Wednesday, September 30, 2026

सभवामि युगे युगे -28

 सम्भवामि युगे युगे -28

           उधर जय-विजय को सनकादिक ऋषियों का शाप और इधर मनु-शतरूपा को दिया वरदान, मानव देह प्राप्त करने के लिए इससे अनुकूल स्थिति क्या हो सकती है ? निर्णय हो गया कि पृथ्वी पर चलते हैं, राम बनकर । मायापति ने माया को कह दिया, जनकपुर जाओ । वहां जाकर शरीर लिया और पृथ्वी से प्रकट होकर बन गई जनकसुता जानकी । भला, प्रकृति के बिना परमात्मा लीला कैसे कर सकते हैं ? लीला तो प्रकृति के माध्यम से ही हो सकती है । लंका विजय के पश्चात् सीता कहती भी है कि सब जगह नाम तो राम का हो रहा है परन्तु उनके जन्म से लेकर सब कार्य (लीलाएँ) मेरे द्वारा ही की जा रही है । सत्य है, राम तो करने और पाने से भी परे हैं । गीता में परमात्मा स्वयं कहते हैं - शरीरस्थोपि कौन्तेय न करोति न लिप्यते ।

            मनु-शतरूपा को दिया वरदान केवल प्रसन्न होकर दिया गया वरदान नहीं था । परमात्मा जानते थे कि जय-विजय का त्रेता में भी असुरोद्धार करना है । मनु हुए अवध के राजा दशरथ और शतरूपा वहां की पटरानी कौशल्या । राजा को चाहिए पुत्र । पुत्रेष्टि यज्ञ सम्पन्न कराया, वशिष्ठजी के आग्रह पर शृंगी ऋषि ने । यज्ञ भगवान की कृपा से तीन रानियों के चार पुत्र हुए - कौशल्या से राम, कैकेयी से भरत तथा सुमित्रा से लखन और रिपुदमन । सभी का बड़े लाड़-प्यार से लालन-पालन होने लगा । बड़े हो रहे हैं परंतु राम को राजमहल कुछ रूच नहीं रहा है । 

         परमात्मा के अवतरण का उद्देश्य तो भूमि को असुरों के भार से मुक्त करना है, राजमहल का सुख भोगना नहीं है । धर्मशील जन बाहर संसार में बैठे भगवान को सहायता के लिए पुकार रहे हैं, ऋषि लोग यज्ञ नहीं कर पा रहे हैं । असुरों ने तांडव मचा रखा है । अधर्म बढ़ते हुए ऐसी स्थिति में आ गया है कि वह धर्म को दबाने लगा है । ऐसे में भला राम कब तक राजमहल में रुक सकते हैं ? भक्त पुकारे और भगवान हाथ पर हाथ धरे बैठे रहें, क्या ऐसा भी कभी हो सकता है ? निकलना होगा राजमहल से बाहर परंतु कैसे ? इसमें भी माया ही कुछ सहायता करेगी ।

 क्रमशः 

प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल

 ।। हरिः शरणम् ।।

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