आसक्ति से अनुरक्ति की ओर -5
पहला भिक्षु जो कि निर्विकार भाव से अपने रास्ते चल रहा है, वह विरक्त है । दूसरा भिक्षु, जिसने युवती को नदी पार कराने से इनकार कर दिया, उसके मन में अभी भी वह स्त्री बसी हुई है । वह भिक्षु उस युवती के प्रति आसक्त है । तीसरा युवा भिक्षु अनासक्त है, उसने युवती की सहायता करने को उसका हाथ पकड़ा था परंतु उसके मन ने स्त्री को नहीं पकड़ा था । विरक्ति, आसक्ति और अनासक्ति में यही मूलभूत अंतर है ।
अनासक्ति का अर्थ है, न तो विरक्ति और न ही आसक्ति, एक दम मध्य में रहना । भगवान बुद्ध ने इस साम्य अवस्था प्राप्त कर लेने को मंझिम निकाय कहा है । मंझिम निकाय अर्थात् मध्य में रहना । एक गृहस्थ के लिए अनासक्त होना ही सर्वोत्तम मार्ग है ।
इस कहानी से ही अनासक्ति (Detachment) की बात को आगे लिए चलते हैं । ऐसा नहीं है कि हम अनासक्त भाव को बड़ी सुगमता से और जीवन में कभी भी पकड़ सकते हैं । बड़ा ही कठिन है, अनासक्त होना । आसक्त होने में कुछ भी नहीं लगता, विरक्त होने की नौटंकी भी की जा सकती है परन्तु अनासक्त होने का तो नाटक भी नहीं किया जा सकता । भगवान बुद्ध का मंझिम निकाय का एक ही अर्थ है, मध्य में रहना । एक दोलक (Pendulum) जब गति करता है तो पहले बांयी तरफ जाता है और फिर उतनी ही तेज़ गति के साथ दायीं ओर चला जाता है, मध्य में वह ठहर ही नहीं सकता । हाँ, केवल एक परिस्थिति में वह मध्य में ठहरता है जब गुरुत्वाकर्षण बल का प्रभाव उसे वहाँ ठहरने को मजबूर कर दे ।
क्रमशः
प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल
।। हरिः शरणम् ।।
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