Sunday, September 27, 2026

सम्भवामि युगे युगे -25

 सम्भवामि युगे युगे -25

          इस प्रकार हमने कथा के अन्तर्गत देखा कि प्रतापभानु स्वयं रावण हुआ, उसके भाई ने कुम्भकर्ण के रूप में जन्म लिया और जो सात्विक गुणों से युक्त प्रतापभानु का एक मन्त्री था, वह बना उसका छोटा भाई विभीषण । विभीषण ने राक्षस राज में रहते हुए भी अपने पूर्व जीवन की शुचिता को बनाए रखा । सदैव उस परमात्मा का स्मरण करता रहता था, जिसका नाम लेना भी रावण-राज में अपराध माना जाता था, यहां तक कि स्वयं रावण भी उन्हें वनवासी कहता था । विभीषण को भक्ति के कारण भगवान भी मिले और लंका का राज भी ।

               पुनः स्मरण करा दूँ कि परमात्मा ने ही प्रकृति और उसके विधान बनाए हैं । इसके बाद जो कुछ भी करती है अथवा जो कुछ भी होता है, सब प्रकृति के माध्यम से ही होता है , परमात्मा की भूमिका केवल एक साक्षी होने तक ही सीमित रहती है । परमात्मा तभी अवतरित होते हैं, जब धर्म की हानि और अधर्म की अनियंत्रित रूप से वृद्धि होने लगती है । परमात्मा भी अपने प्रकटीकरण में प्रकृति को अधीन करते हुए उसकी सहायता लेते हैं । प्रकृति ने ही मनुष्य को कर्म स्वतंत्रता दी है । मनुष्य के द्वारा किए जाने वाले कर्मों के परिणाम देने के लिए प्रकृति ही उसे विभिन्न शरीरों में घुमाती रहती है ।

            चलें, आगे बढ़ते हैं और प्रवेश करते हैं, जय-विजय के दूसरे राक्षस जीवन की कथा में । ऋषि विश्रवा (ऋषि पुलस्त्य के पुत्र) का दैव योग से राक्षसी कैकसी के साथ विवाह हो जाता है । संतान के रूप में दसग्रीव पैदा होते हैं । दसग्रीव के दो सगे भाई भी हैं - कुम्भकर्ण और विभीषण । एक बहिन भी है - सूपनखा । एक सौतेला भाई कुबेर भी हैं जो विश्रवा की पहली पत्नी इलविला के पुत्र हैं । इस प्रकार पुलस्त्य कुल में राज्य का उत्तराधिकारी कुबेर को होना चाहिए था परन्तु हो गया, रावण ।

क्रमशः 

प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल

।। हरिः शरणम् ।।

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