सम्भवामि युगे युगे -41
व्यक्ति विधि के लिखे विधान को पलटने का भरसक प्रयास करता है । यह विधि ही मायापति की माया है । कर्म हम करते हैं और उन कर्मों के अनुसार परमात्मा विधि से हमारा विधान लिखाते हैं । यह बात हमारी समझ से बाहर रहती है, तभी तो हम प्रत्येक परिस्थिति के लिए किसी दूसरे को ज़िम्मेवार ठहराने का प्रयास करते हैं जबकि वास्तविकता है कि प्रत्येक परिस्थिति के लिए हम स्वयं ही ज़िम्मेदार होते हैं । मैं तो कहूँगा कि हम इतना सब जानते हुए भी अनजान बने रहते हैं क्योंकि हमारा विश्वास अपने शास्त्रों पर तनिक सा भी नहीं है । यही कारण है कि हम विधान को स्वीकार करने के स्थान पर उसे अपनी शक्ति से बदलने का प्रयास करते हैं । इस प्रयास के पीछे हमारा सांसारिक मोह है । दशरथजी भी तो यही कर रहे हैं ।
कैकेयी को दिए हुए वचनों को निर्मूल करने का एक ही रास्ता बचा है, दशरथजी के पास । वे राम को कहते हैं कि तुम अयोध्या के सेनापति हो, राज्य की सुरक्षा के नाम पर मुझे गिरफ़्तार कर लो और अवधपति बन जाओ । इससे तुम्हारे सामने वचन पालन की बाध्यता नहीं रहेगी । परंतु राम कोई औरंगज़ेब तो थे नहीं कि अपने पिता (शाहजहां) को गिरफ़्तार कर जेल में डाल देते और शासन अपने हाथ में ले लेते । आज के युग में एक सेनापति राजा को इतना कहने का भी समय नहीं देता, उससे पूर्व ही उसे गिरफ़्तार कर जेल में डाल देता अथवा फांसी पर लटका देता । परंतु राम कोई साधारण मनुष्य नहीं है, वे तो मर्यादा पुरुषोत्तम है ।
जिनका जन्म भी मर्यादित हो और कर्म भी, वे भला ऐसी गलती कैसे कर सकते हैं ? राम ने अपने पिता को समझाया कि आपका ऐसा कहना उचित नहीं है । आपकी आन-बान और शान को अक्षुण बनाए रखना मेरा प्रथम कर्तव्य है । मैं ऐसा कुछ भी नहीं कर सकता जो नियम विरुद्ध और निन्दनीय हो । पिताजी, आप मुझे वन-गमन की आज्ञा दें । समय आपकी और मेरी परीक्षा ले रहा है और उस परीक्षा के परिणाम से ही भविष्य में इतिहास लिखा जाएगा ।
क्रमशः
प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल
।। हरिः शरणम् ।।
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