सम्भवामि युगे युगे -27
कुबेर का पैतृक स्थान उसके हाथ से निकल गया जबकि लंका का वास्तविक उत्तराधिकारी वही था । उसका पुष्पक विमान छीन लिया गया, उसकी सारी सम्पति हड़प ली गई । भागकर कुबेर अपने आराध्य के चरणों में जा बैठा । कैलाश की तलहटी में स्थित मानसरोवर झील में अपना महल बना लिया । विभीषण तो रावण का सगा भाई है । उसका लंका में रहना पारिवारिक दृष्टि से उचित ही था, इसलिए उसकी उपस्थिति को सहन भी करना पड़ा । असुर और भक्त के मध्य सदैव ही छत्तीस का आँकड़ा रहता है । एक न एक दिन दोनों में दुराव होना निश्चित ही था । एक दिन रावण ने विभीषण को लंका से लात मारकर निष्कासित कर दिया । भक्त का एक ही आश्रय होता है - भगवान का । लंका से निकलकर पहुंच गया उनकी शरण में । यही विभीषण दैवयोग से रावण का काल बना ।
रावण का अहंकार उसके सर चढ़कर बोल रहा था । उसके आतंक से पृथ्वी व्यथित हो गई । पृथ्वी और सभी देवताओं को साथ लेकर ब्रह्माजी पहुँच गए, श्रीहरि के यहां । आश्वासन मिल गया - आ रहा हूँ, भूमि का भार उतारने । मैंने पूर्व में भी कहा है कि परमात्मा को धर्म की पुनः स्थापना करने के लिए पंच भौतिक देह लेकर ही आना पड़ता है । वे भी बैकुण्ठ में बैठे-बैठे ही करने को सब कुछ कर सकते हैं, पर नहीं करते । वहीं बैठे-बैठे करने में उनका बनाया विधान ही बाधक बन जाता है । विधान बनाने वाला विधान को तोड़ भी सकता है परन्तु वे नहीं तोड़ते । वे हम जैसे मनुष्यों के सामने अनुकरणीय उदाहरण प्रस्तुत करना चाहते हैं ।
उनके विधान को लागू करने का कार्य माया (प्रकृति) करती है । प्रकृति ही सृष्टि रचती है, उसका संचालन करती है और समय आने पर वह सृष्टि को समेट भी लेती है । जब भी अवतरित होने के लिए परमात्मा को देह चाहिए होती है, वे प्रकृति को अपने अधीन कर देह प्राप्त कर लेते हैं ।
क्रमशः
प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल
।। हरिः शरणम् ।।
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