Sunday, October 11, 2026

सम्भवामि युगे युगे -39

 सम्भवामि युगे युगे -39

              रात होने पर दशरथजी कैकेयी के रनिवास पहुंचे । परंतु यह क्या, यह तो सूना पड़ा है । परिचारिका से पूछा तो उसने कोपभवन की ओर संकेत कर दिया । सदा सजी-धजी रहने वाली प्राणप्रिया आज बाल बिखेरे किसी रणचण्डी से कम नहीं लग रही थी । बड़ी मान-मनोव्वल करनी पड़ी राजा को, तब जाकर कैकेयी थोड़ी बहुत बात करने लगी । राम की शपथ दिलाकर राजा के पास अमानत के रूप में पड़े दो वरदान मांग लिए - भरत के लिए राज्य और तपस्वी भेष में राम के लिए चौदह वर्ष का वनवास । 

          राज्य चाहे राम को मिले अथवा भरत को, राजा को इससे कोई फ़र्क़ पड़ने वाला नहीं है परंतु राम से दूरी वे सहन नहीं कर सकते । कैकेयी को बहुत प्रकार से समझाया, यहां तक कि उसके पैरों तक में गिर पड़े परंतु आज तो मायातीत की माया ने सुकोमल कैकेयी को भी पाषाण हृदयी बना दिया था । ‘नहीं, राम को वन में जाना ही होगा, आपने राम की शपथ ली है । आप अपने वचन से भले ही टल जाएं परंतु टलने से पहले रघुवंश की कीर्ति का ध्यान कर लें ।’ कैकेयी किसी काली नागिन की तरह फ़न फैलाए फुँफकार रही थी ।

              नारी के मोहपाश में जकड़ा पुरुष अपना भला-बुरा नहीं समझता । इसी बंधन में बंधा वह उचित-अनुचित का विचार किए बिना पत्नी ही नहीं, किसी भी स्त्री को वचन दे सकता है । आज ये वचन तीर की भांति राजा दशरथ के हृदय को विदीर्ण कर रहे थे । उन्हें वर्षों पूर्व हुई उस घटना का स्मरण हो आया जब पुत्र वियोग में अंधे माता-पिता प्राण त्याग रहे थे । राजा समझ गए कि उनके कर्म का परिणाम आज उनके समक्ष आकर खड़ा हो गया है । राम से होने वाला वियोग ही उनकी मृत्यु का कारण बनने जा रहा है । उन्होंने कैकेयी को समझाने का अंतिम प्रयास किया परन्तु उसको मानना नहीं था तो मानी ही नहीं । तीन हठ प्रसिद्ध हैं - त्रिया-हठ, बाल- हठ और राज-हठ, परन्तु त्रिया-हठ के सामने शेष दोनों हठ बहुत बौने हैं ।

क्रमशः 

प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल

।। हरिः शरणम् ।।

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