आसक्ति से अनुरक्ति की ओर -3
एक गृहस्थ का जीवन भी आसक्ति और विरक्ति के मध्य डोलता रहता है । आसक्ति और विरक्ति दोनों के ही अस्थाई होने के कारण वह कभी भी मुक्त नहीं हो पाता । इसलिए मुक्त होने के लिए आवश्यक है कि वह अनुरक्त हो जाए । अनुरक्ति में अनुराग होता है अर्थात् अनुरक्त वह है जिसमें आसक्ति तो है परंतु उसकी आसक्ति संसार में न होकर परमात्मा में है । अनुरक्ति में संसार से सम्बन्ध तो रहता है परन्तु वह संबंध मोह, ममता से रहित निःस्वार्थ होता है, साथ ही परमात्मा से सम्बन्ध श्रद्धा, विश्वास और प्रेम का होता है ।
आसक्ति को अनुरक्ति में परिवर्तित करने का रास्ता अनासक्ति से होकर गुजरता है । सर्वप्रथम आसक्त को अनासक्त होना होगा । फिर अनासक्ति को अनुरक्ति में परिवर्तित होते देर नहीं लगेगी ।
यह अनासक्ति कैसे हमें परमात्मा के द्वार तक ले जाती है ? कैसे यह सांसारिक प्रेम को पारमात्मिक प्रेम में बदल देती है ? जानने के लिए सबसे पहले अनासक्ति क्या है ? यह जानना होगा । तो चलिए ! आसक्ति से अनुरक्ति की ओर बढ़ते हुए अनासक्त होने का प्रयास करते हैं । सबसे पहले एक दृष्टान्त के माध्यम से जानने का प्रयास करते हैं कि अनासक्ति क्या है ?
क्रमशः
प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल
।। हरिः शरणम् ।।
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