सम्भवामि युगे युगे -38
कैकेयी इतना सबकुछ जानकार विस्मित रह गई । एक तरफ़ उसका सुहाग है और दूसरी ओर परमात्मा का कार्य । माता को असमंजस में घिरा देखकर राम बोले - ‘ माता, आप यह सुना हुआ सब विस्मृत कर दें । आप परिस्थिति बनाने बिगाड़ने वाली कौन होती है ? परिस्थितियों को नियंत्रित करना प्रकृति का कार्य है । माया को अपना कार्य करने दे । आप निश्चिंत होकर रात्रि की प्रतीक्षा कीजिए ।’ इतना कहकर राम ने कैकेयी को प्रणाम किया और वहाँ से निकल गए ।
इसे परमात्मा की माया का प्रभाव कहें अथवा पुत्र के वचन सुनकर माता के हृदय को लगा आघात, कैकेयी घटनाक्रम को विस्मृत कर बैठी । सुन्न होकर बैठी कैकेयी को याद नहीं रहा कि पुत्र ने क्या कहा परन्तु ऐसा आभास अवश्य हो रहा था कि निकट भविष्य में अवश्य कुछ अशुभ घटित होने जा रहा है । सिर को एक हल्का सा झटका देकर कैकेयी उठी और पूर्व की भांति दैनिक कार्यों में व्यस्त हो गई ।
राम ने मां के पास जाकर बहुत कुछ कहते हुए भी कुछ नहीं कहा क्योंकि कैकेयी सब कुछ भूल चुकी है । अब माया का खेल शुरू अर्थात् फिर से संसार की उठापटक । मंथरा जोकि कैकेयी की सेविका थी, राजमहल जाने के लिए घर से निकली । अयोध्या को सजती देखकर विस्मय करने लगी । किसी से पूछा तो पता चला कि राम का कल राज्याभिषेक होने जा रहा है । दुःखी हुई क्योंकि अब तो राजमाता का पद कौशल्या का होगा । कैकेयी की भी जब पूछ नहीं रहेगी तो उसके सामने बेचारी मंथरा की क्या बिसात ? राजमहल पहुंचकर वही सब कुछ किया जो ईर्ष्या की मारी एक स्त्री करती है । परंतु कैकेयी कोई साधारण स्त्री तो थी नहीं, बड़ी विदुषी और बहादुर थी वह । माया को मंथरा के माध्यम से बड़ा संघर्ष करना पड़ा तब कहीं जाकर कैकेयी कोप-भवन में जाने को राज़ी हुई । कोप-भवन राजमहल का वह भाग, जहां जाकर कोई भी पटरानी राजा से अपनी नाराज़गी व्यक्त कर सकती थी । देखा गया है कि काम पिपासु व्यक्ति इसी जगह आकर स्त्री के समक्ष समर्पण कर बैठता है ।
क्रमशः
प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल
।। हरिः शरणम् ।।
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