Thursday, May 28, 2026

आसक्ति से अनुरक्ति की ओर -4

 आसक्ति से अनुरक्ति की ओर -4 

            एक बार तीन बौद्ध भिक्षु भिक्षा लेने के लिए पास के ही गांव की ओर जा रहे थे । गांव पहुंचने के लिए रास्ते मे एक नदी को पैदल ही पार करना पड़ता था । नाव का कोई साधन नहीं था । जब तीनों भिक्षु नदी किनारे पहुंचते हैं तो देखते हैं कि एक षोडशी नदी के उस पार जाने के लिए पहले से ही खड़ी है । उसकी हिम्मत नदी के प्रवाह में उतरने की नहीं हो रही थी । उसने सबसे आगे चल रहे पहले भिक्षु को हाथ पकड़ कर नदी पार कराने को कहा । उस भिक्षु का उस कन्या की ओर ध्यान ही नहीं गया । कन्या ने पीछे चल रहे दूसरे भिक्षु से हाथ पकड़कर नदी पार कराने को कहा । भिक्षु ने इस प्रकार एक कन्या को हाथ पकड़कर नदी पार कराने को एक साधु के लिए अनुचित मानते हुए इनकार कर दिया । लाचार युवती ने अंतिम प्रयास करते हुए तीसरे युवा भिक्षु से सहायता मांगी । तुरंत ही उस युवक भिक्षु ने युवती का हाथ पकड़ा और सहारा देते हुए नदी पार करा दी । पार पहुंचकर युवती ने उस भिक्षु का बड़ा आभार माना और अपने रास्ते चल दी ।

                तीनो भिक्षु गांव में प्रवेश कर रहे हैं । पहला भिक्षु निर्विकार भाव से सबसे आगे अपने रास्ते पर चल रहा है । दूसरा भिक्षु बार बार तीसरे भिक्षु को उस युवती का हाथ पकड़कर नदी पार कराने को अनुचित बतला रहा है । साथ ही वह उस युवा भिक्षु की शिकायत भगवान बुद्ध से करने की धमकी भी दे रहा है । आख़िरकार तीसरे भिक्षु से रहा नहीं गया, उसे दूसरे भिक्षु को उत्तर देना ही पड़ा । तीसरे युवा भिक्षु ने उस दूसरे भिक्षु को कहा कि मैंने तो उस युवती का हाथ नदी पार कराते ही छोड़ दिया था परंतु आप तो अभी तक उस युवती को मन ही मन पकड़े हुए हैं ।

क्रमशः

प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल

।। हरिः शरणम् ।।

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