Monday, October 12, 2026

सम्भवामि युगे युगे -40

 सम्भवामि युगे युगे -40

              इधर कैकेयी रणचण्डी बनी बैठी है और उधर दशरथ राम-राम की रट लगाते बार-बार मूर्छित हो रहे हैं । इस धरती पर चाहे कितनी ही बड़ी घटना हो जाय, भास्कर का रथ कभी नहीं रुकता । भोर को होना ही था । कैकेयी का रनिवास सूना पड़ा था और इधर कोप- भवन में राज-परिवार का टूटता ताना-बाना एक कोने में पड़ा सिसक रहा था । ब्रह्ममुहूर्त में जाग जाने वाले राजा आज कहीं दिखाई नहीं दे रहे थे । सुमन्त्र के सारथी जीवन में आज पहली बार ऐसा हुआ था कि रथ तैयार है और रथी का कोई अता-पता नहीं है । ढूंढ़ते-ढूंढ़ते कोप-भवन तक पहुंच गए । राजा की दशा का कारण कैकेयी के अलावा दूसरा कोई नहीं बता सकता है । कारण बताने के स्थान पर आदेश दिया कि राम को राजा से मिलने भेजा जाय ।

             सेवक की कभी हिम्मत नहीं होती कि वह प्रतिप्रश्न कर सके । सुमन्त्र ने तत्काल ही राम को संदेश पहुंचा दिया । राम तो साक्षात् परमात्मा हैं, भला उनसे कोई बात छिपी कैसे रह सकती है ? फिर भी लोकाचार के नाते कोप-भवन में प्रवेश कर माता-पिता को प्रणाम किया और कैकेयी से राजा की इस दशा का कारण जानना चाहा । कैकेयी ने रात की सारी घटना बता दी । रघुकुल की रीति, राम की शपथ, दो वरदान और पिता का पुत्र-मोह । राम कोई साधारण मनुष्य नहीं है कि विपरीत बात सुनकर संतुलन खो दे । समता में रहते हुए बोल पड़े - ‘बस, इतनी सी बात ! चौदह वर्ष ही क्यों, राजा के वचनों की साख के लिए उनका राम जीवन भर वन में रहने को तैयार है ।’

               अश्रु भरे नयनों ने राम की बातों की सराहना की परंतु दशरथ तो राम नहीं है न ! भीतर के भाव आंसू बन प्रवाहित हो चले और भावुक पिता ने पुत्र को हृदय से लगा लिया । जो एक पल के लिए पुत्र को अपनी दृष्टि से दूर नहीं रखना चाहते, वे कैसे अपने पुत्र को चौदह वर्ष के लिए वनगमन का आदेश दे सकते हैं । कैकेयी के द्वारा कहे गए शब्दों पर राजा दशरथ का मौन रह जाना, चौदह वर्ष के वनवास के आदेश पर मोहर लगा रहा था । इस समय निर्णय राम को ही करना है । नहीं, ऐसा हमारी सोच कह सकती है, मैं तो कहता हूँ कि यह राम का ही निर्णय है ।

क्रमशः 

प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल

।। हरिः शरणम् ।।

 ।।

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