आसक्ति से अनुरक्ति की ओर -2
विरक्त का अर्थ है बिना राग के अर्थात् जिस व्यक्ति का संसार और उसके पदार्थों से वैराग्य हो गया हो । एक विरक्त व्यक्ति पुनः संसार की आसक्ति में कभी भी फँस सकता है । जैसे एक दोलक (Pendulum) जब बाईं ओर की उच्च अवस्था तक पहुँच जाता है तब वह वहाँ ठहर नहीं सकता । गति करते हुए वह दाईं ओर जाता है और वहाँ भी उच्चतम स्तर को छूकर पुनः बाईं ओर गति करता है । यही स्थिति आसक्ति और विरक्ति की है । आसक्त व्यक्ति कभी भी विरक्त हो सकता है और विरक्त कभी भी आसक्ति की ओर लौट सकता है । विरक्ति में आसक्ति का भी थोड़ा अंश छिपा रहता है और आसक्ति में विरक्ति का । बस, केवल परिस्थिति बदलने की देर है कि आसक्ति विरक्ति में बदल जाती है और विरक्ति आसक्ति में ।
आसक्ति और विरक्ति के मध्य भी एक स्थिति बन सकती है - अनासक्ति की । दोलक दोलन करते हुए कभी बाईं ओर जाता है और कभी दाईं ओर । दोनों ही स्थितियों में सर्वोच्च स्तर पर जाकर वह कुछ क्षण के लिये रूकता है लेकिन गुरुत्वाकर्षण बल के कारण वह स्थाई रूप से वहां रूक नहीं सकता । दोनों ओर की ऊँचाइयों के बिलकुल मध्यम में भी एक स्थिति आती है, जहां पर वह स्थाई रूप से ठहर सकता है । इसी प्रकार आसक्ति और विरक्ति के एकदम मध्यम में भी एक स्थित बनती है और उस स्थिति का नाम है - अनासक्ति अर्थात् न तो आसक्ति और न ही विरक्ति । अनासक्ति को वीतरागिता भी कहते हैं अर्थात् न किसी में राग और न किसी से द्वेष । भगवान श्री कृष्ण न रागी थे और न ही वैरागी बल्कि वे वीतरागी थे, अनासक्त थे ।
क्रमशः
प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल
।। हरिः शरणम् ।।
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