सम्भवामि युगे युगे -24
पराजित राजा सदैव विजयी राजा से अपना क्षेत्र येन केन प्रकारेण पुनः छीन लेने के अवसर की प्रतीक्षा करता है । शीघ्र ही वह दिन भी आ गया । पराजित राजा एकतनु नाम से साधु का वेश बनाकर जंगल में प्रतापभानु की प्रतीक्षा कर रहा था । माया का खेल देखिए, मृगया के लिए निकला प्रताप जंगल में राह भटक गया । पहुंच गया एकतनु की कुटिया पर । उसी रात छल लिया पराजित ने विजयी को । किसी के सभी दिन सदैव एक समान नहीं रहते । प्रतापभानु उसके जाल में फँस गया ।
विजयी को अक्षुण्ण राज्य चाहिए और पराजित को विजयी का सारा राज्य । इस संसार में सभी को कुछ न कुछ चाहिए, यहां कोई संतुष्ट नहीं है । लोभ में आकर राजा ने साधु बने एकतनु से उपाय पूछा । इसी अवसर की ताक में ही तो था वह पराजित राजा । एकतनु ने कुछ ऐसी ही सिद्धियों का प्रदर्शन किया कि प्रतापभानु उस पर विश्वास कर बैठा । राज्य को अक्षुण्ण बनाए रखने का कोई उपाय ? एकतनु बोला - ‘कल सभी विप्रों को भोज के लिए आमंत्रित करें और आप स्वयं उनको भोजन परोसें । आपके रसोइए के भेष में मैं स्वयं वहाँ आकर उनके लिए भोजन बनाउंगा । भोजन कर विप्रजन प्रसन्न हो गए तो जीवनभर आपका राज अक्षुण्ण रहेगा ।’
राजा प्रताप को माया-बल से रात को ही घोड़े सहित राजमहल पहुंचा दिया गया । एकतनु ने संपूर्ण राजमहल में अपना मायाजाल फैला दिया और स्वयं रसोइया बनकर वहां जा पहुंचा । प्रतिशोध की धधकती ज्वाला को शान्त करने के लिए हिरणों के मांस के साथ ब्राह्मण का मांस मिला दिया । प्रतापभानु ने ब्राह्मणों को भोजन परोसा । आकाशवाणी हुई और ब्राह्मणों को पता चल गया कि भोजन अभक्ष्य है । ब्राह्मणों के पास देने के लिए दो ही चीजें हैं - आशीर्वाद और श्राप । प्रसन्न हो गए तो आशीर्वाद मिलेगा और रुष्ट हो गए तो श्राप । क्रोधित ब्राह्मणों ने प्रतापभानु को सपरिवार राक्षस होने का श्राप दे डाला । वही प्रतापभानु त्रेतायुग में परिवार सहित राक्षस बना जिसका नाम था - रावण । छोटा भाई अरिमर्दन का जन्म कुम्भकरण के रूप में हुआ । बड़े धार्मिक विचारों वाले और राजा को न्यायसंगत व हितकारी सलाह देने वाले सचिव धरमरुचि विभीषण बने ।
क्रमशः
प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल
।। हरिः शरणम् ।।
No comments:
Post a Comment