सम्भवामि युगे युगे -37
‘ऐसा कौन सा कारण है राम, जो उन्हें मृत्यु-द्वार तक ले जाएगा’ - कैकेयी ने उत्सुकता जताई । राम ने कहा - ‘‘मां, एक बार पिताजी शिकार करने के लिए वन में गए थे । अचानक उन्हें एक दिशा से कुछ आवाज़ सुनाई दी, जिससे उन्हें लगा कि कोई हिंसक पशु तालाब से पानी पी रहा है । शिकार करने के लिए उन्होंने उस दिशा में शब्द-भेदी बाण चला दिया । पास जाकर देखा तो कोई युवा दर्द के मारे तड़प रहा था । पिताजी को बड़ा पश्चाताप हो रहा था । उन्होंने उस युवक को सहारा देकर बिठाया ।
युवक ने बताया कि वह अपने अन्धे माता-पिता को तीर्थ-यात्रा पर लेकर जा रहा है । दोनों ही प्यासे हैं । उन्होंने मुझसे जल पिलाने की मांग की तो जल भरने यहां चला आया । मैं तो मर रहा हूँ, कृपा करके मेरे अन्धे वृद्ध माता-पिता के पास जाकर उन्हें जल पिला दें । इतना कहकर युवक ने प्राण त्याग दिए । दुःखी राजा जल लेकर ढूंढ़ते हुए वृद्ध दंपति के पास पहुंचे । युवक के पिता ने पद-चाप सुनकर कहा - ‘बेटा श्रवण, आ गए ! बड़ी देर कर दी ।’ पिताजी ने उनको जल पिलाने का प्रयास किया परंतु उनके मौन ने सब कुछ स्पष्ट कर दिया था । पिताजी ने अनजाने में हुई घटना पर दुःख प्रकट किया और क्षमा मांगते हुए जल पीने का आग्रह किया परंतु दोनों ने रोते हुए इनकार कर दिया ।
प्राण त्यागते प्यासे वृद्ध दंपति ने पिताजी को श्राप दिया कि जैसे हम पुत्र वियोग में शरीर त्याग रहे हैं, ऐसे ही एक दिन आप भी पुत्र वियोग में मृत्यु शैया का वरण करेंगे । आज वही श्राप, पिताजी को मरने की स्थिति तक ले आया है ।” राम आगे कहते हैं कि अपने कर्मों का परिणाम ही व्यक्ति भुगतता है । इसके लिए किसी दूसरे को दोष नहीं दिया जा सकता । इसलिए माता आप दुःखी न हो, जो होना है वह तो होकर रहेगा । इसमें आप और मैं अथवा कोई दूसरा कर भी क्या सकता है ? समझदार वही है, जो सबकुछ जानकर बिना विचलित हुए प्रत्येक परिस्थिति का सदुपयोग करे ।
क्रमशः
प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल
।। हरिः शरणम् ।।
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