Monday, September 9, 2013

पुनर्जन्म-कैसे?-प्रक्रिया-८ |

क्रमश:
                      जब सब कर्मों के अंकन से युक्त चित्त आत्मा के साथ अंतरिक्ष में स्वछन्द विचरण करता है तब कर्मों के आधार पर उनका भावी शरीर मिलना तय होता है|अगर पाप कर्मों की बहुलता होती है तो मन यानि चित्त को नीच योनियों में जन्म लेना पड़ता है|अगर पाप और पुण्य कर्मों का संचय समान रूप से हुआ होता है तो पहले यह तय होता है कि पापकर्मों की तीव्रता कितनी है |यह आवश्यक नहीं है कि किये हुये सभी कर्मों के कर्मफलों का निपटारा मात्र एक जन्म में ही हो जाये|इन कर्मों के कर्मफलों का भोग कई जन्मों और कई योनियों में भटकते हुये भोगना पड़ सकता है|इस समय कुछ भी अब मन या चित्त के अधिकार क्षेत्र में नहीं रहता है|अब जो कुछ भी निर्धारण करना है,आत्मा को ही करना है|सारा भविष्य अब आत्मा के हाथ में रहता है कि इस मन को अब कौन सा शरीर उपलब्ध कराया जाये जिससे उसे उसके कर्मों का फल मिल सके|
                      यह स्पष्ट है कि मन या चित्त कर्मों के हिसाब से फल प्राप्त करने के अधिकारी हैं,परन्तु किन कर्मों का फल कहाँ पर,किस शरीर में और कब मिलना है ,यह सब आत्मा के द्वारा किये गए निर्णय पर आधारित होता है|परमब्रह्म परमात्मा का इससे कोई लेना देना नहीं होता है|किसी भी शरीर में आत्मा ही ,परमात्मा का एक मात्र प्रतिनिधि होता है|इसीलिए जो भी निर्णय आत्मा करता है ,वह निर्णय परमात्मा का ही माना जाता है|आत्मा की भूमिका  यहीं पर सबसे अधिक होती है|
                इसीलिए गीता में भगवान श्री कृष्ण अर्जुन को आत्मा कि महत्वता समझाते हुये कहते हैं-
                                  उद्धरेदात्मनात्मानं नात्मनामवसादयेत्  |
                                  आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः ||गीता ६/५||
अर्थात्,अपने द्वारा अपना उद्धार इस संसार सागर से करे|अपने को अधोगति में न डाले;क्योंकि यह आत्मा (आप) ही तो अपना मित्र है और आत्मा (आप) ही अपना शत्रु है|
                              कहने का तात्पर्य यही है कि आत्मा शरीर में रहते हुये जिन भोगों का भोग करती है ,जिन भोगों के लिए मन के माध्यम से शरीर से कर्म करवाती है,उसी से उसका स्वयं के प्रति शत्रुवत या मित्रवत व्यवहार का आकलन होता है|अतः पुनर्जन्म कैसे,कब कहाँ और कौन से शरीर में होना है ,यह सब आत्मा ही निर्धारित करती है,परमात्मा के प्रतिनिधि के तौर पर आत्मा ही इस सम्बन्ध में निर्णय लेती है|इसीलिए गीता में व्यक्ति स्वयं को यानि उसमे अवस्थित आत्मा ही को उसका मित्र या शत्रु बताया गया है|मित्र तभी माना जाता है जब वो अपने मन को नियंत्रण में रखे जिससे भोगों के प्रति आसक्ति ना हो और आत्मा पदार्थ के गुणों का संग न कर सके|पदार्थों के गुणों का संग न करने से चित्त में उन कर्मों का कोई भी अंकन संभव नहीं है,जो पुनर्जन्म में फलों को प्राप्त करने का कोई कारण बन सके|
                            गीता में भगवान श्री कृष्ण कहते हैं-
                                          असंयतात्मना योगो दुष्प्राप इति में मतिः |
                                          वश्यात्मना तु यतता शक्योSवाप्तुमुपयतः||गीता ६/३६ ||
अर्थात्, जिसका मन वश में नहीं किया हुआ है,ऐसे पुरुष द्वारा योग दुष्प्राप्य है और वश में किये हुये मन वाले प्रयत्नशील पुरुष द्वारा साधन से योग का प्राप्त होना सहज है-यह मेरा मत है|
                                         यहाँ योग प्राप्त होने से मतलब परमात्मा से योग होना है,क्योंकि आत्मा ,परमात्मा का प्रतिनिधि मात्र है|अंततोगत्वा उसे परमात्मा से ही मिलना है,पुनर्जन्मों में भटकना उसका मूल स्वभाव नहीं है |परन्तु चित्त से संयोग और विषयों के भोग के कारण पदार्थ के गुणों से संयोग करलेना ही उसे परमात्मा के साथ योग करने से वंचित कर देता है|
क्रमश:
                     || हरि शरणम् ||
                          

Sunday, September 8, 2013

पुनर्जन्म-कैसे?-प्रक्रिया-७ |

क्रमश:
         कबीरदास जी कहते हैं-
                         मन मरा ना ममता मरी,मर मर गए शरीर |
                         आशा तृष्णा ना मरी,कह गया दास कबीर  ||
   कबीर कहते हैं की मन,ममता ,आशा और तृष्णा कभी भी मरते नहीं है,केवल शरीर ही मरते हैं| ये चारों तो नए नए शरीर में प्रवेश कर संसार में आते रहते है|अगर इस संसार में वापिस नहीं आना है तो फिर इन चारों को मारना ही होगा|
                  मन या चित्त में अंकित किए गए कर्मों का फल व्यक्ति को हर हाल में मिल कर ही रहता है|कर्मफल काल के अधीन है|यह समय ही निश्चित करता है कि कौन से कर्म का फल उस व्यक्ति को कब भोगना है?कर्म का फल कभी भी नष्ट नहीं होता है|ये सभी कर्म सदैव चित्त से चिपके रहते हैं और अनुकूल परिस्थितियां पैदा होने पर ही फल देते हैं अन्यथा जन्म-जन्मान्तरों तक चित्त के साथ चिपके हुये चलते रहते हैं|वेदों में कहा गया है कि कर्म समाप्त करने के मात्र तीन तरीके हैं-
      (१)भोग कर----जब कर्मों के फल के लिए उचित समय आता है तब उनका फल व्यक्ति अगर भोग लेता है तो काम चित्त का साथ छोड़ देते है क्योंकि उस कर्म का फल सम्बन्धित व्यक्ति भोग चूका होता है|
      (२)प्रायश्चित कर----अगर भूलवश आपसे शास्त्र विरुद्ध कोई कर्म हो जाता है तो उसके प्रायश्चित से कर्मफल के प्रभावऔर उसकी तीव्रता को कम किया जा सकता है|राजा दिलीप के पैर की ठोकर भूलवश कामधेनु को लग गयी,जिससे क्रुद्ध होकर कामधेनु ने उन्हें निःसंतानता का श्राप दे दिया|राजा दिलीप ने प्रायश्चित स्वरुप कामधेनु की पुत्री नंदिनी को घर लाकर उसकी पूरे मन से सेवा की और श्राप से मुक्ति पाई| केवल एक कर्म से मुक्ति के लिए ही बरसों तक की प्रायश्चित साधना की जरुरत होती है|अगर कोई यह समझता है कि थोड़े से समय के प्रायश्चित से कर्मों से मुक्ति मिल सकती है तो यह गलत होगा|
      (३)ज्ञान प्राप्त कर------जब व्यक्ति को इस बात का ज्ञान हो जाता है कि उसने यह कर्म गलत किया है या भूलवश हो गया है,तो इस बात की स्वीकारोक्ति ही कर्मफल के प्रभाव को समाप्त करने के लिए प्रयाप्त है|परन्तु यह स्वीकारोक्ति हृदय से होनी चाहिए,मात्र शब्दों से नहीं|ज्ञान ही एक मात्र ऐसी विधि है जिससे किये हुये कर्मों के फलों से आसानी से मुक्त हुआ जा सकता है||गीता में भी  भगवान श्री कृष्ण कहते भी हैं कि ज्ञान सभी कर्मफलों को नष्ट कर देता है|इसी लिए कहा जाता है कि ज्ञान बिना मुक्ति संभव नहीं है|कर्मों से मुक्त हो जाना ही वास्तविक मुक्ति है|
            स्वामी तुलसीदास जी ने मानस में लिखा है-
                             जद्यपि सम नहि राग  न रोषू |  गहहि  न  पाप   पूनु    गुन दोषू ||
                             करम प्रधान बिस्व करि राखा|जो जस करहि सो तस फल चाखा||अयोध्याकाण्ड २१९ /३-४||
            अर्थात्,यद्यपि भगवान सम है,-उनमे न राग है,न रोष है|न ही वे किसी पाप-पुण्य और गुण-दोष ही ग्रहण करते हैं|उन्होंने विश्व में कर्म को ही प्रधान कर रखा है|जो जैसा करता है ,वह वैसा ही फल भोगता है|
                             अब प्रश्न यह उठता है कि कौन से कर्म कैसा फल देते है?फल एक ही प्रकार से किये गए कर्म के  सब को समान नहीं मिलते है|यह सब निर्भर करता है कि कर्म किस भावना से किये गए हैं|अगर आपकी भावना गलत है तो उतना ही गंभीर परिणाम मिलेगा|इसीलिए गीता में कहा गया है कि जो भी कर्म करो परमात्मा के निमित्त करो|इन्द्रियों के सुख भी अगर प्राप्त करने हैं तो उसे यह मानकर भोगें कि यह सब गुण ही गुण में कार्य कर रहे है|उन सुखों के प्रति आसक्ति का भाव न रखें|
                               ज्ञान को कर्मफल समाप्त करने का महत्वपूर्ण साधन गीता में कहा गया है-
                                               श्रेयान्द्रव्यमयाद्यज्ञाज्ज्ञानयज्ञः        परन्तपः |
                                               सर्वं कर्माखिलं पार्थ ज्ञाने  गीता परिसमाप्यते ||गीता ४/३३||
अर्थात्,हे परंतप अर्जुन!द्रव्यमय यज्ञ की अपेक्षा ज्ञानयज्ञ श्रेष्ठ है तथा सभी कर्म ज्ञान में समाप्त हो जाते हैं|
                                                 अपि चेदसि पापेभ्यः सर्वेभ्यः पापकृत्तमः |
                                                  सर्वं ज्ञानप्लवेनैव वृजिनं  सन्तरिष्यसि ||गीता ४/३६||
                                         
अर्थात्, यदि तू अन्य सब पापियों से भी अधिक पाप करने वाला है ,तो भी तू इस ज्ञान रुपी नौका से निःसंदेह सम्पूर्ण पाप समुद्र से भली भांति तर जायेगा|
                                                  यथैधाँसी समिद्धोSग्नेर्भस्मसात्कुरुतेSर्जुन |
                                                  ज्ञानाग्नि: सर्वकर्माणि भस्मसात्कुरुते तथा||गीता ४/३७||
अर्थात्,हे अर्जुन!जैसे प्रज्वलित अग्नि इंधनों को भस्ममय कर देती है ,वैसे ही ज्ञान रुपी अग्नि सम्पूर्ण कर्मों को भस्ममय कर देता है|
    अतः स्पष्ट है कि केवल ज्ञान योग ही कर्मफलों को समाप्त करने का सबसे अच्छा साधन है|
क्रमश:
                            || हरि शरणम् ||          

Friday, September 6, 2013

पुनर्जन्म-कैसे?-प्रक्रिया-६|

क्रमश:
              आत्मा चित्त के साथ कितने समय तक पूर्व स्थान पर विचरण करती है,यह स्पष्ट नहीं है|परन्तु सनातन धर्म में यह समय कुछ क्षणों से लेकर दस दिनों तक का माना जाता है|इसके बाद आत्मा  आकाश मे विचरण करते हुये नए शरीर की तलाश करती रहती है|सब कर्मों और आधी अधूरी इच्छाओं के अनुसार हर प्रकार से निरीक्षण करते हुये  चित्त एवं आत्मा को नए शरीर की तलाश कब पूरी होगी कहा नहीं जा सकता|जब हम कहते हैं कि सब कुछ कर्मानुसार ही घटित होता है ,इसका अर्थ यह है कि  परमात्मा ने अपने पास कुछ भी नहीं रखा है|आत्मा को उसने अपनी तरह ही पूर्ण स्वतंत्रता दी है|लेकिन आत्मा के साथ जो भी व्यवहार होता है ,वह सब कर्मों के फलस्वरूप ही होता है|उसमे परमात्मा का कुछ भी लेना देना नहीं है|रामचरितमानस में स्वामी तुलसीदास जी ने अयोध्याकाण्ड में लिखा भी है-"कर्म प्रधान बिस्व करि राखा |"इसका अर्थ भी यही है कि इस संसार में जो भी घटित हो रहा है,सब कर्मों के फलस्वरूप ही हो रहा है|परमात्मा तो सम है,कहीं भी किसी के साथ भेदभाव नहीं करता है|प्रत्येक का भविष्य उसके कर्म ही निर्धारित करते हैं|
                              परमात्मा ने जब सृष्टि की रचना की,तब उसने केवल मनुष्य को ही कर्म करते हुये फल पाने का अधिकार दिया ,अन्य प्राणियों को नहीं|अन्य प्राणी केवल मनुष्य जन्म में किये गए कर्मों का फल ही भोगते हैं|जैसा कि पहले भी विवरण आया है कि किये गए कर्म मन में अंकित होते रहते हैं और मृत्यु से पूर्व सभी कर्म चित्त में,जो कि आत्मा से संयुक्त मन का ही हिस्सा है, स्थानांतरित हो जाते हैं|जब आत्मा व चित्त नए शरीर की तलाश में रहते हैं तो कर्मों के फलानुसार शरीर का चयन कर लेते हैं|जब गर्भावस्था में शिशु का विकास हो रहा होता है,उसी दौरान चित्त द्वारा उसका निरीक्षण बार बार किया जाता रहता है |लेकिन आत्मा का प्रवेश उसमे जन्म लेने के समय ही  होगा,पहले नहीं|
                              जब शिशु गर्भ में होता है तब उसमे सभी अंगों के विकास के साथ साथ ही मन,बुद्धि और अहंकार का विकास भी होता है|मन इस वक़्त तक केवल एक साफ सी.डी. यानि ब्लैंक सी. डी . की तरह होता है|शिशु के शरीर का भी अपना एक जैव विद्युत चुम्बकीय क्षेत्र होता है|जन्म के समय आत्मा का एक चुम्बकीय ध्रुव आकर शिशु के विपरीत चुम्बकीय ध्रुव के साथ संयुक्त हो जाता है|इसी समय शिशु का जन्म हो जाता है|इसी को अचेतन का चेतन होना कह सकते हैं |आत्मा जो कि शरीर की मृत्यु के बाद व्यक्त से अव्यक्त हो गयी थी,शिशु के जन्म के साथ ही पुनः व्यक्त हो जाती है|यह क्रम तब तक चलता रहता है जब तक व्यक्ति अपने मनुष्य जीवन में किये हुये सभी कर्मों के फल प्राप्त नहीं कर लेता है| तब तक उसे बार बार पुनर्जन्म में जाना ही होगा|
                       जब इस संसार में व्यक्ति आता है तो सभी पक्ष और विपक्ष दोनों का सामना करना ही होगा|संसार ,परमात्मा की तरह कोई सम तो है नहीं कि केवल आनंद की अनुभूति ही हो|संसार तो विषमता का नाम है|आज अगर सुख है तो कल दुःख जरूर होगा|आज शांति है तो कल अशांति जरूर होगी|याद रखे-सुख और शांति का समय तेजी से गुजर जाता है परन्तु दुःख और अशांति के दौरान समय भी धीरे धीरे गुजरता है|भारतीय दार्शनिकों ने इस भौतिक संसार को दुखालय इसी कारण से कहा है|पुनर्जन्मों का कभी भी अन्त नहीं होगा,जब तक व्यक्ति को यह समझ में ना आये कि यहाँ आने का उसका मकसद क्या है?इस संसार में आकर मनुष्य जीवन में केवल भोगों का आनंद ही लेना है तो फिर अन्य प्राणियों और मनुष्य में अंतर ही क्या रह जायेगा?यह सोच अगर जीवन में बन जाती है तो फिर कर्मों का प्रकार भी बदल जाता है और पदार्थों के गुण,इन्द्रियों के विषय,अहंकार का परिमार्जन और मन की चंचलता सब में परिवर्तन आने लगता है|
क्रमश:
                   || हरि शरणम् ||

Thursday, September 5, 2013

पुनर्जन्म-कैसे?-प्रक्रिया-५|

क्रमश:
                                आत्मा चित्त के साथ संयुक्त रूप से जब शरीर से बाहर आ जाती है तो वह काफी प्रयास करती है कि उसी शरीर में वापिस जाये|यह चित्त ही उसे उस शरीर के आस पास बने रहने को विवश करता है|अन्यथा अकेली आत्मा तो अपने मूल स्रोत परा चुम्बकीय क्षेत्र यानि परमब्रह्म परमात्मा से ही योग करने को उत्सुक रहती है|परन्तु चित्त उसे ऐसा करने से रोक देता है|अब प्रश्न यह पैदा होता है कि फिर आत्मा अपना वह शरीर छोडती ही क्यों है?जब शरीर की विद्युत उर्जा का प्रभाव कम होने लगता है तब मन को आभास होता है कि जो कामनाएं अभी अधूरी है वे अब इस जर्जर शरीर से पूरी होना असंभव है|आत्मा का शरीर के साथ संयोजन इसी मन के कारण होता है|तब ऐसी स्थिति में मन तुरंत ही समस्त कामनाओं को आत्मा से लगते अपने ही हिस्से चित्त में स्थानांतरित कर देता है|चित्त में इस परिवर्तन के आते ही चित्त और मन के संयुक्त सिरे एक ही चुम्बकीय ध्रुवों की तरह व्यवहार करने लगते हैं जिससे उनमे प्रतिकर्षण पैदा होता है और चित्त आत्मा को साथ लेकर शरीर से अलग हो जाता है|क्योंकि आत्मा निर्विकार है और चित्त या मन विकार सहित है ऐसी स्थिति में इस शारीरिक मृत्यु का कारण चित्त या मन को ही माना जाता है|
                                            लेकिन किसी कारण से अगर शरीर की विद्युत उर्जा का प्रभाव वापिस लौटने लगता है तो उसका चुम्बकीय क्षेत्र पुनः प्रभावी होने लगता है|ऐसी स्थिति में चित्त अपने में अंकित आधी अधूरी कामनाओं को पूरी करने के प्रयास में आत्मा को उसी शरीर में लाने का पूरा प्रयास करता है|यदा कदा जब यह प्रयास सफल भी हो जाता है और मृत शरीर एक बार फिर जीवन पा जाता है|ऐसे व्यक्तियों के जब साक्षात्कार लिए गए तो उन्होंने मृत्यु के बाद का घटनाक्रम का वर्णन  लगभग एक ही प्रकार का किया है|इससे यह प्रमाणित होता है कि मृत्यु के बाद चित्त और आत्मा एक साथ ही विचरण  करते हैं|वे तब तक उस शरीर या स्थान के आस पास विचरण करते हैं जब तक कि वे इस बात से पूरी तरह संतुष्ट नहीं हो जाते कि अब उस शरीर में जाना असंभव होगया है,तथा इस स्थान में केवल मंडराने से कुछ भी प्राप्त नहीं किया जा सकता है|अगर अपनी आधी अधूरी कामनाओं को पूरा करना है तो कोई अन्य तरीके का उपयोग करना होगा |यही से पुनर्जन्म की अवधारणा का जन्म होता है|सनातन धर्म में यह मान्यता है कि मरने वाले का फिर से जन्म होता है,अतः चित्त और आत्मा को उस मृत शरीर से लगाव समाप्त करने के लिए शरीर को जला दिया जाता है जिसे आत्मा व चित्त को इस शरीर के प्रति आकर्षण से मुक्ति मिल सके और पुनर्जन्म का मार्ग प्रशस्त हो|जिन धर्मों में पुनर्जन्म की अवधारणा नहीं है उसमे मृत शरीर को या तो सुरक्षित रखा जाता है या फिर दफ़न कर दिया जाता है अथवा कोई अन्य प्रक्रिया अंतिम संस्कार की अपनाई जाती है|
          गीता में भगवान श्री कृष्ण कहते हैं-
                                 अथ चैनं नित्यजातं नित्यं वा मन्यसे मृतम् |
                                 तथापि   त्वं   महाबाहो   नैवं   शोचितुमर्हसि || गीत२/२६||
अर्थात्,किन्तु हे अर्जुन!अगर तू इस आत्मा को सदा जन्मने वाला तथा सदा मरने वाला मानता है तो भी तू इस प्रकार शोक करने को योग्य नहीं है|
                                  जातस्य हि ध्रुवो मृत्युर्ध्रुवं जन्म मृतस्य च |
                                  तस्मादपरिहार्येSर्थे   न   त्वं  शोचितुमर्हसि ||गीत२/२७||
अर्थात्,क्योंकि जन्मे हुये की मृत्यु निश्चित है और मरे हुये का जन्म निश्चित है|इससे भी इस बिना उपाय वाले विषय में भी तू शोक करने के योग्य नहीं है|
                             भगवान ने स्पष्ट कर दिया है की आत्मा अविनाशी है ,फिर भी कोई इसको जन्मने और मरने वाला मानता है  ;तो यह माना जाना चाहिए कि जन्मने वाले की मृत्यु निश्चित है और मरने वाले का जन्म भी इसी प्रकार निश्चित है|आत्मा अविनाशी है |परन्तु चित्त के साथ संयुक्त हो जाने के कारण वह चित्त के साथ ही रहने को बाध्य है|चित्त यानि मन अपने में अंकित कामनाओं को पूरा करने के लिए अगर नए शरीर को प्राप्त करने की जरूरत समझता है ,तो उसे पुनर्जन्म के लिए जाना ही होगा|
                                        अतः यह स्पष्ट है कि मृत्य,पुनर्जीवन और पुनर्जन्म का कारण न तो शरीर है और न ही आत्मा|इनका एक मात्र कारण मन या चित्त है जिसमे व्यक्ति की इच्छाएं,कामनाये और कर्म अंकित रहते हैं|वे ही अब आगे पुनर्जन्म का कारण बनेंगे ||
क्रमश:
                    || हरि शरणम् ||
                                            

Wednesday, September 4, 2013

पुनर्जन्म-कैसे?-प्रक्रिया-४|

क्रमश:
                     जब आत्मा शरीर से अलग हो जाती है तो कुछ समय के लिए वह मृत शरीर के आस पास ही मंडराती रहती है|आत्मा वास्तव में है क्या?एक चुम्बक का चुम्बकीय क्षेत्र मात्र ही तो है,जो चित्त के साथ साथ अभी अभी शरीर से अलग हुई है|आप आत्मा को चुम्बक का उत्तरी ध्रुव और चित्त को दक्षिणी ध्रुव कह सकते हैं,क्योंकि आत्मा का चित्त के प्रति आकर्षण ही उसे अपने साथ शरीर से ले आता है|आत्मा और चित्त अपने प्रभाव क्षेत्र लिए  चुम्बकीय तरंगों के रूप में शरीर के चुम्बकीय क्षेत्र के आस पास घूमते रहते हैं और अगर किसी व्यक्ति का अपने शरीर के साथ ज्यादा ही मोह हुआ तो आत्मा उस शरीर में जाने का प्रयत्न भी करती है|लेकिन मात्र शरीर के चुम्बकीय क्षेत्र के ही प्रभावी होने के कारण यह असंभव होता है,क्योंकि इस समय शरीर के चुम्बकीय क्षेत्र का प्रभाव धीरे धीरे कम होना शुरू हो जाता है| शरीर की कोशिकाओं में विद्युत  उर्जा के अभाव के कारण चुम्बकीय क्षेत्र ज्यादा देर तक नहीं बना रह सकता|विद्युत उर्जा में अवरोध आ जाने से शरीर में हृदय की धड़कन पूर्ण रूप से बंद हो चुकी होती है|चिकित्सक कृत्रिम रूप से हृदय को शुरू करने के लिए सीने को दबाते है ,कृत्रिम श्वास भी देते है जिसे मेडिकल भाषा में Cardiac-respiratory resuscitation  कहा जाता है|इस प्रकिया से भी अगर हृदय की धड़कन वापिस नहीं लौटती है तो सीने पर विद्युत झटके दिए जाते है जिससे कई बार हृदय की गति वापिस लौट आती है|यह विद्युत कोशिकाओं में पुनः विद्युत संचरण प्रारंभ कर देती है,जिससे शरीर का जैव चुम्बकीय प्रभाव क्षेत्र पुनः अस्तित्व में आ जाता है और आत्मा के चुम्बकीय क्षेत्र  को आकर्षित करता है जिससे आत्मा मय चित्त के उसी शरीर में पुनः प्रवेश पा जाती है|
                                       आये दिन समाचार पत्रों में इस तरह के समाचार प्रकाशित  होते रहते है कि व्यक्ति मरने के बाद जिन्दा हो उठा,अंतिम संस्कार में अग्नि देने से पहले मृतक जिन्दा हो उठा या दफ़नाने से पहले बच्चे के शरीर में हरकत हुयी आदि|इन सब में इसी प्रकिया से आत्मा का शरीर में पुनः प्रवेश होता है|कई उदाहरण तो ऐसे भी मिल जायेंगे जहाँ दुबारा जिन्दा होने के बाद उस व्यक्ति ने काफी अच्छी खासी जिंदगी कई वर्षों तक जियी है| ऐसी स्थिति में ज्यादातर शरीर के विद्युत उर्जा के कम होते प्रभाव के साथ ही आत्मा शरीर को त्याग देती है परन्तु संयोगवश विद्युत उर्जा की तीव्रता अचानक बढ़ जाने से आत्मा शरीर में लौट आती है|
                               आत्मा कितने दिनों तक शरीर के आस पास चक्कर लगाती रहती है यह स्पष्ट नहीं है|अलग अलग शास्त्रों की इस बारे में अलग अलग राय है| सनातन धर्म में शरीर को अग्नि में समर्पित करने का विधान इसी लिए किया गया है ,जिससे त्यागे हुये शरीर के प्रति आत्मा का आकर्षण पूर्ण रूप से समाप्त होजाये और आत्मा अपनी भावी यात्रा के लिए आगे निकल पड़े|
                  गीता में भगवान श्री कृष्ण कहते हैं-
                               न जायते म्रियते वा कदाचि-
                               न्नायं भूत्वा भविता वा न भूयः |
                               अजो नित्यः शाश्वतोSयं पुराणों
                               न  हन्यते    हन्यमाने    शरीरे ||गीता२/२०||
अर्थात्,यह आत्मा किसी काल में न तो जन्मता है और न मरता ही है तथा न यह उत्पन्न होकर फिर होनेवाला ही है|क्योंकि यह अजन्मा,नित्य, सनातन और पुरातन है;शरीर के मारे जाने पर भी यह मारा नहीं जाता है|
                         जब आत्मा न तो जन्मती है और न ही मारी जाती है |आत्मा हमेशा के लिए है तो फिर शरीर के मर जाने के बाद पुनर्जन्म किसका होता है?यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है|इसका उत्तर पुनर्जन्म के कारण और पूरी प्रक्रिया को जानने और समझने से ही मिल सकेगा|
                                  मिस्र में पिरामिड शताब्दियों पहले निर्मित किये गए थे जिसमे मृत देह को रसायनों का लेप करके सुरक्षित रखा जाता था|उस वक्त यह विश्वास किया जाता था कि एक न एक दिन यह मृत शरीर पुनः जीवित होगा|इन मृत देह को मम्मी कहा जाता है|मृत देह के साथ जीवनोपयोगी सभी वस्तुएं भी रखी जाती थी ताकि पुनर्जीवित होने पर सम्बंधित को समस्त सामग्री तत्काल सुलभ हो सके|उस समय में शाही परिवार के महत्वपूर्ण सदस्य की मृत्यु पर उसकी मृत देह के साथ आवश्यक जीवनोपयोगी वस्तुओं के संग जीवित दास और दासियों को भी पिरामिड में रख दिया जाता था| उस समय वहां पर पुनर्जन्म के विश्वास के स्थान पर उसी देह में पुनर्जीवन पर विश्वास किया जाता था |
    क्रमश:
                                 || हरि शरणम् ||                  
                                                     

Tuesday, September 3, 2013

पुनर्जन्म-कैसे?-प्रकिया-३|

क्रमश:
                        जब शरीर का क्षरण प्रारंभ होता है तो आत्मा जो कि शरीर में मन के साथ संयुक्तरूप से रहती  है ,का शरीर छोड़ कर जाना अवश्यम्भावी हो जाता है|उम्र बढ़ने के साथ साथ कोशिकाओं का क्षरण भी शुरू हो जाता है जिसके कारण उनमे स्थित उर्जा यानि विद्युत की तीव्रता में भी कमी आने लगती है ,जिससे शरीर का विद्युत चुम्बकीय क्षेत्र का प्रभाव कमजोर पड़ने लगता है|एक स्थिति ऐसी आती है जब शरीर के चुम्बकत्व से अधिक तीव्रता आत्मा के चुमबकत्व की हो जाती है|इस स्थिति में आत्मा के शरीर से अलग होने की प्रकिया शुरू हो जाती है|शरीर में जब आत्मा रहती है तब तक इन दोनों का साथ मिलकर एक चुम्बक की तरह व्यवहार होता है|शरीर की विद्युत शक्ति के क्षीण होने पर धीरे धीरे आत्मा  का अपना स्वतंत्र चुम्बकीय  व्यवहार बनने लगता है|ज्योंही दोनों में जरा सा भी विभाजन होता है,  शरीर और आत्मा के अलग हुये सिरे चुम्बक के एक समान ध्रुव की तरह व्यवहार करने लगते है,जिसके कारण उनमे आपस में प्रतिकर्षण पैदा होता है और आत्मा शरीर छोड़ देती है|इसी को शरीर की मृत्यु होंना कहते हैं|यह स्थिति तभी आती है जब शरीर की विद्युत उर्जा लगभग समाप्त हो जाती है|विद्युत उर्जा के समाप्त होते ही शरीर का विद्युत क्षेत्र भी कमजोर पड़कर समाप्त होने लगता है|लेकिन शरीर के चुम्बकीय क्षेत्र के समाप्त होने से पहले ही आत्मा शरीर से दूर जा चुकी होती है|क्योंकि चुम्बकीय क्षेत्र का अस्तित्व शीघ्र समाप्त नहीं होता है|जब आत्मा शरीर को छोड़ देती है ,उसको ही व्यक्त का पुनः अव्यक्त होना कहते है|गीता में भगवान श्री कृष्ण कहते हैं-
                                             अव्यक्तादीनि भूतानि व्यक्तमध्यानि भारत |
                                             अव्यक्तनिधनान्येव   तत्र   का    परिवेदना || गीता२/२८ ||      
अर्थात्,हे अर्जुन!सम्पूर्ण प्राणी जन्म सेपहले अप्रकट थे यानि अव्यक्त थे और मरने के बाद भी अप्रकट या अव्यक्त हो जाने वाले है,केवल बीच में ही प्रकट या व्यक्त है|ऐसी स्थिति में क्या शोक करना है?    
                                         यह स्थिति साधारण परिस्थिति है|प्रश्न उठता है कि जब किसी दुर्घटना वश किसी की मृत्यु हो जाती है ,तब क्या और कैसे होता है?ऐसी स्थिति में भी शरीर का क्षरण ही होता है|अंतर केवल मात्र यही होता है कि दुर्घटनावश हुई अकाल मृत्य में शरीर का क्षरण तीव्र गति के साथ होता है|जिसे शरीर की विद्युत   उर्जा तेजी के साथ समाप्त हो जाती है और आत्मा तुरंत ही शरीर का त्याग कर देती है|परन्तु शरीर का चुम्बकीय क्षेत्र काफी समय तक बना रहता है|ऐसी स्थिति में तत्काल मृत्यु हो जाती है|
                                        आत्मा शरीर से जब अलग हो जाती है तब वह चित्त जो कि आत्मा से लगे हुये मन को कहते हैं,को भी अपने साथ ले जाती है|चित्त मन का वह भाग होता है जो आत्मा के साथ संयुक्त होता है और जिसमे बुद्धि का अंश भी संलग्न होता है|चित्त में ही व्यक्ति की अधूरी ईच्छाएं और कामनाएं तथा उनको प्राप्त करने के लिए किये गए सभी कर्म अंकित होते हैं|इन्ही को आप सम्बंधित व्यक्ति के संस्कार कह सकते है|                                                काम,क्रोध,मद्,लोभ और मोह ये सभी व्यक्ति को अपनी ईछाये और कामनाये पूरी करने के लिए किसी भी प्रकार के कर्म करने को प्रेरित करते है|इसी कारण से इन पांचो को नरक का रास्ता बताया गया है|गोस्वामी तुलसीदास जी महाराज ने रामचरित मानस में लिखा है-
                                "काम क्रोध मद् लोभ सब,नाथ नरक के पंथ||"
                                            इस भौतिक जीवन में जो कुछ भी हम करते हैं वे हमारे संस्कार का निर्माण करते हैं ,जो चित्त के साथ संलग्न होकर मृत्यु के समय आत्मा के साथ शरीर को छोड़ देते हैं|तथा जो भी इन कर्मों को करने के दौरान या अन्य कारण से हमारे साथ जो कुछ भी घटित होता है वह मन के हिस्से में स्मृति के रूप में अंकित होता है,जो मृत्यु के समय चित्त व आत्मा के साथ शरीर नहीं छोड़ पाता|अतः इससे यह प्रमाणित होता है कि आत्मा केवल हमारे शरीर से संस्कार ही लेकर जाती है,स्मृति नहीं|इसी कारण से पुनर्जन्म में किसी को भी अपने पूर्व जन्म की स्मृति नहीं रहती|लेकिन अपवाद स्वरुप जब मृत्यु तत्काल होती है जैसे हत्या,आत्महत्या या दुर्घटना आदि की स्थिति में,तब संस्कारों के साथ कुछ स्मृतियाँ भी आत्मा के साथ शरीर छोड़ कर चली जाती है|ऐसी स्थिति में व्यक्ति को अपने पूर्व जन्म की स्मृति कई दिनों तक बनी रहती है,जो समय के साथ साथ धूमिल पड़ते हुये समाप्त हो जाती है|
क्रमश:
                                 || हरि शरणम् ||

Sunday, September 1, 2013

पुनर्जन्म-कैसे?-प्रक्रिया-२|

क्रमश:
                     हमने चुम्बक के तीन प्रमुख गुणों की विवेचना की जो है-
                              १.चुमबकीय ध्रुवों का एक दूसरे के प्रति आकर्षण और प्रतिकर्षण|
                              २.चुम्बकीय प्रभाव क्षेत्र का निर्माण|
                              ३.चुम्बकीय क्षेत्र का विस्तार|
     उपरोक्त तीन गुणों के अलावा तीन गुण और महत्त्व पूर्ण है जिन्हें जानने से हमें पुनर्जन्म की प्रक्रिया को समझने में और भी सहायता मिलेगी|इन गुणों को सरल भाषा में इस प्रकार बताया जा सकता है-
                             ४.अगर किसी चुम्बक को तोड़कर दो भागों में विभाजित किया जाये तो उसका प्रत्येक हिस्सा एक चुम्बक की तरह व्यवहार करता है|यह नहीं है कि एक हिस्सा उत्तरी ध्रुव का बन जाये और दूसरा दक्षिणी ध्रुव|प्रत्येक टुकड़ा एक स्वतन्त्र चुम्बक की तरह व्यवहार करता है|
                            ५.अगर एक चुम्बक के प्रभाव क्षेत्र में कोई भी लोहे का टुकड़ा या लोहे की वस्तु आ जाती है तो उसमे भी चुम्बकीय गुण आ जाते है|अगर चुम्बक का उत्तरी ध्रुव लोहे की वस्तु की तरफ है तो उस वस्तु का चुम्बक की तरफ का हिस्सा दक्षिणी ध्रुव की तरह व्यवहार करेगा| उनके बीच एक आकर्षण बल काम करेगा|अगर चुम्बक का आकर्षण बल उस लोहे की वस्तु पर लगने वाले अन्य बलों से ज्यादा हुआ तो फिर वह वस्तु चुम्बक के आकर चिपक जाती है|चिपकते ही उस वस्तु का स्वतन्त्र चुम्बकत्व समाप्त हो जाता है और उस वस्तु का दूसरा सिरा चुम्बक के दूसरे ध्रुव की तरह काम करने लगता है|अगर वह वस्तु चुम्बक की तरफ अन्य बलों के तेज होने के कारण चुम्बक के आकर चिपकती नहीं है तो चुम्बक को वहां से हटाते ही लोहे की वस्तु का चुम्बकीय व्यवहारभी समाप्त हो जाता है|
                             ६.अगर एक चुम्बक को लोहे के टुकड़े या वस्तु पर एक ही दिशा में घिसा जाये तो वह लोहा एक स्वतन्त्र  चुम्बक बन जाता है और उसमे समस्त चुम्बकीय गुण आ जाते हैं|
                 उपरोक्त ६ गुण चुम्बक के इतने महत्वपूर्ण है कि इनको जाने बिना पुनर्जन्म को जानना मुश्किल होगा और  असंभव भी| अगर किसी भी चुम्बक को किसी ऊंचाई से गिरा दिया जाये तो उसके चुम्बकीय गुण समाप्त हो जाते हैं|
            चुम्बक के इतने गुण अव्यय है अर्थात कभी भी समाप्त नहीं होते है|जब हम चुम्बक को ऊंचाई से गिराते हैं तो चुम्बकत्व नष्ट होता है, उसे वापिस विद्युत उर्जा से या दूसरे चुम्बक को उस पर एक ही दिशा में घिस कर प्राप्त किया जा सकता है|इसी प्रकार परम ब्रह्म भी अव्यय है और प्रलय के बाद चुम्बकत्व समाप्त होने की तरह उसका बल भी कृष्ण विवर यानि ब्लैक हॉल में जाकर समाप्त  हो जाता है|ब्रह्माण्ड की पुनः रचना के लिए फिर से पराचुम्बकीय क्षेत्र का निर्माण ब्लैक हॉल से होता है जिसे परम ब्रह्म कह सकते है|जिसके स्पंदन से उर्जा यानि शक्ति का प्रादुर्भाव होता है|इसी से आगे फिर सृष्टि का निर्माण शुरू होता है,जिसे हम पहले ही विस्तृत रूप से जान चुके हैं|
                          शरीर का अपना एक चुम्बकीय क्षेत्र होता है जो उसकी कोशिकाओं में उपस्थित विद्युत के कारण होता है,इसीलिए शरीर के इस चुम्बकीय  क्षेत्र को जैव विद्युत चुम्बकीय क्षेत्र कहा जाता है|जबकि आत्मा परमब्रह्म का यानि परमात्मा का अंश होने के कारण उसका केवल चुम्बकीय क्षेत्र हीहोता  है,ठीक उसी प्रकार  जैसे एक चुम्बक से उसका एक अंश अलग कर दिया जाये तो वह एक स्वतन्त्र चुम्बक की तारह व्यवहार करता है||इसी तरह परमात्मा का अंश आत्मा का अपना अस्तित्व परमात्मा के ही गुण रखते हुये स्वतन्त्र होता है|आत्मा अपने चुम्बकीय क्षेत्र को साथ लिए शरीर के जैव विद्युत चुम्बकीय क्षेत्र के साथ संयुक्त हो जाता है|इसके बाद ही शरीर में जीवन प्रारंभ होता है|इसी को अव्यक्त का व्यक्त होना कहते हैं|
                      इस स्थिति में अब शरीर और आत्मा के साथ मन ,बुद्धि और अहंकार भी होते हैं,जिनका विस्तार पूर्वक वर्णन पूर्व में किया जा चूका है|जितने भी कर्म इस शरीर के द्वारा किये जाते है वे सभी मन में चुम्बकीय तरंगों के रूप में अंकित होते जाते है|जिनका फल यानि परिणाम उसे नए जन्म की और ले जायेंगे|जब शरीर की क्षमता तेजी से कम होने लगती है तब आत्मा का शरीर को छोडना अवश्यम्भावी हो जाता है|
क्रमश:
                                || हरि शरणम् ||