Friday, August 9, 2013

पुनर्जन्म का वैज्ञानिक आधार-एक परिकल्पना|क्रमश:२५|आत्मा -१ |

क्रमश:
          आत्मा ,जिसके बिना कहीं भी और किसी भी जगह जीवन की कल्पना नहीं की जा सकती|भौतिक शरीर को तैयार करने हेतु पांच भौतिक तत्व ,पांच ज्ञानेन्द्रिया,पांचों ज्ञानेन्द्रियों के पांच विषय,पांच कर्मेन्द्रियाँ,मन,बुद्धि ,चित्त तथा अहंकार ;कुल चौबीस अपरा प्रकृति की आवश्यकता होती है|शरीर बनने के बाद भी यह कुछ भी करने की स्थिति में नहीं होता है|श्री मद् भागवत महापुराण के ३/२६ के श्लोक संख्या ७० में लिखा है -
                            चित्तेन हृदयं चैत्यः क्षेत्रज्ञ: प्राविशद्यदा |
                            विराट्  तदैव  पुरुष:  सलिलादुदतिष्ठत||
अर्थात्, जब चित्त के अधिष्ठाता क्षेत्रज्ञ ने चित्त के सहित ह्रदय में प्रवेश किया , तो विराट पुरुष जल से उसी समय उठ खड़ा हुआ|
                इस श्लोक से यह स्पष्ट होता है कि चाहे अपरा प्रकृति के समस्त २४ तत्व मिलकर एक शरीर का निर्माण करदे ,उस में जीवन जीने की क्षमता पैदा करना उस परमात्मा की शक्ति या उस परमात्मा के अंश का उस शरीर में प्रवेश किये बिना असंभव है|इसी परमात्मा की शक्ति ,परमात्मा के अंश का नाम ही आत्मा है|गीता में भगवान कहते हैं -
                अहमात्मा  गुडाकेश सर्वभूताशयस्थितः |
                अहमादिश्च मध्यं च भूतानामन्त एव च ||गीता१०/२०||
अर्थात्, हे अर्जुन! मैं सब भूतों के हृदय में स्थित सब का आत्मा हूँ|तथा सम्पूर्ण भूतों का आदि ,मध्य और अन्त भी मैं ही हूँ|
       इस श्लोक से स्पष्ट है कि आत्मा ,परमात्मा का  ही अंश है|जब तक हम परमात्मा कोअपने से अलग मानते रहेंगे तब तक आत्मा को समझना मुश्किल होगा|परमात्मा का अंश होना एक तरह से परमात्मा होना ही होता है|फिर ऐसी कौन सा परिवर्तन इस आत्मा में होता है ,जो इसे परमात्मा से अलग कर देता है|गुणात्मक(Qualitative) रूप से दोनों में कोई भेद नहीं है और ना ही मात्रात्मक(Quantitative) भेद है|फिर भी विभिन्न जीवों में उपस्थित ये आत्माएं अलग अलग नज़र क्यों आती है?आत्मा, जो कि परमात्मा का ही अंश है,क्यों परमात्मा की तरह व्यवहार नहीं कर पाती है?
                                 यह सब इस आत्मा के सफर का ही असर है|यह सब जो हमें भौतिक रूप से नजर आता है,वह आत्मा का स्वरुप नजर नहीं आता बल्कि आत्मा की यात्रा के कारण नज़र आता है  यानि जिस शरीर में आत्मा उपस्थित है ,उसके कारण हमें एक तरह का भ्रम पैदा हो जाता है|एक छोटे से उदाहरण से आप समझ सकते हैं|आप जब ट्रेन में सफर करते है,तब भी आप  वही होते है और वायुयान में सफर करते हैं तब भी वही|फिर भी जो दूसरे देखने वाले होते है,तब उनकी दृष्टि में आप अलग अलग होते है|एक बार मेरी नियुक्ति छापर नामक स्थान पर थी|मैं रोज अपने कार्य पर सुबह जाता था और शाम को वापिस सुजानगढ़ आ जाता था|एक बार छापर में मेरी कार खराब हो गयी|उस दिन रविवार था,कोई मैकेनिक भी नहीं मिला तो मैं दोपहर को बस से सुजानगढ़ के लिए छापर बस अड्डे से चढा|खाली सीट पाकर मैं बैठ गया|दो पंक्ति पीछे दो महिलाये आपस में बात कर रही थी|एक ने कहा-देखो डॉ.काछवाल जी जा रहे है|दूसरी महिला ने मेरे पर नज़र डालते हुये कहा-ये डॉ. साहब नहीं है,उनके पास तो कार है,भला वे इस बस में सफर क्यों करेंगे?व्यक्ति वही है,परन्तु अप्रत्याशित रूप से जब नज़र आता है तो एक भ्रम की स्थिति पैदा कर देता है|यही इस आत्मा के साथ होता है|जब अमीर के साथ सफर कर रही होती है तब और नज़र आती है और गरीब के शरीर में होती है तो कुछ और|भगवान गीता में कहते है,कोई भेद नहीं है-आप गलत समझ रहे है ,सब में वही है सब में एक समान है|
                                   आत्मौपम्येन सर्वत्र समं पश्यति योSर्जुन |
                                   सुखं वा यदि वा दु:खं स योगी परमो मतः|| गीता६/३२||
अर्थात्, हे अर्जुन!जो योगी स्वयं की भांति सम्पूर्ण भूतों में सम देखता है,यानि आत्मा को ही देखता है और सुख अथवा दुःख को भी सब में सम देखता है ,वह योगी परम श्रेष्ठ माना गया है|यहाँ कृष्ण के कहने का आशय यही है की सब में आत्मा एक समान है और सब को सुख और दुःख का अनुभव  समान ही होता है ,यही समझना चाहिए|
                                    विद्याविनयसम्पन्ने ब्राह्मणे गवि हस्तिनि |
                                    शुनि चैव श्वपाके च पण्डिता: समदर्शिनः ||गीता५/१८||
  अर्थात्,ज्ञानीजन, विद्यायुक्त ब्राह्मण में,गौ में,हाथी,कुत्ते और चांडाल में भी समदर्शी होते हैं,यानि सभी में अपने को अर्थात् आत्मा को ही देखते है|
       उपरोक्त दोनों श्लोकों से स्पष्ट हो जाता है कि सब में चेतन स्वरुप आत्मा समान ही होती है|जो भेद नज़र आता है ,वह मात्र सांसारिक दृष्टि का ही भेद है;वास्तव में कोई भेद नहीं है|जब यह ज्ञान किसी को हो जाता है ,तब उसके लिए जीवन का अर्थ ही बदल जाता है|
  क्रमश:

                       || हरि शरणम् || 

Thursday, August 8, 2013

पुनर्जन्म का वैज्ञानिक आधार-एक परिकल्पना|क्रमश:२४|अहंकार-४|

क्रमश:
              जन्म के बाद प्रथम रूदन के साथ ही अहंकार का अपरा प्रकृति  स्वरुप स्पष्ट होने लगता है|जो दिन प्रतिदिन अपना रूप विशाल करता जाता है|शिशु के विकास के दौरान हमें एक साँस भूलने की बीमारी(Breath holding spells) से रूबरू होना पड़ता है|यह बीमारी अपरा अहंकार के कारण ही पैदा होती है|जब बच्चा कुछ खा पी सकने वाली उम्र में पहुँचता है तो वह खुद अपने हाथ से खाना चाहता है,और हम इस तरह स्वयं के द्वारा खाने की प्रवृति को प्रोत्साहित भी करते है|यह भी अपरा अहंकार का एक उदाहरण है|ऐसे कई उदाहरण दिए जा सकते है|विज्ञानं इसको बच्चे के शारीरिक और मानसिक विकास की एक साधारण प्रक्रिया मानते है|जबकि यह अपरा अहंकार के कारण संभव होता है|इस अहंकार के बढ़ने के क्या कारण हो सकते हैं और क्या इस अहंकार की प्रकृति को बदला जा सकता है ?जानने से पहले हमें योग पर विचार करना होगा,तभी हम इस विषय की गंभीरता को समझ पाएंगे| योग के माध्यम से ही हम शरीर को (अपरा) को आत्मा (परा) के साथ जोड़ सकते हैं|अन्य कोई भी माध्यम या साधन उपलब्ध नहीं है|
                       इस भौतिक शरीर का आत्मा के साथ तारतम्य बनाये रखने में भारतीय योग पद्धति का बड़ा ही महत्त्व है|वैसे योग को कई तरह से परिभाषित किया गया है|ऋषि पतंजली को योग विज्ञानं का प्रथम वैज्ञानिक माना जा सकता है|बाकी सभी  ने अपने अपने तरीके से इसकी व्याख्या  की है|वैज्ञानिक तरीके से इसको कैसे समझा जा सकता है,उसका एक प्रयास कर रहा हूँ|जो इस अहंकार की प्रकृति को बदलने में भी सहायक होगा|
योग के आयाम ---
(१)इस संसार में जो छोटे से छोटे कण में है,वही विशाल से विशाल पिण्ड में भी है|"यथा पिण्डे तथा ब्रह्माण्डे"|आप एक साधारण परमणु से लेकर पूरे ब्रह्माण्ड का अवलोकन कर लीजिए आपको सब समान नज़र आएगा|वही केन्द्र,वही भ्रमण करते पिण्ड|सब समान|कहीं कोई फर्क नहीं|वही गुरुत्वाकर्षण बल,अप और अभिकेंद्रित बल,वही विद्युत और चुम्बकीय क्षेत्र|
(२)यहाँ सब एक दूसरे के पूरक है|एक के बिना दूसरे का अस्तित्व खतरे में पड़ सकता है|जितना आवश्यक मनुष्य का जीवन है उतना ही जंगली जानवरों का,उतना ही वनस्पतियों और जंगल का |सब एक दूसरे के पूरक है|अमीर व्यक्ति का अस्तित्व गरीबों की मौजूदगी के कारण है|अगर सभी अमीर हो जाये तो फिर कौन किसको पूछेगा|डॉ. का अस्तित्व मरीज के कारण है|सब स्वस्थ हो जाये तो फिर डॉ. का अस्तित्व खतरे में|सब जगह ऐसे उदाहरण देखे जा सकते है|
(३)यहाँ न तो कोई किसी को ज्यादा देता है और न ही कोई किसी से ज्यादा ग्रहण ही करता है|जंगल आपको पद ,फल और खाना देते है,बदले में आप उसको खाद ,कार्बन डाई ओक्साइड देते है|एक दूसरे पर निर्भर|कहीं कुछ ज्यदा देना नहीं और ज्यादा लेना नहीं|जहाँ पर भी यह संतुलन बिगड़ा सब खतरे में|आप किसी को कुछ देते है तो बदले में वह भी आपको कुछ देता है यह बिलकुल निश्चित है|
(४)यहाँ पर कोई भी,न तो कुछ करता है और न ही करवाता है|सब अपनी एक निश्चित प्रक्रिया के अनुसार ही होता है|यह सब कर्म के सिद्धांत में समझे जा चुके हैं|व्यक्ति को यही मानकर कर्म करने चाहिए,सब कर्म ईश्वर के लिए कर रहा हूँ|जो भी इसका परिणाम होगा वह भी उसका होगा|यह सब मान लेने पर ही व्यक्ति को शांति प्राप्त होगी|
                      इस तरह से योग के कुल नौ आयाम बताये गए है,और कुल नौ विभिन्न तरीकों से इसकी व्याख्या की गयी है|इस तरह से कुल८१ आयाम बताये गए हैं|परन्तु सबका उद्देश्य एक ही है-शरीर का आत्मा के साथ योग| अहंकार को समझने के लिए उपरोक्त चार ही प्रयाप्त है|जो व्यक्ति इन योग के सिद्धांतों के अनुकूल आचरण करता है ,उसका आकर्षण आत्मा और परमात्मा  के प्रति ज्यादा होता है अतः उसका अहंकार परा प्रकृति का माना जायेगा|जो व्यक्ति इन सिद्धांतों के प्रतिकूल आचरण करता है ,उसका आकर्षण संसार और शरीर के प्रति ज्यादा होता है ,अतः उसका अहंकार अपरा प्रकृति का है|अब सम्बन्धित  व्यक्ति को ही तय करना होगा कि वह कौन से अहंकार के साथ जीवन जीना चाहता है,किसी एक को तो चुनना होगा क्योंकि बिना अहंकार के तो जीवन ही असंभव है|
                                अहंकार को जब चोट पहुंचती है ,तब व्यक्ति व्यथित हो जाता है|अहंकार के कारण ही सब ईच्छाएं ,कामनाएं ,वासनाएं और अभिमान आदि पैदा होते हैं|जब इनकी पूर्ति  में व्यवधान पैदा होता है तब व्यक्ति को दुःख पैदा होता है और मन में ईर्ष्या और क्रोध उत्पन्न होता है|क्रोध से मति भ्रम पैदा हो जाता है और बुद्धि का विनाश भी|यह सब अपरा अहंकार को और अधिक बढ़ाने का काम करते है|इस प्रकार यह चक्र जीवन पर्यंत चलता रहता है|गीता में भगवान कहते हैं-
                               क्रोधाद्भवति   सम्मोहः   सम्मोहात्स्मृतिविभ्रमः |
                               स्मरितिभ्रन्शाद् बुद्धिनाशो बुद्धिनाशात्प्रणश्यति ||गीता२/६३||
   अर्थात्,क्रोध से अत्यंत मूढ़ भाव पैदा हो जाता है,मूढ़ भाव से स्मृति में भ्रम हो जाता है,स्मृति में भ्रम हो जाने से बुद्धि अर्थात् ज्ञान शक्ति का नाश हो जाता है जिससे व्यक्ति अपनी स्थिति से गिर जाता है|(Demoralization)
                         इससे स्पष्ट है कि व्यक्ति को यह अहंकार कहाँ से कहाँ तक ले जा सकता है|अतः अहंकार सांसारिकता में न होकर परमात्मा में होना ही श्रेयस्कर है|सबको अपने ही समान समझें|किसी भी कार्य के कर्ता न बने|कुछ दान देकर भी अपने आप को दाता न समझे,देने में अपना सौभाग्य समझे कि आपको कोई लेने वाला तो मिला है|अपने शरीर को परमात्मा का आशीर्वाद समझते हुये लोक कल्याण कार्यों के लिए समर्पित कर दे|तभी आप आध्यात्मिकता के पथ पर आगे बढ़ पाएंगे|केवल पूजा पाठ करना,मंदिर जाना,कुछ दान  देकर अहसान करना ,प्रवचन सुनना आदि तो सिर्फ झूठे अहंकार के प्रतीक है,इनसे कुछ भी प्राप्त नहीं कर सकेंगे|
                   अहंकार पर अभी भी काफी कुछ लिखा जा सकता है ,परन्तु ब्लॉग पर ज्यादा सम्भावना नहीं है|आधुनिक काल में अहंकार की प्रवृति इतनी ज्यादा बढ़ रही है कि कई बार आश्चर्य होता है कि पतंजली की इस पावन भूमि पर यह सब कैसे हो रहा है?अतः आज अहंकार को समझने की ज्यादा आवश्यकता महसूस हो रही है|दुर्भाग्य से इस विषय पर प्रवचन कर्ता भी ज्यादा मुखर नहीं है|
   कल से आत्मा के बारे में.....
क्रमश:
     ||हरि शरणम् || 

Wednesday, August 7, 2013

पुनर्जन्म का वैज्ञानिक आधार-एक परिकल्पना|क्रमश:२३|अहंकार-३|

क्रमश:
                                 अहंकार का विकास गर्भावस्था के दौरान ही होता है|कुल २४ तत्व इस जीवन के लिए आवश्यक होते हैं|उनमे से बीस तत्वों से इस भौतिक शरीर का निर्माण गर्भवस्था के प्रथम तीन माह में ही सम्पूर्ण हो जाता है|तीन माह के पश्चात केवल शरीर का आकार और वजन बढ़ने का क्रम चलता है|जो २० तत्व इस दौरान शरीर निर्माण में में योगदान देते हैं ,वे सभी स्थूल प्रकृति के माने जाते है|ये २० तत्व है-पांच भौतिक तत्व या आधार तत्व यथा-पृथ्वी,आकाश,जल,अग्नि और वायु,पांच ज्ञानेन्द्रियाँ,पांच कर्मेन्द्रियाँ और पांच ज्ञानेन्द्रियों के विषय|तीन माह के पश्चात स्थूल प्रकृति में भी सूक्ष्मता का  प्रादुर्भाव प्रारंभ होता है|यहाँ पर सबसे पहले  मन और बुद्धि के विकास की शुरुआत होती है|जिससे शिशु को धीरे धीरे कुछ ज्ञान होना शुरू होता है|हालाँकि मन का विकास साथ में शुरू हो चूका होता है ,परन्तु जन्म तक यह सुषुप्त अवस्था में बना रहता है|मान और बुद्धि के विकास की शुरुआत होने के बाद अहम् अपना आकार(अहंकार) प्राप्त करना शुरू कर देता है| यहाँ ध्यान देने योग्य बात यही है कि बिना मन और बुद्धि के विकास की शुरुआत के अहंकार का विकास असंभव है|मन,बुद्धि और अहंकार तीनो ही ऐसे स्थूल प्रकृति में वे सूक्ष्म तत्व है जिनका विकास गर्भावस्था के तीन माह पश्चात शुरू होता है और जन्म के बाद भी लगातार यह विकास का क्रम जारी रहता है|
                                          भ्रूण विज्ञानं (Embryology)के अनुसार केवल स्थूल  भौतिक शरीर की निर्माण प्रकिया जानी और समझी जा सकती है,मन ,बुद्धि और अहंकार जैसे सूक्ष्म तत्वों की नहीं|जब अहंकार के विकास की शुरुआत होती है ,इसकी उपस्थिति का पहला संकेत माँ को १६-१८ सप्ताह के आस पास मिलने लगता है,जब बच्चे द्वारा की गयी पहली हरकत का आभास (Quickening)होता है|अगर इसमे देरी होती है तो मानसिक और शरीरिक विकास के कमजोर रहने का पूर्वानुमान लगाया जा सकता है|इस सबकी एक निश्चित प्रक्रिया होती है|ज्योंही अहंकार के विकास का पहला चरण पूरा होता है,सुषुप्त पड़े मन पर उसका अंकन हो जाता है|जिसके फलस्वरूप बुद्धि का सक्रिय होना भी शुरू हो जाता है|मन,बुद्धि और अहंकार के तालमेल से गर्भस्थ शिशु में शरीरिक हलचल शुरू हो जाती है|धीरे धीरे वह हलकी मुस्कराहट के साथ दर्द आदि का अनुभव करने  लगता है|उसके शरीर का जैविक विद्युत चुम्बकीय क्षेत्र(Bio electro magnetic field) माँ के क्षेत्र से तालमेल बैठा लेता है|ऐसी स्थिति में अब दोनों में से किसी के भी इस क्षेत्र में आये परिवर्तन को दोनों महसूस कर सकते है|उसी के अनुरूप गर्भस्थ शिशु व्यवहार करता है|
                                       यहविकासशील  अहंकार स्थूल प्रकृति का होते हुये भी शुरुआत में उदासीन होता है |पूर्ण अपरा प्रकृति का अहंकार गर्भावस्था में पैदा नहीं हो सकता है|अपरा प्रकृति का अहंकार जन्म लेने के बाद जब बालक सांसारिक गतिविधियों में रमने लगता है ,तब पैदा होना शुरू होता है और र्धीरे धीरे यह उदासीन अहंकार अदृश्य होने लगता है|गर्भावस्था में शरीर में अहम् भाव पैदा हुये बिना आगे जीवन की कल्पना नहीं की जा सकती |अतः अहंकार शारीरिक विकास के लिए एक महत्व पूर्ण तत्व है|
                                                 जन्म के समय इस अहंकार का विकास अपने चरम पर होता है| बच्चे के जन्म लेते ही रोना इस अहंकार का प्रथम जीवित प्रदर्शन है|सामान्य प्रसव में बच्चे को परेशनियों का सामना करना पड़ता है,जिससे उसके अहंकार को चोट पहुंचती है,जिसकी परिणिति रोने के रूप में सामने  आती है|मैं जनता हूँ कि आप इससे सहमत नहीं है और न ही हो सकते है|परन्तु वास्तविकता यही है|विज्ञानं इस प्रथम रूदन के कई कारण गिनाता है,जिसमे एक अति महत्वपूर्ण कारण बाहर के वातावरण की वायु के स्पर्श से उत्पन्न शारीरिक प्रतिक्रिया (Reflex)माना जाता है|परन्तु आंकड़े गवाह है कि सिजेरियन प्रसव जिसमे कोई बेहोशी की दवा माँ को सुंघाई नहीं गयी हो और ना ही सीधे खून में कोई दवा  दी गयी हो,फिर भी शिशु सामान्य प्रसव की तुलना में औसत १/२ से १ मिनट देरी से रोता है,और इसके लिए भी शिशु रोग विशेषज्ञ को कुछ प्रक्रिया अपनानी पड़ती है|जबकि सामान्य प्रसव में किसी प्रक्रिया की जरूरत नहीं पड़ती|यह मैं उन शिशुओं की बात कर रहा हूँ जो गर्भ में किसी भी तरह की Foetal distress से पीड़ित नहीं होते ,और न ही किसी जन्मजात विकृति से पीड़ित होते है|बिलकुल सामान्य शिशु और सामान्य प्रसव और सिजेरियन प्रसव(बिना किसी दवा के उपयोग के जो बच्चे की श्वास प्रक्रिया पर असर डालती हो) ही इसके लिए आधार लिया गया है|यह अंतर स्पष्ट करता है कि कोई अन्य कारण भी हो सकता है जिससे प्रथम रूदन प्रभावित होता हो|और भारतीय मनीषियों ने इसका एक मात्र कारण अहंकार को ही बताया है|यह अहंकार आगे जन्म के बाद कैसे कैसे रूप परिवर्तित करता है,यह देखना और जानना महत्वपूर्ण होगा|कल.......
     क्रमश:
                || हरि शरणम् || 

Tuesday, August 6, 2013

पुनर्जन्म का वैज्ञानिक आधार-एक परिकल्पना|क्रमश:२२|अहंकार-२|

क्रमश:
           अहंकार,एक ऐसा शब्द है जिसके बारे में बहुत सारी भ्रान्तियां है|अहंकारी व्यक्ति को लोग अलग ही दृष्टि  से देखते हैं|लेकिन यह सब वास्तविकता से परे है|अहंकार संसार में जीवित रहने के लिए आवश्यक तत्व है गीता में भगवान श्री कृष्ण कहते हैं-
                                  महाभूतान्यहंकारो   बुद्धिरव्यक्त  मेव  च |
                                  इन्द्रियाणि दशैकं च पञ्च चेन्द्रियगोचरा ||गीता१३/५||
अर्थात्,पांच महाभूत,दस इन्द्रियां,पांच इन्द्रियों के विषय,एक मन,बुद्धि,अहंकार और मूल प्रकृति आत्मा(अव्यक्त)यह सब इस शरीर में स्थित है|
        यहाँ भगवान क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ योग नामक १३ वें अध्याय में अर्जुन को यही समझा रहे हैं कि इस शरीर में उपरोक्त २४ तत्वों की उपस्थिति ही व्यक्ति को इस संसार में बने रहने के लिए आवश्यक है|इनमे किसी भी एक तत्व की  अनुपस्थिति व्यक्ति की जीवन शैली को प्रभावित कर सकती है|एक इन्द्रिय के सही कार्य न कर पाने से ही जब व्यक्ति विचलित हो जाता है ,तो उनसे भी सूक्ष्म मन और बुद्धि में विकार आने से उपस्थित होने वाली समस्याओं की सहज ही कल्पना की जा सकती है|मन बुद्धि से भी कोई अति सूक्ष्म है तो वह है अहंकार|अहंकार स्थूल प्रकृति का २३वां तत्व है|इससे सूक्ष्म आत्मा ही है ,जिसकी प्रकृति सूक्ष्म यानि परा प्रकृति कही गयी है|
                                       अहंकार की प्रकृति भी स्थूल और सूक्ष्म यानि अपरा और परा दोनों प्रकार की बताई गयी है|जब आपका अहंकार इस शरीर के कारण ,इन्द्रियों के कारण या इन्द्रियों के विषयों के कारण होता है तब यह अहंकार अपरा प्रकृति का हुआ|और यही अहंकार जब आत्मा और परमात्मा के कारण होता है ,तब यह परा यानि सूक्ष्म प्रकृति का माना जाता है|
                               किसी को अपनी सुंदरता पर ,किसी को अपने शारीरिक सौष्ठव पर,किसी को अपनी इन्द्रियों पर या इन्द्रियों के विषयों पर अभिमान होता है,तब जो अहंकार पैदा होता है वह निम्नतम प्रकृति का होता है|किसी का धन के कारण और किसी को अपनी बुद्धि पर गर्व होता है ,तो यह भी निम्न प्रकृति का माना जाता है|लेकिन यह अहंकार उसे जीवन जीने के लिए इस संसार में बने रहने के लिए आवश्यक है|यह अहंकार बिलकुल झूठा है(False Ego) क्योंकि जिसका कोई अस्तित्व ही नहीं हो और उसका अभिमान हो तो फिर यह अहंकार झूठ ही तो हुआ|इस अहंकार के वशीभूत होकर व्यक्ति संसार में इतना रच बस जाता है कि इस चक्र से उसका निकलना मुश्किल हो जाता है|
                                  अगर यही अहंकार इस संसार में रहते हुये आत्मा और परमात्मा के लिए हो तो यह अहंकार सच्चा होगा(True Ego Or Self Ego)|यहाँ व्यक्ति यही मान लेता है कि परमात्मा ने जो यह शरीर दिया है वह इस संसार की सेवा के लिए दिया है,और मुझे यह शरीर संसार में जरूरतमंदों की सेवा के लिए समर्पित कर देना चाहिए|तब व्यक्ति के दिमाग में कभी भी यह नहीं आता कि यह कार्य केवल मैं ही कर सकता हूँ|बल्कि यह होगा कि इस कार्य के लिए परमात्मा ने मेरे को इस संसार में भेजा है तो जिस किसी की भी मेरे इस कार्य से सेवा हो सकती है,मुझे करनी चाहिए|यह अहंकार परमात्मा के प्रति होता है ,इसमे व्यक्ति को अपनी बुद्धि,धन इन्द्रियों अथवा शरीर पर अभिमान नहीं होता है|अतः यह अहंकार इस जीवन के लिए उपयोगी है और आवश्यक भी|कई बार इस संसार की सेवा करना या स्वयं को परमात्मा का मानने का भी अभिमान हो जाता है ,यह फिर अपरा पर्कृति के अहंकार की श्रेणी में आ जायेगा|अतः परमात्मा का स्वयं को मान लेना और संसार की सेवा में लग जाना और इतना करके कुछ भी नहीं किया या नहीं करता हूँ यह मान लेना ही सच्चा अहंकार है| यह अहंकार ही व्यक्ति के लिए आवश्यक है|
                                           ज्यादातर सांसारिक जीव झूठे अहंकार से ही जीवन जी रहे है,और जब इस अहंकार को चोट पहुंचती है तब एक प्रकार की छटपटाहट पैदा होती है जो व्यक्ति को आंतरिक रूप से  परिवर्तित कर सकती है|अगर यहाँ व्यक्ति, बुद्धि से कार्य लेते हुये अपने आप को परमात्मा का मान लेता है तो अपना भावी जीवन तत्काल बदल लेता है|अगर ऐसा करने में वह असफल रहता है तो उसमे फिर आत्महत्या कर लेने जैसी प्रवृति पैदा होने लगती है|मानसिक संताप की यह स्थिति व्यक्ति को कहीं भी और किधर भी ले जा सकती है|यह सब उसकी बुद्धि और विवेक पर निर्भर करता है| यहाँ उसे अर्जुन की तरह किसी कृष्ण की जरूरत होती है|परन्तु दुर्भाग्य,इस संसार में हर कोई अर्जुन नहीं है जिसे कृष्ण मिल सके|
   क्रमश:
                        || हरि शरणम् || 

Saturday, August 3, 2013

पुनर्जन्म का वैज्ञानिक आधार-एक परिकल्पना|क्रमश:२१|अहंकार

क्रमश:
                            गर्भावस्था के दौरान जब सभी शारीरिक अंग विकसित हो जाते है,उसके बाद उसमे सूक्ष्मता का विकास शुरू हो जाता है|जब सब इन्द्रियों का निर्माण सम्पूर्ण हो जाता है तब इन्द्रियों के विषय विकसित होते है,जो कि मूल रूप से रासायनिक उर्जा (Chemical energy) के कारण होता है|इसके बाद मन,बुद्धि और चित्त का विकास होता है|मन और बुद्धि का विकास होने पर गर्भस्थ शिशु गर्भ में अपनी हलचल शुरू कर देता है,इसमे उसका मुस्कुराना भी शामिल है|अंतिम विकास अहंकार का होता है|अहंकार का अर्थ है अपने "मैं"स्वरुप का आकार लेना|इस स्थिति में जब अहंकार विकसित होता है,गर्भस्थ शिशु में स्वयं  को एक स्वतन्त्र इकाई मानने का भाव पैदा होने लगता है|इसी को अहंकार कहते है|अहंकार=अहं+आकार|इसे अंग्रेजी में Self Recognition or Self Identity कहते है|अहंकार का विकास गर्भावस्था के दौरान ही हो जाता है,अतः इसकी प्रकृति अपरा यानि स्थूल (Macro) ही मानी गयी है|
         मन,चित्त और बुद्धि के बाद अगर सूक्ष्म रूप किसी का है तो वह है अहंकार|सूक्ष्म रूप होने के बाद भी इसकी प्रकृति अपरा ही मानी गयी है|अहंकार मानव मनोविज्ञान(Human Psychology) का विषय है|मानव शरीर विज्ञानं इसके बारे में अभी भी कुछ भी नहीं जान पाया है|वह इसे एक व्यक्ति की अपनी मानसिकता समझता है|
    आध्यात्मिकता की दृष्टि से  अगर देखा जाये तो अहंकार का अर्थ है अपने आप को कर्ता मानना|अहंकार को दोनों अपरा और परा प्रकृति माना जा सकता है|'अहं' अपरा प्रकृति है,जिसमे' मैं' पना है|अगर यही अहं भाव परमात्मा की तरफ हो जाये जैसे मैं परमात्मा का हूँ,परमात्मा मेरे हैं;तब यह अहंकार की परा प्रकृति हो जाती है|यहाँ यह अहंकार मानव जन्म की सफलता प्रदर्शित करता है|
                     अपरा प्रकृति के अहंकार के होने से मनुष्य संसार की तरफ उन्मुख रहता है,जिसके कारण वह परमात्मा को भूलकर सब जगह अपने को ही कुछ होना समझने लगता है|वास्तविकता यह है कि यहाँ पर उसकी कोई औकात भी नही है|आज आप घर से कह कर निकलते हो कि दोपहर का खाना घर पर खाऊंगा|किस आधार पर कहते हो?इसी अहंकार के कारण,जैसे सब कुछ आपके हाथ है|लोग एक दूसरे को देख लेने की धमकी देते है,पता नहीं है उनको कि देखने और दिखाने वाला कोई और है|यह तभी है जब व्यक्ति  संसार और शरीर की क्षमता को देखता है |जब व्यक्ति  को परमात्मा की सत्ता का पता चलता है तब वह अगर अपने आप को परमात्मा को समर्पित कर देता है तो यही अहंकार उसे मुक्ति के मार्ग तक भी ले जा सकता है|गीता में भगवान कहते हैं-
                                   यदहंकारमाश्रित्य न योत्स इति मन्यसे |
                                   मिथ्यैष व्यवसायस्ते प्रकृतिस्त्वां नियोक्ष्यति ||गीता१८/५९||
अर्थात्, जो तू अहंकार का आश्रय लेकर यह मान रहा है कि "मैं युद्ध नहीं करूँगा"तो तेरा यह निश्चय मिथ्या है;क्योंकि तेरा स्वभाव तुझे जबर्दस्ती युद्ध में लगा देगा|
                 अर्जुन एक कुशल योद्धा था ,उसको तो अहंकार युद्ध करने का होना चाहिए था परन्तु यहाँ भगवान कहते है कि वह अहंकार का आश्रय ले रहा था|उसको अहंकार इस बात का नहीं था कि वह एक कुशल योद्धा था बल्कि उसे अपने आप को ज्ञानवान समझने का था|गीता के प्रथम अध्याय में अर्जुन ने युद्ध से होने वाले नुकसान गिनाये थे|तब वह कृष्ण के सामने ज्ञानियों जैसी बातें कर रहा था|भगवान ने यहाँ यह माना है कि उसे अपने ज्ञान का अहंकार हो गया है| इसी अहंकार की आड में अर्जुन युद्ध से कतरा रहा था|यह अहंकार परमात्मा से विमुख और स्वयं के कारण होने से स्थूल यानि अपरा प्रकृति का है|
                                           अहंकार की दोनों प्रकृतियों को समझ लेने के बाद प्रश्न यह उपस्थित होता है कि यह अहंकार मनुष्य के लिए क्यों आवश्यक है?अहंकार के बिना भी जीवन चल सकता है|नहीं,ऐसा नहीं है|अगर अहंकार मनुष्य में नहीं हो तो वह कर्म से विमुख हो सकता है|अहंकार का आश्रय लेकर ही व्यक्ति कर्म करता है|
अहंकार की अति होने पर विकर्म होने लगते है,तब व्यक्ति अधोगति की तरफ अग्रसर हो जाता है|यही अहंकार अगर परमात्मा की तरफ हो तो भक्ति में लग कर अपना जीवन सफल बना सकता है|
क्रमश:
                       ||हरि शरणम् ||

Friday, August 2, 2013

पुनर्जन्म का वैज्ञानिक आधार-एक परिकल्पना|क्रमश:२० |बुद्धि-२|

क्रमश:
                       बुद्धि ही शरीर में एक मात्र ऐसी प्रकृति है जो अपने साथ उपस्थित मन,चित्त और अहंकार को नियंत्रित करती है|अगर बुद्धि के चुम्बकीय क्षेत्र में कोई व्यवधान आता है तो फिर समस्त शरीर की क्रियाओं पर उसका प्रभाव पड़ता है|बुद्धि का सम्बन्ध आत्मा और शरीर दोनों से होता है|आत्मा अपनेआप कुछ भी नहीं कर सकती|कुछ करवाने के लिए उसे मन की ही आवश्यकता होती है और मन पर नियत्रण हमेशा ही बुद्धि का रहा है|मन को नियंत्रित ना तो शरीर कर सकता है और ना ही आत्मा ही|जबकि दोनों के  उर्जा क्षेत्र  के सामंजस्य बिंदु पर  मन अवस्थित होता है|मन में जो भी अंकित होता है ,उसे केवल बुद्धि ही परिवर्तित कर सकती है|बुद्धि का चुम्बकीय क्षेत्रत् मन को प्रभावित  करता  है|मन फिर इन्द्रियों के माध्यम से वही कर्म करवाता है जो बुद्धि उसे करवाने का आदेश देती है||
                                           आत्मा का अपना एक विद्युत चुम्बकीय क्षेत्र होता है और शरीर का अपना|बुद्धि का अपना चुम्बकीय क्षेत्र होता है ,परन्तु बुद्धि; शरीर  की तरह ही स्थूल प्रकृति की है अतः उसका यह क्षेत्र शरीर के क्षेत्र के  ज्यादा प्रभाव में रहता है बजाय आत्मा के प्रभाव के|इसीलिए भगवान श्री कृष्ण को गीता में अर्जुन को समझाना पड़ा कि तुम अपनी बुद्धि और मन को मुझमे लगा|(गीता १२/८)|अगर बुद्धि शरीर की बजाय आत्मा के प्रभाव में होती तो श्री कृष्ण को यह कहने की कोई जरूरत ही नहीं होती|आत्मा को भी अगर शरीर से कोई कार्य लेना होता है तो उसे भी पहले बुद्धि के प्रभाव क्षेत्र को ही प्रभावित करना होगा|उसके बाद बुद्धि उसको कितना महत्त्वपूर्ण मानती है यह उसके प्रभाव क्षेत्र और मन पर निर्भर करता है|  अगर मन इंकार कर देता है,तो फिर आत्मा को बार बार बुद्धि को निर्देशित करना पड़ता है|फिर भी अगर मन वैसा नहीं करता जैसा आत्मा चाहती है तो फिर सारा दोष बुद्धि का ही माना जाता है|आम बोलचाल की भाषा में तब हम गलत कामकरने वाले व्यक्ति के बारे में कह ही देते हैं कि उसकी मति(बुद्धि)मारी गयी है,जो ऐसा गलत कार्य कर रहा है| क्योंकि  अब यह स्पष्ट हो चूका है कि   मन पर आत्मा की बजाय बुद्धि का नियंत्रण रहता है|
     गीता में भगवान श्री कृष्ण कहते है-
                                   व्यवसायात्मिका बुद्धिरेकेह कुरुनन्दन |
                                  बहुशाखा ह्यनन्ताश्च बुद्ध्योSव्यवसायिनाम् ||गीता-२/४१ ||
अर्थात्, हे कुरुनन्दन अर्जुन!इस कर्मयोग में निश्चय वाली बुद्धि एक ही होती है|जिनका एक निश्चय नहीं है,ऐसे मनुष्यों की बुद्धियाँ अनंत बहु शाखा वाली होती है|
        इस श्लोक का यह वह अनुवाद है जो गीता प्रेस से प्रकाशित विभिन्न पुस्तकों में दिया गया है इस श्लोक की पहली पंक्ति का संधि विच्छेद करते है तो यह निमं प्रकार से व्यक्त होता है-
  व्ययसाय+आत्मा+इक=व्ययासत्मिका |   बुद्धिर+एक=बुद्धिरेकेह |
अर्थात्,व्यवसाय(कर्म) और आत्मा एक हो,बुद्धि भी एक हो और फिर ये दोनों साथ साथ हों,तभी सही कर्म संभव है|अन्यथा जिनका (मन का) और आत्मा का एक निश्चित व्यवसाय (कर्म) नहीं हो ,उनकी बुद्धियाँ भी बहुत शाखाओं वाली  और अनंत होती है|अतः बुद्धि का मन पर नियंत्रण आवश्यक है |
                           बुद्धि अपने प्रभाव से मन को नियंत्रित कर सकती है |हम जानते है कि शरीर,इन्द्रियों,मन और बुद्धि की प्रकृति एक ही है , अतः बुद्धि पर नियंत्रण कर पाना मुश्किल जरूर है ,परन्तु असंभव नहीं|आत्मा के द्वारा चित्त(अंतःकरण )के माध्यम से यह नियंत्रण पाया जा सकता है|एक बार व्यक्ति अपनी बुद्धि के माध्यम से मन पर नियंत्रण पा  लेता है ,तो फिर उसके सामने कोई भी समस्या आ ही नहीं सकती| इस अवस्था को प्राप्त कर लेना ही आध्यत्मिकता को प्राप्त कर लेना है|यहाँ पहुंचकर ईश्वर से परोक्ष सम्बन्ध बन पाता है|गीता में आगे भगवान कहते हैं-
                           दूरेण   ह्यवरं   कर्म    बुद्धियोगाद्धनंजय |
                           बुद्धौ शरणमन्विच्छ कृपणाः फलहेतव :||गीता२/४९||
अर्थात्, बुद्धि योग से सकाम कर्म अत्यंत निम्न श्रेणी का है,इसलिए हे धनंजय ! तू समबुद्धि में ही रक्षा का उपाय ढूंढ,अर्थात् बुद्धियोग का ही आश्रय ग्रहण कर;क्योंकि फल प्राप्ति के कारण बनने वाले अत्यंत ही दीन होते हैं|सारांश यह है कि मन के द्वारा होने वाले सकाम कर्म के साथ बुद्धि को मत लगा|बल्कि बुद्धि को सम(Balance) अवस्था में रखने का कोई उपाय ढूंढ|जिससे निष्काम कर्म कर सके और बुद्धि को आत्मा और परमात्मा की तरफ लगा सके|आगे फिर भगवान कहते है कि विषयों का चिंतन करने वाले पुरुष की आसक्ति उन विषयों में हो जाती है,आसक्ति से कामनाएं उत्पन्न होती है और जब कामनाओं के पूरी होने में बाधा उत्पन्न होती है तो क्रोध पैदा होता है|(गीता२/६२)फिर क्रोध से मूढ़ भाव पीड़ा होता है,मूढ़ भाव से स्मृतिभ्रम हो जाता है और स्मृतिभ्रं से बुद्धि का नाश हो जाता है अर्थात् ज्ञान शक्ति का नाश हो जाता है|बुद्धि का नाश हो जाने से पुरुष अपनी स्थिति से गिर जाता है|(गीता२/६३)|
                                        उपरोक्त विश्लेषण से स्पष्ट है कि बुद्धि पर नियंत्रण के लिए अपनी कामनाओं पर नियंत्रण रखना जरुरी है|कामनाओं पर नियंत्रण होने से कम से कम बुद्धि  का विनाश तो नहीं होगा|यहाँ कामनाओं का अर्थ सकाम कर्म और उनमे पैदा हुई आसक्ति से है,प्रत्येक कर्म से नहीं|यही ध्यान देने योग्य बात है|
     क्रमश:
                                                     || हरि शरणम् ||

Thursday, August 1, 2013

पुनर्जन्म का वैज्ञानिक आधार-एक परिकल्पना|क्रमश:१९|बुद्धि |

                 क्रमश:
                         प्रकृति से उत्पन्न बुद्धि(Intelligence) का सूक्ष्म(Micro) रूप होते हुये भी अपरा (Macro) कही गयी है|बुद्धि से ही मन (Mind)  का संचालन किया जा सकता है|बुद्धि के बिना शरीर मात्र एक मल मूत्र पैदा करने वाली मशीन बनकर ही रह जायेगा | शरीर विज्ञानं(Anatomy) के अनुसार भ्रूण विकास में ECTODERM से NEURAL TUBE बनती है,जिससे मस्तिष्क(Brain) और सुषुम्ना नाडी(Spinal cord) का विकास होता है|विज्ञानं के अनुसार शरीर में होने वाली सभी गतिविधियां यहीं से नियंत्रित होती है|इन्द्रियों(Senses) का विकास भी उसी पर्त (Layer)  से होता है,जिससे मस्तिष्क का होता है|इसी कारण बुद्धि की प्रकृति भी अपरा यानि स्थूल कही गयी है|
                           शरीर के अन्य सब अंगों की तरह मस्तिष्क में भी विद्युत उर्जा प्रवाहित होती रहती है|जिससे एक विद्युत चुम्बकीय क्षेत्र का निर्माण होता है|आप इसे ही बुद्धि कह सकते है|क्योंकि जब यह क्षेत्र पूर्णतया समाप्त हो जाता है,तब मस्तिष्क नाम का अंग जरूर होता है,परन्तु कार्य करने लायक नहीं|इसमे अब विद्युत चुम्बकीय क्षेत्र का अभाव है,यानि बुद्धि का अभाव है|
 विद्युत और चुम्बकीय क्षेत्र ----
-विद्युतीय क्षेत्र(Electric Field) तो विद्युत प्रवाह बंद हो जाने के बाद भी कुछ समय के लिए बना रहता है,जब कि चुम्बकीय क्षेत्र(Magnetic field) समाप्त हो जाता है|विद्युतीय क्षेत्र की एक सीमा होती है,जबकि चुम्बकीय क्षेत्र अनंत होता है|विद्युतीय उर्जा से चुम्बकीय क्षेत्र बन सकता है और चुम्बकीय क्षेत्र से गतिज उर्जा को विद्युतीय उर्जा में बदला जा सकता है|जल विद्युत परियोजनाएं(Hydro power project) इसका उदहारण है|
                                       चुम्बकीय क्षेत्र गोलाकार(Circle) आकृति लिए होता है|इसकी विशेषता है कि यह पलक झपकने के साथ ही अनंत(Infinity) तक विस्तार पाकर स्थिर हो जाता है|इसकी गति का अनुमान लगाना असंभव  है|प्रत्येक कोशिका से लेकर पूरे शरीर तक ,सबका अपना अपना जैव विद्युत चुम्बकीय क्षेत्र (Bio- Electro magnetic field)होता है|जो एक दूसरे को प्रभावित करते है|ब्रह्माण्ड(Universe) में जितने भी पिण्ड है उन सबका अपना ऐसा ही एक क्षेत्र होता है|
                                 मानव मस्तिष्क(Brain) में उपस्थित यही जैव विद्युत चुम्बकीय क्षेत्र ही बुद्धि (Intelligence)  है|जब इसका विकास होता है तब वह कहीं पर भी तुरंत पहुँच सकती है|बुद्धि और मन का आपस में गहरा संबंध होता है,और इन्हें अलग अलग समझना असंभव है|मन का लगाव जब किसी विशेष के साथ होता है ,तब यह चुम्बकीय क्षेत्र अपना फैलाव कर विशेष के चुम्बकीय क्षेत्र को प्रभावित करने लगता है|आपको ऐसे कई उदहारण मिल जायेंगे जहाँ दूर बैठा कोई व्यक्ति अचानक अपने विशेष व्यक्ति से संपर्क हुआ पाता है|आप अगर गौर  करेंगे तो इस बात को सत्य पाएंगे|खेतों में काम करने वाली महिलाएं,घर में सो रहे बच्चे के बारे में पता लगा लेती है कि वह घर पर रो रहा है,खेल रहा है या उसको कोई चोट लग गयी है|बच्चे के रोते ही वह तुरंत काम छोड़ जब घर पहुँचती है,तो उसे सब वही देखने को मिलता है ,जैसा उसने खेत में काम करते हुये महसूस किया|यहाँ पर,महिला ने अपने  मस्तिष्क के  चुम्बकीय क्षेत्र  को फैला कर बच्चे के चुम्बकीय क्षेत्र के साथ स्थिर कर लिया था|अब बच्चे के इस क्षेत्र में जो भी परिवर्तन आते है वे महिला यानि उसकी माँ के चुम्बकीय क्षेत्र को प्रभावित करते हुये महिला के मस्तिष्क तक पलक झपकते ही पहुँच जाते है,और माँ को बच्चे के बारे में तुरंत महसूस हो जाता है कि बच्चे के साथ क्या घटित हो रहा है?यह सब माँ की ममता के कारण होता है|जब कि माँ को यह आभास ही नहीं होता कि ऐसा वह सब कर रही है|
                                अब इसे भौतिक संसार के साथ जोड़ कर देखें|आप रास्ते से जा रहे है|आपके कानो ने कोई आवाज नहीं सुनी|अचानक आप को लगता है कि आपके पीछे पीछे कोई परिचित आ रहा है|आप पीछे मुड़कर देखते है,और उसी को आपके पीछे आता हुआ पाते है|यह सब दो क्षेत्रों के आपस में तालमेल के बिना असंभव है|किसी एक के क्षेत्र का फैलाव होकर दूसरे के क्षेत्र तक पहुँचना जरुरी है|यह सब आपके मन पर निर्भर करता है|गीता में भगवान कहते हैं---
                        मय्येव मन आधत्स्व मयि बुद्धिं निवेशय|
                        निवसिष्यसि मय्येव अत ऊर्ध्वं न संशय :||गीता १२/८||
अर्थात्, मुझ में मन को लगा और मुझमे ही बुद्धि को लगा;इसके उपरांत तू मुझमें ही निवास करेगा,इसमें कुछ भी संशय नहीं है|
                            मन और बुद्धि को जब परमात्मा की तरफ लगा दें तो फिर वह व्यक्ति परमात्मा को प्राप्त हो जाता है अर्थात् उसे परमात्मा की प्राप्ति हो जाती है|अगले श्लोक में भगवान मन के स्थान पर चित्त शब्द का उपयोग करते हुये कहते हैं-
                        अथ चित्तं समाधातुं न शक्नोषि मई स्थिरम् |
                        अभ्यासयोगेन  ततो  मामिच्छाप्तुं  धनञ्जय||गीता१२/९||
अर्थात्,यदि तू चित्त को मुझ में लगाने में असमर्थ है तो हे अर्जुन!अभ्यास योग के द्वारा मुझको प्राप्त होने के लिए इच्छा कर|
            यहाँ पर यह स्पष्ट हो जाता है कि ज्यों ही मन,बुद्धि के साथ आकर परमात्मा की तरफ उन्मुख होता है,मन का रूपांतरण हो जाता है|इस रूपांतरित मन को ही चित्त कहते हैं|
                        यही क्षेत्र(बुद्धि) जब अपना फैलाव कर परमात्मा के क्षेत्र के साथ योग कर लेता है,फिर उनके बीच भी एक सम्बन्ध बन जाता है|फिर परमात्मा के सन्देश भी आपको प्राप्त होने लगते है,जिसे अन्तःकरण की आवाज कहते हैं|जब इस बुद्धि का जुडाव मन के साथ होकर  शरीर की तरफ हो जाता है तो इन्द्रियां मन को प्रभावित करते हुये बुद्धि को भी अपने नियंत्रण में ले लेती है|ऐसी स्थिति में व्यक्ति काम,वासना ,छल,कपट,मोह,माया आदि के चक्कर में पड़ा रहता है और जन्म-मरण के चक्र-व्यूह को भेद नहीं पाता है|
क्रमश:
                   || हरि शरणम् ||