Saturday, May 23, 2026

आसक्ति/अनुरक्ति

 आसक्ति/अनुरक्ति 

                परमात्मा ने इस जगत् (प्रकृति) का निर्माण करते हुए इसमें गुणों से युक्त विभिन्न प्रकार के पदार्थ बनाए हैं । इन पदार्थों से जुड़कर जीव सुख- दुःख का अनुभव करता है । जगत् भी परमात्मा है और पदार्थ में उपस्थित गुण भी परमात्मा हैं । गुणों के कारण पदार्थ में हो रही क्रियाओं से परमात्मा को सुख-दुःख का अनुभव नहीं होता क्योंकि उन्होंने गुणों से कोई सम्बन्ध नहीं रखा है । गुण उनके कारण हैं अवश्य, फिर भी वे गुणों में नहीं है और न ही गुण उनमें हैं । वे तो गुणातीत हैं ।

       भगवान कहते हैं कि ‘ममैवांशो जीवलोके जीवभूत: सनातन:’ (गीता - 15/7) - इस लोक में यह जीव बना हुआ आत्मा (जीवात्मा) मेरा ही सनातन अंश है । फिर यह विवेकवान जीव (मनुष्य) गुणों से मिल रहे सुख-दुःख के अनुभव को अपने में, अपने द्वारा और अपने लिए क्यों मानने लगा है ? सुख-दुःख का स्वयं में अनुभव करना, उसे परमात्मा का अंश होने से नीचे के स्तर पर ले आता है । इस पतन का कारण है, उसके द्वारा गुणों का संग कर लेना अर्थात् गुणों में आसक्त हो जाना । गुणों का संग कर लेने के कारण ही वह विभिन्न प्रकार की उच्च-निम्न योनियों में भटकता रहता है और परमात्मा का अंश होने के बावजूद भी जन्म-मरण से मुक्त होकर उन तक पहुँच नहीं पाता । 

       परमात्मा ने तो प्रकृति का निर्माण कर उसमें गुणों को डालते हुए स्वयं को इनसे अलग कर लिया परन्तु यह जीवात्मा उनका अंश होते हुए भी प्रकृति के गुणों से स्वयं को अलग क्यों नहीं कर पा रहा है ? इसका उत्तर है - उसका गुणों के प्रति आसक्ति-भाव । इस आसक्ति से दूर हटने का भी क्या कोई रास्ता है ? हाँ है - परमात्मा में अनुरक्ति अर्थात् गुणों में आसक्ति को छोड़ने के लिए आवश्यक है कि हमारी परमात्मा में अनुरक्ति हो । आइए ! कल से इसी विषय पर चर्चा को आगे बढ़ाते हैं और चलते हैं -‘आसक्ति से अनुरक्ति की ओर’ ।

।। हरिः शरणम् ।।

प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल

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