आसक्ति से अनुरक्ति की ओर -6
दोलक का बांयी और जाना आसक्ति है और दायीं और जाना विरक्ति । अनासक्ति है, दोलक का मध्य में ठहर जाना । आसक्ति जितनी अधिक तीव्र होगी, विरक्ति भी उतनी ही तेज़ होगी । विरक्ति के नाटक से जब व्यक्ति उब जाता है, तब वह पुनः आसक्ति की और लौट आता है, मध्य में एक पल के लिए भी नहीं ठहरता । आसक्ति से जब मोह भंग होता है, वह पुनः विरक्ति की ओर चल देता है, मध्य में एक क्षण के लिये भी नहीं ठहरता ।
एक दोलक की भांति सदैव दोलन (Oscillation) करते रहना व्यक्ति की नियति (Destiny) बन चूका है । अगर आप किसी अति आसक्त व्यक्ति (Attached person) को विरक्त होते हुए देखो तो कभी भी यह मत समझना कि वह सदैव के लिए विरक्त हो चूका है । वह कभी भी पुनः उतना ही अधिक तेजी के साथ आसक्त भी हो सकता है । सब कुछ मन का खेल है और मन ही उसे आसक्ति और विरक्ति के मध्य भटकाता रहता है, अनासक्त होने ही नहीं देता । आज जो हमारा सर्वाधिक प्रिय व्यक्ति है, वह एक दिन भी अगर हमारा कहना नहीं माने तो हम तत्काल उससे दूरी बना लेते हैं । उस व्यक्ति से हमारी अधिक समीपता उसके प्रति रहे हमारे आसक्त भाव को बतलाती है और तत्काल होने वाली उससे दूरी हमारी विरक्ति को प्रदर्शित करती है । वास्तव में देखा जाये तो यह हमारा मन ही है, जो हमें आसक्ति और विरक्ति के मध्य में झुला रहा है और मध्य में ठहरने का अवसर ही नहीं देता ।
क्रमशः
प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल
।। हरिः शरणम् ।।
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