में तामसिक गुण ही पाए जाते हैं |तामसिक गुण सात्विक और राजसिक गुणों को नियंत्रण में रखते हुए बढ़ते है|तामसिक गुणों से युक्त व्यक्ति प्रायः तामसिक कर्म ही करते हैं|परन्तु कभी कभी इनसे भी सात्विक या राजसिक कर्म हो जाते हैं|
                              जीवन में किये गए कर्मों का लेखा जोखा चित्त में अंकित होता रहता है|जीवन में एक आम आदमी, कर्म अपनी इच्छाओं और कामनाओं की पूर्ति के लिए ही करता है|अतः ये अपूर्ण रही इच्छाए और कामनाएं ही पुनर्जन्म का कारण बनती है ,और इन इच्छाओं को पूरी करने के लिए किये गए कर्म उसके भावी जीवन का भविष्य निश्चित्त करते हैं|पुनर्जन्म की सीधी सादी और सरल गणित मात्र इतनी ही है|
                              कर्म चाहे किसी प्रकार के हों और व्यक्ति की प्रकृति किसी भी गुण से सम्बंधित हो,पुनर्जन्म तो अवश्यम्भावी है|हाँ,किस योनि में होना है और भविष्य कैसा होगा ,यह सब कर्म के गुणों के उपजे फल पर निर्भर करता है|परन्तु मानव जन्म का एक मात्र उद्देश्य केवल मात्र यह तो नहीं हो सकता कि सात्विक कर्म करते हुए उच्च लोकों में आनंद प्राप्त कर पुनः इस दु:खालय यानि इस दु:खों से परिपूर्ण भौतिक संसार में अवतरित होना पड़े और जन्म मरण के चक्र से छुटकारा न मिल सके |ऐसी स्थिति में फिर व्यक्ति का क्या उद्देश्य होना चाहिए?यही विचारणीय विषय होना चाहिए |
                             जब सभी कर्मों के करने से पुनर्जन्म ही होता है तो फिर इन गुणों को पीछे छोड़ते हुए आगे बढ़ना होगा,जिससे इन पुनर्जन्मों से मुक्ति मिल सके|इस अवस्था को गुणातीत होना कहते हैं |भगवान श्री कृष्ण गीता में कहते हैं-
                             गुणानेतानतीत्य त्रीन्देही देहसमुद्भवान् |
                             जन्ममृत्युजरादु:खैर्विमुक्तोSमृतमश्नुते || गीता १४/२०||
अर्थात्,पुरुष शरीर की उत्पत्ति के कारणरूप इन तीनों गुणों का उल्लंघन करके जन्म, मृत्यु,वृद्धावस्था और सब प्रकार के दु:खों से मुक्त हुआ परमानन्द को प्राप्त होता है|तीनों गुणों की उत्पत्ति का कारण पहले वर्णित स्थूल प्रकृति के २३ तत्व हैं|ये हैं-पञ्च भूत(भूमि,जल,अग्नि,आकाश और वायु),पांच ज्ञानेन्द्रियाँ ,पांच ही इनके विषय,पांच कर्मेंदियाँ,मन, बुद्धि और अहंकार|
                   यहाँ भगवान श्री कृष्ण यह कहते हैं कि सात्विक,राजसिक और तामसिक गुणों का उल्लंघन करके ही परमात्मा को पाया जा सकता है,क्योंकि सभी गुण स्थूल शरीर की उत्पति से ही अस्तित्व में आयें है,जिसके कारण इन गुणों का संग ही पुनर्जन्म का एक मात्र कारण है|अतः अगर पुनर्जन्म से मुक्त होना है,तो इन गुणों से भी मुक्त होना होगा अर्थात् व्यक्ति को इन गुणों से ऊपर उठकर गुणातीत होना होगा,जो कि परमात्मा स्वयं की प्रकृति है|परमात्मा प्रत्येक भौतिक शरीर में अपने ही अंश आत्मा के रूप में अवस्थित रहता है|अतः आत्मा भी गुणातीत ही होती है|लेकिन शरीर में रहते हुए वह उपरोक्त २३ स्थूल प्रकृति के तत्वों के गुणों का संग कर लेती है |इन गुणों के संग के कारण ही मन में कई इच्छाएं और कामनाएं पैदा होती है |इन इच्छाओं और कामनाओं को पूरा करने के लिए तीन गुणों से युक्त कर्म शरीर करता है,और वही कर्म , पुनर्जन्म निर्धारित करता है |अतः यदि इस संसार में पुनः नहीं लौटना है तो इस त्रिगुणी व्यवस्था से भी व्यक्ति को ऊपर उठना होगा |तभी इस दु:खालय में न लौटकर परमात्मा का सानिध्य प्राप्त किया जा सकता है |
क्रमश:
                        || हरि: शरणम् ||     

Tuesday, September 17, 2013

पुनर्जन्म-कब और कहाँ?-५

क्रमश:
                      तामसिक गुणों से युक्त पुरुष की गति भी उसके किये गए कर्मों के अनुरूप ही होती है | तामसिक व्यक्ति ज्यादातर तामसिक कर्म ही करता है|गीता में भगवान श्री कृष्ण तामसिक कर्मों के लक्षण समझाते हुये कहते हैं-
                              अनुबन्धं क्षयं हिंसामनवेक्ष्य च पौरुषम् |
                              मोहादारभ्यते   कर्म   यत्तत्तामसमुच्यते || गीता १८/२५ ||
अर्थात्,जो कर्म परिणाम,हानि,हिंसा और सामर्थ्य का विचार किये बिना केवल अज्ञान से आरम्भ किया जाता है,वह कर्म तामसिक कहा जाता है|
                       तामसिक कर्ता कोई भी कार्य बिना सोचे विचारे प्रारंभ कर देता है|उसे कार्य का ज्ञान भी नहीं होता कि ऐसे कर्म कों करने की क्या तो विधि होनी चाहिए,उसे कैसे परिणाम तक पहुँचाया जाये या इस कर्म का संभावित परिणाम क्या होगा?उसका उद्देश्य तो प्रत्येक कर्म का येन-केन-प्रकारेण अपने मनवांछित फल कों प्राप्त करना होता है,चाहे उसके लिए उसे कितने भी प्रयास शास्त्र विरुद्ध करने पड़े|वह यह समझ ही नहीं पाता कि आज जो भी फल उसे प्राप्त हो रहें है वह सब पूर्व जन्म के कर्मों के फल है ना कि इस जन्म के किये गए कर्मों का फल|इस जन्म में किये गए कर्मों के फल तो उसे अगले जन्म में ही प्राप्त हो पाएंगे|इस कों सही तरीके से समझ नहीं पाना ही उसका अज्ञान है|
                          तामसिक कर्ता शिक्षा से रहित तो होता ही है,साथ में वह घमंडी,धूर्त दूसरों की जीविका का नाश करनेवाला भी होता है|ऐसा कर्ता आलसी होता है और तत्काल करने वाले कार्य कों भी टालता रहता है|इसका कारण उसकी तामसिक बुद्धि ही होती है|तामसिक बुद्धियुक्त पुरुष अधर्म कों भी "यही धर्म है" ऐसा मान बैठता है|लाख समझाने पर भी वह यथार्थ कों समझने का प्रयास भी नहीं करता है|  इसी प्रकार वह सभी संज्ञान में आने वाली बातों के विपरीत कों ही सही  मान लेता है |ऐसा व्यक्ति बाहरी तौर पर देखने में चाहे कितना ही निश्चिन्त और बहादुर नजर आता हो परन्तु वास्तव में वह जीवन में निद्रा,भय,शोक,चिंता ,दुख,दुर्बलता और उन्मत्तता कों त्याग ही नहीं सकता |यही उसकी सबसे बड़ी विडम्बना है|
                           तामसिक कर्मों से  उसे सुख का जो अनुभव  होता है वह आत्मा कों भी मोहित कर देता है जबकि ऐसा सुख मात्र आलस्य ,निद्रा और प्रमाद से ही उत्पन्न होता है|तामसिक व्यक्ति ईश्वर की पूजा,तप और यज्ञ भी शास्त्रविधि के बिना,अन्नदान से रहित,बिना मन्त्रों के और बिना श्रद्धा के करता है|तामसिक कर्ता तप भी मूढतापूर्ण तरीके से,हठपूर्वक तथा दूसरे का अनिष्ट करने के लिए करता है|वह दान भी तिरस्कारपूर्वक  व अयोग्य तथा कुपात्र कों ही करता है|
                               ऐसी तामसिक वृति वाला पुरुष मरणोपरांत कई वर्षों तक नीच योनियों में जन्म लेकर भटकता रहता है|जहाँ उसे बहुत ही प्रकार के कष्ट सहने पड़ते हैं|जब उसके सभी तामसिक कर्मों का फल पूर्ण रूप से भोगे जाने के बाद समाप्त हो जाते हैं तब उसे वापिस मानव योनि सुलभ होती है|यहाँ पर भी ज्यादा सम्भावना इसी बात की रहती है कि उसका जन्म निम्न कुल में ही होगा|परन्तु मानव योनि ही एक मात्र ऐसी योनि है,जिसमे जन्म ले कर व्यक्ति अपनी स्थिति में सुधार कर सकता है|अगर कोई तामसिक वृति का व्यक्ति तामसिक कर्मों के साथ साथ सात्विक कर्म भी एकाधिक बार कर लेता है तो भी प्रारंभ में उसे नीच योनियों में ही कई वर्षों तक भटकते रहना होगा|हाँ,ऐसा अवश्य होगा कि मानव योनि में उसका जन्म निम्न कुल की जगह माध्यम कुल में हो,जिससे वह अपने आप का उत्थान कर सके|
                     एक बार पुनः मानव योनि प्राप्त करने के बाद जिस प्रकार के कर्म वह करेगा ,उसी प्रकार से उसका भावी जन्म निश्चित होगा |तामसिक कर्मों का फल नीच योनियों में भोगलेने के पश्चात जब मानव योनि में जन्म होता है तो तामसिक प्रकृति के व्यक्ति का चित्त प्रारंभ में निर्मल अवस्था में होता है|उसे जो भी वातावरण अपने परिवार व परिवेश में मिलता है,उसी के अनुरूप उसका विकास होता है,जो उसकी अपनी स्थिति को सुधारने में भी सहायक सिद्ध हो सकता है|वह उच्च कोटि के कर्म करने को प्रेरित हो सकता है |
क्रमश:
               || हरी शरणम् || 

Monday, September 16, 2013

पुनर्जन्म-कब और कहाँ?-४

क्रमश:
                          सात्विक गुणों से युक्त पुरुष जब अपने मानव जीवन काल में सात्विक कर्म करता है तो शरीर त्यागने के पश्चात उसकी गति के बारे में स्पष्ट हो चूका है|परन्तु अगर ऐसा व्यक्ति अगर सात्विक कर्मों के साथ साथ कुछेक राजसिक या तामसिक कर्म करता है तो फिर उसकी क्या गति होगी?ऐसे पुरुष का देव व ब्रह्म लोक में निवास अल्प अवधि का ही होता है और राजसिक या तामसिक कर्म का फल उसे पुनः मानव योनि में आकर भुगतना होगा |
                              राजसिक कर्म के लक्षण बताते हुये भगवान श्री कृष्ण गीता में कहते हैं-
                                                 यत्तु कामेप्सुना कर्म साहन्कारेण वा पुनः |
                                                 क्रियते    बहुलायासं    तद्राजसमुदाहृतम् || गीता १८/२४ ||
अर्थात्,जो कर्म बहुत परिश्रम से युक्त होता है तथा भोगों कों चाहने वाले पुरुष द्वारा या अहंकारयुक्त पुरुष द्वारा किया जाता है,वह कर्म राजस कहा गया है|
               अगर हम आज के समाज में रह रहे व्यक्तियों का अवलोकन करें तो हमें ज्यादातर लोग राजस कर्म करते हुये ही प्रतीत होंगे|आज प्रायः सभी जन, भोगों की प्राप्ति के लिए बहुत ही श्रम वाले कर्म करते हैं|जिन लोगों कों सभी भोग उपलब्ध है वे अहंकार रखते हुये इसी प्रकार के कर्म करते है|ऐसे कर्म करने वाला कर्ता आसक्ति से युक्त,कर्मों का फल चाहने वाला तथा लोभी होता है|राजसिक व्यक्ति दूसरों कों कष्ट देनेवाला तथा अशुद्ध आचरण करने वाला होता है|राजसिक कर्ता हर्ष-शोक से लिप्त होता है|किसी उपलब्धि पर वह हर्षित हो जाता है तथा कभी विपरीत परिणाम पाने पर उतना ही शोकग्रस्त हो जाता है|
                                        ऐसे राजसिक गुणों से युक्त पुरुष के कर्म भी प्रायः राजसिक लक्षण वाले ही होते हैं|चूँकि राजसिक व्यक्ति का संसार में जबरदस्त आकर्षण होता है,और वह जीवन भर सांसारिक भोगों के प्रति आसक्त रहता है और उन भोगों कों प्राप्त करने के लिए वह श्रमशील भी होता है|ऐसे व्यक्ति देह त्यागने के उपरांत तत्काल ही मानव योनि में पुनर्जन्म लेते है और अपने अधूरे भोगों और कामनाओं कों पूरा करने हेतु राजसिक कर्म करने लगते है|यह चक्र मानव दर मानव योनि सतत चलता रहता है,जब तक कि वह सत्संग के माध्यम से परमात्मा की तरफ उन्मुख नहीं होता|
                                         राजसिक गुणों से युक्त व्यक्ति अपने जीवन काल में तामसिक या सात्विक कर्म भी कर लेता है|ऐसी परिस्थिति में अगर उसने साथ में एकाधिक तामसिक कर्म किये है तो उनकी तीव्रता के अनुसार पहले नीच योनि में भी जन्म लेना पड़ सकता है|तामसिक कर्मफलों कों भोगने के बाद उसे पुनः मानव योनि सुलभ हो जाती है|इसी प्रकार अगर उसने एकाधिक सात्विक कर्म किये है तो भी उसका उच्च लोक में जाना संभव नहीं है|हाँ,इतना अवश्य होता है कि मानव योनि प्राप्त होने पर उसका जन्म पूर्वजन्म से अच्छे कुल में हो जाता है,जहाँ अपने सात्विक कर्म का फल प्राप्त करता है|
                                         राजसिक गुणों से युक्त व्यक्ति की सबसे बड़ी विडम्बना यह है कि वह धर्म और अधर्म तथा कर्तव्य और अकर्तव्य कों यथार्थ रूप से नहीं जानता क्योंकि उसकी बुद्धि भी राजसिक प्रवृति की होती है|ऐसा व्यक्ति इन्द्रियों से प्राप्त  क्षणिक सुख कों ही वास्तविक सुख मान लेता है,जबकि वह वास्तविक सुख होता नहीं है|जो सुख इन्द्रियों के संयोग से वह प्राप्त करता है वह भोग काल में तो अमृत तुल्य प्रतीत होता है लेकिन उसके परिणाम विष तुल्य होते हैं|इन्द्रियों के अत्यधिक भोग बल,वीर्य ,बुद्धि, धन और उत्साह नाशक तो होते ही है,साथ ही परलोक नाशक भी होते है|कहने का तात्पर्य यह है कि  शरीर त्यागने के बाद भी इन भोगों के लिए किये गए कर्मों के फल भी विषतुल्य होते हैं|
                                     इसी प्रकार राजसिक गुणों से युक्त व्यक्ति अगर ईश्वर की पूजा और यज्ञ तपादि भी करता है तो केवल दम्भाचरण के लिये फल कों ही दृष्टि में लिए करता है| जिसका परिणाम भी श्रेष्ट प्राप्त नहीं होता|क्योंकि  सब कर्म फलों की प्राप्ति कों ध्यान में रखकर किये जाते हैं|
                             अतः स्पष्ट है कि राजसिक स्वभाव युक्त पुरुष मानव जन्मों में इसी प्रकार भटकता रहता है,फिर भी उसकी भोगों की कामनाएं किसी भी जन्म में पूरी नहीं हो पाती|और वह इस जन्म-मरण के चक्र से कभी भी मुक्त नहीं हो पायेगा| उसका हर बार मानव रूप में पुनर्जन्म होता रहेगा|
क्रमश:
                         || हरि शरणम् || 

Friday, September 13, 2013

पुनर्जन्म-कब और कहाँ?-३

क्रमश:
                     श्रीमद्भागवत गीता में भगवान श्री कृष्ण कहते हैं-
                                  मनुष्याणां   सहस्रेषु   कश्चिद्यतति   सिद्धये |
                                  यततामपि सिद्धानां कश्चिन्मां वेति तत्वतः || गीता ७/३ ||  
अर्थात्, हजारों मनुष्यों में कोई एक मेरी प्राप्ति के लिए यत्न करता है और उन यत्न करने वाले योगियों में भी कोई एक मेरे परायण होकर मुझको तत्व से यानि यथार्थ रूप से जानता है|
                        पहली बात तो यह है कि ज्यादातर लोग तो परमात्मा कों प्राप्त करने का प्रयास ही नहीं करते हैं|कोई  हजारों लोगों में से कोई मात्र एक व्यक्ति ही इसके लिए प्रयत्न करता है|और ऐसे हजारों प्रयत्न करने वालों में भी कोई एक परमात्मा के प्रति समर्पित होकर उसे तत्व से अर्थात् उसके वास्तविक स्वरुप कों जान पाता है|ऐसा व्यक्ति जिसे भी योगी कहा जा सकता है ,वह योगी शरीर त्यागने के पश्चात परमात्मा कों ही प्राप्त होता है और जन्म-मरण के चक्र से मुक्त हो जाता है|इस बात कों और अधिक स्पष्ट करते हुये भगवान कहते हैं-
                                 अभ्यासयोगयुक्तेन चेतसा नान्यगामिना |
                                 परमं पुरुषं दिव्यं याति पार्थानुचिन्तयन् || गीता ८/८ ||
अर्थात्,हे पार्थ!यह नियम है कि परमात्मा के प्रति ध्यान के अभ्यासरूप योग से युक्त,दूसरी और न जाने वाले चित्त से निरंतर चिंतन करता हुआ मनुष्य परम दिव्य पुरुष अर्थात परमपिता परमेश्वर कों प्राप्त होता है|
                      इससे यह स्पष्ट होता है कि परमात्मा को अनन्य  भक्ति से ही प्राप्त किया जा सकता है|मन कों केवल मात्र परमात्मा के प्रति समर्पित करते हुये एक मात्र उनका चिंतन करते रहने से ही उसकी प्राप्ति सुलभ हो जाती है |इसके लिए एक मात्र परमात्मा के प्रति ध्यान का अभ्यास करते रहना होगा |बिना अभ्यासयोग के ध्यान असंभव होता है|बिना ध्यान के मन पर नियंत्रण रखना असंभव होता है,जिससे परमात्मा की प्राप्ति भी दुर्लभ हो जाती है|रामचरितमानस में गोस्वामीजी कहते हैं कि-
             सनमुख होइ जीव मोहि जबहीं |जन्म कोटि अघ नासहिं तबहीं ||सुन्दरकाण्ड ४४/२ ||
भगवान कहते हैं कि जीव ज्योंही मेरे सम्मुख होता है,त्योंही उसके करोडों जन्मों के पाप नष्ट हो जाते हैं|जब विभीषण कों रावण ने लंका से निकाल दिया था,तब वह भगवान की शरण में आने कों वहां से निकल पड़ा था|यह प्रसंग उस समय का है|रावण से निराश होकर विभीषण ने एक मात्र भगवान श्री राम का सहारा लिया था|और भगवान श्री राम ने उसे निराश नहीं किया|उस समय विभीषण ने भगवान श्री राम के प्रति अनन्य भक्ति प्रदर्शित की थी|उसी कारण से विभीषण कों परमात्मा उपलब्ध हुये|
                                सतो गुण से युक्त पुरुष कुछ काल के लिए ब्रह्म या देव लोक में रहने के बाद वापिस मानव योनि में जन्म लेते हैं|जिसका वर्णन पहले किया जा चूका है|रजो गुण से युक्त पुरुष का पुनर्जन्म तत्काल ही मानव योनि में ही हो जाता है|क्योंकि इस गुण से युक्त पुरुष का देह ,परिवार,समाज ,ऐश्वर्य आदि के प्रति मोह इतना अधिक होता है कि अपने आखिरी समय में भी वह इन्हीं का चिंतन करता रहता है|भगवान श्री कृष्ण गीता में कहते हैं कि इस भौतिक देह कों त्यागते समय जो जो ,जिस जिस का स्मरण करता है वह वह उसी भाव कों प्राप्त होता है|(गीता ८/६ )|अतः यह स्पष्ट है कि राजसिक गुणों से युक्त पुरुष बार बार मानव के रूपमे ही इस धरा पर जन्म पाते रहते  हैं और इस पुनर्जन्म के चक्र से निकल ही नहीं पाते हैं|
                                       गीता में सात्विक कर्म के लक्षण भगवान श्री कृष्ण ने इस प्रकार कहे हैं-
                                                       नियतं       संगरहितमरागद्वेषतः   कृतम् |
                                                       अफलप्रेप्सुना कर्म यत्तत्सात्विक मुच्यते || गीता १८/२३ ||
                    अर्थात्,जो कर्म शास्त्र विधि से नियत किया हुआ और कर्तापन के अभिमान से रहित हो तथा फल न चाहने वाले पुरुष द्वारा बिना राग द्वेष के किया गया हो-वह सात्विक कर्म कहा जाता हैं|
                                  सात्विक कर्म बिना फल की ईच्छा के किये जाते हैं जिससे कर्मबंधन नहीं हो पाता है|अतः कर्मफल के रूप में किसी भी योनि का मिलना संभव नहीं होता है|सात्विक कर्म में कर्म फल का त्याग किया जाता है|यह सब सात्विक ज्ञान के कारण ही संभव हो पाता है| इस कर्म से युक्त पुरुष  उच्च लोक में जाकर कुछ समय तक रहते हैं|जब इन सात्विक कर्मों के अनुसारफल प्राप्त करने के उपरांत  अवधि पूरी हो जाती है तब इस भूलोक में मानव योनि में उनका पुनर्जन्म होता है|
क्रमश:
                         || हरि शरणम् ||
      

Thursday, September 12, 2013

पुनर्जन्म-कब और कहाँ?-२

क्रमश:
                     गीता में भगवान श्री कृष्ण कहते हैं-
                                       आब्रह्मभुवनाल्लोकाः पुनरावर्तिनोSर्जुन |
                                       मामुपेत्य तु कौन्तेय पुनर्जन्म न विद्यते || गीता ८/१६ ||
अर्थात्,हे कुन्तीपुत्र अर्जुन! ब्रह्मलोक पर्यंत सब लोक पुनरावर्ती है,परन्तु जो मुझको प्राप्त हो जाता है उसका पुनर्जन्म नहीं होता |
                           यहाँ पर भगवान श्री कृष्ण ने ब्रह्म लोक को सम्मिलित करते हुये कहा है कि इन सभी लोकों में गए पुरुष वापिस लौटते है,अर्थात् उन सभी का मानव योनि में कभी ना कभी पुनर्जन्म होना अवश्यम्भावी है|फिन पुनर्जन्म कहाँ जाने पर नहीं होता उसको समझाते हुये कहते हैं-
                                       परस्तस्मात्तु भावोSन्योSव्यक्त्तोSव्यक्त्तात्सनातनः |
                                       यः    स   सर्वेषु   भूतेषु   नश्यत्सु    न    विनश्यति  || गीता ८/२० ||
अर्थात्,परन्तु उस अवक्त से भी परे दूसरा विलक्षण यानि जो सनातन अव्यक्त भाव है;वह परम दिव्य पुरुष सब भूतों के नष्ट होने पर भी नष्ट नहीं होता|
                    ब्रह्म लोक से भी परे जो अव्यक्त भाव है वह कभी भी नष्ट नहीं होता है|केवल मात्र उसको प्राप्त कर लेने से ही किसी पुरुष का पुनर्जन्म होना असंभव हो जाता है|अतः इस स्थिति कों प्राप्त करना ही लक्ष्य होना चाहिए अन्यथा आप पुनर्जन्म कों कुछ समय के लिए टाल जरुर सकते हैं परन्तु पुनर्जन्म कों रोक बिलकुल भी नहीं सकते| उस सनातन अव्यक्त भाव कों कैसे प्राप्त किया जा सकता है कि पुनर्जन्म न हो,इसको स्पष्ट करते हुये भगवान श्री कृष्ण कहते हैं-
                                        पुरुषः स परः पार्थ भक्त्या लभ्यस्त्वनन्यया |
                                        यस्यान्तःस्थानि भूतानि येन सर्वमिदं ततम् || गीता ८/२२ ||
अर्थात्,हे पार्थ!जिस परमात्मा के अंतर्गत सर्वभूत है और जिस परमात्मा से यह समस्त जगत परिपूर्ण है,वह सनातन अव्यक्त परम पुरुष तो केवल अनन्य भक्ति से ही प्राप्त होने योग्य है|
                                             ब्रह्म लोक तक तो कोई भी पुरुष सत्कर्म करते हुये पहुँच भी सकता है,परन्तु यह लोक भी पुनरावर्ती है|यहाँ पर समस्त कर्मफल सम्पूर्ण हो जाने पर वापिस मानव रूप में पुनर्जन्म होना होता है|परन्तु अगर पुनर्जन्म से मुक्त होना चाहते है तो फिर उस सनातन अव्यक्त पुरुष तक पहुँचना ही होगा|गीता में भगवान श्री कृष्ण कहते हैं कि वह सनातन अव्यक्त पुरुष केवल अन्य भक्ति से ही पाया जा सकता है|भक्ति नाम है ,प्रेम का|और प्रेम में समर्पण आवश्यक होता है|अनन्य भक्ति एक मात्र परमात्मा के प्रति प्रेम सहित समर्पण का ही नाम है|यानि साधारण शब्दों में कहा जाये तो" एक मात्र परमात्मा ही मेरे सब कुछ है और मैं परमात्मा के प्रति पूर्णरूप से समर्पित हूँ|अन्य यहाँ मेरा कोई भी नहीं है,सबकुछ परमात्मा ही है"इसी का नाम अनन्य भक्ति है|इस भक्ति से परमात्मा कों पाना संभव है|एक बार उससे मिलन हो जाने पर व्यक्ति जन्म मरण के चक्र से मुक्त हो जाता है|
                       उस सनातन अव्यक्त भाव कों प्राप्त करने के अतिरिक्त हर स्थान से पुनर्जन्म के लिए लौटना ही होता है|पुनर्जन्म की इस सम्बन्ध में क्या सम्भावनाये हो सकती है ,इस पर विचार करेंगे|
                    जब चित्त में अंकित कर्मों के आधार पर फल निश्चित हो जाते है तो उन्हें उपलब्ध करवाने की व्यवस्था भी आत्मा द्वारा ही की जाती है|अगर सात्विक कर्म इस भांति किये गए हों कि जिससे मिलने वाले कर्मफल मानव योनि में भी संभव ना हो ,तो ऐसी स्थिति में किसी भी योनि में पुनर्जन्म नहीं हो सकता |ऐसी आत्माए फिर देवलोक या ब्रह्म लोक में कुछ समय के लिए निवास करती है और जब पुण्य कर्मों का कर्मफल पूर्ण होता है तभी उनका जन्म मानव योनि में संभव होता है|सतोगुण युक्त पुरुष ही इस लोक के अधिकारी होते हैं|सतोगुण से युक्त व्यक्ति साधारणतया सात्विक कर्म ही अपने जीवन में संपन्न करते हैं अतः उनका उपरी लोकों में कुछ समय के लिए निवास करना संभव होता है| उनका पुनर्जन्म उच्च कुल में और सुशिक्षित परिवार में होता है,जहाँ बचपन से ही उसे ईश्वर के प्रति भक्ति पूर्ण वातावरण उपलब्ध रहता है,जिससे उसे परमात्मा कों पाने की सोच बलवती हो जाती है|इसी कारण से भागवत में कहा गया है कि मानव योनि बार बार इसी लिए मिलती है कि व्यक्ति निरंतर परमात्मा कों पाने की दिशा में प्रगति करता रहे|
क्रमश:
                         || हरि शरणम् ||  

Wednesday, September 11, 2013

पुनर्जन्म-कब और कहाँ?-१

                                            पुनर्जन्म के कारण और प्रकिया समझ लेने के बाद यह जानना होगा कि मृत्यु के बाद पुनः आत्मा और चित्त को देह कब उपलब्ध होती है? इस बारे में विज्ञानं के आधार पर कल्पना नहीं की जा सकती क्योंकि विज्ञानं तो अभी भी पुनर्जन्म को स्वीकार नहीं कर पाया है|अतः इस बारे में जो भी भारतीय शास्त्रों में उपलब्ध है ,उन्ही के आधार पर समझने का प्रयास करेंगे|
                                         मृत्यु के बाद जब आत्मा चित्त को साथ लेकर शरीर से अलग हो जाती है तो उसे नया शरीर उपलब्ध होने में कुछ क्षणों से लेकर कई वर्ष तक लग सकते हैं|यह सब पूर्व शरीर में रहते हुये मन द्वारा शरीर से जो कर्म करवाए जाते है ,उन पर निर्भर करता है|प्रत्येक कर्म के आधार पर पहले कर्मफल निर्धारित किये जाते हैं ,फिर उन्हीं के आधार पर यह तय होता है कि किस योनि में वह फल उपलब्ध होगा|कौन सा कर्मफल कब भुगतना होगा ,समयानुसार वही योनि उस समय आत्मा को उपलब्ध होगी|सब कुछ आत्मा को ही तय करना होता है क्योंकि वह परमात्मा की प्रतिनिधि या अंश है|आत्मा जब कर्मों के अनुसार सब तय कर लेती है तब निश्चित क्रमानुसार शरीर उपलब्ध होने की प्रक्रिया शुरू होती है|फिर उसमे कुछ भी परिवर्तन नहीं किया जा सकता|
                                             कर्मफलों का आकलन केवल मानव योनि भोग लेने के बाद ही होता है,अन्य योनियों में शरीरों की मृत्यु के बाद ऐसा आकलन बिलकुल भी नहीं होता है|अतः अगर किसी व्यक्ति के कर्मों के अनुसार  मानव योनि के अतिरिक्त कोई अन्य योनि मिलना निश्चित होता है, तो वह अन्य योनि उसे पहले भोगनी होगी|ऐसी समस्त योनियों को भोगने के पश्चात ही उसे मानव जीवन सुलभ होगा|अपवाद स्वरुप कई बार मानव योनि पहले भी उपलब्ध हो सकती है;परन्तु ऐसे उदाहरण नगण्य ही है|
                                   आत्मा इन सब कर्मों का कर्मफल उनके गुणों के आधार पर करती है|कर्म भी गुणों के आधार पर तीन प्रकार के कहे गए हैं-सात्विक,राजसिक और तामसिक| ये तीनो गुण प्रत्येक व्यक्ति में होते हैं|कोई भी एक व्यक्ति मात्र एक ही गुण से युक्त नहीं होता है|सभी में तीनो गुणों की उपलब्धता होती है|तमो व रजो गुणों को दबाकर सात्विक गुण बढता है,सतो व तमो गुणों को दबाकर राजसिक गुण बढता है और इसी प्रकार सतो व रजो गुणों को दबाकर तामसिक गुण बढता है|परन्तु एकव्यक्ति में मात्र एक ही गुण की उपलब्धता असंभव है|इन्हीं गुणों के आधार पर कर्मफल निश्चित किये जाते हैं|गीता में भगवान श्री कृष्ण कहते हैं-
                                ऊर्ध्वं गच्छन्ति सत्त्वस्था मध्य तिष्ठन्ति राजसाः |
                                जघन्यगुणवृतिस्था   अधो   गच्छन्ति   तामसाः || गीता १४/१८ ||
अर्थात्,सत्व गुण में स्थित पुरुष स्वर्गादि उच्च लोकों को जाते हैं;रजो गुण में स्थित राजस पुरुष मध्य में अर्थात् मनुष्य लोक में ही रहते हैं और तमो गुण के कार्यरूप निद्रा,प्रमाद और आलस्यादि में स्थित तामस पुरुष अधोगति को अर्थात्,कीट,पशु आदि नीच योनियों को प्राप्त होते हैं|
                                  पदार्थों के गुणों के संग से उसी कोटि के गुणयुक्त कर्म शरीर द्वारा किये जाते है,जिसके फल व्यक्ति को अपने आगामी जन्मों में उपलब्ध होते हैं|इस लिए प्रत्येक स्थान पर गुणों का अपना महत्त्व है|व्यक्ति को प्रत्येक कर्म करने से पहले यह विचार जरूर करना चाहिए कि कारित कर्म किस गुण से युक्त हो सकते हैं|सत्व गुण में स्थित पुरुष भी कई बार तामसिक प्रकृति के कर्म कर सकता है और तमो गुणों से युक्त व्यक्ति भी कभी कभी सात्विक प्रकृति के कर्म कर सकता है|अतः प्रत्येक स्थिति में यह संभव नहीं है कि जिस गुण में पुरुष स्थित हो उसे उसी प्रकार का कर्मफल मिलेगा|अगर सतो गुण में स्थित पुरुष एक भी तामसिक प्रकृति के कर्म में लिप्त हो जाता है तो भावी जन्म में उसका फल मिलना अवश्यम्भावी है|इसी कारण से कहा जाता है कि जो जैसा दिखाई देता है ,उसे वास्तव में वैसा होना भी चाहिए|यह सोचना नितांत ही असत्य है कि एक तामसिक कर्म को करने के उपरांत सौ सात्विक कर्म कर तामसिक कर्म के फल से मुक्ति पाई जा सकती है|कर्म फल से मुक्ति केवल भोगकर ही पाई जा सकती है|इनसे मुक्ति पाने के लिए प्रायश्चित और ज्ञान दो अन्य साधन उपलब्ध  अवश्य हैं परन्तु इन दोनों में बहुत ही अधिक श्रम,समय और धैर्य की आवश्यकता होती है|जो कि साधारण पुरुष के लिए लगभग असंभव है|संत कबीर ने सच ही कहा है-
                                       कर्ता था तो क्यूँ रहा,अब कर क्यूँ पछताय |
                                       बोया पेड़ बबूल का,फिर आम कहाँ से पाय ||
             कबीर यहाँ कहना चाहते हैं कि अगर तूंही  सब का कर्ता था,तो जो कर्म तूने पिछे किये है उनका फल भोगते हुये क्यों पछता रहा है?कहने का अर्थ यह है कि व्यक्ति कर्म करते वक्त सब कार्यों का कर्ता स्वयं कों मानता है,लेकिन जब उन कर्मों का फल मिलने लगता है तो वह अपनी किस्मत कों दोष देते हुये पछताता रहता है|जबकि इन कर्मफलों का अधिकारी भी वही है,क्योंकि उसने सभी कर्म कर्ता भाव से ही किये हैं |
क्रमश:
                      || हरि शरणम् ||
               

Tuesday, September 10, 2013

पुनर्जन्म-कैसे?-प्रक्रिया-९ |

क्रमश:
                       गीता में भगवान श्री कृष्ण कहते हैं-
                                 प्रकृतिं स्वामवष्टभ्य विसृजामि पुनः पुनः |
                                 भूतग्रामिमं कृत्सनमवशं प्रक्रितेर्वशात् || गीता ९/८ ||
अर्थात्,अपनी प्रकृति को अंगीकार करके स्वभाव के बल से परतंत्र हुये इस सम्पूर्ण भूत समुदाय को बार बार उनके कर्मों के अनुसार रचता हूँ|
                             यहाँ यह स्पष्ट है कि पुनार्जन्मका कारण व्यक्ति द्वारा किये गए उसके कर्म ही एक मात्र कारण होते है,अन्य कोई नहीं|वैज्ञानिक तौर पर देखा जाये तो कर्म जो भी चित्त में अंकित होते हैं वे चुम्बकीय तरंगों के रूप में होते हैं|इन्हें नष्ट नहींकिया  जा सकता,परन्तु पढ़ा जा सकता है|जितने भी कर्म इन चुम्बकीय तरंगों के रूप में होते है,वे नए शरीर में बने जैव  विद्युत चुम्बकीय क्षेत्र के साथ संयोग करने के लिए  उसकी तरफ आकर्षित होते हैं |क्योंकि उन्हें उस शरीर से ही फल प्राप्त होने की आशा होती है|जो कामनाएं अधूरी रह जाती है,उन्हें नए शरीर से प्राप्त कर लेने हेतु यह आकर्षण उसे नए शरीर में आने को  प्रेरित करता है|जिस तरीके से चित्त आत्मा को लेकर पुराने शरीर से अलग होता है,उसकी विपरीत क्रिया से चित्त आत्मा के साथ नए शरीर में प्रवेश करता है|
                                        जब आत्मा को नए शरीर में जाना होता है तब शरीर और आत्मा के विपरीत चुम्बकीय ध्रुव एक दूसरे के सामने होते है जिसे आत्मा मय चित्त उसकी तरफ आकर्षित होकर शरीर के साथ संयुक्त हो जाती है|ज्यादातर मामलों में इसी समय शिशु का जन्म होता है|ज्योंही आत्मा का शरीर के साथ संयोजन होता है,शरीर में उपस्थित मन के साथ आत्मा संयोग कर लेती है|फिर वापिस वही जीवन चक्र प्रारंभ हो जाता है ,जैसा पूर्व में वर्णित किया जा चूका है|वास्तव में शरीर में स्थित यही आत्मा ही भोक्ता है|इन्द्रियों के विषय मन के द्वारा कर्मेन्द्रियों से कर्म करवाते हुये सब भोग आत्मा को ही उपलब्ध होते हैं|
                गीता में भगवान श्री कृष्ण कहते हैं-
                                 ममैवांशो जीवलोके जीवभूतः सनातनः |
                                 मनःषष्ठानीन्द्रियाणि प्रकृतिस्थानि कर्षति ||गीता १५/७ ||
अर्थात्,इस देह में यह सनातन जीवात्मा मेरा ही अंश है और यह प्रकृति में स्थित मन और पांचों इन्द्रियों को आकर्षित करता है|
                                 श्रोत्रं चक्षुः स्पर्शनं च रसनं घ्राणमेव च |
                                 अधिष्ठाय   मनश्चायं  विषयानुपसेवते ||गीता १५/९  ||
अर्थात्,यह जीवात्मा कान ,चक्षु,त्वचा,रसना ,नाक और मन को आश्रय करके अर्थात इन सबके सहारे से ही विषयों का सेवन करता है|
                                उपरोक्त दोनों श्लोकों से स्पष्ट है की आत्मा,परमात्मा का ही अंश है ,और शरीर में आकार वह इन्द्रियों और मन सेसंयोग करते हुये इन्द्रियों के सभी विषयों का सेवन करती है|
                                  उपरोक्त दोनों श्लोक इस बात को स्पष्ट करते हैं कि शरीर में स्थित आत्मा ही इन्द्रियों के विषयों का भोग करती है|इन भोगों के प्रति आसक्तिभाव शरीर को मन के द्वारा कर्म करने को बाध्य करता है,जिसको आत्मा के द्वारा पदार्थ के गुणों का संग करना कहते हैं |यही गुण युक्त कर्म चित्त के साथ संयुक्त होकर मृत्यु उपरांत आत्मा के साथ चले जाते हैं|इन्ही के कारण पुनर्जन्म का आधार बनता है|इन्ही कर्मों के कर्मफल स्वरुप जब भी नया मानव शरीर उपलब्ध होता है,आत्मा फिर उसी प्रकार मन व इन्द्रियों के प्रति आकर्षित हो कर उनसे संयोग कर लेती है|और इस प्रकार नए कर्म फिर से चित्त में अंकित होते रहते है|इस प्रकार मानव जीवन में किये गए कर्मों के कर्मफलों से छुटकारा मिलना असंभव हो जाता है ,और व्यक्ति जन्म-मरण के चक्र से मुक्त नहीं हो पाता है|
                                                     || हरि शरणम् ||