ज्ञान उदय जब होत है …..29
गीताजी के इन दो श्लोकों (5/ 8-9) को समझकर पुनः उसी आश्रम में चलते हैं जहां पहले के दो सन्त तो जा चुके हैं और तीसरा सन्त बैठा हुआ अपने दादा गुरु और गुरु के द्वारा कहे गए शब्दों पर विचार कर रहा है । विचार ही विवेक की जननी है । देखते हैं, विवेक जाग्रत होता है अथवा नहीं ।
तीसरा सन्त जो अब गुरु है विचार कर रहा है कि मेरे दादा गुरु ने भूखे बगुले को मछली मारने से रोक दिया इसलिए वे स्वर्ग पाने से दूर हो गए । मेरे गुरु ने मछली के साथ क्रीड़ा कर रहे बगुले को नहीं उड़ाया इसलिए नरक में मछली की तरह तड़फना पड़ा । तीसरा ऐसा कौन सा रास्ता हो सकता है, जिससे मुझे नरकगामी न होना पड़े । तालाब भी रहेगा, उसमें मछलियाँ भी होंगी और अपना पेट भरने के लिए बगुले भी आएंगे । तो क्या मैं अपनी कुटिया के बाहर बैठना ही छोड़ दूँ जिससे बगुले द्वारा मछली के शिकार किए जाने पर मेरी दृष्टि ही न पड़े ।
वर्तमान सन्त को यही उपाय उचित लगा । तत्काल ही वह वहाँ से उठा और अपनी कुटिया के भीतर बैठकर ध्यान करने लगा । परन्तु यह क्या हुआ ? आज तो ध्यान हो ही नहीं रहा । ध्यान में जाने पर अपने गुरु की कही बात याद आने लगती, फिर कल्पना में मछली मारता बगुला दिखाई देता, उसे उड़ाने को हाथ उठता पर गुरु की बात याद कर रुक जाता । झुंझला कर फिर गुरु की बात पर विचार करने लगता परन्तु क्या करूँ क्या न करूँ, इसका उत्तर उसे नहीं मिल पाया ।
क्रमशः
प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल
।। हरिः शरण
म् ।।
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