आसक्ति से अनुरक्ति की ओर -1
आसक्ति और अनुरक्ति, दो शब्द, एक अर्थ परन्तु भावार्थ भिन्न भिन्न । आसक्त वह है जो अपने स्वार्थ के कारण किसी के साथ जुड़ा है, जबकि अनुरक्ति का स्वार्थ से कोई सम्बन्ध ही नहीं है । आसक्ति कामना को जन्म देती है जबकि अनुरक्ति में व्यक्ति निष्काम (कामना रहित) हो जाता है । आसक्ति का सम्बन्ध मोह और वासना से है जबकि अनुरक्ति में प्रेम और त्याग का महत्व है । आसक्त और अनुरक्त, दोनों ही व्यक्ति प्रेम की बात करते हैं । आसक्ति में प्रेम केवल दिखावा बन जाता है, उसमें प्रेम का मात्र प्रदर्शन है जबकि अनुरक्ति में निःस्वार्थ प्रेम होता है ।
आसक्ति सांसारिक बन्धन है जबकि अनुरक्ति आपको संसार से मुक्त करती है । आसक्ति आपको जीवनभर अशान्त और दुःखी बनाए रखती है जबकि अनुरक्ति आपको मुक्त करते हुए परमात्मा के द्वार तक ले जाती है । सबसे बड़ी बात - आसक्ति में सदैव दो की उपस्थिति बनी रहती है जबकि अनुरक्ति में दोनों एक दूसरे में खो जाते हैं और केवल एक ही शेष रहता है । संसार से प्रेम करना आसक्ति है जबकि परमात्मा से प्रेम करना अनुरक्ति ।
आसक्ति से मुक्त व्यक्ति विरक्त कहलाता है । आसक्त का अर्थ है, उस व्यक्ति का किसी न किसी में राग है और वह राग होता है अपने द्वारा निर्मित संसार के पदार्थों के साथ, जिससे उसे सुख मिलने की आशा रहती है ।
क्रमशः
प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल
।। हरिः शरणम् ।।
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